भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८४ भावप्रकाशनिघण्टुः (२) इसकी जड़ की मिरिच के साथ सूतिका-ज्वर एवं सर्पविष में देते हैं । (३) इसके कांड का स्वरस त्वचा पर मलने से त्वचा लाल होती है। चर्मकील (Warts) में इसे लगाने से वे गिर पड़ते हैं। जीर्ण आमवात में संधिपीड़ा होने पर इसका स्वरस निबौली के तेल में मिलाकर मलते हैं। इसके कांड को भूनकर उसका स्वरस निकाल कर मधु, टंकणक्षार तथा अडूसा के साथ कफविकारों में देते हैं। केवल स्वरस को कर्णशूल में डालते हैं। (४) तमकश्वास में पत्तों का स्वरस या कांड का रस मधु के साथ देते हैं। पत्तों के अन्य गुण आगे शाक वर्ग में दिये हुये हैं। (५) व्रण में इसके क्षीर को घृत के साथ मिलाकर लगाया जाता है। मात्रा-मूल २ से ४ रत्ती; स्वरस २-५ बूँद; क्षीर १/२-१ रत्ती। २६. तिधारा थूहर सं०-वज्रकण्टक, वज्री। हिं०-तिधारासेंहुड, तिधारा थूहर। बं०-बाजबारग, तेशिरेमनसा, तेकाँटासिज । म०-तीनधारी निवडुंग। ता०, मल०-चतुरकल्ली । ते०-बोम्मजेमुडु। अं०-Triangular sponge (ट्राएन्युलर स्पॉञ्ज)। ले०-Euphorbia antiquorum Linn. (युफोर्बिआ एण्टिक्क्योरम् लिन.)। Fam. Euphorbiaceae (युफोर्बिएसी)। यह प्रायः सभी प्रान्तों में पाया जाता है। इसके वृक्ष-१२-१५ फीट ऊँचे होते हैं। काण्ड-खण्डमय और शाखाएँ-प्रायः ३ या कभी-कभी ४-५ पक्षों वाली होती हैं। इन पर कंटकीभूत उपपत्र होते हैं जो छोटे होते हैं। काण्डखण्ड भी इसमे छोटे होते हैं तथा ऊपर के काण्डखंड प्रायः उतने ही लम्बे होते हैं जितने मोटे। पत्ते-छोटे-छोटे होते हैं तथा सब वृक्षों में नहीं होते। पुष्प-द्विलिंगी प्रायः १/२ इञ्च बड़े हरिताभ पीत या लाल रंग के होते हैं। फल- १/२ इञ्च बड़े होते हैं। इसके दुग्ध, मूल एवं काण्ड का व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें युफोर्बिन ३५%, दो प्रकार की राल जिनमें से एक ईथर में घुलनशील तथा दूसरी न घुलने वाली, गोंद एवं रबर सदृश पदार्थ १.५% ये द्रव्य पाये जाते हैं। थूहर के जाति में पाया जाने वाला दाहजनक द्रव्य इसमें बहुत अल्प मात्रा में है। गुण और प्रयोग-यह कफघ्न, ज्वरघ्न, रेचन एवं रक्तशोधक है। इससे कफ पतला होकर मुख एवं गुदा के द्वारा निकल जाता है। इसका प्रयोग प्लीहावृद्धि, कामला, कुष्ठ तथा सर्पविष में किया जाता है। (१) बच्चों के कफविकारों में इसके कांड को गरम कर निकाले हुए रस में टंकणक्षार, मधु एवं अडूसा मिलाकर बहुत प्रयोग किया जाता है। बच्चों को इसमें नुकसान नहीं होता। यदि मात्रा अधिक भी हो जाय तो इससे अधिक-से- अधिक एकाध वमन होता है तथा पाखाना साफ होता है। (२) इसके मूल का क्वाथ जीर्ण आमवात एवं उपदंश में दिया जाता है। (३) इसके दुग्ध को आमवातिक पीड़ा, दंतशूल एवं मस्से आदि में लगाते हैं। (४) इसके दुग्ध को बेसन के साथ पकाकर गोली बनाकर सोजाक में देते हैं। मात्रा-काण्डस्वरस बच्चों को १ १/२-३ माशा; बड़ों को १ १/२-२ तोला। अथ सेहुण्डभेदः शातला । तस्या नामानि गुणांश्चाह शातला सप्तला सारा विमला विदुला च सा । तथा निगदिता भूरिफेना चर्मकपेत्यपि ।।७८।। शातला कटुका पाके वातला शीतला लघुः । तिक्ता शोथकफानाहपित्तोदावर्त्तरक्तजित् ।।७९।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmau. Digitized by S3 Foundation USA