भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 524, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंगुडूच्यादिवर्गः ४७३ इसके पंचांग का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। गुण और प्रयोग- यह लघु, मधुर, शीतल, रसायन, स्नेहन, बल्य एवं वृष्य है। इसका उपयोग श्वास, कास, गले के विकार, क्षय, ज्वर, दाह, नेत्रविकार एवं रक्तविकार में किया जाता है। इसके पंचांग का क्वाथ अन्य सुगंधित पदार्थों के साथ त्रिदोष में देते हैं। धातुपात के कारण उत्पन्न दौर्बल्य में क्वाथ पिलाते हैं। मात्रा- ३ से ६ माशा। अथ मुद्गपर्णी। तस्या नामानि गुणाँश्चाह मुद्गपर्णी काकपर्णी सूर्यपर्ण्यल्पिका$^१$ सहा ॥५२॥ काकमुद्गा च सा प्रोक्ता तथा मार्जारगन्धिका। मुद्गपर्णी हिमा रूक्षा तिक्ता स्वादुश्च शुक्रला ॥५३॥ चक्षुष्या क्षतशोथघ्नी ग्राहिणी ज्वरदाहनुत्। दोषत्रयहरी लघ्वी ग्रहण्यर्शोऽतिसारजित् ॥५४॥ मुगवन के नाम तथा गुण- मुद्गपर्णी, काकपर्णी, सूर्यपर्णी, अल्पिका, सहा, काकमुद्गा और मार्जारगन्धिका ये सब संस्कृत नाम मुगवन के हैं। मुगवन- शीतवीर्य, रूक्ष, तिक्तरसयुक्त, स्वादु, शुक्रजनन, नेत्र को हितकर, क्षत तथा शोथ का नाशक, ग्राही, ज्वर तथा दाह को दूर करने वाली, त्रिदोषनाशक तथा लघु होती है एवम् ग्रहणी, बवासीर तथा अतिसार को दूर करने वाली होती है। [५२-५४] १९. मुद्गपर्णी हिं०- मुगवन, मुंगानी, वनमूँग, जंगली मूँग, रखाल कलमी। बं०- मुंगानी। म०- रानमुग। गु०- जंगली मूँग, अडबाऊ मूँग। क०- कोहसरु, आवरेगिड। ते०- कारु पेसारा, पिल्ल पेसर चेट्टु, कलबन्द चेट्टु। पं०- मुगवन। ता०- नरिप्ययरू। ले०- Phaseolus trilobus Ait. (फेसिओलस् ट्राइलोबस् एट्.)। Fam. Leguminosae (लेगुमिनोसी)। यह मूँग के समान ही लता जाति की वनौषधि प्रायः सब प्रान्तों में उत्पन्न होती है। इसके काण्ड प्रसरी, १-२ फीट लम्बे, रोमश या चिकने होते हैं। पत्रक- कद में प्रायः बहुत परिवर्तनशील होते हैं और प्रायः वृन्त से छोटे ही होते हैं। ये प्रायः सर्वदा खण्डित, खण्ड तीन और गोल होते हैं। उपपत्र बहुत बड़े और पीठ से जुड़े हुए (प्रायः १/२ तक) होते हैं। उपपत्रक छोटे परन्तु पर्णवत् होते हैं। मंजरी के शीर्ष पर पुष्पगुच्छ और बड़ा पुष्पदंड होता है। फली- पतली, लगभग २ इञ्च लम्बी एवं चिकनी होती है। बीज- ६-१२ और श्वेताभ होते हैं। इसके बीजों को कभी-कभी गरीब लोग खाने के लिये एकत्र करते हैं। पत्रकों के आकार के अनुसार इसे सूर्यपर्णी कह सकते हैं। गुण और प्रयोग- मुद्गपर्णी शीतल, जीवनीय, शुक्रजनन, बलप्रद, चक्षुष्य एवं शामक है। इसका प्रयोग वातरक्त, क्षय, ज्वर एवं दाह में किया जाता है। बिहार में ज्वर के लिये इसके पंचांग का प्रयोग किया जाता है। जीर्ण ज्वर में पुष्टि एवं निद्रा लाने के लिये इसके पत्तों का क्वाथ पिलाया जाता है। चूहे के विष में सिन्धुवार, मुद्गपर्णी एवं माषपर्णी मधु के साथ खाने से लाभ होता है। मात्रा- २-४ माशा। अथ माषपर्णी। तस्या नामानि गुणाँश्चाह माषपर्णी सूर्यपर्णी काम्बोजी हयपुच्छिका। पाण्डुलोमशपर्णी च कृष्णवृन्ता महासहा ॥५५॥ माषपर्णी हिमा तिक्ता रूक्षा शुक्रवलासकृत्। मधुरा ग्राहिणी शोथवातपित्तज्वरास्रजित् ॥५६॥ १. शूर्पपर्ण्यल्पिका इति पाठ०।