भारतकोश
संग्रह पर लौटें

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

४६२ भावप्रकाशनिघण्टुः काट-१/२-१ इञ्च मोटा, अन्दर की ओर रेशेदार, पीला और बाहर की ओर हरिताभ होता है। लकड़ी-पीलापन युक्त सफेद, हल्की और सार रहित होती है। पत्ते-२-४ फीट लम्बे, द्विपक्षवत् सदल तथा शाखग्रों पर प्रायः समूहबद्ध होकर पाये जाते हैं। पत्रनाल और पत्रदण्ड पर दाने पड़े होते हैं। पत्रक-२।।-५ इञ्च लम्बे, १।।-४ इञ्च चौड़े, लट्वाकार या अंडाकार, लम्बाग्र तथा अखण्ड होते हैं। फूल-बहुत बड़े, मांसल और जामुनी रंग के तथा अग्र्य मंजरियों में सवृन्तकाण्डज क्रम से निकले रहते हैं। इनकी गन्ध अच्छी नहीं होती। फलियाँ-१-३ फुट लम्बी, २-३।। इञ्च चौड़ी, चिपटी, तलवार के समान टेढ़ी एवं कठोर होती हैं। बीज-सफेद, चिपटे, गोल, २-३ इञ्च व्यास वाले तथा आधार के अतिरिक्त चारों ओर पंखयुक्त होते हैं। इसके मूल की छाल का दशमूल में उपयोग किया जाता है। यह हलके पीले रंग की रहती है तथा इसका स्वाद कुछ कड़वा तथा कुछ तीता रहता है। इसमें गन्ध नहीं होती। रा० नि० ने इसके यद्यपि दो भेद लिखे हैं तथापि गुणों में अन्तर नहीं लिखा है। कुछ लोग 'अरलू' नाम से Alianthus excelsa Roxb. (ऐलेन्थस् एक्सेल्सा राक्स.) लेते हैं और उसी को रा० नि० का श्योनाक भेद मानते हैं। ऐलेन्थस् एक्सेल्सा को कुछ लोगों ने महानिंब माना है। रासायनिक संगठन-इसकी छाल में ओरोक्झाइलिन् (Oroxylin) नामक एक कडुवा रवेदार ग्लूकोसाइड, कटुपदार्थ, पेक्टिन, तैल एवं मोम आदि पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-सोनापाठा के मूल की छाल उत्तम स्वेदजनन, कुछ वेदनास्थापन, दीपन, बस्तिरोगहर, स्तम्भन, व्रणरोपण एवं शोथहर है। इसके बीज रेचक होते हैं। इसकी छाल का प्रयोग आमवात, अतिसार, कास, अरुचि एवं ज्वर में किया जाता है। (१) शोथ तथा वातप्रधान रोगों में श्योनाकमूल देते हैं। यह नवीन आमवात में बहुत लाभ करता है। सोंठ के साथ इसका फांट (१ : १०) बनाकर १ औंस दिन में त्रिबार देते हैं। इसके चूर्ण के साथ अफीम मिलाई जा सकती है। यह डोवर्स् पाउडर (Dover's powder) की अपेक्षा उत्तम स्वेदजनन तथा वेदनाहर है। छाल का क्वाथ अधिक स्तम्भन होने के कारण इसके फांट का प्रयोग उचित है। विवन्ध होने पर एरंड तैल का प्रयोग करना चाहिये। आमवात में इसके क्वाथ से शोथयुक्त संधियों को सेंकते हैं जिससे सूजन तथा पीड़ा कम होती है। (२) इसकी छाल के कल्क तथा पद्मकेसर को गंभारी एवं कमल के पत्तों में लपेटकर, पुटपाक करके निकला हुआ रस शीत होने पर मधु मिलाकर, अतिसार में दिया जाता है। (३) इसकी छाल से सिद्ध तैल का उपयोग कर्णस्राव तथा कर्णशूल में किया जाता है। बहुत दिन के प्रयोग के बाद इससे लाभ होता है। (४) कहा जाता है कि अठन्नी भर छाल पीसकर छानकर दूध के साथ पिलाने से मिर्गी में लाभ होता है। (५) कर्णमूल शोथ में इसके बीज और हरिमेद दोनों पीसकर लगाये तथा पिलाये जाते हैं। मात्रा-चूर्ण १०-२० र० त्रिकटु के साथ। अथ बृहत्पञ्चमूलम् । तस्य लक्षणं गुणाँश्चाह श्रीफलः सर्वतोभद्रा पाटला गणिकारिका। श्योनाकः पञ्चभिस्तैःतैः पञ्चमूलं महत्स्मृतम् ।। २९ ।। पञ्चमूलं महत् तिक्तं कषायं कफवातनुत्। मधुरं श्वासकासघ्न्नमुष्णं लघ्वग्निदीपनम् ।। ३० ।। बृहत् पञ्चमूल के लक्षण तथा गुण-बेल, गम्भारी, पाढल, अरनी और सोनापाठा इन पाँचों वृक्षों के मूल एकत्र करने से 'बृहत् पञ्चमूल' होता है। बृहत् पञ्चमूल-तिक्त, कषाय तथा मधुर रसयुक्त, कफवातनाशक एवं श्वास तथा कास को दूर करने वाला, उष्णवीर्य, लघु और अग्निदीपक होता है। [२९-३०]

गुडूच्यादिवर्गः ४६३ अथ शालपर्णी (सरिवन) तस्या नामानि गुणाँश्चाह शालपर्णी१ स्थिरा सौम्या त्रिपर्णी पीवरी गुहा । विदारिगन्धा दीर्घाङ्गी२ दीर्घपत्राऽशुमत्यपि ॥३१॥ शालपर्णी गुरुश्छर्दिज्वरश्वासातिसारजित् ।।३२।। शोषदोषत्रयहरी बृंहण्युक्ता रसायनी । तिक्ता विषहरी स्वादुः क्षतकासकृमिप्रणुत् ।।३३।। 'सरिवन' के नाम तथा गुण—शालपर्णी, स्थिरा, सौम्या, त्रिपर्णी, पीवरी, गुहा, विदारिगन्धा, दीर्घाङ्गी, दीर्घपत्रा तथा अंशुमती ये सब संस्कृत नाम 'सरिवन' के हैं। सरिवन—पाक में गुरु और वमन, ज्वर, श्वास, अतिसार, शोष तथा त्रिदोष का नाशक है एवं बृंहण, रसायन, तिक्त तथा मधुर रसयुक्त और विष, क्षयकास तथा कृमि का भी नाशक है। [३१- ३३] १०. शालपर्णी

४६४ भावप्रकाशनिघण्टुः इसका प्रयोग ज्वर, वातरोग, अतिसार, वमन, शोथ, प्रमेह, अर्श, कृमि, राजयक्ष्मा एवं क्षत कास में किया जाता है। श्वासनलिकाशोथ, फुप्फुसशोथ तथा सूतिकाज्वर में इससे विशेष लाभ होता है। इसके पंचांग के क्वाथ में कालीमिर्च मिलाकर रक्तविकार में प्रयोग करते हैं। मात्रा—चूर्ण १/२-१ तोला। अथ पृश्निपर्णी (पिठवन) तस्या नामानि गुणाँश्चाह पृश्निपर्णी पृथक्पर्णी चित्रपर्ण्यहिपर्ण्यपि¹। क्रोष्टुविन्ना सिंहपुच्छी कलशी धावनिर्गुहा ॥३४॥ पृश्निपर्णी त्रिदोषघ्नी वृष्योष्णा मधुराऽसरा। हन्ति दाहज्वरश्वासरक्तातीसारतृड्वमीः ॥३५॥ पिठवन के नाम तथा गुण—पृश्निपर्णी, पृथक्पर्णी, चित्रपर्णी, अहिपर्णी, क्रोष्टुविन्ना, सिंहपुच्छी, कलशी, धावनी और गुहा ये सब संस्कृत नाम पिठवन के हैं। पिठवन—त्रिदोष को दूर करने वाली, वृष्य, उष्णवीर्य, मधुर रस युक्त तथा संग्राही होती है। यह दाह, ज्वर, श्वास, रक्तातिसार, तृषा और वमन को दूर करती है। [३४-३५] ११. पृश्निपर्णी (१) हिं०- पिठवन, डाब्रा। बं०- शंकरजटा। पं०- देतेर्दानी। म०- पृश्निपर्णी, पिठवण। गु०- पीठवण, पीलो समेरवो। ले०- Uraria picta Desv. (युरेरिआ पिक्टा डेस्व.)। Fam. Leguminosae (लेगुमिनोसी)। यह देहरादून और बाहरी हिमालय में प्रायः ऊसर भूमि एवं खुले हुए जंगलों में पाया जाता है। इसके क्षुप—२-६ फीट ऊँचे, स्वावलम्बी तथा अल्प शाखाओं वाले होते हैं जिसमें पत्ते एक ही क्षुप में भिन्न तरह के होते हैं। पत्ते—नीचे के पत्ते छोटे और लगभग वृत्ताकार, इनके ऊपर ३-५ पत्रक सदलपर्ण जिनके पत्रक रेखाकार और इनके साथ कभी-कभी बड़े-बड़े आयताकार, भालाकार, ६ × १ १/२ इञ्च बड़े अपत्रक पर्ण भी रहते हैं। ऊपर के पत्ते ५-९ पत्रक तथा पत्रक ३ १/२-६ इञ्च बड़े होते हैं। पत्रकों के मध्य में पीलापन लिये भूरे या पीले सफेद रंग के पट्टे होते हैं। पुष्प—छोटे, लाल और ३-४ इञ्च लम्बी, सघन, अग्र्य और रंभाकार मंजरियों में निकले रहते हैं। फलवती होने पर ये मंजरियाँ पुच्छाकार मालूम होती हैं। फली—छोटी तथा ३-६ संधियों वाली होती है। अधिकांश लोग इसे पृश्निपर्णी मानते हैं। इसे शालपर्णी मानना उचित नहीं है। पृश्निपर्णी (२) को शालपर्णी माना जा सकता है क्योंकि उसके पत्र शालपत्र जैसे होते हैं। गुण और प्रयोग—पृश्निपर्णी उष्ण, लघु, त्रिदोषघ्न, दीपनीय, वृष्य, वातहर, संग्राही, सन्धानीय, शोथहर, अंगमर्द प्रशमन तथा जीवाणुनाशक है। इसका उपयोग ज्वर, कास, रक्तातिसार, रक्तार्श, तृषा एवं दाह में किया जाता है। (२) अस्थिभग्न में मांसरस के साथ इसके मूल का चूर्ण २१ दिन तक सेवन करना चाहिये। (३) इसके पंचांग का स्वरस फुरसा (Echis carinata) नामक सर्प के विष में लाभदायक माना जाता है। मात्रा—१/२-१ तोला। १२. पृश्निपर्णी (२) हिं०- पिठवन, पिठोनी, पितवन। बं०- चाकुले, चाकुलिआ। म०- डवला, पिठवण। पं०- पिठोनी, पिठौनी। मा०- पिठपन। गु०- नहानो समेरवो। क०- नबियल बोने। ते०- कोलकूपौन्ना। ले०- Uraria lagopoides DC. (युरेरिआ लँगोपॉइडिस् डीसी.)। Fam. Leguminosae (लेगुमिनोसी)। १. अंघ्रिपर्ण्यपि इति पाठा०।

गुडूच्यादिवर्गः ४६५ यह नेपाल, बंगाल, छोटा नागपुर तथा अन्य उष्ण प्रान्तों के जंगली स्थानों में होती है। इसके क्षुप-बहुवर्षायु काष्ठीय मूल से प्रतिवर्ष निकलते हैं। शाखाएँ-प्रसरी या अत्यन्तप्रसरी और लगभग १२ इञ्च लम्बी होती हैं, जो मूल के समीप निकलती हैं। पत्ते-किंचित् वृत्ताकार या चौड़ाई लिये हुए आयताकार, एकपत्रक और त्रिपत्रक दोनों प्रकार के पत्ते मिले या कभी-कभी केवल अपत्रक पत्ते होते हैं। पुष्प-पुष्पमंजरी ८-१२ इञ्च तक लम्बी, गोल तथा पुच्छाकार होती है जो स्थायी बाह्यकोश के पंख सदृश खण्डों के कारण बहुत सघन और शृगालपुच्छ (क्रोष्टुविन्ना) जैसी दिखाई देती हैं इसी से कहीं-कहीं जंगलों में इसे सियारपुछिया भी कहते हैं। फली-एक इञ्च लम्बी, टेढ़ी-मेढ़ी तथा चिकनी होती है। इसके मूल का व्यवहार किया जाता है। इसकी एक अन्य जाति युरेरिआ हँमोसा वाल. (Uraria hamosa Wall.) होती है जिसमें मंजरियाँ लम्बी परन्तु सघन नहीं होतीं तथा पर्ण अपत्रक या त्रिपत्रक होते हैं। इसे लड़ीसा में सालपानी (शालपर्णी) कहते हैं। वस्तुतः 'सालपानी' नाम कई जाति के पौधों को दिया जाता है। गुण और प्रयोग-यह रसायन, बल्य, श्लेष्मघ्न एवं त्रिदोषघ्न है। इसके मूल का व्यवहार १/२-१ तोला की मात्रा में किया जाता है। अथ वार्त्ताकी (बड़ी कटेरी) तस्या नामानि गुणाँश्चाह वार्त्ताकी क्षुद्रभण्टाकी महती बृहती कुली। हिङ्गुली राष्ट्रिका सिंही महोष्ट्री दुष्प्रधर्षिणी ।।३६।। कटुतिक्ताऽऽस्यवैरस्यमलारोचकनाशिनी । उष्णा कुष्ठज्वरश्वासशूलकासाग्निमान्द्यजित् ।।३७।। बड़ी कटेरी के नाम तथा गुण-वार्त्ताकी, क्षुद्रमण्टाकी, महती, बृहती, कुली, हिङ्गुली, राष्ट्रिका, सिंही, महोष्ट्री और दुष्प्रधर्षिणी ये सब संस्कृत नाम बड़ी कटेरी के हैं। बड़ी कटेरी-संग्राही (मलरोधक), हृदय को हितकर, पाचक, कफवात-नाशक, कटु तथा तिक्तरस-युक्त होती है। यह मुख की विरसता तथा मल और अरुचि का नाश करने वाली, उष्णवीर्य तथा कुष्ठ, ज्वर, श्वास, शूल, कास और अग्नि की मन्दता इन सबों को दूर करने वाली होती है।। [३६-३७] १३ बृहती (बड़ी कटेरी) हिं०-वनभंटा, वनभांटा, बड़ी कटाई, बड़ी कटेरी, बरहंटा, अंजड। बं०-व्याकुड, व्याकुर। म०-डोरले, चिंचुरटी वांगी। गु०-उभी रिंगणी। ते०-तेल्ल मुलक। ता०-पप्पर मुल्ली। क०-किरिगुलि। मा०-उभीकटाली। मला०-चेरुचुण्ड। पं०-कंडयारी। फा०-टाई कलाँ। ले०-Solanum indicum Linn. (सोलेनॅम् इण्डिकम् लिन.)। Fam. Solanaceae (सोलेनेॅसी)। यह भारत के प्रायः सब प्रान्तों में कहीं-न-कहीं पाई जाती है, विशेषकर ऊसर भूमि में अधिक मिलती है। इसका क्षुप-३-६ फीट ऊँचा ठीक मण्टे के क्षुप के समान होता है। शाखाएँ-श्वेत रोमश और किंचित् टेढ़े तथा मृदु कांटो से भरी रहती हैं। पत्ते-३ से ६ इञ्च तक लम्बे तथा १ से ४ इञ्च तक चौड़े, कटे किनारे वाले या लहरदार, ठीक भण्टे के पत्तों के आकार के लट्वाकार या आयताकार होते हैं। अधरतल पर रोमश होने के कारण ये मैले सफेद रंग के और ऊपरी तल पर तारकाकार रोमों के कारण कुछ-कुछ खुरखुरे होते हैं। नीचे के तल पर मध्यपर्णक पर अथवा नसों पर मृदु कंटकों से युक्त रहते हैं। फूल-भंटा के फूल के समान बैंगनी रंग के या कभी-कभी श्वेताभ, .७५ इञ्च व्यास के और पाँच दल वाले होते हैं। फल-गोल, कच्ची अवस्था में हरे, पकने पर पीले, तिहाई इञ्च व्यास के एवं प्रायः चिकने होते हैं। इनका स्थायी बाह्यकोश पहले जैसा छोटा ही रहता है। फल तथा फूल सालभर लगते रहते हैं। ताजे फल कड़वे तथा कटु रहते हैं लेकिन सूखने पर इनका कड़वापन चला जाता है। ३३ भाव.I

४६६ भावप्रकाशनिघण्टुः इसका एक भेद ठंडे तथा आर्द्र स्थानों में पाया जाता है जिसे ले०-Solanum torvum Swartz (सोलॅनम् टॉर्व्हम् स्वाज्र्ट्) तथा सं०-श्वेतबृहती कहते हैं। इसके क्षुप-६-१० फीट ऊँचे तथा उपर्युक्त बृहती के समान होते हैं। ये अधिक ऊँचे, सीधे तथा शाखाएँ अल्प, सीधी, प्रायः मुलायम और उन पर काँटे बहुत कम होते हैं। पत्ते-३-७ इञ्च लम्बे, २-४ इञ्च चौड़े, ऊपर कम और नीचे अधिक रोमश (रोम तारकाकार) होते हैं। काँटे भी प्रायः मध्यशिरा पर नीचे की ओर केवल एक या दो होते हैं। फूल-श्वेत तथा बाह्यकोश में काँटे नहीं होते। फल-पहले से बड़े, .५ इञ्च व्यास के तथा पीले होते हैं। इसका एक अन्य भेद शुष्क भागों में पाया जाता है जिसे ले०-Solanum melongena Linn. (सोलॅनम् मेलोंगेना लिन.) एवं हिं०-वनभण्टा, जंगली बैंगन, रोको, ठोको, गठेगनी कहते हैं। यह बैंगन की ही जंगली जाती होती है जिसमें काँटे होते हैं। पत्ते-अंडाकार, ४-७ इञ्च बड़े, न्यूनाधिक अखंड, लहरदार या किंचित् खंडित (खंडगोल) होते हैं। फूल-नीले और प्रायः व्यास में १ इञ्च होते हैं। बाह्यकोश फल में बढ़ा हुआ रहता है। फल-चिकने, श्वेताभ-पीत, गोल और व्यास में करीब १ इञ्च होते हैं। इसके कृषिजन्य भेद में फल के रंग तथा आकारादि में बहुत भिन्नता आ जाती है। नोट-प्राचीनों ने बृहतीद्वय का उल्लेख किया है जिससे कुछ लोग बृहती (बड़ी कटेरी) तथा कंटकारी (भटकटैया) ये दो द्रव्य लेते हैं। कुछ लोगों का मत है कि बृहतीद्वय अलग है तथा कंटकारी अलग है। बृहती के कई भेद प्राप्त भी होते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें सोलेनीन एवं सोलेनिडीन नामक दो क्षाराभ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-यह उष्ण, दीपन, पाचन, ग्राही, वातघ्न, कफघ्न, हृद्य, कण्ठ्य, हिक्कानिग्रहण, शोथहर तथा अंगमर्द प्रशमन है। इसका मूल कफ रोगों में दिया जाता है। इससे ज्वर कम होता है एवं श्वासावरोध कम होता है। इसके प्रयोग से उदरगत वात कम होने से शूल एवं मरोड़ दूर होती है। मूत्रकृच्छ्र में इसका उपयोग करते हैं। त्वग्रोगों में इसके पत्तों का लेप किया जाता है। वमन रोकने के लिये इसके पत्तों का स्वरस आर्द्रक के साथ पिलाते हैं। इसके फल अग्निदीपक माने जाते हैं तथा शिरःशूल में इसका लेप लाभदायक होता है। मात्रा-चूर्ण १-२ माशा। अथ कण्टकारी (भटकटैया, कटेरी) । तस्या नामान्याह कण्टकारी तु दुःस्पर्शा क्षुद्राव्याघ्री निदिग्धिका । कण्टालिका कण्टकिनी धावनी बृहती तथा ।।३८।। भटकटैया के नाम-कण्टकारी, दुःस्पर्शा, क्षुद्रा, व्याघ्री, निदिग्धिका, कण्टालिका, कण्टकिनी, धावनी और बृहती ये सब संस्कृत नाम भटकटैया के हैं। [३८] ❖ उभे च बृहत्यौ । यत आह सुश्रुत क्षुद्रा या क्षुद्रभण्टाकी बृहतीति निगद्यते ।।३८।। दोनों ही अर्थात् बड़ी कटेरी तथा भटकटैया (छोटी कटेरी) 'बृहती' कहलाती हैं क्योंकि 'सुश्रुत' महर्षि ने भी कहा है कि-क्षुद्रा (भटकटैया) और क्षुद्रभण्टाकी (बड़ी कटेरी) जो यह दो प्रकार की कटेरी होती है वे दोनों ही 'बृहती' नाम से कहलाती हैं। [३८] अथ श्वेतपुष्पायाः कण्टकार्या नामान्याह श्वेता क्षुद्रा चन्द्रहासा लक्ष्मणा क्षेत्रदूतिका । गर्भदा चन्द्रमा चन्द्री चन्द्रपुष्प्या प्रियङ्करी ।।३९।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammpu. Digitized by S3 Foundation USA

गुडूच्यादिवर्गः ४६७ सफेद फूल वाली भटकटैया के नाम—श्वेता, क्षुद्रा, चन्द्रहासा, लक्ष्मणा, क्षेत्रदूतिका, गर्भदा, चन्द्रमा, चन्द्री, चन्द्रपुष्पा और प्रियङ्करी ये सब संस्कृत नाम सफेद फूल वाली भटकटैया के हैं। [३९] अथ कण्टकारीगुणानाह कण्टकारी सरा तिक्ता कटुका दीपनी लघुः ।।४०।। रूक्षोष्णा पाचनी कासश्वासज्वरकफानिलान् । निहन्ति पीनसं पार्श्वपीडाकृमिहृदामयान् ।।४१।। भटकटैया के गुण—भटकटैया—दस्तावर, तिक्त तथा कटुरसयुक्त, अग्निदीपक, लघु, रूक्ष, उष्णवीर्य और पाचक होती है। यह खाँसी, श्वास, ज्वर, कफ, वात, पीनस, पार्श्वपीडा (पसुली का दर्द), कृमि तथा हृद्रोग इन सबों को दूर करती है। [४०-४१] अथ कण्टकारीद्वयफलगुणानाह तयोः फलं कटु रसे पाके च कटुकं भवेत् । शुक्रस्य रेचनं भेदि तिक्तं पित्ताग्निकृल्लघु ।। हन्यात्कफमरुत्कण्डूकासमेदःकृमिज्वरान् ।।४२।। दोनों कटेरियों के फल के गुण—छोटी तथा बड़ी कटेरी के फल—पाक में कटुरसयुक्त, शुक्र का रेचन करने वाले, मल को भेदन करने वाले, कटु तथा तिक्तरसयुक्त, पित्त तथा अग्निवर्धक और लघु होते हैं और कफ, वात, खुजली, खाँसी, मेदरोग, कृमि तथा ज्वर को दूर करने वाले होते हैं। [४२] अथ श्वेतपुष्पकण्टकार्या गुणानाह तद्वत्प्रोक्ता सिता क्षुद्रा विशेषाद् गर्भकारिणी ।।४३।। श्वेत फूल वाली भटकटैया के गुण—सफेद फूल वाली भटकटैया भी पूर्वोक्त इन सभी गुणों से युक्त होती है तथापि विशेष करके यह गर्भ धारण कराने वाली होती है। [४३] १४. कंटकारी हिं०—कटेरी, लघुकटाई, कंटकारी, छोटी कटाई, भटकटैया, रेंगनी, रिगणी, कटाली, कटयाली। बं०— कंटकारी। म०—रिङ्गणी, भुईरिङ्गणी। गु०—बेठी भोरिंगणी, भोयरिंगणी। क०—नेल्ल गुल्लु। ते०—चल्लन मुलग। मा०—पसरकटाई। पं०—कंडियारी, बरुम्ब। ता०—कंडनकत्तरि। अ०—हदक, इसिम, शौकतुलअकरब। फा०— बादंगानवरीं, कटाई खुर्द। ले०—Solanum xanthocarpum Schrad & Wendl. (सोलैनम् झैन्थोकार्पम् श्रैंड, वेण्ड.)। Fam. Solanaceae (सोलेनेसी)। यह प्रायः सब प्रान्तों में और सब प्रकार की मिट्टी में पाई जाती है परन्तु रेतीली भूमि में यह अधिक उत्पन्न होती है। दक्षिण-पूर्व एशिया, मलाया एवं आस्ट्रेलिया के उष्ण प्रदेशों में भी यह पाई जाती है। इसका परिप्रसरी क्षुप—बहुवर्षायु तथा अत्यन्त काँटेदार होता है। काण्ड—टेढ़े-मेढ़े एवं अनेक शाखाओं से युक्त रहते हैं। काँटे—सीधे, पीले, चिकने, चमकीले एवं .५-.७ इञ्च तक लम्बे होते हैं। इनमें साथ में छोटे काँटे भी होते हैं। पत्ते—२-४ इञ्च लम्बे, १-३ इञ्च चौड़े, लट्वाकार, आयताकार या अंडाकार, गहरे कटे हुए या पक्षवत् खण्डित होते हैं। पत्रखण्ड पुनः खण्डित या दन्तुर होते हैं। ये तारकाकार रोमों के कारण खुरदुरे होते हैं। फूल—गहरे नीले रंग के आते हैं। फल—गोल, .५-१ इञ्च व्यास के, चिकने और पीले या कभी-कभी सफेद होते हैं तथा हरी धारियों से युक्त होते हैं। बीज—चिकने एवं छोटे होते हैं। इसके मूल का उपयोग किया जाता है। यह हमेशा ताजा उपयोग में लाना चाहिये। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

४६८ भावप्रकाशनिघण्टुः श्वेतकंटकारी का पौधा वर्षायु, कुछ छोटा एवं हलके रंग का होता है। पुष्प श्वेत रंग के आते हैं। मूल छोटा एवं पतला तथा शाखायुक्त होता है। यह शीतऋतु में होता है तथा वर्षा में गल जाता है। श्वेतकंटकारी का एक पर्याय लक्ष्मणा होने के कारण तथा यह भी 'गर्भकारिणी' होने के कारण 'लक्ष्मणा' के स्थान पर इसका उपयोग किया जाता है। लक्ष्मणा का आगे स्वतंत्र वर्णन आया है। यह पौधा उपर्युक्त कंटकारी का केवल स्थानभेद से उत्पन्न प्रकार (Variety) है या स्वतंत्र जाति (Species) है इस संबंध में अभी शोध चालू है। इसके स्वतंत्र स्पीसीज सिद्ध होने की अधिक संभावना है। रासायनिक संगठन— इसमें सोलेनीन सदृश सोलेकार्पिडिन (Solacarpidin, C₂₆ H₄₄ O₃ N) नामक एक क्षाराभ बहुत अल्पमात्रा में होता है जो फल में अधिक होता है। पत्तों की अपेक्षा मूल में यह अधिक होता है। इसके पंचांग में पोटैशियम् क्लोराइड् एवं पोटे-शियम नाइट्रेट् (Potassium chloride and Potassium nitrate) पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग— यह उत्तम मूत्रल, कफनिःसारक एवं ज्वरहर है। इसके बीज वेदनास्थापक हैं। इसका उपयोग कास, श्वास, प्रतिश्याय, ज्वर, अंगमर्द, पार्श्वपीड़ा, हृद्रोग, आध्मान, विबंध, अश्मरी तथा वमन में किया जाता है। (१) गुडुचं एवं इसकी जड़ का क्वाथ ज्वर एवं कास में बल्य रूप में दिया जाता है। इससे शरीर की पीड़ा कम होती है, कुछ पसीना होता है एवं मूत्र की मात्रा भी कुछ बढ़ती है। (२) इससे गला एवं श्वासनलिका की शुष्कता कम होकर कफ ढीला होने लगता है इसलिये गले का शोथ, स्वरयन्त्रशोथ एवं श्वासनलिकाशोथ इनकी प्रथमावस्था में इससे अच्छा लाभ होता है। कफ की प्रथमावस्था में मूल के क्वाथ के साथ मधु एवं सैंधव दिया जाता है। द्वितीयावस्था में पत्रस्वरस या मूलक्वाथ में छोटीपीपल एवं मधु मिलाकर देते हैं जिससे खाँसी की तकलीफ कम होती है। तमक श्वास एवं उद्वेष्टन युक्त कास में इसके मूल के क्वाथ में सैंधव एवं हींग मिलाकर देते हैं। सुश्रुत ने तमक श्वास के लिये इसका मूलचूर्ण १ तोला तथा हींग १/२ तोला, मधु के साथ ३ दिन सेवन करने को लिखा है। कास, श्वास तथा स्वरभेद में इससे सिद्ध घृत का उपयोग लिखा है। कास में इसके स्वरस से सिद्ध मुद्गयूष आँवले की खटाई डालकर उपयोग करने को लिखा है। (३) इसके मूल का स्वरस मद्य मिलाकर पिलाने से वमन बन्द होता है। (४) इसके मूल के क्वाथ को मूत्रकृच्छ्र, बस्तिगत अश्मरी एवं जलोदर में देते हैं। मूत्रदोष में इसके स्वरस में मधु मिलाकर पिलाते हैं। अश्मरी में बृहती तथा कंटकारी के मूल का चूर्ण मीठे दही के साथ ७ दिन पीने का विधान है। (५) इसके बीज के धूम्रपान से कृमिदन्तजन्य शूल कम होता है तथा कभी-कभी तत्काल लाभ होता है। मुखपाक में पंचांग क्वाथ से गण्डूष कराते हैं। पीड़ायुक्त अर्श में इसके बीज की धूनी दी जाती है। वेदनायुक्त अंगों पर इसके पत्तों का लेप किया जाता है। (६) आमवात में इसके पत्रस्वरस में काली मिर्च मिलाकर पिलाते हैं तथा पत्तों का लेप करते हैं। (७) गले की सूजन में फलों का स्वरस उपयोगी है। (८) सोजाक में पंचांग का क्वाथ पिलाते हैं। मात्रा— पत्रस्वरस १/४-१/२ तोला; मूलक्वाथ (अष्टमांश) २-४ तोला; मूलचूर्ण १-२ माशा। श्वेतकंटकारी— इसकी ताजी जड़ दूध में पीसकर मासिक के चौथे दिन पिलाने से गर्भधारण होता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

गुडूच्यादिवर्गः ४६९ अथ गोक्षुरः । तस्य नामानि गुणाँश्चाह गोक्षुरः क्षुरकोऽपि स्यात्त्रिकण्टः स्वादुकण्टकः । गोकण्टको गोक्षुरको वनशृङ्गाट इत्यपि ।।४४।। पलङ्कषा श्वदंष्ट्रा च तथा स्यादिक्षुगन्धिका । गोक्षुरः शीतलः स्वादुर्बलकृद्बस्तिशोधनः ।।४५।। मधुरो दीपनो वृष्यः पुष्टिदश्चाश्मरीहरः । प्रमेहश्वासकासार्शः कृच्छ्रहृद्रोगवातनुत् ।।४६।। गोखरू के नाम तथा गुण-गोक्षुर, क्षुरक, त्रिकण्ट, स्वादुकण्टक, गोकण्टक, गोक्षुरक, वनशृङ्गाट, पलङ्कषा, श्वदंष्ट्रा तथा इक्षुगन्धिका ये सब संस्कृत नाम गोखरू के हैं। गोखरू-शीतवीर्य, स्वादु, बलकारक, बस्तिशोधक, मधुररसयुक्त, अग्निदीपक, वृष्य तथा पुष्टिकारक होता है। यह पयरी, प्रमेह, श्वास, खाँसी, बवासीर, मूत्रकृच्छ्र, हृद्रोग तथा वात को दूर करने वाला होता है। [४४-४६] १५. गोखरू (छोटा) हिं०-गोखरू छोटा गोखरू, हाथीचिकार। बं०-गोक्षुर, गोखुरी। म०-सराटे, काटे गोखरू। क०- नेग्गिलुमुल्लु, नेगलु। गु०-न्हाना गोखरू, बेठा गोखरू। ते०-पल्लेरु मुल्लु। ता०-नेरिंजिल, नेरुंजी। पं०- मखड़ा, मखर। फा०-खारे खसक, खारे मेहगोशा। अ०-इसक, बजरुल खस्क। अं०-Small Caltrops (स्मॉल कॅल्ट्रोप्स)। ले०-Tribulus terrestris Linn. (ट्रिब्युलस् टेरेस्ट्रिस् लिन.)। Fam. Zygo-phyllaceae (झाइगोफाइलॅइसी)। छोटा गोखरू-प्रसर जाति की वनौषधि है। यह प्रायः सब प्रान्तों में पाया जाता है विशेषकर बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिमोत्तर प्रदेश, राजपूताना और मद्रास में अधिक उत्पन्न होता है। यह अन्य उष्ण प्रदेशों में भी पाया जाता है। इसका प्रसर-१ १/२ फीट से ४ फीट के घेरे में भूमि पर फैला हुआ रहता है। मूल-पतला, चीमड़, करीब ५ इञ्च लम्बा, गोल एवं हलके भूरे रंग का रहता है। इसमें थोड़ी सी सुगन्ध रहती है एवं इसका स्वाद कुछ मिठास लिये हुए कसैला होता है। शाखाएँ-१-२ फीट लम्बी, रोमश तथा जमीन पर फैली हुई रहती हैं। पत्ते-विपरीत, २-३ इञ्च लम्बे, प्रायः असम तथा जोड़ी में आते हैं। पत्रक-आयताकार, ४-७ जोड़े, छोटे, ०.८-१.२ से० मि० लम्बे, आधार की तरफ कुछ तिरछे एवं इनका अग्र रोमश रहता है। फूल-छोटे-छोटे, पाँच पंखड़ी वाले, पीले रंग के तथा पत्रकोणों में आते हैं। फल-छोटे-छोटे गोल किञ्चित् चिपटे होते हैं और उन पर पाँच जोड़े बड़े काँटे लगे रहते हैं। ये पाँच दलवाले होते हैं और सूखने पर प्रायः पाँचों दल त्रिकोणाकार पृथक्-पृथक् हो जाते हैं तथा उनके दोनों छोर पर एक-एक बड़े काँटे, आधार पर दो छोटे काँटे एवं अन्य सतह पर सूक्ष्म काँटे रहते हैं। प्रत्येक दल में अनेक बीज पाये जाते हैं जिनके बीच में आड़े परत होते हैं। इसके मूल एवं फल का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। प्रायः चूर्ण के लिये फल एवं क्वाथ के लिये मूल काम में लेते हैं। इसी का एक जातिभेद सिंध, पंजाब तथा बलूचिस्तान में होता है। इसे ले०-Tribulus alatus Del. (ट्रिब्युलस् एलॅटस् डेल); अं०-Winged caltrops (विंग्ड् कॅल्ट्रोप्स); सिंध-लतक; हिं०-गोखुरेकलान; पं०- हसक कहते हैं। इसके फल एक तरफ मोटे तथा दूसरी तरफ संकुचित होते हैं एवं इसे पंख रहते हैं। इनमें दो बीज होते हैं। इसके गुण गोखरू के समान ही होते हैं। इससे पाखाना साफ होता है एवं प्रसूता को इसके फल की पेया पिलाते हैं। रासायनिक संगठन-इसके फलों में अत्यल्प मात्रा में एक क्षाराभ, ३.५% स्थिर तैल, कुछ उड़नशील तैल, राल एवं अधिक मात्रा में नाइट्रेट (Nitrates) ये पदार्थ पाये जाते हैं।

४७० भावप्रकाशनिघण्टुः **गुण और प्रयोग—**गोखरू शीतल, स्नेहन, मूत्रविरेचनीय, शोथहर, वातहर, बल्य, वृष्य एवं वेदनास्थापन है । मूत्र-संस्थान की श्लेष्मकला पर इसका प्रभाव बकु (Buchu) के पत्र एवं उह्याअर्सी (Uva-ursi) के पुष्प सदृश होता है । इसका मूत्रल प्रभाव इसमें के नाइट्रेट् एवं उड़नशील तैल के कारण होता है । यह शीतवीर्य होते हुये वृक्कोत्तेजक है । अधिक मात्रा से इससे शौच साफ होता है । इसका उपयोग मूत्रकृच्छ्र, सोजाक, अश्मरी, बस्तिरोग, वृक्कविकार, प्रमेह, स्वप्नदोष, नपुंसकता एवं वीर्यक्षीणता में किया जाता है । इसके फलों का फांट वृक्कविकार, अश्मरी तथा वातरक्त में मूत्रल औषधि के रूप में बहुत उपयोगी है । इसका उपयोग मूत्राघात, कास तथा हृदय विकार में भी किया जाता है । सोजाक तथा बस्तिशोथ में इसका क्वाथ देते हैं । इसका वेदना स्थापन गुण अल्प होने के कारण इसके साथ खोरासानी अजवाइन या अफीम मिलाई जाती है । मूत्रकृच्छ्र में इससे सिद्ध दुग्ध का प्रयोग किया जाता है । मूत्र में बहुत अम्ल होने पर तथा मूत्रकृच्छ्र में इसके क्वाथ में यवक्षार मिलाकर देते हैं । बस्तिशोथ या वृक्कशोथ में जब मूत्र क्षारीय, दुर्गन्ध युक्त एवं गंदला रहता है तब इसके क्वाथ में शिलाजीत देते हैं । इसके चूर्ण को मधु के साथ खाकर ऊपर से बकरी का दूध सात दिन पीने से अश्मरी में लाभ होता है । गोखरू तथा तिल इनका समभाग चूर्ण मधु एवं बकरी के दूध के साथ सेवन करने से हस्तमैथुनजन्य षांढ्य में लाभ होता है । गर्भाशय शुद्ध होकर वन्ध्यत्व नष्ट होने के लिये गोखरू देते हैं । **मात्रा—**३-६ माशा । १६. गोखरू (बड़ा) **हिं०—**बड़ा गोखरू, फरीदबूटी, दक्षिणी गोखरू । **बं०—**बड गोखरू । **म०—**मोठें गोखरू । **गु०—**ऊभा गोखरू, म्होटा गोखरू, कडवा गोखरू । **पं०—**गोखरू कलां, बड़ा भखडा (रा) । **उडि०—**गोक्षुरा । **क०—**आनेनेग्गिलु । ते०— पेड्डा पल्लेरू । **ता०—**पेरूनैरूंजि । **मल०—**कट्टुनेरिंजल । **सिंह०—**अतिनेरंचि । **अ०—**हसके कबीर । **फा०—**खारेखसह- के कलां, खसके कलाँ । ले०—Pedalium murex Linn. (पेडॅलिअम् म्यूरेक्स लिन.) । Fam. Pedaliaceae (पेडॅलिएसी) । यह दक्षिण में समुद्र के किनारे, गुजरात तथा सिलोन में बहुत उत्पन्न होता है । इसका **क्षुप—**वर्षायु, नरम, मांसल तथा चिकना होता है । **शाखाएँ—**६-१८ इञ्च लम्बी तथा उत्थित प्रसरी होती हैं । **पत्ते—**न्यूनाधिक विपरीत, १-२ इञ्च लम्बे, अंडाकार तथा लहरदार दन्तुर किनारे वाले होते हैं । **पुष्प—**पीले रंग के, १ इञ्च लम्बे तथा पत्रकोणों में निकले हुए होते हैं । इनको मसलने से कस्तूरी जैसी सुगन्ध आती है । **फल—**चौकोनी, करीब १/२ इञ्च लम्बा, १/४ इञ्च चौड़ा तथा आधार की ओर प्रत्येक कोन पर एक-एक सीधा काँटा होता है । इसके ऊपर का भाग शंक्वाकार और भीतर से दो कोशवाला होता है । **बीज—**प्रत्येक कोश में दो-दो बीज होते हैं । इसके पत्तों को जल में डालने पर जल एकदम लुआबदार हो जाता है । इसमें न स्वाद होता है न गन्ध होती है तथा कुछ समय बाद इसका लुआब भी निकल जाता है । इसके पत्ते तथा फलों का चिकित्सा में व्यवहार होता है । **रासायनिक संगठन—**इसके फलों में एक क्षाराभ, वसा, तथा राख ५% होती है । **गुण और प्रयोग—**बड़ा गोखरू स्नेहन, मूत्रजनन, बल्य तथा बाजीकर है । इसका मूत्रजनन धर्म बहुत उत्तम है तथा त्वरित मालूम पड़ता है ।

गुडूच्यादिवर्गः ४७१ (१) नये सोजाक में ताजे पंचांग का हिम करीब एक पाव की मात्रा में प्रत्ये समय ताजा बनाकर देना चाहिए। फल का काढ़ा देना हो तो उसके साथ मुलेठी एवं नागरमोथा मिलाना चाहिये। इससे मूत्रत्याग के समय जलन नहीं होती। इसके पत्तों का चूर्ण एक तोला दुग्ध एवं शर्करा के साथ सोजाक में तथा तज्जन्य संधिवात में देते हैं। (२) स्वप्नदोष, कामशक्ति का ह्रास तथा अपने आप पेशाब हो जाना इन अवस्थाओं में इसके फल का फांट देते हैं। २ १/२ तोला फल चूर्ण को २५ तोला उबलते जल में डालकर १ घंटे पश्चात् छान लें तथा बार-बार थोड़ा-थोड़ा पिलावें। फलचूर्ण को २ माशे की मात्रा में शर्करा, घृत एवं दुग्ध के साथ भी दे सकते हैं। इसका पौष्टिक तथा वाजीकर गुण कभी-कभी स्पष्ट प्रतीत होता है। (३) प्रसूति रोग में फलों का क्वाथ या पत्रस्वरस पिलाते हैं। (४) यकृत तथा प्लीहा वृद्धि में पंचांग का रस या क्वाथ पिलाते हैं। मात्रा-पत्रचूर्ण १ तोला; फल २-३ तोला फांट बनाकर; फल

४७२ भावप्रकाशनिघण्टुः इन्हीं दो का यहाँ वर्णन किया गया है। कुछ लोगों ने ड्रेगिआ होल्यूविलिस् (Dregia volubilis) को जीवन्ती लिखा है जिसे कहीं-कहीं 'लाखन' कहा जाता है तथा उसका मूर्वा के स्थान पर कहीं-कहीं प्रयोग किया जाता है। पंजाबी में जिउन्ती नाम सिमिसिफ्यूजा फिटिडा (Cimicifuga toetida) को दिया हुआ है जो जीवन्ती शाक से बिलकुल भिन्न मालूम होती है। श्रीयुत् यादवजी ने इसके दो लेटिन नाम लेप्टाडेनिआ रेटिक्युलेटा एवं होलोस्टेमा एन्युलेर लिखे हैं तथा इसके नव्यमत में श्री डॉ० देसाई के होलोस्टेमा हिडिआनम् का वर्णन किया है। होलोस्टेमा हिडिआनम् (हो० एन्युलेर) को कुछ विद्वानों ने अर्कपुष्पी माना है तथा उसे जीवन्ती का भेद लिखा है। अर्कपुष्पी का आगे स्वतंत्र वर्णन आया हुआ है। १७ जीवन्ती (१) हिं०-जीवन्ती, डोडो। गु०-दोडी, डोडी, खरखोडी, राडारुडी। म०-डोडी, राईडोडी, खीरखोडी। ले०- Leptadenia reticulata W. & A. (लेप्टाडेनिआ रेटिक्युलॅटा)। Fam. Asclepiadaceae (एस्क्लेपिएडॅसी)। यह लता सहारनपुर, शिवालिक के नीचे तथा बरकाला, रानीपूर एवं दक्षिण में भी मिलती है। देहरादून में मोध्रानवाला के समीप घास के मैदानों में भी होती है। इसकी मधुर कलियों का रुचिकर शाक बनता है अतः शाकश्रेष्ठ जीवन्ती इसे मानना चाहिये। इसकी लता-क्षुपजातीय तथा चक्रारोही होती है। इसके पुराने काण्ड कार्क युक्त होते हैं और नवीन भाग श्वेताभ मृदु रोमश होते हैं। पत्ते-२-३ इञ्च लम्बे, १-१॥ इञ्च चौड़े, लट्वाकार-आयताकार या अंडाकार, नोकीले, सरल धार, चर्म सदृश और अधःपृष्ठ पर नीलाभ श्वेत रज से ढके होते हैं। इनका आधार प्रायः गोल या नोकीला होता है। पुष्प- कुछ मटमैले हरिताभ पीत रंग के होते हैं। फलियाँ-एकाकी, २-३ इञ्च लम्बी, ।।-।।। इञ्च मोटी, सीधी, सरस परन्तु कठोर, चिकनी और उनका अग्रभाग मोटा परन्तु चोंचदार (टेढ़ा) होता है। गुण और प्रयोग-जीवन्ती जीवनीय, शीतल, मधुर, लघु, त्रिदोषनाशक, चक्षुष्य, स्वर्य, ग्राही, बल्य एवं वृष्य है। इसका उपयोग रक्तपित्त, क्षय, दाह, ज्वर, अतिसार, विषदोष, नक्तान्ध्य एवं व्रण में किया जाता है। (१) ज्वरजन्य दाह में इसके मूल के क्वाथ में घृत मिलाकर पीने से लाभ होता है। (२) इसका साग घृत के साथ पकाकर खाने से रतौंधी में लाभ होता है। (३) अतिसार में इसका साग दही, अनार तथा स्नेह के साथ उपयोगी होता है। मात्रा-३-६ माशा। १८ जीवन्ती (२) सं०-स्वर्ण जीवन्ती (?)। हिं०-जिवसाग्। बं०-जिबै, जीवन्ती। गु०-जिवन्ती। ले०-Dendrobium macraei Lindl. (डेण्ड्रोबिअम् मेक्रीइ लिंड)। Fam. Orchi-daceae (ऑर्किडॅसी)। यह हिमालय पहाड़ सिक्किम, नीलगिरि के पहाड़ एवं दक्षिण, सीलोन, वर्मा तथा मलाया आदि में होती है। इसके बांदे जामुन के वृक्षों पर पाये जाते हैं। जड़े-(भौमिक काण्ड) प्रसरणशील तथा वलय युक्त होती हैं जिससे अनेक लटकते हुए, चमकीले तथा २-३ फीट लम्बे काण्ड निकले रहते हैं। काण्ड पर विभिन्न दूरी पर मूलकाकार, कुछ दबे हुवे चमकीले तथा २-२।। इञ्च लम्बे कूटकंद (Pseudobulbs) रहते हैं। पत्र-कूटकंद के अग्रभाग से, एकाकी, ४-८ इञ्च लम्बा, करीब १ इञ्च चौड़ा, रेखाकार-आयताकार, कुण्ठिताग्र एवं अनेक समानान्तर पतली शिराओं से युक्त होता है। पुष्प-पत्र के आधार से निकले हुए, १-३, करीब १ इञ्च बड़े तथा श्वेत वर्ण के रहते हैं। इनके ओष्ठ एवं चंचु (Spur) पीतवर्ण के रहते हैं। पुष्प कुछ ही घंटे विकसित रहते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

गुडूच्यादिवर्गः ४७३ इसके पंचांग का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। गुण और प्रयोग- यह लघु, मधुर, शीतल, रसायन, स्नेहन, बल्य एवं वृष्य है। इसका उपयोग श्वास, कास, गले के विकार, क्षय, ज्वर, दाह, नेत्रविकार एवं रक्तविकार में किया जाता है। इसके पंचांग का क्वाथ अन्य सुगंधित पदार्थों के साथ त्रिदोष में देते हैं। धातुपात के कारण उत्पन्न दौर्बल्य में क्वाथ पिलाते हैं। मात्रा- ३ से ६ माशा। अथ मुद्गपर्णी। तस्या नामानि गुणाँश्चाह मुद्गपर्णी काकपर्णी सूर्यपर्ण्यल्पिका$^१$ सहा ॥५२॥ काकमुद्गा च सा प्रोक्ता तथा मार्जारगन्धिका। मुद्गपर्णी हिमा रूक्षा तिक्ता स्वादुश्च शुक्रला ॥५३॥ चक्षुष्या क्षतशोथघ्नी ग्राहिणी ज्वरदाहनुत्। दोषत्रयहरी लघ्वी ग्रहण्यर्शोऽतिसारजित् ॥५४॥ मुगवन के नाम तथा गुण- मुद्गपर्णी, काकपर्णी, सूर्यपर्णी, अल्पिका, सहा, काकमुद्गा और मार्जारगन्धिका ये सब संस्कृत नाम मुगवन के हैं। मुगवन- शीतवीर्य, रूक्ष, तिक्तरसयुक्त, स्वादु, शुक्रजनन, नेत्र को हितकर, क्षत तथा शोथ का नाशक, ग्राही, ज्वर तथा दाह को दूर करने वाली, त्रिदोषनाशक तथा लघु होती है एवम् ग्रहणी, बवासीर तथा अतिसार को दूर करने वाली होती है। [५२-५४] १९. मुद्गपर्णी हिं०- मुगवन, मुंगानी, वनमूँग, जंगली मूँग, रखाल कलमी। बं०- मुंगानी। म०- रानमुग। गु०- जंगली मूँग, अडबाऊ मूँग। क०- कोहसरु, आवरेगिड। ते०- कारु पेसारा, पिल्ल पेसर चेट्टु, कलबन्द चेट्टु। पं०- मुगवन। ता०- नरिप्ययरू। ले०- Phaseolus trilobus Ait. (फेसिओलस् ट्राइलोबस् एट्.)। Fam. Leguminosae (लेगुमिनोसी)। यह मूँग के समान ही लता जाति की वनौषधि प्रायः सब प्रान्तों में उत्पन्न होती है। इसके काण्ड प्रसरी, १-२ फीट लम्बे, रोमश या चिकने होते हैं। पत्रक- कद में प्रायः बहुत परिवर्तनशील होते हैं और प्रायः वृन्त से छोटे ही होते हैं। ये प्रायः सर्वदा खण्डित, खण्ड तीन और गोल होते हैं। उपपत्र बहुत बड़े और पीठ से जुड़े हुए (प्रायः १/२ तक) होते हैं। उपपत्रक छोटे परन्तु पर्णवत् होते हैं। मंजरी के शीर्ष पर पुष्पगुच्छ और बड़ा पुष्पदंड होता है। फली- पतली, लगभग २ इञ्च लम्बी एवं चिकनी होती है। बीज- ६-१२ और श्वेताभ होते हैं। इसके बीजों को कभी-कभी गरीब लोग खाने के लिये एकत्र करते हैं। पत्रकों के आकार के अनुसार इसे सूर्यपर्णी कह सकते हैं। गुण और प्रयोग- मुद्गपर्णी शीतल, जीवनीय, शुक्रजनन, बलप्रद, चक्षुष्य एवं शामक है। इसका प्रयोग वातरक्त, क्षय, ज्वर एवं दाह में किया जाता है। बिहार में ज्वर के लिये इसके पंचांग का प्रयोग किया जाता है। जीर्ण ज्वर में पुष्टि एवं निद्रा लाने के लिये इसके पत्तों का क्वाथ पिलाया जाता है। चूहे के विष में सिन्धुवार, मुद्गपर्णी एवं माषपर्णी मधु के साथ खाने से लाभ होता है। मात्रा- २-४ माशा। अथ माषपर्णी। तस्या नामानि गुणाँश्चाह माषपर्णी सूर्यपर्णी काम्बोजी हयपुच्छिका। पाण्डुलोमशपर्णी च कृष्णवृन्ता महासहा ॥५५॥ माषपर्णी हिमा तिक्ता रूक्षा शुक्रवलासकृत्। मधुरा ग्राहिणी शोथवातपित्तज्वरास्रजित् ॥५६॥ १. शूर्पपर्ण्यल्पिका इति पाठ०।

४७४ भावप्रकाशनिघण्टुः बनउर्दी के नाम तथा गुण—माषपर्णी, सूर्यपर्णी, काम्बोजी, हयपुच्छिका, पाण्डुलोमशपर्णी, कृष्णवृन्ता और महासहा ये सब संस्कृत नाम बनउर्दी के हैं। बनउर्दी—शीतवीर्य, तिक्त तथा मधुररसयुक्त, रूक्ष, ग्राही, शुक्रजनक तथा कफकारक होती है। एवम् यह शोथ, वात, पित्त, ज्वर और रक्तविकार को दूर करने वाली होती है। [५५-५६] २०. माषपर्णी हिं०—मषबन, माषोनी, बन उड़दी, जंगली उड़द, बनउर्दी, बनउड़द। बं०—माषानी। म०—रानउड़ीद। गु०— जंगली अड़द। क०—काडडयु, काडुलंद। ते०—रानो डिंडु, कारु मिनुरु। ता०—कट्टु अलंदूं। ले०—Teramnus labialis Spreng (टेरॅमन्स् लेबिएलिस् स्प्रेंग)। Fam. Leguminosae (लेगुमिनोसी)। यह सब प्रान्तों के जंगल-झाड़ियों में कहीं-न-कहीं उत्पन्न होती हैं। यह लता जाति की वनौषधि झाड़ियों पर लिपटती हुई (चक्रारोही) बढ़ती है और वर्षा ऋतु में अधिक पाई जाती है। पत्ते—त्रिपत्रक और पत्रक भिन्न-भिन्न कद के होते हैं। पत्रक—कभी .६-१.३ इञ्च और कभी १-३ इञ्च लम्बे होते हैं। ये अंडाकार या लट्वाकार (अग्र्य पत्रक कभी- कभी अभिलट्वाकार), नीचे के तल पर तलशायी रोमों से युक्त होते हैं। सवृन्त पुष्पों की मञ्जरी बहुत पतली १ १/२- ५ इञ्च लम्बी और पुष्प—गुलाबी, नीलारुण या सफेद होते हैं। फली—पतली लम्बी सीधी या कुछ-कुछ टेढ़ी होती हैं। बीज—ताजी अवस्था में लाल तथा सूखने पर काले तथा संख्या में लगभग १० होती हैं। गुण और प्रयोग—माषपर्णी शीतल, बल्य, वृष्य, पुष्टिकारक, शुक्रजनन एवं जीवनीय हैं। इसका उपयोग ज्वर, दाह, रक्तपित्त, वातविकार, अंगघात एवं आमवात में किया जाता है। चरक ने वाजीकरण के लिये माषपर्णी खिलाई हुई समान वर्ण वत्सवाली प्रथम-प्रसवा गौ का दुग्ध, मधु, शर्करा एवं घृत के साथ सेवन करने का विधान किया है। इससे सिद्ध तैल का पिचुधारण वातिक प्रदर में लाभदायक माना जाता है। मात्रा—२-४ माशा। अथ जीवनीगणः । तस्य लक्षणं गुणाँश्चाह अष्टवर्गः सयष्टीको जीवन्ती मुद्गपर्णिका। माषपर्णी गणोऽयं तु जीवनीय इति स्मृतः ॥५७॥ जीवनो मधुरश्चापि नाम्ना स परिकीर्त्तितः । जीवनीगणः प्रोक्तः शुक्रकृद् बृंहणो हिमः ॥५८॥ गुरुर्गर्भप्रदः स्तन्यकफकृत्पित्तरक्तहृत् । तृष्णां शोषं ज्वरं दाहं रक्तपित्तं व्यपोहति ॥५९॥ जीवनीगण के लक्षण तथा गुण—जीवक, ऋषभकादि पूर्वोक्त अष्टवर्ग की औषधियाँ, मुलेठी, जीवन्ती (डोडी), मुगवन और बनउर्दी इन सब औषधियों को जीवनीगण कहते हैं। जीवनीगण का ही नामान्तर जीवन (जीवनं गण या मधुर (मधुर गण) भी ऋषियों ने कहा है। जीवनीगण—शुक्रजनक, बृंहण, शीतवीर्य, गुरु, गर्भप्रद, स्तन्य (दुग्धवर्धक) तथा कफकारक एवं पित्त तथा रक्तदोष को दूर करने वाला तथा तृषा, शोष, ज्वर, दाह और रक्तपित्त इन सबों को नष्ट करने वाला होता है। [५७-५९] अथ शुक्लरक्तैरण्डौ । तयोर्नामानि गुणाँश्चाह शुक्ल एरण्ड आमण्डश्चित्रो गन्धर्वहस्तकः । पञ्चाङ्गुलो वर्द्धमानो दीर्घदण्डो व्यडम्बकः ॥६०॥ वातारिस्तरुणश्चापि रुबुकश्च निगद्यते। रक्तोऽपरो रुबूकः स्यादुरुबूको रुबुस्तथा ॥६१॥ व्याघ्रपुच्छश्च वातारिश्चञ्चुरुत्तानपत्रकः । एरण्डयुग्मं मधुरमुष्णं गुरु विनाशयेत् ॥६२॥ शूलशोथकटीबस्तिशिरःपीडोदरज्वरान् । ब्रध्नश्वासकफानाहकासकुष्ठाममारुतान् ॥६३॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

गुडूच्यादिवर्गः ४७५ सफेद एरण्ड तथा लाल एरण्ड के नाम एवम् गुण-शुक्लैरण्ड, आमण्ड, चित्र, गन्धर्वहस्तक, पञ्चाङ्गुल, वर्धमान, दीर्घदण्ड, व्यडम्बक, वातारि, तरुण और रुबूक ये सब संस्कृत नाम सफेद एरण्ड के हैं। रक्तैदण्ड, रुबूक, उरुबूक, रुबु, व्याघ्रपुच्छ, वातारि, चञ्चु और उत्तानपत्रक ये सब लाल एरण्ड के संस्कृत नाम हैं। दोनों एरण्ड-मधुररसयुक्त, उष्णवीर्य तथा गुरु होते हैं एवम् ये दोनों-शूल, शोथ एवं कटि, बस्ति तथा शिर की पीड़ा, उदररोग, ज्वर, ब्रध्ननामक- रोग, श्वास, कफ, आनाह, खाँसी, कुष्ठ और आमवात इन सबों को दूर करते हैं। [६०-६३] अथैरण्डपत्राग्रपत्रफलमज्जगुणानाह एरण्डपत्रं वातघ्नं कफकृमिविनाशनम्। मूत्रकृच्छ्रहरं चापि पित्तरक्तप्रकोपणम्। वातार्यग्रदलं गुल्मबस्तिशूलहरं परम्।।६४।। कफवातकृमीन्हन्ति वृद्धिं सप्तविधामपि। एरण्डफलमत्युष्णं गुल्मशूलानिलापहम्।।६५।। यकृत्प्लीहोदराशघ्नं कटुकं दीपनं परम्। तद्वन्मज्जा च विड्भेदी वातश्लेष्मोदरापहः ।।६६।। एरण्ड के पत्ते, फुनगी, फल तथा मीगी के गुण-एरण्ड के पत्ते-वातनाशक तथा कफ, कृमि और मूत्रकृच्छ्र को दूर करनेवाले एवम् पित्त तथा रक्त को कुपित करनेवाले होते हैं। कोमल पत्ते (अग्रभाग के पत्ते) गुल्म और बस्ति- शूल को अत्यन्त दूर करनेवाले तथा कफ, वात, कृमि और सात प्रकार के वृद्धि रोग (अंडवृद्धि) को भी दूर करने वाले होते हैं। एरण्ड के फल-अत्यन्त उष्णवीर्य, गुल्म, शूल, वायु, यकृत्, प्लीहा, उदररोग तथा बवासीर को दूर करनेवाले एवम् कटुरसयुक्त तथा अत्यन्त अग्निदीपक होते हैं। फल की मींगी भी गुणों में इसके फलों के समान होती हुई भी मल को भेदन करने वाली एवं वात, कफ तथा उदर-सम्बन्धी रोगों को दूर करने वाली होती है। [६४-६६] नोट-भावप्रकाशकार ने श्वेत एवं रक्त भेद से एरण्ड के दो भेद लिखे हैं, यद्यपि दोनों के गुण समान ही होते हैं। सामान्यतः इसके दो भेद पाये जाते हैं। एक भेद बहुवर्षायु एवं बड़े फल तथा बड़े और लाल बीजों वाला होता है। दूसरा भेद एकवर्षायु एवं छोटे, भूरे और चित्तीदार बीजों वाला होता है। यह प्रतिवर्ष बोया जाता है। प्रथम में ४०% तैल होता है लेकिन वह अधिकतर जलाने एवं स्निग्धीकरण के काम आता है। इसके पत्तों का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। दूसरे में तैल ३७% होता है जो चिकित्सा में अधिकतर काम आता है। इसके मूल का भी उपयोग चिकित्सा में किया जाता है। एक अन्य प्रकार का एरंड भी मिलता है जिसे व्याघ्रैरण्ड कहते हैं। इसके गुण एरंड से काफी भिन्न हैं। इसकी एक दूसरी जाति होती है जिसे लाली व्याघ्रैरण्ड कहते हैं। एरंड के पश्चात् व्याघ्रैरण्ड का वर्णन किया गया है। २१. एरण्ड हिं०-अरंड, एरंड, एरंडी, रेंडी, । बं०-भेरेंडा। म०-एरंड, एरंडी। गु०-एरंडो, एरंडियो, दिबेली। ते०- आमुडामु, एरंडमु। ता०-आमणक्कम्। मल०-चिट्टामणक्कु, आवणक्का। क०-हरलु। फा०-बेदञ्जीर, तुख्मे बेदञ्जीर। अ०-खिरवा, वज्रुल, खिर्बअ। अं०-Castor-oil plant (कैस्टर ऑइल् प्लाण्ट)। ले०-Ricinus communis Linn. (रिसिनस् कॉम्यूनिस् लिन.)। Fam. Euphorbiaceae (युफोर्बिएसी)। प्रायः सब प्रान्तों में एरण्ड की खेती की जाती है। यह अपने आप ही मैदानों, सड़कों के किनारे, परती जमीन एवं पहाड़ियों की खाली भूमि में उत्पन्न हुआ पाया जाता है। इसका क्षुप-एक वर्षायु, ऊँचा, चिकना तथा क्षोदलिप्त रहता है। कभी-कभी यह झाड़ीदार या छोटे वृक्षसदृश भी हो जाता है। पत्ते-एकांतरे, चौड़े, खंडित (त्रिपादानुत्तर-पाणिवत्), खण्ड ७ या अधिक एवं पत्रतट आरावत दन्तुर होता है। पुष्प-द्विलिंगी तथा सवृन्त-काण्डज पुष्पव्यूहों में आते हैं जिसमें पुंपुष्प पुष्पव्यूह के ऊपर के भाग में रहते हैं

४७६ भावप्रकाशनिघण्टुः तथा स्त्रीपुष्प नीचे के भाग में रहते हैं। फल-गोल-गोल सघन गुम्बजदार लगते हैं तथा उन पर मुलायम-मुलायम काँटे से होते हैं। फल पकने पर धूप की गरमी से फट जाते हैं और बीज भूमि में गिर पड़ते हैं। उसी समय गुच्छों को तोड़कर संग्रह करते हैं। प्रत्येक फल में तीन-तीन बीज होते हैं। बीज-गोल आयताकार तथा कुछ चिपटे, ४-१२ मि० मि० लम्बे, एक तरफ से चिपटे किन्तु दूसरी तरफ कुछ गोल, लम्बाई की अपेक्षा २/३ चौड़े एवं १/३ मोटे होते हैं। बीज का बाह्य त्वक् पतला, भिदुर, चिकना, चमकीला, भूरे रंग का तथा चितकबरा रहता है। इसका अन्तस्त्वक् पतला और मुलायम होता है। बीजावरण में ऊपर द्वारक के समीप एक सफेद बाह्य वृद्धि होती है जिससे कुछ-कुछ ढँका हुआ वृन्तयु (Hilum) होता है। बीजावरण को हटा देने पर स्थूल तथा पीताभ श्वेत भ्रूणपोष (Endosperm) दिखाई देता है जिसके अन्दर तैलीय खाद्य पदार्थ संचित रहता है। भ्रूणपोष के मध्य में गर्भ होता है जिसमें दो पतले पत्र-सदृश बीजपत्र और उनके बीच छोटा भ्रूणाक्ष होता है। बीजों में नाममात्र की गंध एवं किंचित् तीता स्वाद होता है। एरण्ड का अपने यहाँ बहुत प्राचीन काल से प्रयोग होता आ रहा है। इसकी इतनी अधिक खेती होती है जिससे इसके तेल का एवं बीजों का बहुत अधिक मात्रा में निर्यात होता है। तैल विशेषकर साबुन बनाने, मशीनों के स्निग्धीकरण (Lubrication) एवं चर्म-व्यवसाय आदि उद्योगों में उपयोग में लाया जाता है। चिकित्सा की दृष्टि से उत्तम प्रकार का तेल अपने यहाँ कम निकाला जाता है यद्यपि उसमें विशेष बाधाएँ नहीं हैं। उत्तम तेल फ्रांस तथा इटली से आता है। इसमें पहले बीजों को खूब अच्छी तरह साफ कर, ऊपर का छिलका हटा, बिना उष्णता पहुँचाये केवल दबाव के द्वार तेल निकालते हैं। प्रथम दबाव देने पर करीब १६% तेल निकलता है वह अन्य व्यवसायों में काम में लाया जाता है। शीतविधि द्वारा निकाले तैल का स्वाद एवं गन्ध कम अप्रिय होता है। उष्ण विधि में बीजों को जल के साथ उबालते हैं। गरमी के कारण तैल जल पर नितर आता है। फिर इस तैल को अलग कर लेते हैं। दूसरी विधि में तैल को दबाव से ही निकालते हैं किन्तु बाहर से मंद आँच भी देनी पड़ती है। उष्णता से पतला हो जाने के कारण तेल अधिक मात्रा में तथा आसानी से निकलता है। इस तैल को धूप में रखकर शुभ्र बनाते हैं तथा बाद में जल के साथ उबालते हैं जिससे इसमें के अन्य पदार्थ निकलकर तेल स्वच्छ हो जाता है। रासायनिक संगठन-रेंड के बीजों में करीब ५०% तैल रहता है। तैल निकालने के पश्चात् बची हुई खली में रिसिनाइन (Ricinnine) नामक रवेदार पदार्थ, रिसिन (Ricin) नामक विषैला पदार्थ, तीव्र कार्य करने वाला लाइपेस् (Lipase) नामक किण्व एवं अन्य किण्व पाये जाते हैं। इसके तैल में अनेक ग्लिसराइड्स (Glycerides) रहते हैं जिसमें से प्रधान स्नेहीय अम्ल रिसिनोलिक एसिड (Ricinoleic acid, C₁₈ H₃₄ O₃) है जो इसका विरेचक द्रव्य माना जाता है। स्नेहीय अम्लों के ओलिक (Oleic), लिनोलिक् (Linoleic) एवं अल्प मात्रा में स्टियरिक (Stearic) तथा हाइड्रॉक्सि स्टियनिक् (Hydroxy stearic) अम्ल पाये जाते हैं। इसके बीजों में रिसिन नामक जो विषैला तत्व है वह इतना अधिक तीव्र है कि २, ३ बीज से मृत्यु तक हो सकती है। मुख की अपेक्षा सूचीवेध द्वारा प्रवेश करने से इसके विषैले परिणाम अधिक दिखलाई देते हैं। इससे आंत्र में रक्तस्रावयुक्त शोथ हो जाता है। इसमें कोई विरेचक गुण नहीं रहता। रिसिन एरण्ड तैल में नहीं पाया जाता। औषधि कार्य में बीजों का प्रयोग करते समय बीजों को दो फाक करके भीतर की जीभी जिसमें यह विष अधिक रहता है निकाला देना चाहिये। कुछ समय तक दुग्ध में भिगोने एवं एक दो बार उबालने से भी इस विष का पर्याप्त शोधन होता है। गुण और प्रयोग-एरण्ड तैल सौम्य, स्रंसन, स्तन्यजनन, दाहशामक एवं वातहर है। इसका मूल वृष्य एवं वातहर है। एरण्ड भेदनीय, स्वेदोपग, अङ्गमर्दप्रशमन, अधोभागहर एवं वातसंशमन है। एरण्ड तैल बहुत अच्छा विरेचक द्रव्य है। इसका प्रभाव क्षुद्रांत्र (ग्रहणी) पर होता है। यह आंत्र की ग्रन्थियों एवं पुरस्सरण क्रिया को उत्तेजित करता है जिससे २-६ घंटों में साधारण विरेचन होता है। इससे साधारण पतले २-४ पाखाने

गुडूच्यादिवर्गः ४७७ होते हैं। आखिरी पाखाने के साथ तैल निकल जाता है तथा कभी-कभी मरोड़ होती है। इसका कुछ अंश प्रचूषण के पश्चात् स्तन द्वारा उत्सर्गित होने के कारण स्तनपान करने वाले बच्चों को भी विरेचन हो जाता है। कुछ लोगों को इसकी आदत पड़ जाती है तथा कुछ लोगों में इससे विरेचन के पश्चात् विबंध हो जाता है। यह सम्भवतः बृहदांत्र की शिथिलता के कारण होता है जो २, ३ दिन रहती है। बाल, वृद्ध, स्त्री, गर्भिणी एवं प्रसूता के लिये तथा अर्शविकार, गुदविदार, उदरगत शल्यकर्म, श्रोणिविकार, उदरावरणशोथ, जीर्ण विबंध तथा ज्वरजन्य विबंध आदि अवस्थाओंके लिये यह उत्तम तथा हानिरहित सौम्य विरेचक है। अजीर्णजन्य अतिसार विशेषकर बच्चों में होनेवाले अतिसार में इससे लाभ होता है। तीव्र प्रवाहिका के प्रारंभ में अहिफेन के साथ इसका प्रयोग लाभदायक होता है तथा जीर्ण विकार में भी इसका उपयोग किया जाता है। एरंड तैल को सुबह खाली पेट आदी के रस के साथ दिया जाता है। सोंठ के फांट के साथ या उष्ण चाय, कॉफी आदि के साथ भी इसको दे सकते हैं। शीतऋतु में इसको कुछ उष्ण करके देना चाहिये। इसके स्वाद एवं गंध को दूर करने के लिये इसे कैप्सूल में बंदकर या गोंद के साथ एमल्शन् बनाकर ले सकते हैं। बड़ों में इसकी प्रभावोत्पादक न्यूनतम एवं अधिकतम मात्रा ३० बूँद से लेकर १ पाव तक की है लेकिन प्रायः २ तोला की मात्रा मृदुरेचन के लिए पर्याप्त होती है। नवजात शिशु के लिये छोटे चाय के चम्मच बराबर मात्रा कोई बड़ी मात्रा नहीं है। विबंध में एरंड तैल की बस्ति भी दी जाती है। कटिशूल, गृध्रसी, पार्श्वशूल, हृदयशूल, आमवात एवं संधिशोथ में इसके मूल का क्वाथ सोंठ के साथ पिलाने से लाभ होता है। इन अवस्थाओं में इसके तैल को शिलाजीत के साथ पिलाते हैं तथा इसकी मालिश भी करते हैं। नूतन तथा जीर्ण आमवात में नित्य सुबह एरंड तैल का प्रयोग लाभदायक है। स्तनों पर इसके तैल को मर्दन कर ऊपर से एरंड पत्र बाँधने से उसमें की गाँठें विलीन होकर स्तन्य-वृद्धि होती है। स्तन-चूचुक-विदार में इसके तैल को लगाने से लाभ होता है। आँखों में कोई चीज चली जावे तो स्वच्छ एरंड तैल डालने से वह निकल जाती है तथा आँखों की खुरखुराहट दूर होती है। अर्श में एरंड तैल तथा घृतकुमारी का स्वरस मिलाकर लगाने से जलन कम होती है। शिरःशूल में रेंडी के तेल की मालिश से लाभ होता है। दाह के शमन के लिये एरंडमज्जा को बकरी के दूध में पीसकर पादतल में मलते हैं। एरंड तैल के मर्दन से भी दाह का शमन होता है। मात्रा—तेल १-२ तोला; मूलचूर्ण १/४-१/२ तोला। २२. व्याघ्रैरण्ड हिं०—व्याघ्रैरण्ड, जंगली एरंड। बं०—बागा भेरेन्डा, बाघभेरंड। म०—मोंगली एरंड। गोवा—गलमर्क। कॉंक— काडएरडि। ता०—कट्टमनक्कु। ते०—अडविआमुदमु। क०—कडहरलु। अ०, फा०—डंडेनहरा। ले०—Jatropha curcas Linn. (जॅट्रोफा कर्कस् लिन.)। Fam. Euphorbiaceae (युफोर्बिएसी)। यह दक्षिण अमेरिका का आदिवासी है किन्तु प्रायः सब प्रान्तों में पाया जाता है। दक्षिण में इसे लोग घरों में लगाते हैं। इसका वृक्ष—छोटा एवं करीब १०-२० फीट ऊँचा होता है। इसकी छाल धूसरवर्ण की एवं काष्ठ मुलायम होता है। पत्ते—चिकने, बड़े, व्यास में ४-६ इञ्च एवं ३-५ खंडों में विभक्त होते हैं। पुष्प—पीताभ वर्ण के होते हैं। फल— हरे रंग के, १ इञ्च लम्बे एवं सूखने पर भी बहुत दिन तक पेड़ में लगे रहते हैं। इसके बीजों में तैल होता है। इसके पत्तों को तोड़ने से सफेद रंग का बहुत दूध निकलता है। इसके दूध एवं मूल का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है।

इसी की दूसरी जाति जॅट्रोफा गॉसिपिफोलिया लिन. (J. gossipifolia Linn.), लाल व्याघ्रैरण्ड सड़कों के किनारे तथा ऊसर भूमि में और अधिक मात्रा में उगी हुई पाई जाती है। इसके पौधे ३-६ फीट ऊँचे, पत्ते ३-५ खंडों में विभक्त एवं पुष्प लाल होते हैं। पत्रतट, पर्णवृन्त और उपपत्रों के ऊपर श्लेष्मोत्पादक ग्रंथियाँ रोमों के रूप में रहती हैं जिससे यह पौधा स्पर्श में चिपचिपा होता है। इसके मूल में कपूर जैसी गंध आती है। इसकी दातुन अच्छी समझी जाती है। रासायनिक संगठन- व्याघ्रैरण्ड के बीजों में हलके पीले रंग का तैल ३०%, शर्करा, स्टार्च तथा कर्सिन (Curcin) नामक रिसिन जैसा विषैला पदार्थ पाया जाता है। गुण और प्रयोग- व्याघ्रैरण्ड का दुग्ध रक्तसांग्राहिक तथा व्रणरोपक है। इसकी जड़ वातानुलोमक, पाचन एवं ग्राही है। इसका तैल जमालगोटे जैसा तीव्र विरेचक होता है तथा इसकी क्रिया अनियन्त्रित होने के कारा तैल का आन्तरिक व्यवहार नहीं किया जाता। इसके दुग्ध को क्षतपर लगाने से कोलोडिअन की तरह एक पतला स्तर व्रण पर बन जाता है जिससे रक्तस्राव रुकता है, उपसर्ग से व्रण की रक्षा होती है तथा व्रण का संकोच होने से व्रण जल्दी अच्छा होता है। इसे पामा, दाद तथा छाजन पर लगाते हैं। इसके पत्तों के क्वाथ का भी इसी तरह उपयोग होता है एवं इससे कुल्ला करने से मसूड़े से खून जाना बन्द होकर दाँत मजबूत होते हैं। इसकी दतुअन से भी लाभ होता है। इसके तैल को खुजली, परिसर्प, छाजन तथा अन्य चर्मरोगों में एवं आमवात में लगाते हैं तथा व्रणशोधन के लिये भी इसका उपयोग करते हैं। दुग्धवृद्धि के लिये इसके पत्तों को जरा सा गरमकर स्तन पर बाँधते हैं या इसके क्वाथ से सेंककर फिर उन्हीं पत्तों को बाँधते हैं। कोंकण की तरह अजीर्ण, अतिसार तथा उदरशूल के लिये इसकी एक अंगुल लम्बी ताजी जड़, ७ दाना काली मिर्च एवं थोड़ा हींग इन सबको पीसकर उसका रस मट्ठे के साथ पिलाते हैं।

अथ शुक्लरक्तार्कौ (सफेद आक-लाल आक)। तयोर्नामानि गुणाँश्चाह

श्वेताकॊ गणरूपः स्यान्मन्दारो वसुकोऽपि च। श्वेतपुष्पः सदापुष्पः स चालर्कः प्रतापसः ।।६७।। रक्तोऽपरोऽर्कनामा स्यादर्कपर्णो विकीरणः। रक्तपुष्पः शुक्लफलस्तथाऽऽस्फोटः प्रकीर्तितः ।।६८।। अर्कद्वयं सरं वातकुष्ठकण्डूविषव्रणान्। निहन्ति प्लीहगुल्मार्शःश्लेष्मोदरशकृत्कृमीन् ।।६९।। सफेद आक तथा लाल आक के नाम और गुण- श्वेतांक, गणरूप, मन्दार, वसुक, श्वेतपुष्प, सदापुष्प, अलर्क और प्रतापस ये सब संस्कृत नाम सफेद आक के हैं। लाल आक के संस्कृत नाम—रक्तार्क, अर्कनामा (सूर्य के वाचक सभी शब्द इसके पर्यायवाचक हैं), अर्कपर्ण, विकीरण, रक्तपुष्प, शुक्लफल तथा आस्फोट हैं। दोनों प्रकार के आक- दस्तावर तथा वात, कुष्ठ, खुजली, विष, व्रण, प्लीहा, गुल्म, बवासीर, कफ, उदररोग एवं मल के कृमि इन सबों को नष्ट करते हैं। [६७-६९]

अथ शुक्लरक्तार्कयोः पुष्पगुणानाह

अलर्ककुसुमं वृष्यं लघु दीपनपाचनम्। अरोचकप्रसेकार्शःकासश्वासनिवारणम् ।।७०।। रक्तार्कपुष्पं मधुरं सतिक्तं कुष्ठकृमिघ्नं कफनशनञ्च। अर्शो विषं हन्ति च रक्तपित्तं संग्राहि गुल्मे श्वयथौ हितं तत् ।।७१।। सफेद आक तथा लाल आक के फूल के गुण-सफेद आक का फूल- वृष्य, लघु, अग्निदीपक तथा पाचक होता है एवम् यह अरुचि, प्रसेक (मुख से लार गिरना), बवासीर, खाँसी तथा श्वास को दूर करता है। लाल आक का फूल- मधुर तथा थोड़ा तिक्त रसयुक्त, संग्राही, गुल्म तथा शोथ में हितकर होता है एवम् यह कुष्ठ, कृमि, कफ, बवासीर, विष तथा रक्तपित्त को दूर करने वाला होता है। [७०-७१]

गुड़ूच्यादिवर्गः ४७९ अथार्कदुग्धगुणानाह क्षीरमर्कस्य तिक्तोष्णं स्निग्धं सलवणं लघु । कुष्ठगुल्मोदरहरं श्रेष्ठमेतद्विरेचनम् ।।७२।। 'आक' के दूध के गुण-यह तिक्त तथा कुछ लवण रस से युक्त, उष्णवीर्य, स्निग्ध और लघु होता है एवम् यह कुष्ठ, गुल्म तथा उदर रोग को दूर करता है और इसके प्रयोग से उत्तम विरेचन होता है । [७२] नोट-चरक ने अर्क का एक ही भेद लिखा है। सुश्रुत ने अर्क एवं अलर्क ये दो भेद लिखे हैं। भावप्रकाशकार श्वेत एवं रक्त ये दो भेद लिखते हैं। धन्वन्तरि निघण्टु में अर्क एवं राजार्क ये दो भेद दिये हैं। राजनिघण्टु में अर्क, राजार्क, शुक्लार्क एवं श्वेतमन्दारक ये ४ भेद लिखे हैं। राजार्क के जो अन्य पर्याय रा० नि० में दिये हैं वे भावप्रकाशोक्त श्वेतार्क से मिलते हैं। अरुणदत्त ने मन्दारक को श्वेतपुष्प लिखा है (सू० अ० १५)। इससे अनुमान होता है कि राजार्क तथा श्वेतमन्दारक ये श्वेतार्क के ही भेद होंगे। रा० नि० ने राजार्क को सदापुष्प एवं श्वेत मन्दारक को दीर्घपुष्प लिखा है। इससे ऐसा मालूम होता है कि श्वेत पुष्पवाले किन्तु जिसमें बारहो मास पुष्प आते हों उसे राजार्क एवं जिसके पुष्प श्वेत एवं दीर्घ हों उसे मन्दारक कहा गया हो। आधुनिक ग्रन्थों में इसके दो भेद पाये जाते हैं किन्तु उनके लेटिन नामों में विद्वानों में मतभेद हैं। केलोट्रोपिस जाइगेण्टीआ को कुछ विद्वान् श्वेतार्क (अलर्क, मदार) तथा केलोट्रोपिस प्रोसेरा को रक्तार्क (अर्क) मानते हैं किन्तु अन्य विद्वान् इसके विपरीत मानते हैं। यहाँ पर दोनों का वानस्पतिक वर्णन अलग-अलग दिया गया है। चिकित्सा की दृष्टि से मंदार के सभी भेदों के गुण समान होते हैं। रक्तार्क या श्वेतार्क के भेद से उपयोगिता में कोई अन्तर नहीं होता। २३. श्वेतार्क सं०-अलर्क, मंदार । हिं०-मदार, आक । म०-रूई, आक । बं०-आकंद । गु०-आकडो । ता०- बदाबडम, एरुक्कु । ते०-मंदारमु, जिल्लेडु । क०-एक्क । मल०-एरिक्का । अ०-उषर, उषार । फा०- खरक, जहूक । अं०-मडार (Mudar); जायगॉण्टिक् स्वॅलोवर्ट (Gigantic Swallow-wort) । ले०-Calotr- opis gigantea (Linn.) R. Br. ex Ait. (कॅलोट्रोपिस जाईगेण्टीआ लिन.) । Fam. Asclepiadaceae (एरक्लेपिएडॅसी) । यह हिमालय में ३००० फीट की ऊँचाई तक तथा पंजाब से लेकर दक्षिण भारत, आसाम, लंका और सिंगापुर में ऊसर भूमि में पाया जाता है। यह मलाया द्वीप तथा दक्षिण चीन में भी होता है। इसका क्षुप यो छोटा वृक्ष-बहुवर्षायु तथा ८-१० फीट तक ऊँचा रहता है। पत्र-अवृन्त, मोटे, क्षोदलिप्त हरे रंग के, अंडाकार या अभिलट्वाकार-आयताकार, ४-८ इञ्च लम्बे, १.५-४ इञ्च चौड़े एवं पर्णतल की तरफ संकुचित हृदयाकार या प्रायः काण्ड को कुछ घेरे रहते हैं। पुष्प-१.५-२ इञ्च व्यास के, गंधहीन तथा अन्तर्दल फैले हुये एवं नीललोहित (Purplish) या श्वेत रंग के होते हैं। फल-करीब ४ इञ्च लम्बे, मुड़े हुवे एवं फूलों से एक सेवनीक फल (Follicle) रहते हैं। बीज-महीन सिल्क की तरह गुच्छेदार रूई से युक्त तथा छोटे एवं चिपटे होते हैं। इसकी शाखाओं तथा पत्रादि से दुग्ध निकलता है। इसके गुण और प्रयोग आगे रक्तार्क के साथ ही दिये गये हैं। २४. रक्तार्क (अर्क) ले०-Calotropis procera (Ait.) R.Br. (कॅलोट्रॉपिस प्रोसेरा एट.) । यह भारतवर्ष के प्रायः सभी प्रान्तों में उष्ण एवं शुष्क स्थानों में पाया जाता है। यह हिमालय के निचले भागों में तथा उत्तर-पश्चिम में उसके समीप के मैदानों में अधिक होता है। बजीरिस्तान, अफगानिस्तान, पर्शिआ, अरब, इजिप्त तथा अफ्रीका का उष्ण प्रदेश इन स्थानों में भी यह पाया जाता है। इसका क्षुप-स्वावलंबी एवं प्रायः ६-८ फीट ऊँचा

४८० भावप्रकाशनिघण्टुः होता है। पत्र—अवृन्त, प्रायः २।-६ इञ्च लम्बे, १॥-३॥ इञ्च चौड़े, चौड़े लट्वाकार-आयताकार, अंडाकार या अभिलट्वाकार होते हैं। पुष्प— १ इञ्च व्यास के, सुगन्ध युक्त एवं गुच्छों में आते हैं। अन्तर्दल श्वेताभ रहते हैं तथा सीधे ऊपर की ओर उठे हुये दलखण्डों के ऊपर जामुनी (आनीलारुण) रंग के दाग होते हैं। फल— ३-४ इञ्च लम्बे, २-३ इञ्च चौड़े, गोल अंडाकार होते हैं। बीज—रूईदार श्वेतार्क की तरह के होते हैं। इसके पत्ते आदि से भी दूध निकलता है। उपर्युक्त दोनों प्रकार के अर्क के मूल, पत्र, पुष्प एवं क्षीर आदि का औषध में उपयोग किया जाता है। इनके मूल की छाल का विशेष उपयोग किया जाता है। इसके छोटे, मुड़े हुए, २-५ मि० मि० मोटे एवं २-३.५ से० मि० चौड़े टुकड़े होते हैं। कभी-कभी इनमें उपमूल लगे रहते हैं। इसका बाह्यभाग मुलायम, हलके पीतवर्ण (Buff) का एवं लम्बाई में नालीदार होता है एवं अन्दर की सतह हलके पीले रंग की एवं रवेदार होती है। इसका भग्न छोटा एवं दुग्ध युक्त होता है। इसमें गंध नहीं होती तथा इसका स्वाद कडुआ एवं तीता होता है। ग्रीष्मऋतु में पुराने-से-पुराने बड़े (के. जाइगेण्टीआ) क्षुप के मूल की छाल को निकाल कर, शीतल जल से जल्दी धोकर खुली हवा में सुखायें। धूप में न रखें। जब उसमें का दूध सूख जाय तब ऊपर की कार्कयुक्त सतह निकाल कर बाकी भाग को सुखा एवं चूर्ण बना हवाबंद बोतलों में रखें। औषध के अतिरिक्त इसके बीजों की रूई एवं छाल से तन्तुनिर्माण किया जा सकता है। इसके दुग्ध का चमड़े के व्यवसाय में उपयोग किया जाता है। इससे नये चमड़े की दुर्गंध दूर होकर उसका रंग पीला हो जाता है। चमड़े के बालों को साफ करने के लिये भी इसका उपयोग करते हैं। इसके किसी-किसी वृक्ष पर एक प्रकार का शर्करावत् निर्यास संगृहीत होता है ऐसा हकीम मानते हैं जिसे 'सुकरूलउषर' कहा जाता है। जिन जातियों में लड़कियों की हत्या की प्रथा है उनमें इसके दुग्ध को जबरदस्ती बच्चे को पिलाते हैं। गर्भपात के लिये भी इसका आन्तरिक तथा स्थानिक प्रयोग करते हैं। रासायनिक संगठन—के. जाइगेण्टीआ के मूल की छाल में बीटा-एमाइरिन (B. amyrin) एवं जाइगेण्टीओल् (Giganteol) तथा आइसो जाइगेण्टीओल् (Iso Giganteol) ये दो समाजिक रवेदार सुषव (Isomeric crystalline alcohols) पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग—इसकी मूलत्वक् कटु, तिक्त, उष्ण, दीपन, पाचन, स्वेदजनन, पित्तस्रावी, कफघ्न, वामक, उद्वेष्टननिरोधी, रसग्रंथी एवं त्वचा के लिये उत्तेजक, जीवनविनिमय क्रिया को उत्तेजित करने वाली, वल्य एवं रसायन है। अल्प मात्रा में यह उत्तम स्वेदल एवं कफनिःसारक होते हुए भी अधिक मात्रा से इससे वमन, विरेचन तथा प्रक्षोभ उत्पन्न होता है। इसका वामक प्रभाव आमाशयप्रक्षोभ एवं वमनकेन्द्र की उत्तेजना से होता है। इसका उद्वेष्टन-निरोधी गुण साधारण है किन्तु उसका श्वासनलिकाओं पर स्पष्ट प्रभाव दिखलाई देता है। रसायन होने के कारण इसे वानस्पतिक पारद कहा जाता है। इससे यकृत् की क्रिया अच्छी होकर पित्तस्राव ठीक होने लगता है। इसका उत्सर्ग त्वचा के द्वारा होने के कारण इससे त्वचा पर उत्तेजक प्रभाव दिखलाई देता है एवं छोटी रक्तवाहिनियों का विस्फार होता है। (१) रक्तविकार, कुष्ठ, उपदंश या किसी भी कारण से उत्पन्न व्रण में इसका आंतरिक एवं बाह्य प्रयोग करते हैं। श्लीपद में इसके साथ रसकपूर या रससिन्दूर, सुरमा (स्रोतोञ्जन) एवं सांभरसींगभस्म देते हैं तथा कांजी में पीसकर शोथ पर लेप करते हैं। उपदंश में पारद की तरह इसका उपयोग होता है। उपदंश की द्वितीयावस्था में त्वचा पर उत्पन्न चकत्ते आदि इससे कम होते हैं। वद (Bubo) तथा गंडमाला में इसको खिलाते तथा इसके दूध को लगाते हैं। सभी प्रकार के चर्मरोगों में छाल को जल में पीस कर लगाते हैं या खुजली अधिक होने पर निमोली के तैल में घिसकर लगाते हैं। विशेषकर पुराने त्वग्रोगों में इससे अधिक लाभ होता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

गुडूच्यादिवर्गः ४८१ (२) सभी प्रकार के कफविकारों में इससे लाभ होता है । १५-३० र० चूर्ण को खिलाने से इपिकाक की तरह १ घंटे के अंदर वमन होकर कफ बाहर निकल जाता है तथा कभी-कभी विरेचन भी होता है । प्रतिश्याय तथा गले का नूतन शोथ, श्वासनलिकाशोथ आदि में घोड़बच के साथ अर्कादिचूर्ण (अर्कचूर्ण २, अफीम १, सैंधव ७; मात्रा-३-७ र०) का उपयोग किया जाता है । तमकश्वास तथा श्वसनिकाभिस्तीर्णता (Bronchiactasis) आदि व्याधियों में इसके प्रयोग से पर्याप्त लाभ होता है । (३) यकृत् एवं प्लीहावृद्धि तथा उससे उत्पन्न उदर, पित्त का स्राव ठीक न होने के कारण उत्पन्न अतिसार तथा नई एवं पुरानी आँव में इसका बहुत उपयोग किया जाता है । आँव में छाल को ३०-४० रत्ती की बड़ी मात्रा में देना चाहिये किन्तु इसके साथ अफीम एवं सुगन्धित पदार्थ भी देने चाहिए अन्यथा वमन की संभावना रहती है । कुपचन में १/२ रत्ती छाल देने से पाचनशक्ति बढ़ती है । (४) जीर्ण ज्वर एवं विसर्गी ज्वर में इसका फांट पिलाते हैं । मलेरिया में इसकी छाल पान के साथ खिलाते हैं । (५) जीर्ण आमवात में अर्कादिचूर्ण सोंठ के साथ रात को देने से पसीना होता है, संधिशूल कम होता है एवं निद्रा आती है । इसके दुग्ध का मोटा लेप करने से त्वचा का दाह होकर फोड़े उत्पन्न होते हैं किन्तु पतला लेप अल्प वेदनाहर एवं लोमशातक है । इसके आन्तरिक प्रयोग से अत्यन्त विरेचन होता है । इसके गुण भी मूल की तरह ही होते हैं किन्तु इसका कम जादा प्रभाव होता है । (१) यकृत् एवं प्लीहावृद्धि तथा तज्जन्य उदर में इसका आन्तरिक प्रयोग करते हैं । (२) मोच, मरोड़ एवं संधिशोथ में नमक में इसको मिलाकर लगाने से सूजन कम होती है । दारुहरिद्रा के चूर्ण में इसको मिलाकर उसकी बत्ती भगंदर तथा नाड़ीव्रण में डालते हैं । दाद एवं छाजन आदि त्वचा के रोगों में एवं आमवात में इसको हल्दी के साथ तिल के तैल में उबालकर मालिश करते हैं । अर्श में यद्यपि इसका लेप करते हैं तथापि इससे बहुत तकलीफ होती है । मुखरोगों में मधु के साथ इसे लगाते हैं । कृमिदन्त में दाँत के गढ़े में इसे लगाने से दर्द कम होता है । इसके पुष्प दीपन, पाचन, कफघ्न एवं उद्वेष्टननिरोधी हैं । मूल की अपेक्षा ये गुण इसमें अधिक स्पष्ट दिखलाई देते हैं । (१) क्षुधानाश तथा कुपचन में इससे अच्छा लाभ होता है । (२) खाँसी एवं दमा में इसके फूलों को राब में उबालकर देते हैं । इसके पत्ते वातहर, शोथहर, व्रणशोधक, व्रणरोपक एवं आनुलोमिक हैं । (१) जीर्ण व्रण पर इसका चूर्ण डालने से व्रण जल्दी अच्छे होते हैं । (२) इसके पत्तों को रेंड़ी का तेल लगाकर गरम करके सूजन पर बाँधने से सूजन तथा पीड़ा कम होती है । (३) बच्चों के आध्मान में पेट पर इनको बाँधने से एकाधबार पाखाना होकर आध्मान कम होता है । (४) इसके पत्तों को तेल में उबाल कर चोट पर उसकी मालिश की जाती है । (५) इसके पत्ते एवं सैंधव को समान भाग में लेकर बन्द हाँड़ी में गरम करके बनाई हुई राख तक्र के साथ उदररोग में देते हैं । मात्रा—मूलत्वक्चूर्ण १ १/२-२ १/२ रत्ती; वामक १५-३० रत्ती; दुग्ध १-२ रत्ती; पत्रचूर्ण २ रत्ती-१ माशा; फूल १-३ रत्ती । ३४ भाव.I