भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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४७४ भावप्रकाशनिघण्टुः बनउर्दी के नाम तथा गुण—माषपर्णी, सूर्यपर्णी, काम्बोजी, हयपुच्छिका, पाण्डुलोमशपर्णी, कृष्णवृन्ता और महासहा ये सब संस्कृत नाम बनउर्दी के हैं। बनउर्दी—शीतवीर्य, तिक्त तथा मधुररसयुक्त, रूक्ष, ग्राही, शुक्रजनक तथा कफकारक होती है। एवम् यह शोथ, वात, पित्त, ज्वर और रक्तविकार को दूर करने वाली होती है। [५५-५६] २०. माषपर्णी हिं०—मषबन, माषोनी, बन उड़दी, जंगली उड़द, बनउर्दी, बनउड़द। बं०—माषानी। म०—रानउड़ीद। गु०— जंगली अड़द। क०—काडडयु, काडुलंद। ते०—रानो डिंडु, कारु मिनुरु। ता०—कट्टु अलंदूं। ले०—Teramnus labialis Spreng (टेरॅमन्स् लेबिएलिस् स्प्रेंग)। Fam. Leguminosae (लेगुमिनोसी)। यह सब प्रान्तों के जंगल-झाड़ियों में कहीं-न-कहीं उत्पन्न होती हैं। यह लता जाति की वनौषधि झाड़ियों पर लिपटती हुई (चक्रारोही) बढ़ती है और वर्षा ऋतु में अधिक पाई जाती है। पत्ते—त्रिपत्रक और पत्रक भिन्न-भिन्न कद के होते हैं। पत्रक—कभी .६-१.३ इञ्च और कभी १-३ इञ्च लम्बे होते हैं। ये अंडाकार या लट्वाकार (अग्र्य पत्रक कभी- कभी अभिलट्वाकार), नीचे के तल पर तलशायी रोमों से युक्त होते हैं। सवृन्त पुष्पों की मञ्जरी बहुत पतली १ १/२- ५ इञ्च लम्बी और पुष्प—गुलाबी, नीलारुण या सफेद होते हैं। फली—पतली लम्बी सीधी या कुछ-कुछ टेढ़ी होती हैं। बीज—ताजी अवस्था में लाल तथा सूखने पर काले तथा संख्या में लगभग १० होती हैं। गुण और प्रयोग—माषपर्णी शीतल, बल्य, वृष्य, पुष्टिकारक, शुक्रजनन एवं जीवनीय हैं। इसका उपयोग ज्वर, दाह, रक्तपित्त, वातविकार, अंगघात एवं आमवात में किया जाता है। चरक ने वाजीकरण के लिये माषपर्णी खिलाई हुई समान वर्ण वत्सवाली प्रथम-प्रसवा गौ का दुग्ध, मधु, शर्करा एवं घृत के साथ सेवन करने का विधान किया है। इससे सिद्ध तैल का पिचुधारण वातिक प्रदर में लाभदायक माना जाता है। मात्रा—२-४ माशा। अथ जीवनीगणः । तस्य लक्षणं गुणाँश्चाह अष्टवर्गः सयष्टीको जीवन्ती मुद्गपर्णिका। माषपर्णी गणोऽयं तु जीवनीय इति स्मृतः ॥५७॥ जीवनो मधुरश्चापि नाम्ना स परिकीर्त्तितः । जीवनीगणः प्रोक्तः शुक्रकृद् बृंहणो हिमः ॥५८॥ गुरुर्गर्भप्रदः स्तन्यकफकृत्पित्तरक्तहृत् । तृष्णां शोषं ज्वरं दाहं रक्तपित्तं व्यपोहति ॥५९॥ जीवनीगण के लक्षण तथा गुण—जीवक, ऋषभकादि पूर्वोक्त अष्टवर्ग की औषधियाँ, मुलेठी, जीवन्ती (डोडी), मुगवन और बनउर्दी इन सब औषधियों को जीवनीगण कहते हैं। जीवनीगण का ही नामान्तर जीवन (जीवनं गण या मधुर (मधुर गण) भी ऋषियों ने कहा है। जीवनीगण—शुक्रजनक, बृंहण, शीतवीर्य, गुरु, गर्भप्रद, स्तन्य (दुग्धवर्धक) तथा कफकारक एवं पित्त तथा रक्तदोष को दूर करने वाला तथा तृषा, शोष, ज्वर, दाह और रक्तपित्त इन सबों को नष्ट करने वाला होता है। [५७-५९] अथ शुक्लरक्तैरण्डौ । तयोर्नामानि गुणाँश्चाह शुक्ल एरण्ड आमण्डश्चित्रो गन्धर्वहस्तकः । पञ्चाङ्गुलो वर्द्धमानो दीर्घदण्डो व्यडम्बकः ॥६०॥ वातारिस्तरुणश्चापि रुबुकश्च निगद्यते। रक्तोऽपरो रुबूकः स्यादुरुबूको रुबुस्तथा ॥६१॥ व्याघ्रपुच्छश्च वातारिश्चञ्चुरुत्तानपत्रकः । एरण्डयुग्मं मधुरमुष्णं गुरु विनाशयेत् ॥६२॥ शूलशोथकटीबस्तिशिरःपीडोदरज्वरान् । ब्रध्नश्वासकफानाहकासकुष्ठाममारुतान् ॥६३॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA