भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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गुडूच्यादिवर्गः ४८५ **शातला (सेंहुड़ भेद) के नाम तथा गुण—**शातला, सप्तला, सारा, विमला, विदुला, भूरिफेना और चर्मकषा ये सब संस्कृत नाम शातला के हैं। **शातला—**पाक में कटु, वातकारक, शीतवीर्य, लघु और तिक्तरसयुक्त होती है तथा यह शोथ, कफ, आनाह, पित्त, उदावर्त तथा रक्त-प्रकोप का नाश करती है। [७८-७९] **नोट—**सप्तला एक संदिग्ध द्रव्य है— चरक क० अ० ११ में 'सप्तला शंखिनी' कल्प का वर्णन है। यहाँ सप्तला के मूल का एवं शंखिनी के फल का जो अधिक शुष्क न हों तथा जिनका छिलका निकाल दिया गया हो उनका व्यवहार कफ की अधिकतायुक्त गुल्म, गरदोष, हृद्रोग, कुष्ठ, शोफ एवं उदररोग में करने को लिखा है क्योंकि यह विकासि, तीक्ष्ण एवं रूक्ष होता है।$^१$ चरक ने विरेचनद्रव्यों में (सू० अ० २, वि० अ० ८) इसका उल्लेख किया है। सुश्रुत में श्यामादिगण में एवं उभयतोभागहर द्रव्यों में इसके स्वरस का तथा अधोभागहर द्रव्यों में मूल का उपयोग लिखा है। सप्तला के साथ प्रायः प्रत्येक स्थान पर शंखिनी का उल्लेख मिलता है। टीकाकारों ने शंखिनी को यवतिक्ता तथा कहीं यवतिक्ता भेद लिखा है। सप्तला का अर्थ कहीं पर स्नुहीभेद तथा कहीं पर यवतिक्ताभेद किया गया है। कहीं पर 'बुध्नामाहुः' तथा 'अपरे श्रीफलिकामाहुः' इस प्रकार उल्लेख करते हुए बुध्ना या श्रीफलिका नामक वनस्पति की तरफ निर्देश किया है। कुछ लोगों ने पीतदुग्ध सेहुण्ड की सप्तला लिखा है। उपर्युक्त वर्णन से यह मालूम होता है कि सप्तला यह कोई सेहुण्ड का ही भेद होगा। कुछ आधुनिक विद्वानों ने युफोर्बिआ तिरुकेल्लि लिन. (Euphorbia tirucalli Linn.), अंगुलिया थूहर-नामक सेंहुण्ड के भेद को सप्तला माना है। श्रीमान् ठा. बलवन्त सिंह जी ने युफोर्बिआ ड्रॅकन्क्युलॉइड्स, लैम (Euphorbia dracunculoides Lam.)-तितली के लिये सप्तला होने की सम्भावना पर विचार करने को लिखा है। (बिहार की वनस्पतियाँ, पृ० २४) कुछ अन्य विद्वानों ने सप्तला को शिकाकाई (Acacia concinna DC.) लिखा है। सप्तला को 'विमला', 'भूरिफेना' एवं 'चर्मकषा' ये पर्याय शिकाकाई के होने की सम्भावना दर्शित करते हैं तथा यह भी वामक एवं विरेचक है। कुछ लोगों ने ले०-Origanum vulgare Linn. (ओरिगॅनमू ह्वलगेर् लिन.), हिं०-सथरा, Fam. Labiatae (लेबिएटी) को सप्तला लिखा है जिसमें का सुगन्धि उड़नशील तैल. उत्तेजक एवं अतिसार में बल्य होता है तथा आमवात, दन्तशूल एवं कर्णशूल में उसका उपयोग किया जाता है। यहाँ अंगुलिया थूहर, तितली एवं शिकाकाई तीनों का अलग-अलग वर्णन किया गया है। २७. सातला १ (अंगुलिया थूहर) **हिं०-**अंगुलिया, थूहर, छिमिया सेहुण्ड। **बं०-**जटालंका, लंकासिज। **म०-**निवल, थोर, शेर। गु०- डांडलीओ थोर, खरसानी थोर। **ता०-**कल्लि। **ते०-**जेमुदु। **क०-**मोंडगलि। **मल०-**तिरुक्कल्लिल। **ले०-**Euphorbia tirucalli Linn. (युफोर्बिआ तिरुकॅल्लि लिन.)। Fam. Euphorbiaceae (युफोर्बिएसी)। यह बंगाल, बिहार, सिन्ध, कोंकण एवं गुजरात आदि स्थानों में पाया जाता है। इसका आदिम स्थान अफ्रीका है। इसका **वृक्ष-**छोटा, १५-२० फीट ऊँचा होता है। इसे कहीं से काटने से बहुत दूध निकलता है। इसकी मुख्य शाखायें सीधी परन्तु उपशाखायें हरी, चिकनी, चमकीली, गोल (घेरे में), चक्राकार निकली हुई और बहुत पतली होती हैं। इस पर काँटे नहीं होते। **पत्ते-**बरसात में १/२ इञ्च तक लम्बे एवं गूदेदार पत्र निकलते हैं। **पुष्प-**उपशाखाओं के १. ते गुल्मगरहृद्रोगकुष्ठशोफोदरादिषु । विकासितीक्ष्णरूक्षत्वाद्वोज्ये श्लेष्माधिकेषु तु ॥ नातिशुष्कं फलं ग्राह्यं शंखिन्या निस्तुषीकृतम् । सप्तलायाश्च मूलानि गृहीत्वा भाजने क्षिपेत् ॥

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