भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६२ भावप्रकाशनिघण्टुः काट-१/२-१ इञ्च मोटा, अन्दर की ओर रेशेदार, पीला और बाहर की ओर हरिताभ होता है। लकड़ी-पीलापन युक्त सफेद, हल्की और सार रहित होती है। पत्ते-२-४ फीट लम्बे, द्विपक्षवत् सदल तथा शाखग्रों पर प्रायः समूहबद्ध होकर पाये जाते हैं। पत्रनाल और पत्रदण्ड पर दाने पड़े होते हैं। पत्रक-२।।-५ इञ्च लम्बे, १।।-४ इञ्च चौड़े, लट्वाकार या अंडाकार, लम्बाग्र तथा अखण्ड होते हैं। फूल-बहुत बड़े, मांसल और जामुनी रंग के तथा अग्र्य मंजरियों में सवृन्तकाण्डज क्रम से निकले रहते हैं। इनकी गन्ध अच्छी नहीं होती। फलियाँ-१-३ फुट लम्बी, २-३।। इञ्च चौड़ी, चिपटी, तलवार के समान टेढ़ी एवं कठोर होती हैं। बीज-सफेद, चिपटे, गोल, २-३ इञ्च व्यास वाले तथा आधार के अतिरिक्त चारों ओर पंखयुक्त होते हैं। इसके मूल की छाल का दशमूल में उपयोग किया जाता है। यह हलके पीले रंग की रहती है तथा इसका स्वाद कुछ कड़वा तथा कुछ तीता रहता है। इसमें गन्ध नहीं होती। रा० नि० ने इसके यद्यपि दो भेद लिखे हैं तथापि गुणों में अन्तर नहीं लिखा है। कुछ लोग 'अरलू' नाम से Alianthus excelsa Roxb. (ऐलेन्थस् एक्सेल्सा राक्स.) लेते हैं और उसी को रा० नि० का श्योनाक भेद मानते हैं। ऐलेन्थस् एक्सेल्सा को कुछ लोगों ने महानिंब माना है। रासायनिक संगठन-इसकी छाल में ओरोक्झाइलिन् (Oroxylin) नामक एक कडुवा रवेदार ग्लूकोसाइड, कटुपदार्थ, पेक्टिन, तैल एवं मोम आदि पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-सोनापाठा के मूल की छाल उत्तम स्वेदजनन, कुछ वेदनास्थापन, दीपन, बस्तिरोगहर, स्तम्भन, व्रणरोपण एवं शोथहर है। इसके बीज रेचक होते हैं। इसकी छाल का प्रयोग आमवात, अतिसार, कास, अरुचि एवं ज्वर में किया जाता है। (१) शोथ तथा वातप्रधान रोगों में श्योनाकमूल देते हैं। यह नवीन आमवात में बहुत लाभ करता है। सोंठ के साथ इसका फांट (१ : १०) बनाकर १ औंस दिन में त्रिबार देते हैं। इसके चूर्ण के साथ अफीम मिलाई जा सकती है। यह डोवर्स् पाउडर (Dover's powder) की अपेक्षा उत्तम स्वेदजनन तथा वेदनाहर है। छाल का क्वाथ अधिक स्तम्भन होने के कारण इसके फांट का प्रयोग उचित है। विवन्ध होने पर एरंड तैल का प्रयोग करना चाहिये। आमवात में इसके क्वाथ से शोथयुक्त संधियों को सेंकते हैं जिससे सूजन तथा पीड़ा कम होती है। (२) इसकी छाल के कल्क तथा पद्मकेसर को गंभारी एवं कमल के पत्तों में लपेटकर, पुटपाक करके निकला हुआ रस शीत होने पर मधु मिलाकर, अतिसार में दिया जाता है। (३) इसकी छाल से सिद्ध तैल का उपयोग कर्णस्राव तथा कर्णशूल में किया जाता है। बहुत दिन के प्रयोग के बाद इससे लाभ होता है। (४) कहा जाता है कि अठन्नी भर छाल पीसकर छानकर दूध के साथ पिलाने से मिर्गी में लाभ होता है। (५) कर्णमूल शोथ में इसके बीज और हरिमेद दोनों पीसकर लगाये तथा पिलाये जाते हैं। मात्रा-चूर्ण १०-२० र० त्रिकटु के साथ। अथ बृहत्पञ्चमूलम् । तस्य लक्षणं गुणाँश्चाह श्रीफलः सर्वतोभद्रा पाटला गणिकारिका। श्योनाकः पञ्चभिस्तैःतैः पञ्चमूलं महत्स्मृतम् ।। २९ ।। पञ्चमूलं महत् तिक्तं कषायं कफवातनुत्। मधुरं श्वासकासघ्न्नमुष्णं लघ्वग्निदीपनम् ।। ३० ।। बृहत् पञ्चमूल के लक्षण तथा गुण-बेल, गम्भारी, पाढल, अरनी और सोनापाठा इन पाँचों वृक्षों के मूल एकत्र करने से 'बृहत् पञ्चमूल' होता है। बृहत् पञ्चमूल-तिक्त, कषाय तथा मधुर रसयुक्त, कफवातनाशक एवं श्वास तथा कास को दूर करने वाला, उष्णवीर्य, लघु और अग्निदीपक होता है। [२९-३०]