भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 533, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ें४८२ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ सेहुण्डः (सेहुण्ड, थूहर)। तस्य नामानि गुणाँश्चाह सेहुण्डः सिंहतुण्डः स्याद्वज्री वज्रद्रुमोऽपि च। सुधासमन्तदुग्धा च स्नुक् स्त्रियां स्यात्स्नुही गुडा ।। ७३ ।। सेहुण्डो रेचनस्तीक्ष्णो दीपनः कटुको गुरुः। १शूलामाष्ठीलिकाऽऽध्मानकफगुल्मोदरानिलान् ।। ७४ ।। २उन्मादमोहकुष्ठार्शः शोथमेदोऽश्मपाण्डुताः। व्रणशोथज्वरप्लीहविषदूषीविषं हरेत् ।। ७५ ।। सेहुंड (थूहर) के नाम तथा गुण-सेहुंड, सिंहतुण्ड, वज्री, वज्रद्रुम, सुधा, समन्तदुग्धा, स्नुक् (स्नुह्), स्नुही (स्त्रीलिङ्ग में होता है) और गुडा ये सब संस्कृत नाम थूहर के हैं। थूहर-रेचक, तीक्ष्ण, अग्निदीपक, कटु रस युक्त तथा गुरु होता है। यह-शूल, आमदोष, अष्ठीलिका, आध्मान, कफ-गुल्म, उदररोग, वात, उन्माद (पागलपन), मोह (मूर्च्छा), कुष्ठ, बवासीर, शोथ, मेदरोग, पथरी, पाण्डुरोग, व्रणशोथ, ज्वर, प्लीहा, विष और दूषीविष को दूर करता है। [७३-७५] अथ स्नुहीदुग्धगुणानाह उष्णवीर्यं स्नुहीक्षीरं स्निग्धञ्च कटुकं लघु। गुल्मिनां कुष्ठिनाञ्चापि तथैवोदररोगिणाम् ।। ७६ ।। हितमेतद्विरेकार्थं ये चान्ये दीर्घरोगिणः। थूहर का दूध-उष्णवीर्य, स्निग्ध, कटुरसयुक्त और लघु होता है तथा यह गुल्म, कुष्ठ और उदररोग वालों के लिये एवम् जो दीर्घकाल से रोगी हैं उनके लिये भी विरेचन कराने में हितकर है। [७६-७७] नोट-सेहुण्ड की कई जातियाँ पाई जाती हैं। जिस सेहुण्ड में बहुत काँटे हों वह, अल्प एवं तीक्ष्ण काँटे वाले सेहुण्ड की अपेक्षा अच्छा माना गया है।३ इसी प्रकार २-३ वर्ष पुराने सेहुण्डवृक्ष से शिशिर-ऋतु के अन्त में दुग्ध निकाल कर व्यवहार करने को लिखा है।४ सुश्रुत ने (सु० अ० ३९) अधोभागहरगण में सेहुण्ड के मूल और क्षीर दोनों का उपयोग करने को लिखा है तथा स्नुक् एवं महावृक्ष ये दो अलग-अलग द्रव्य लिखे हैं। सुश्रुतने (सु० अ० ३८) श्यामादिगण में सुधा नाम से इसका उल्लेख किया है। चरक ने इसके दुग्ध को तीव्रतम विरेचन माना है तथा उचित प्रयोग से यह दोषों के महान् संचय को भी शीघ्र हरता है ऐसा लिखा है। किन्तु मृदुकोष्ठ वाले में, दोषों का संचय अल्प होने पर एवं अन्य उपाय से रोगी अच्छा हो सकता हो तो इसके प्रयोग का निषेध किया है।५ चरक (सू० अ० १) में षोडशमूलिनी औषधियों में अधोगुडा शब्द आया है। उसका अर्थ श्रीभगीरथजी स्वामी ने 'गुडायाः (स्नुहेः) अधः (अधोभागः मूल) इति अधोगुडा' यह लिखा है तथा श्रीयादवजी ने इसका समर्थन किया है। (द्रव्यगुणविज्ञान, उत्तरार्ध द्वितीय खण्ड, पृ० ३३०)। आधुनिक उद्भिदवेत्ताओं ने इसकी निम्नलिखित जातियों का वर्णन किया है। यु० तिरुकेल्लि को कुछ लोगों ने सातला माना है तथा उसका वर्णन सप्तला के अन्तर्गत किया गया है। १. शूलमष्ठीलिका इति पाठा०। २. मेह इति पाठा०। ३. द्विविधः स मतो यश्च बहुभिश्चेव कण्टकैः। सुतीक्ष्णैः कण्टकैरल्पैः प्रवरो बहुकण्टकः।। (च. क. अ. १०) ४. तं विपाट्याहरेत्क्षीरं शस्त्रेण मतिमान् भिषक्। द्विवर्षं वा त्रिवर्षं वा शिशिरान्ते विशेषतः।। (च. क. अ. १०) ५. विरेचनानां सर्वेषा सुधा तीक्ष्णतमा मता। संघातं हि भिनत्याशु दोषाणां कष्टविभ्रमा।। तस्मान्नैषा मृदौ कोष्ठे प्रयोक्तव्या कदाचन। न दोषनिचये चाल्पे सति चान्यपरिक्रमे।। पाण्डुरोगोदरे गुल्मे कुण्ठे दूषीविषार्दिते। श्वयथौ मधुमेहे च दोषविभ्रान्तचेतसि।। रोगैरेवंविधै ग्रस्तं ज्ञात्वा सप्राणमातुरम्। प्रयोजयेन्महावृक्षं सम्यग्स ह्यवचारितः।। सद्यो हरति दोषाणां महान्तमपि संचयम्। (च. क. अ. १०)