भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुडूच्यादिवर्गः ४६९ अथ गोक्षुरः । तस्य नामानि गुणाँश्चाह गोक्षुरः क्षुरकोऽपि स्यात्त्रिकण्टः स्वादुकण्टकः । गोकण्टको गोक्षुरको वनशृङ्गाट इत्यपि ।।४४।। पलङ्कषा श्वदंष्ट्रा च तथा स्यादिक्षुगन्धिका । गोक्षुरः शीतलः स्वादुर्बलकृद्बस्तिशोधनः ।।४५।। मधुरो दीपनो वृष्यः पुष्टिदश्चाश्मरीहरः । प्रमेहश्वासकासार्शः कृच्छ्रहृद्रोगवातनुत् ।।४६।। गोखरू के नाम तथा गुण-गोक्षुर, क्षुरक, त्रिकण्ट, स्वादुकण्टक, गोकण्टक, गोक्षुरक, वनशृङ्गाट, पलङ्कषा, श्वदंष्ट्रा तथा इक्षुगन्धिका ये सब संस्कृत नाम गोखरू के हैं। गोखरू-शीतवीर्य, स्वादु, बलकारक, बस्तिशोधक, मधुररसयुक्त, अग्निदीपक, वृष्य तथा पुष्टिकारक होता है। यह पयरी, प्रमेह, श्वास, खाँसी, बवासीर, मूत्रकृच्छ्र, हृद्रोग तथा वात को दूर करने वाला होता है। [४४-४६] १५. गोखरू (छोटा) हिं०-गोखरू छोटा गोखरू, हाथीचिकार। बं०-गोक्षुर, गोखुरी। म०-सराटे, काटे गोखरू। क०- नेग्गिलुमुल्लु, नेगलु। गु०-न्हाना गोखरू, बेठा गोखरू। ते०-पल्लेरु मुल्लु। ता०-नेरिंजिल, नेरुंजी। पं०- मखड़ा, मखर। फा०-खारे खसक, खारे मेहगोशा। अ०-इसक, बजरुल खस्क। अं०-Small Caltrops (स्मॉल कॅल्ट्रोप्स)। ले०-Tribulus terrestris Linn. (ट्रिब्युलस् टेरेस्ट्रिस् लिन.)। Fam. Zygo-phyllaceae (झाइगोफाइलॅइसी)। छोटा गोखरू-प्रसर जाति की वनौषधि है। यह प्रायः सब प्रान्तों में पाया जाता है विशेषकर बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिमोत्तर प्रदेश, राजपूताना और मद्रास में अधिक उत्पन्न होता है। यह अन्य उष्ण प्रदेशों में भी पाया जाता है। इसका प्रसर-१ १/२ फीट से ४ फीट के घेरे में भूमि पर फैला हुआ रहता है। मूल-पतला, चीमड़, करीब ५ इञ्च लम्बा, गोल एवं हलके भूरे रंग का रहता है। इसमें थोड़ी सी सुगन्ध रहती है एवं इसका स्वाद कुछ मिठास लिये हुए कसैला होता है। शाखाएँ-१-२ फीट लम्बी, रोमश तथा जमीन पर फैली हुई रहती हैं। पत्ते-विपरीत, २-३ इञ्च लम्बे, प्रायः असम तथा जोड़ी में आते हैं। पत्रक-आयताकार, ४-७ जोड़े, छोटे, ०.८-१.२ से० मि० लम्बे, आधार की तरफ कुछ तिरछे एवं इनका अग्र रोमश रहता है। फूल-छोटे-छोटे, पाँच पंखड़ी वाले, पीले रंग के तथा पत्रकोणों में आते हैं। फल-छोटे-छोटे गोल किञ्चित् चिपटे होते हैं और उन पर पाँच जोड़े बड़े काँटे लगे रहते हैं। ये पाँच दलवाले होते हैं और सूखने पर प्रायः पाँचों दल त्रिकोणाकार पृथक्-पृथक् हो जाते हैं तथा उनके दोनों छोर पर एक-एक बड़े काँटे, आधार पर दो छोटे काँटे एवं अन्य सतह पर सूक्ष्म काँटे रहते हैं। प्रत्येक दल में अनेक बीज पाये जाते हैं जिनके बीच में आड़े परत होते हैं। इसके मूल एवं फल का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। प्रायः चूर्ण के लिये फल एवं क्वाथ के लिये मूल काम में लेते हैं। इसी का एक जातिभेद सिंध, पंजाब तथा बलूचिस्तान में होता है। इसे ले०-Tribulus alatus Del. (ट्रिब्युलस् एलॅटस् डेल); अं०-Winged caltrops (विंग्ड् कॅल्ट्रोप्स); सिंध-लतक; हिं०-गोखुरेकलान; पं०- हसक कहते हैं। इसके फल एक तरफ मोटे तथा दूसरी तरफ संकुचित होते हैं एवं इसे पंख रहते हैं। इनमें दो बीज होते हैं। इसके गुण गोखरू के समान ही होते हैं। इससे पाखाना साफ होता है एवं प्रसूता को इसके फल की पेया पिलाते हैं। रासायनिक संगठन-इसके फलों में अत्यल्प मात्रा में एक क्षाराभ, ३.५% स्थिर तैल, कुछ उड़नशील तैल, राल एवं अधिक मात्रा में नाइट्रेट (Nitrates) ये पदार्थ पाये जाते हैं।