भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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४६४ भावप्रकाशनिघण्टुः इसका प्रयोग ज्वर, वातरोग, अतिसार, वमन, शोथ, प्रमेह, अर्श, कृमि, राजयक्ष्मा एवं क्षत कास में किया जाता है। श्वासनलिकाशोथ, फुप्फुसशोथ तथा सूतिकाज्वर में इससे विशेष लाभ होता है। इसके पंचांग के क्वाथ में कालीमिर्च मिलाकर रक्तविकार में प्रयोग करते हैं। मात्रा—चूर्ण १/२-१ तोला। अथ पृश्निपर्णी (पिठवन) तस्या नामानि गुणाँश्चाह पृश्निपर्णी पृथक्पर्णी चित्रपर्ण्यहिपर्ण्यपि¹। क्रोष्टुविन्ना सिंहपुच्छी कलशी धावनिर्गुहा ॥३४॥ पृश्निपर्णी त्रिदोषघ्नी वृष्योष्णा मधुराऽसरा। हन्ति दाहज्वरश्वासरक्तातीसारतृड्वमीः ॥३५॥ पिठवन के नाम तथा गुण—पृश्निपर्णी, पृथक्पर्णी, चित्रपर्णी, अहिपर्णी, क्रोष्टुविन्ना, सिंहपुच्छी, कलशी, धावनी और गुहा ये सब संस्कृत नाम पिठवन के हैं। पिठवन—त्रिदोष को दूर करने वाली, वृष्य, उष्णवीर्य, मधुर रस युक्त तथा संग्राही होती है। यह दाह, ज्वर, श्वास, रक्तातिसार, तृषा और वमन को दूर करती है। [३४-३५] ११. पृश्निपर्णी (१) हिं०- पिठवन, डाब्रा। बं०- शंकरजटा। पं०- देतेर्दानी। म०- पृश्निपर्णी, पिठवण। गु०- पीठवण, पीलो समेरवो। ले०- Uraria picta Desv. (युरेरिआ पिक्टा डेस्व.)। Fam. Leguminosae (लेगुमिनोसी)। यह देहरादून और बाहरी हिमालय में प्रायः ऊसर भूमि एवं खुले हुए जंगलों में पाया जाता है। इसके क्षुप—२-६ फीट ऊँचे, स्वावलम्बी तथा अल्प शाखाओं वाले होते हैं जिसमें पत्ते एक ही क्षुप में भिन्न तरह के होते हैं। पत्ते—नीचे के पत्ते छोटे और लगभग वृत्ताकार, इनके ऊपर ३-५ पत्रक सदलपर्ण जिनके पत्रक रेखाकार और इनके साथ कभी-कभी बड़े-बड़े आयताकार, भालाकार, ६ × १ १/२ इञ्च बड़े अपत्रक पर्ण भी रहते हैं। ऊपर के पत्ते ५-९ पत्रक तथा पत्रक ३ १/२-६ इञ्च बड़े होते हैं। पत्रकों के मध्य में पीलापन लिये भूरे या पीले सफेद रंग के पट्टे होते हैं। पुष्प—छोटे, लाल और ३-४ इञ्च लम्बी, सघन, अग्र्य और रंभाकार मंजरियों में निकले रहते हैं। फलवती होने पर ये मंजरियाँ पुच्छाकार मालूम होती हैं। फली—छोटी तथा ३-६ संधियों वाली होती है। अधिकांश लोग इसे पृश्निपर्णी मानते हैं। इसे शालपर्णी मानना उचित नहीं है। पृश्निपर्णी (२) को शालपर्णी माना जा सकता है क्योंकि उसके पत्र शालपत्र जैसे होते हैं। गुण और प्रयोग—पृश्निपर्णी उष्ण, लघु, त्रिदोषघ्न, दीपनीय, वृष्य, वातहर, संग्राही, सन्धानीय, शोथहर, अंगमर्द प्रशमन तथा जीवाणुनाशक है। इसका उपयोग ज्वर, कास, रक्तातिसार, रक्तार्श, तृषा एवं दाह में किया जाता है। (२) अस्थिभग्न में मांसरस के साथ इसके मूल का चूर्ण २१ दिन तक सेवन करना चाहिये। (३) इसके पंचांग का स्वरस फुरसा (Echis carinata) नामक सर्प के विष में लाभदायक माना जाता है। मात्रा—१/२-१ तोला। १२. पृश्निपर्णी (२) हिं०- पिठवन, पिठोनी, पितवन। बं०- चाकुले, चाकुलिआ। म०- डवला, पिठवण। पं०- पिठोनी, पिठौनी। मा०- पिठपन। गु०- नहानो समेरवो। क०- नबियल बोने। ते०- कोलकूपौन्ना। ले०- Uraria lagopoides DC. (युरेरिआ लँगोपॉइडिस् डीसी.)। Fam. Leguminosae (लेगुमिनोसी)। १. अंघ्रिपर्ण्यपि इति पाठा०।