भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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४६६ भावप्रकाशनिघण्टुः इसका एक भेद ठंडे तथा आर्द्र स्थानों में पाया जाता है जिसे ले०-Solanum torvum Swartz (सोलॅनम् टॉर्व्हम् स्वाज्र्ट्) तथा सं०-श्वेतबृहती कहते हैं। इसके क्षुप-६-१० फीट ऊँचे तथा उपर्युक्त बृहती के समान होते हैं। ये अधिक ऊँचे, सीधे तथा शाखाएँ अल्प, सीधी, प्रायः मुलायम और उन पर काँटे बहुत कम होते हैं। पत्ते-३-७ इञ्च लम्बे, २-४ इञ्च चौड़े, ऊपर कम और नीचे अधिक रोमश (रोम तारकाकार) होते हैं। काँटे भी प्रायः मध्यशिरा पर नीचे की ओर केवल एक या दो होते हैं। फूल-श्वेत तथा बाह्यकोश में काँटे नहीं होते। फल-पहले से बड़े, .५ इञ्च व्यास के तथा पीले होते हैं। इसका एक अन्य भेद शुष्क भागों में पाया जाता है जिसे ले०-Solanum melongena Linn. (सोलॅनम् मेलोंगेना लिन.) एवं हिं०-वनभण्टा, जंगली बैंगन, रोको, ठोको, गठेगनी कहते हैं। यह बैंगन की ही जंगली जाती होती है जिसमें काँटे होते हैं। पत्ते-अंडाकार, ४-७ इञ्च बड़े, न्यूनाधिक अखंड, लहरदार या किंचित् खंडित (खंडगोल) होते हैं। फूल-नीले और प्रायः व्यास में १ इञ्च होते हैं। बाह्यकोश फल में बढ़ा हुआ रहता है। फल-चिकने, श्वेताभ-पीत, गोल और व्यास में करीब १ इञ्च होते हैं। इसके कृषिजन्य भेद में फल के रंग तथा आकारादि में बहुत भिन्नता आ जाती है। नोट-प्राचीनों ने बृहतीद्वय का उल्लेख किया है जिससे कुछ लोग बृहती (बड़ी कटेरी) तथा कंटकारी (भटकटैया) ये दो द्रव्य लेते हैं। कुछ लोगों का मत है कि बृहतीद्वय अलग है तथा कंटकारी अलग है। बृहती के कई भेद प्राप्त भी होते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें सोलेनीन एवं सोलेनिडीन नामक दो क्षाराभ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-यह उष्ण, दीपन, पाचन, ग्राही, वातघ्न, कफघ्न, हृद्य, कण्ठ्य, हिक्कानिग्रहण, शोथहर तथा अंगमर्द प्रशमन है। इसका मूल कफ रोगों में दिया जाता है। इससे ज्वर कम होता है एवं श्वासावरोध कम होता है। इसके प्रयोग से उदरगत वात कम होने से शूल एवं मरोड़ दूर होती है। मूत्रकृच्छ्र में इसका उपयोग करते हैं। त्वग्रोगों में इसके पत्तों का लेप किया जाता है। वमन रोकने के लिये इसके पत्तों का स्वरस आर्द्रक के साथ पिलाते हैं। इसके फल अग्निदीपक माने जाते हैं तथा शिरःशूल में इसका लेप लाभदायक होता है। मात्रा-चूर्ण १-२ माशा। अथ कण्टकारी (भटकटैया, कटेरी) । तस्या नामान्याह कण्टकारी तु दुःस्पर्शा क्षुद्राव्याघ्री निदिग्धिका । कण्टालिका कण्टकिनी धावनी बृहती तथा ।।३८।। भटकटैया के नाम-कण्टकारी, दुःस्पर्शा, क्षुद्रा, व्याघ्री, निदिग्धिका, कण्टालिका, कण्टकिनी, धावनी और बृहती ये सब संस्कृत नाम भटकटैया के हैं। [३८] ❖ उभे च बृहत्यौ । यत आह सुश्रुत क्षुद्रा या क्षुद्रभण्टाकी बृहतीति निगद्यते ।।३८।। दोनों ही अर्थात् बड़ी कटेरी तथा भटकटैया (छोटी कटेरी) 'बृहती' कहलाती हैं क्योंकि 'सुश्रुत' महर्षि ने भी कहा है कि-क्षुद्रा (भटकटैया) और क्षुद्रभण्टाकी (बड़ी कटेरी) जो यह दो प्रकार की कटेरी होती है वे दोनों ही 'बृहती' नाम से कहलाती हैं। [३८] अथ श्वेतपुष्पायाः कण्टकार्या नामान्याह श्वेता क्षुद्रा चन्द्रहासा लक्ष्मणा क्षेत्रदूतिका । गर्भदा चन्द्रमा चन्द्री चन्द्रपुष्प्या प्रियङ्करी ।।३९।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammpu. Digitized by S3 Foundation USA