भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८० भावप्रकाशनिघण्टुः होता है। पत्र—अवृन्त, प्रायः २।-६ इञ्च लम्बे, १॥-३॥ इञ्च चौड़े, चौड़े लट्वाकार-आयताकार, अंडाकार या अभिलट्वाकार होते हैं। पुष्प— १ इञ्च व्यास के, सुगन्ध युक्त एवं गुच्छों में आते हैं। अन्तर्दल श्वेताभ रहते हैं तथा सीधे ऊपर की ओर उठे हुये दलखण्डों के ऊपर जामुनी (आनीलारुण) रंग के दाग होते हैं। फल— ३-४ इञ्च लम्बे, २-३ इञ्च चौड़े, गोल अंडाकार होते हैं। बीज—रूईदार श्वेतार्क की तरह के होते हैं। इसके पत्ते आदि से भी दूध निकलता है। उपर्युक्त दोनों प्रकार के अर्क के मूल, पत्र, पुष्प एवं क्षीर आदि का औषध में उपयोग किया जाता है। इनके मूल की छाल का विशेष उपयोग किया जाता है। इसके छोटे, मुड़े हुए, २-५ मि० मि० मोटे एवं २-३.५ से० मि० चौड़े टुकड़े होते हैं। कभी-कभी इनमें उपमूल लगे रहते हैं। इसका बाह्यभाग मुलायम, हलके पीतवर्ण (Buff) का एवं लम्बाई में नालीदार होता है एवं अन्दर की सतह हलके पीले रंग की एवं रवेदार होती है। इसका भग्न छोटा एवं दुग्ध युक्त होता है। इसमें गंध नहीं होती तथा इसका स्वाद कडुआ एवं तीता होता है। ग्रीष्मऋतु में पुराने-से-पुराने बड़े (के. जाइगेण्टीआ) क्षुप के मूल की छाल को निकाल कर, शीतल जल से जल्दी धोकर खुली हवा में सुखायें। धूप में न रखें। जब उसमें का दूध सूख जाय तब ऊपर की कार्कयुक्त सतह निकाल कर बाकी भाग को सुखा एवं चूर्ण बना हवाबंद बोतलों में रखें। औषध के अतिरिक्त इसके बीजों की रूई एवं छाल से तन्तुनिर्माण किया जा सकता है। इसके दुग्ध का चमड़े के व्यवसाय में उपयोग किया जाता है। इससे नये चमड़े की दुर्गंध दूर होकर उसका रंग पीला हो जाता है। चमड़े के बालों को साफ करने के लिये भी इसका उपयोग करते हैं। इसके किसी-किसी वृक्ष पर एक प्रकार का शर्करावत् निर्यास संगृहीत होता है ऐसा हकीम मानते हैं जिसे 'सुकरूलउषर' कहा जाता है। जिन जातियों में लड़कियों की हत्या की प्रथा है उनमें इसके दुग्ध को जबरदस्ती बच्चे को पिलाते हैं। गर्भपात के लिये भी इसका आन्तरिक तथा स्थानिक प्रयोग करते हैं। रासायनिक संगठन—के. जाइगेण्टीआ के मूल की छाल में बीटा-एमाइरिन (B. amyrin) एवं जाइगेण्टीओल् (Giganteol) तथा आइसो जाइगेण्टीओल् (Iso Giganteol) ये दो समाजिक रवेदार सुषव (Isomeric crystalline alcohols) पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग—इसकी मूलत्वक् कटु, तिक्त, उष्ण, दीपन, पाचन, स्वेदजनन, पित्तस्रावी, कफघ्न, वामक, उद्वेष्टननिरोधी, रसग्रंथी एवं त्वचा के लिये उत्तेजक, जीवनविनिमय क्रिया को उत्तेजित करने वाली, वल्य एवं रसायन है। अल्प मात्रा में यह उत्तम स्वेदल एवं कफनिःसारक होते हुए भी अधिक मात्रा से इससे वमन, विरेचन तथा प्रक्षोभ उत्पन्न होता है। इसका वामक प्रभाव आमाशयप्रक्षोभ एवं वमनकेन्द्र की उत्तेजना से होता है। इसका उद्वेष्टन-निरोधी गुण साधारण है किन्तु उसका श्वासनलिकाओं पर स्पष्ट प्रभाव दिखलाई देता है। रसायन होने के कारण इसे वानस्पतिक पारद कहा जाता है। इससे यकृत् की क्रिया अच्छी होकर पित्तस्राव ठीक होने लगता है। इसका उत्सर्ग त्वचा के द्वारा होने के कारण इससे त्वचा पर उत्तेजक प्रभाव दिखलाई देता है एवं छोटी रक्तवाहिनियों का विस्फार होता है। (१) रक्तविकार, कुष्ठ, उपदंश या किसी भी कारण से उत्पन्न व्रण में इसका आंतरिक एवं बाह्य प्रयोग करते हैं। श्लीपद में इसके साथ रसकपूर या रससिन्दूर, सुरमा (स्रोतोञ्जन) एवं सांभरसींगभस्म देते हैं तथा कांजी में पीसकर शोथ पर लेप करते हैं। उपदंश में पारद की तरह इसका उपयोग होता है। उपदंश की द्वितीयावस्था में त्वचा पर उत्पन्न चकत्ते आदि इससे कम होते हैं। वद (Bubo) तथा गंडमाला में इसको खिलाते तथा इसके दूध को लगाते हैं। सभी प्रकार के चर्मरोगों में छाल को जल में पीस कर लगाते हैं या खुजली अधिक होने पर निमोली के तैल में घिसकर लगाते हैं। विशेषकर पुराने त्वग्रोगों में इससे अधिक लाभ होता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA