भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 530, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 530

गुड़ूच्यादिवर्गः ४७९ अथार्कदुग्धगुणानाह क्षीरमर्कस्य तिक्तोष्णं स्निग्धं सलवणं लघु । कुष्ठगुल्मोदरहरं श्रेष्ठमेतद्विरेचनम् ।।७२।। 'आक' के दूध के गुण-यह तिक्त तथा कुछ लवण रस से युक्त, उष्णवीर्य, स्निग्ध और लघु होता है एवम् यह कुष्ठ, गुल्म तथा उदर रोग को दूर करता है और इसके प्रयोग से उत्तम विरेचन होता है । [७२] नोट-चरक ने अर्क का एक ही भेद लिखा है। सुश्रुत ने अर्क एवं अलर्क ये दो भेद लिखे हैं। भावप्रकाशकार श्वेत एवं रक्त ये दो भेद लिखते हैं। धन्वन्तरि निघण्टु में अर्क एवं राजार्क ये दो भेद दिये हैं। राजनिघण्टु में अर्क, राजार्क, शुक्लार्क एवं श्वेतमन्दारक ये ४ भेद लिखे हैं। राजार्क के जो अन्य पर्याय रा० नि० में दिये हैं वे भावप्रकाशोक्त श्वेतार्क से मिलते हैं। अरुणदत्त ने मन्दारक को श्वेतपुष्प लिखा है (सू० अ० १५)। इससे अनुमान होता है कि राजार्क तथा श्वेतमन्दारक ये श्वेतार्क के ही भेद होंगे। रा० नि० ने राजार्क को सदापुष्प एवं श्वेत मन्दारक को दीर्घपुष्प लिखा है। इससे ऐसा मालूम होता है कि श्वेत पुष्पवाले किन्तु जिसमें बारहो मास पुष्प आते हों उसे राजार्क एवं जिसके पुष्प श्वेत एवं दीर्घ हों उसे मन्दारक कहा गया हो। आधुनिक ग्रन्थों में इसके दो भेद पाये जाते हैं किन्तु उनके लेटिन नामों में विद्वानों में मतभेद हैं। केलोट्रोपिस जाइगेण्टीआ को कुछ विद्वान् श्वेतार्क (अलर्क, मदार) तथा केलोट्रोपिस प्रोसेरा को रक्तार्क (अर्क) मानते हैं किन्तु अन्य विद्वान् इसके विपरीत मानते हैं। यहाँ पर दोनों का वानस्पतिक वर्णन अलग-अलग दिया गया है। चिकित्सा की दृष्टि से मंदार के सभी भेदों के गुण समान होते हैं। रक्तार्क या श्वेतार्क के भेद से उपयोगिता में कोई अन्तर नहीं होता। २३. श्वेतार्क सं०-अलर्क, मंदार । हिं०-मदार, आक । म०-रूई, आक । बं०-आकंद । गु०-आकडो । ता०- बदाबडम, एरुक्कु । ते०-मंदारमु, जिल्लेडु । क०-एक्क । मल०-एरिक्का । अ०-उषर, उषार । फा०- खरक, जहूक । अं०-मडार (Mudar); जायगॉण्टिक् स्वॅलोवर्ट (Gigantic Swallow-wort) । ले०-Calotr- opis gigantea (Linn.) R. Br. ex Ait. (कॅलोट्रोपिस जाईगेण्टीआ लिन.) । Fam. Asclepiadaceae (एरक्लेपिएडॅसी) । यह हिमालय में ३००० फीट की ऊँचाई तक तथा पंजाब से लेकर दक्षिण भारत, आसाम, लंका और सिंगापुर में ऊसर भूमि में पाया जाता है। यह मलाया द्वीप तथा दक्षिण चीन में भी होता है। इसका क्षुप यो छोटा वृक्ष-बहुवर्षायु तथा ८-१० फीट तक ऊँचा रहता है। पत्र-अवृन्त, मोटे, क्षोदलिप्त हरे रंग के, अंडाकार या अभिलट्वाकार-आयताकार, ४-८ इञ्च लम्बे, १.५-४ इञ्च चौड़े एवं पर्णतल की तरफ संकुचित हृदयाकार या प्रायः काण्ड को कुछ घेरे रहते हैं। पुष्प-१.५-२ इञ्च व्यास के, गंधहीन तथा अन्तर्दल फैले हुये एवं नीललोहित (Purplish) या श्वेत रंग के होते हैं। फल-करीब ४ इञ्च लम्बे, मुड़े हुवे एवं फूलों से एक सेवनीक फल (Follicle) रहते हैं। बीज-महीन सिल्क की तरह गुच्छेदार रूई से युक्त तथा छोटे एवं चिपटे होते हैं। इसकी शाखाओं तथा पत्रादि से दुग्ध निकलता है। इसके गुण और प्रयोग आगे रक्तार्क के साथ ही दिये गये हैं। २४. रक्तार्क (अर्क) ले०-Calotropis procera (Ait.) R.Br. (कॅलोट्रॉपिस प्रोसेरा एट.) । यह भारतवर्ष के प्रायः सभी प्रान्तों में उष्ण एवं शुष्क स्थानों में पाया जाता है। यह हिमालय के निचले भागों में तथा उत्तर-पश्चिम में उसके समीप के मैदानों में अधिक होता है। बजीरिस्तान, अफगानिस्तान, पर्शिआ, अरब, इजिप्त तथा अफ्रीका का उष्ण प्रदेश इन स्थानों में भी यह पाया जाता है। इसका क्षुप-स्वावलंबी एवं प्रायः ६-८ फीट ऊँचा

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा) · पृष्ठ 530, कुल 1167 में से · BharatKosha