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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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गुडूच्यादिवर्गः ४७७ होते हैं। आखिरी पाखाने के साथ तैल निकल जाता है तथा कभी-कभी मरोड़ होती है। इसका कुछ अंश प्रचूषण के पश्चात् स्तन द्वारा उत्सर्गित होने के कारण स्तनपान करने वाले बच्चों को भी विरेचन हो जाता है। कुछ लोगों को इसकी आदत पड़ जाती है तथा कुछ लोगों में इससे विरेचन के पश्चात् विबंध हो जाता है। यह सम्भवतः बृहदांत्र की शिथिलता के कारण होता है जो २, ३ दिन रहती है। बाल, वृद्ध, स्त्री, गर्भिणी एवं प्रसूता के लिये तथा अर्शविकार, गुदविदार, उदरगत शल्यकर्म, श्रोणिविकार, उदरावरणशोथ, जीर्ण विबंध तथा ज्वरजन्य विबंध आदि अवस्थाओंके लिये यह उत्तम तथा हानिरहित सौम्य विरेचक है। अजीर्णजन्य अतिसार विशेषकर बच्चों में होनेवाले अतिसार में इससे लाभ होता है। तीव्र प्रवाहिका के प्रारंभ में अहिफेन के साथ इसका प्रयोग लाभदायक होता है तथा जीर्ण विकार में भी इसका उपयोग किया जाता है। एरंड तैल को सुबह खाली पेट आदी के रस के साथ दिया जाता है। सोंठ के फांट के साथ या उष्ण चाय, कॉफी आदि के साथ भी इसको दे सकते हैं। शीतऋतु में इसको कुछ उष्ण करके देना चाहिये। इसके स्वाद एवं गंध को दूर करने के लिये इसे कैप्सूल में बंदकर या गोंद के साथ एमल्शन् बनाकर ले सकते हैं। बड़ों में इसकी प्रभावोत्पादक न्यूनतम एवं अधिकतम मात्रा ३० बूँद से लेकर १ पाव तक की है लेकिन प्रायः २ तोला की मात्रा मृदुरेचन के लिए पर्याप्त होती है। नवजात शिशु के लिये छोटे चाय के चम्मच बराबर मात्रा कोई बड़ी मात्रा नहीं है। विबंध में एरंड तैल की बस्ति भी दी जाती है। कटिशूल, गृध्रसी, पार्श्वशूल, हृदयशूल, आमवात एवं संधिशोथ में इसके मूल का क्वाथ सोंठ के साथ पिलाने से लाभ होता है। इन अवस्थाओं में इसके तैल को शिलाजीत के साथ पिलाते हैं तथा इसकी मालिश भी करते हैं। नूतन तथा जीर्ण आमवात में नित्य सुबह एरंड तैल का प्रयोग लाभदायक है। स्तनों पर इसके तैल को मर्दन कर ऊपर से एरंड पत्र बाँधने से उसमें की गाँठें विलीन होकर स्तन्य-वृद्धि होती है। स्तन-चूचुक-विदार में इसके तैल को लगाने से लाभ होता है। आँखों में कोई चीज चली जावे तो स्वच्छ एरंड तैल डालने से वह निकल जाती है तथा आँखों की खुरखुराहट दूर होती है। अर्श में एरंड तैल तथा घृतकुमारी का स्वरस मिलाकर लगाने से जलन कम होती है। शिरःशूल में रेंडी के तेल की मालिश से लाभ होता है। दाह के शमन के लिये एरंडमज्जा को बकरी के दूध में पीसकर पादतल में मलते हैं। एरंड तैल के मर्दन से भी दाह का शमन होता है। मात्रा—तेल १-२ तोला; मूलचूर्ण १/४-१/२ तोला। २२. व्याघ्रैरण्ड हिं०—व्याघ्रैरण्ड, जंगली एरंड। बं०—बागा भेरेन्डा, बाघभेरंड। म०—मोंगली एरंड। गोवा—गलमर्क। कॉंक— काडएरडि। ता०—कट्टमनक्कु। ते०—अडविआमुदमु। क०—कडहरलु। अ०, फा०—डंडेनहरा। ले०—Jatropha curcas Linn. (जॅट्रोफा कर्कस् लिन.)। Fam. Euphorbiaceae (युफोर्बिएसी)। यह दक्षिण अमेरिका का आदिवासी है किन्तु प्रायः सब प्रान्तों में पाया जाता है। दक्षिण में इसे लोग घरों में लगाते हैं। इसका वृक्ष—छोटा एवं करीब १०-२० फीट ऊँचा होता है। इसकी छाल धूसरवर्ण की एवं काष्ठ मुलायम होता है। पत्ते—चिकने, बड़े, व्यास में ४-६ इञ्च एवं ३-५ खंडों में विभक्त होते हैं। पुष्प—पीताभ वर्ण के होते हैं। फल— हरे रंग के, १ इञ्च लम्बे एवं सूखने पर भी बहुत दिन तक पेड़ में लगे रहते हैं। इसके बीजों में तैल होता है। इसके पत्तों को तोड़ने से सफेद रंग का बहुत दूध निकलता है। इसके दूध एवं मूल का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है।