भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 519, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 519

४६८ भावप्रकाशनिघण्टुः श्वेतकंटकारी का पौधा वर्षायु, कुछ छोटा एवं हलके रंग का होता है। पुष्प श्वेत रंग के आते हैं। मूल छोटा एवं पतला तथा शाखायुक्त होता है। यह शीतऋतु में होता है तथा वर्षा में गल जाता है। श्वेतकंटकारी का एक पर्याय लक्ष्मणा होने के कारण तथा यह भी 'गर्भकारिणी' होने के कारण 'लक्ष्मणा' के स्थान पर इसका उपयोग किया जाता है। लक्ष्मणा का आगे स्वतंत्र वर्णन आया है। यह पौधा उपर्युक्त कंटकारी का केवल स्थानभेद से उत्पन्न प्रकार (Variety) है या स्वतंत्र जाति (Species) है इस संबंध में अभी शोध चालू है। इसके स्वतंत्र स्पीसीज सिद्ध होने की अधिक संभावना है। रासायनिक संगठन— इसमें सोलेनीन सदृश सोलेकार्पिडिन (Solacarpidin, C₂₆ H₄₄ O₃ N) नामक एक क्षाराभ बहुत अल्पमात्रा में होता है जो फल में अधिक होता है। पत्तों की अपेक्षा मूल में यह अधिक होता है। इसके पंचांग में पोटैशियम् क्लोराइड् एवं पोटे-शियम नाइट्रेट् (Potassium chloride and Potassium nitrate) पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग— यह उत्तम मूत्रल, कफनिःसारक एवं ज्वरहर है। इसके बीज वेदनास्थापक हैं। इसका उपयोग कास, श्वास, प्रतिश्याय, ज्वर, अंगमर्द, पार्श्वपीड़ा, हृद्रोग, आध्मान, विबंध, अश्मरी तथा वमन में किया जाता है। (१) गुडुचं एवं इसकी जड़ का क्वाथ ज्वर एवं कास में बल्य रूप में दिया जाता है। इससे शरीर की पीड़ा कम होती है, कुछ पसीना होता है एवं मूत्र की मात्रा भी कुछ बढ़ती है। (२) इससे गला एवं श्वासनलिका की शुष्कता कम होकर कफ ढीला होने लगता है इसलिये गले का शोथ, स्वरयन्त्रशोथ एवं श्वासनलिकाशोथ इनकी प्रथमावस्था में इससे अच्छा लाभ होता है। कफ की प्रथमावस्था में मूल के क्वाथ के साथ मधु एवं सैंधव दिया जाता है। द्वितीयावस्था में पत्रस्वरस या मूलक्वाथ में छोटीपीपल एवं मधु मिलाकर देते हैं जिससे खाँसी की तकलीफ कम होती है। तमक श्वास एवं उद्वेष्टन युक्त कास में इसके मूल के क्वाथ में सैंधव एवं हींग मिलाकर देते हैं। सुश्रुत ने तमक श्वास के लिये इसका मूलचूर्ण १ तोला तथा हींग १/२ तोला, मधु के साथ ३ दिन सेवन करने को लिखा है। कास, श्वास तथा स्वरभेद में इससे सिद्ध घृत का उपयोग लिखा है। कास में इसके स्वरस से सिद्ध मुद्गयूष आँवले की खटाई डालकर उपयोग करने को लिखा है। (३) इसके मूल का स्वरस मद्य मिलाकर पिलाने से वमन बन्द होता है। (४) इसके मूल के क्वाथ को मूत्रकृच्छ्र, बस्तिगत अश्मरी एवं जलोदर में देते हैं। मूत्रदोष में इसके स्वरस में मधु मिलाकर पिलाते हैं। अश्मरी में बृहती तथा कंटकारी के मूल का चूर्ण मीठे दही के साथ ७ दिन पीने का विधान है। (५) इसके बीज के धूम्रपान से कृमिदन्तजन्य शूल कम होता है तथा कभी-कभी तत्काल लाभ होता है। मुखपाक में पंचांग क्वाथ से गण्डूष कराते हैं। पीड़ायुक्त अर्श में इसके बीज की धूनी दी जाती है। वेदनायुक्त अंगों पर इसके पत्तों का लेप किया जाता है। (६) आमवात में इसके पत्रस्वरस में काली मिर्च मिलाकर पिलाते हैं तथा पत्तों का लेप करते हैं। (७) गले की सूजन में फलों का स्वरस उपयोगी है। (८) सोजाक में पंचांग का क्वाथ पिलाते हैं। मात्रा— पत्रस्वरस १/४-१/२ तोला; मूलक्वाथ (अष्टमांश) २-४ तोला; मूलचूर्ण १-२ माशा। श्वेतकंटकारी— इसकी ताजी जड़ दूध में पीसकर मासिक के चौथे दिन पिलाने से गर्भधारण होता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA