भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुडूच्यादिवर्गः ४८३ १. Euphorbia nerifolia Linn. (युफोर्बिआ नेराइफोलिया लिन.); सेहुण्ड, थोहर, मन्सासिज। २. E. nivulia Buch. & Ham. (यु. निवुलिया वुच; हैम); पटके, सिज, सेहुण्ड। ३. E. antiquorum Linn. (यु. ऐण्टिक्क्वोर्म् लिन.); तिधारा सेहुण्ड। ४. E. trigona Haw. (यु. ट्राइगोना हॉ.); तिधारा सेहुण्डभेद। ५. E. triucalli Linn. (यु. तिरुकेल्लि लिन.); लंकासिज, अंगुलिया थूहर, छिमिया सेहुण्ड। ६. E. royleana Boiss (यु. रायलिआना वाएस); थोर, सूरू। २५. थूहर हिं०-थूहर, सेंहुड, सेंहुर, सेंड, मुठरिया सीज, मुठिया सीज, सौझ, थोहर, एटके। बं०-मनसा सिज। म०- वई निवडुङ्ग, मिनगुटथोर। गु०-थोर, कांटलो, कंटालो। ते०-आकुजे, मुडु। ता०, क०, मल-इल्लैकल्लि। फा०-लादनाम्। अ०-ज़क्लमफर्यून। अं०-Milk Hedge (मिल्क हेज), Common Dulkhedge (कामन् डक हेज)। ले०-Euphorbia neriifolia Linn. (युफोर्बिआ नेराइफोलिआ लिन.)। Fam. Euphorbiacea (युफोर्बिएसी)। यह बङ्गाल, बिहार, उत्तरप्रदेश, पश्चिमोत्तरप्रदेश, दक्षिण तथा अन्य प्रान्तों में पाया जाता है। इसका झाड़-१०-१५ फीट तक ऊँचा होता है। शाखाएँ-सीधी और गूदेदार होती हैं। इसके डंठल और शाखाओं पर जगह-जगह काँटे रहते हैं और काँटे चौथाई से आध इञ्च तक लम्बे जोड़े में होते हैं। इन कंटकीभूत उपपत्रों के परस्पर मिलने से काण्ड पञ्चकोणीय बन जाता है। लकड़ी-कोमल होती है। प्रायः शाखाओं के अन्त में चारों ओर से गुच्छाकार पत्ते लगे रहते हैं। वे पत्थरचट्टे के समान मोटे, ६ से १२ इञ्च तक लम्बे, अभि-लट्त्वाकार होते हैं। अधःपत्रावलि (Involucre) पीताभ होती है। फूल-छोटे-छोटे हरापनयुक्त पीले और फल-आधा इञ्च तक चौड़े होते हैं। बीज-चपटे तथा कोमल लोमयुक्त होते हैं। इसकी शाखाओं और पत्तों से दूध निकलता है। इसकी दूसरी जाति यु. निवुलिया बुच, हैम (E. nivulia Buch. & Ham.) के वृक्ष-१०-३० फीट ऊँचे, शाखाएँ-सीधी, गोल, खण्डमय, चक्राकार क्रम में निकली हुई और सीधे दो-दो एक साथ कंटकीभूत उपपत्रों से युक्त होते हैं। पत्ते-अस्थायी, मांसल, ९ इञ्च लम्बे, २ १/२ इञ्च चौड़े, रेखाकार अभिप्रासवत् अथवा स्रुवाकार कुण्ठिताग्र और अवृन्त होते हैं। शीत व ग्रीष्मकाल में पत्ते नहीं रहते। एकाभव्यूह (Cyathium) में अधः पत्रावलि (Involucre) पीली होती है। ये पौधे विशेषकर शुष्क तथा नग्न पहाड़ियों पर अधिक होते हैं। पहली जाति के पौधे गाँवों की बाड़ों पर अधिक पाये जाते हैं। चिकित्सा में इनके ताजे वा सुखाये दुग्ध, पत्र एवं मूल का व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें युफोर्बिन, राल, गोंद, रबर की तरह पदार्थ एवं कॅल्शियम मॅलेट ये पदार्थ पाये जाते हैं। सेहुण्ड की जाति में पाये जाने वाला दाहजनक द्रव्य इसमें बहुत रहता है। गुण और प्रयोग-इसका क्षीर अत्यन्त तीव्र विरेचन है। इससे वमन तथा पानी की तरह जुलाब होते हैं। इसके काण्ड का रस रेचन है। इसके पत्र का रस मूत्रजनन है। इसके मूल का रस उत्तेजक एवं उद्वेष्टननिरोधी है। (१) उदररोग में इसका क्षीर देते हैं। मिरिच को इसके क्षीर में डुबोकर सुखाकर रखते हैं तथा आवश्यकता पड़ने पर १-२ मिरिच के दाने खिलाते हैं। इसी प्रकार पिप्पली, लौङ्ग एवं त्रिवृतमूल आदि को इसके क्षीर की भावना देकर उनका उपयोग अत्यन्त तीव्र विरेचन की आवश्यकता होने पर करते हैं। उदर रोगी को विबन्ध होने पर भोजन के पूर्व इसके पत्तों का शाक खिलाते हैं। क्षीर चर्म पर लगने से दाह उत्पन्न होकर फोड़े उत्पन्न होते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA