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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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इसी की दूसरी जाति जॅट्रोफा गॉसिपिफोलिया लिन. (J. gossipifolia Linn.), लाल व्याघ्रैरण्ड सड़कों के किनारे तथा ऊसर भूमि में और अधिक मात्रा में उगी हुई पाई जाती है। इसके पौधे ३-६ फीट ऊँचे, पत्ते ३-५ खंडों में विभक्त एवं पुष्प लाल होते हैं। पत्रतट, पर्णवृन्त और उपपत्रों के ऊपर श्लेष्मोत्पादक ग्रंथियाँ रोमों के रूप में रहती हैं जिससे यह पौधा स्पर्श में चिपचिपा होता है। इसके मूल में कपूर जैसी गंध आती है। इसकी दातुन अच्छी समझी जाती है। रासायनिक संगठन- व्याघ्रैरण्ड के बीजों में हलके पीले रंग का तैल ३०%, शर्करा, स्टार्च तथा कर्सिन (Curcin) नामक रिसिन जैसा विषैला पदार्थ पाया जाता है। गुण और प्रयोग- व्याघ्रैरण्ड का दुग्ध रक्तसांग्राहिक तथा व्रणरोपक है। इसकी जड़ वातानुलोमक, पाचन एवं ग्राही है। इसका तैल जमालगोटे जैसा तीव्र विरेचक होता है तथा इसकी क्रिया अनियन्त्रित होने के कारा तैल का आन्तरिक व्यवहार नहीं किया जाता। इसके दुग्ध को क्षतपर लगाने से कोलोडिअन की तरह एक पतला स्तर व्रण पर बन जाता है जिससे रक्तस्राव रुकता है, उपसर्ग से व्रण की रक्षा होती है तथा व्रण का संकोच होने से व्रण जल्दी अच्छा होता है। इसे पामा, दाद तथा छाजन पर लगाते हैं। इसके पत्तों के क्वाथ का भी इसी तरह उपयोग होता है एवं इससे कुल्ला करने से मसूड़े से खून जाना बन्द होकर दाँत मजबूत होते हैं। इसकी दतुअन से भी लाभ होता है। इसके तैल को खुजली, परिसर्प, छाजन तथा अन्य चर्मरोगों में एवं आमवात में लगाते हैं तथा व्रणशोधन के लिये भी इसका उपयोग करते हैं। दुग्धवृद्धि के लिये इसके पत्तों को जरा सा गरमकर स्तन पर बाँधते हैं या इसके क्वाथ से सेंककर फिर उन्हीं पत्तों को बाँधते हैं। कोंकण की तरह अजीर्ण, अतिसार तथा उदरशूल के लिये इसकी एक अंगुल लम्बी ताजी जड़, ७ दाना काली मिर्च एवं थोड़ा हींग इन सबको पीसकर उसका रस मट्ठे के साथ पिलाते हैं।

अथ शुक्लरक्तार्कौ (सफेद आक-लाल आक)। तयोर्नामानि गुणाँश्चाह

श्वेताकॊ गणरूपः स्यान्मन्दारो वसुकोऽपि च। श्वेतपुष्पः सदापुष्पः स चालर्कः प्रतापसः ।।६७।। रक्तोऽपरोऽर्कनामा स्यादर्कपर्णो विकीरणः। रक्तपुष्पः शुक्लफलस्तथाऽऽस्फोटः प्रकीर्तितः ।।६८।। अर्कद्वयं सरं वातकुष्ठकण्डूविषव्रणान्। निहन्ति प्लीहगुल्मार्शःश्लेष्मोदरशकृत्कृमीन् ।।६९।। सफेद आक तथा लाल आक के नाम और गुण- श्वेतांक, गणरूप, मन्दार, वसुक, श्वेतपुष्प, सदापुष्प, अलर्क और प्रतापस ये सब संस्कृत नाम सफेद आक के हैं। लाल आक के संस्कृत नाम—रक्तार्क, अर्कनामा (सूर्य के वाचक सभी शब्द इसके पर्यायवाचक हैं), अर्कपर्ण, विकीरण, रक्तपुष्प, शुक्लफल तथा आस्फोट हैं। दोनों प्रकार के आक- दस्तावर तथा वात, कुष्ठ, खुजली, विष, व्रण, प्लीहा, गुल्म, बवासीर, कफ, उदररोग एवं मल के कृमि इन सबों को नष्ट करते हैं। [६७-६९]

अथ शुक्लरक्तार्कयोः पुष्पगुणानाह

अलर्ककुसुमं वृष्यं लघु दीपनपाचनम्। अरोचकप्रसेकार्शःकासश्वासनिवारणम् ।।७०।। रक्तार्कपुष्पं मधुरं सतिक्तं कुष्ठकृमिघ्नं कफनशनञ्च। अर्शो विषं हन्ति च रक्तपित्तं संग्राहि गुल्मे श्वयथौ हितं तत् ।।७१।। सफेद आक तथा लाल आक के फूल के गुण-सफेद आक का फूल- वृष्य, लघु, अग्निदीपक तथा पाचक होता है एवम् यह अरुचि, प्रसेक (मुख से लार गिरना), बवासीर, खाँसी तथा श्वास को दूर करता है। लाल आक का फूल- मधुर तथा थोड़ा तिक्त रसयुक्त, संग्राही, गुल्म तथा शोथ में हितकर होता है एवम् यह कुष्ठ, कृमि, कफ, बवासीर, विष तथा रक्तपित्त को दूर करने वाला होता है। [७०-७१]