भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 512, कुल 1167 में से

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गुडूच्यादिवर्गः ४६१ (१) इसकी २ छटाक जड़ को चौगुने जल में १५ मिनट उबाल कर १-२ छटाक की मात्रा में दीपन, पाचन, पौष्टिक रूप में दो बार पिलाते हैं। (२) गंडमाला तथा शोथ में इसको खिलाते हैं तथा बाह्य लेप भी करते हैं। ग्रन्थि पर बाँस के पत्तों के साथ इसकी जड़ का लेप करने से लाभ होता है। (३) अर्श में इसके क्वाथ में बैठाने से पीड़ा शांत होती है। (४) उरुस्तम्भ में इसकी जड़ को गोमूत्र में पीस कर लेप करते हैं या करंज के साथ क्वाथ बनाकर उससे सिंचन करते हैं। (५) वसामेह तथा इक्षुमेह में इसकी जड़ का क्वाथ पिलाया जाता है। (६) इसकी जड़ को पीसकर घृत के साथ सेवन करने से १ सप्ताह में शीतपित्त, उददर्द तथा कोठ आदि अच्छे होते हैं। (७) अतिस्थौल्य में इसका रस दिया जाता है। मात्रा- चूर्ण १-२ माशा। अथ श्योनाकः (सोनापाठा-अरलू)। तस्य नामानि गुणाँश्चाह श्योनाकः शोषणश्च स्यान्नटकट्वङ्गटुण्डुकाः । मण्डूकपर्णपत्रोर्णशुकनासकुटन्नटाः ॥२५॥ दीर्घवृन्तोऽरलुश्चापि पृथुशिम्बः कटम्भरः । श्योनाको दीपनः पाके कटुकस्तुवरो हिमः । ग्राही तिक्तोऽनिलश्लेष्मपित्तकासप्रणाशनः ॥२६॥ सोनापाठा या अरलू के नाम तथा गुण-श्योनाक, शोषण, नट, कट्वङ्ग, टुण्टुक, मण्डूकपर्ण, पत्रोर्ण, शुकनास, कुटन्नट, दीर्घवृन्त, अरलु, पृथुशिम्ब और कटम्भर ये सब संस्कृत नाम 'सोनापाठा' के हैं। सोनापाठा- अग्निदीपक, पाक में कटुरस तथा स्वाद में कषाय और तिक्तरस से युक्त, शीतवीर्य और मलसंग्राहक है। यह वात, कफ, पित्त तथा कास का विनाशक है। [२५-२६] अथ श्योनाकस्य बालप्रौढफलयोर्गुणानाह टुण्डुकस्य फलं बालं रूक्षं वातकफापहम् ॥२७॥ हृद्यं कषायं मधुरं रोचनं लघु दीपनम् । गुल्मार्शःकृमिहत् प्रौढं गुरु वातप्रकोपणम् ॥२८॥ इसके कोमल तथा प्रौढ़ फल के गुण-सोनापाठा का कोमल फल रूक्ष, वातकफनाशक, हृदय को हितकर, कषाय तथा मधुररस युक्त, रोचक, लघु तथा अग्निदीपक एवं गुल्म, बवासीर तथा कृमि का नाशक होता है। इसका प्रौढ़ (पूरा तैयार) फल-गुरु तथा वात को प्रकुपित करने वाला होता है। [२७-२८] ९. सोनापाठा हिं०-सोनापाठा, शोनाक, सोनपत्ता, टेंटू, अरलु। बं०-शोण, सोनागाछ। म०-टेंटू। गु०-टेंटु। ते०- दुन्दिलुम्, पंपन। उ०-पम्पोनिया। पं०-मुलिन, तात्पलङ्ग। ता०-पन, वंग। ने०-तोतिल्ल। कोल०-अरेंगेवनुं। सन्ता०-बनहाटक। गोंड०-जयमंगल। आसा०-केरिंग। का०-तातर। वर्मा-क्योंग-शा। सिलो०-तोतिल्ल। ले०-Oroxylum indicum Vent. (ओरोक्झाइलम् इण्डिकम् वेण्ट)। Fam. Bigoniaceae (बिग्नोनिएसी)। यह सब प्रान्तों में कहीं-कहीं पाया जाता है किन्तु पश्चिम प्रान्त की सूखी भूमि में यह देखने में नहीं आता। इसका वृक्ष-मध्यमाकार का होता है तथा शाखाएँ थोड़ी होती हैं। छाल-चौथाई इञ्च तक मोटी, कार्कयुक्त तथा बादामी सफेद रङ्ग की चिकनी, हल्की और कोमल होती है। इसको काटने से किंचित् हरियाली लिये रस निकलता है।

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