भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 518, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 518

गुडूच्यादिवर्गः ४६७ सफेद फूल वाली भटकटैया के नाम—श्वेता, क्षुद्रा, चन्द्रहासा, लक्ष्मणा, क्षेत्रदूतिका, गर्भदा, चन्द्रमा, चन्द्री, चन्द्रपुष्पा और प्रियङ्करी ये सब संस्कृत नाम सफेद फूल वाली भटकटैया के हैं। [३९] अथ कण्टकारीगुणानाह कण्टकारी सरा तिक्ता कटुका दीपनी लघुः ।।४०।। रूक्षोष्णा पाचनी कासश्वासज्वरकफानिलान् । निहन्ति पीनसं पार्श्वपीडाकृमिहृदामयान् ।।४१।। भटकटैया के गुण—भटकटैया—दस्तावर, तिक्त तथा कटुरसयुक्त, अग्निदीपक, लघु, रूक्ष, उष्णवीर्य और पाचक होती है। यह खाँसी, श्वास, ज्वर, कफ, वात, पीनस, पार्श्वपीडा (पसुली का दर्द), कृमि तथा हृद्रोग इन सबों को दूर करती है। [४०-४१] अथ कण्टकारीद्वयफलगुणानाह तयोः फलं कटु रसे पाके च कटुकं भवेत् । शुक्रस्य रेचनं भेदि तिक्तं पित्ताग्निकृल्लघु ।। हन्यात्कफमरुत्कण्डूकासमेदःकृमिज्वरान् ।।४२।। दोनों कटेरियों के फल के गुण—छोटी तथा बड़ी कटेरी के फल—पाक में कटुरसयुक्त, शुक्र का रेचन करने वाले, मल को भेदन करने वाले, कटु तथा तिक्तरसयुक्त, पित्त तथा अग्निवर्धक और लघु होते हैं और कफ, वात, खुजली, खाँसी, मेदरोग, कृमि तथा ज्वर को दूर करने वाले होते हैं। [४२] अथ श्वेतपुष्पकण्टकार्या गुणानाह तद्वत्प्रोक्ता सिता क्षुद्रा विशेषाद् गर्भकारिणी ।।४३।। श्वेत फूल वाली भटकटैया के गुण—सफेद फूल वाली भटकटैया भी पूर्वोक्त इन सभी गुणों से युक्त होती है तथापि विशेष करके यह गर्भ धारण कराने वाली होती है। [४३] १४. कंटकारी हिं०—कटेरी, लघुकटाई, कंटकारी, छोटी कटाई, भटकटैया, रेंगनी, रिगणी, कटाली, कटयाली। बं०— कंटकारी। म०—रिङ्गणी, भुईरिङ्गणी। गु०—बेठी भोरिंगणी, भोयरिंगणी। क०—नेल्ल गुल्लु। ते०—चल्लन मुलग। मा०—पसरकटाई। पं०—कंडियारी, बरुम्ब। ता०—कंडनकत्तरि। अ०—हदक, इसिम, शौकतुलअकरब। फा०— बादंगानवरीं, कटाई खुर्द। ले०—Solanum xanthocarpum Schrad & Wendl. (सोलैनम् झैन्थोकार्पम् श्रैंड, वेण्ड.)। Fam. Solanaceae (सोलेनेसी)। यह प्रायः सब प्रान्तों में और सब प्रकार की मिट्टी में पाई जाती है परन्तु रेतीली भूमि में यह अधिक उत्पन्न होती है। दक्षिण-पूर्व एशिया, मलाया एवं आस्ट्रेलिया के उष्ण प्रदेशों में भी यह पाई जाती है। इसका परिप्रसरी क्षुप—बहुवर्षायु तथा अत्यन्त काँटेदार होता है। काण्ड—टेढ़े-मेढ़े एवं अनेक शाखाओं से युक्त रहते हैं। काँटे—सीधे, पीले, चिकने, चमकीले एवं .५-.७ इञ्च तक लम्बे होते हैं। इनमें साथ में छोटे काँटे भी होते हैं। पत्ते—२-४ इञ्च लम्बे, १-३ इञ्च चौड़े, लट्वाकार, आयताकार या अंडाकार, गहरे कटे हुए या पक्षवत् खण्डित होते हैं। पत्रखण्ड पुनः खण्डित या दन्तुर होते हैं। ये तारकाकार रोमों के कारण खुरदुरे होते हैं। फूल—गहरे नीले रंग के आते हैं। फल—गोल, .५-१ इञ्च व्यास के, चिकने और पीले या कभी-कभी सफेद होते हैं तथा हरी धारियों से युक्त होते हैं। बीज—चिकने एवं छोटे होते हैं। इसके मूल का उपयोग किया जाता है। यह हमेशा ताजा उपयोग में लाना चाहिये। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा) · पृष्ठ 518, कुल 1167 में से · BharatKosha