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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

गुडूच्यादिवर्गः ४८३ १. Euphorbia nerifolia Linn. (युफोर्बिआ नेराइफोलिया लिन.); सेहुण्ड, थोहर, मन्सासिज। २. E. nivulia Buch. & Ham. (यु. निवुलिया वुच; हैम); पटके, सिज, सेहुण्ड। ३. E. antiquorum Linn. (यु. ऐण्टिक्क्वोर्म् लिन.); तिधारा सेहुण्ड। ४. E. trigona Haw. (यु. ट्राइगोना हॉ.); तिधारा सेहुण्डभेद। ५. E. triucalli Linn. (यु. तिरुकेल्लि लिन.); लंकासिज, अंगुलिया थूहर, छिमिया सेहुण्ड। ६. E. royleana Boiss (यु. रायलिआना वाएस); थोर, सूरू। २५. थूहर हिं०-थूहर, सेंहुड, सेंहुर, सेंड, मुठरिया सीज, मुठिया सीज, सौझ, थोहर, एटके। बं०-मनसा सिज। म०- वई निवडुङ्ग, मिनगुटथोर। गु०-थोर, कांटलो, कंटालो। ते०-आकुजे, मुडु। ता०, क०, मल-इल्लैकल्लि। फा०-लादनाम्। अ०-ज़क्लमफर्यून। अं०-Milk Hedge (मिल्क हेज), Common Dulkhedge (कामन् डक हेज)। ले०-Euphorbia neriifolia Linn. (युफोर्बिआ नेराइफोलिआ लिन.)। Fam. Euphorbiacea (युफोर्बिएसी)। यह बङ्गाल, बिहार, उत्तरप्रदेश, पश्चिमोत्तरप्रदेश, दक्षिण तथा अन्य प्रान्तों में पाया जाता है। इसका झाड़-१०-१५ फीट तक ऊँचा होता है। शाखाएँ-सीधी और गूदेदार होती हैं। इसके डंठल और शाखाओं पर जगह-जगह काँटे रहते हैं और काँटे चौथाई से आध इञ्च तक लम्बे जोड़े में होते हैं। इन कंटकीभूत उपपत्रों के परस्पर मिलने से काण्ड पञ्चकोणीय बन जाता है। लकड़ी-कोमल होती है। प्रायः शाखाओं के अन्त में चारों ओर से गुच्छाकार पत्ते लगे रहते हैं। वे पत्थरचट्टे के समान मोटे, ६ से १२ इञ्च तक लम्बे, अभि-लट्त्वाकार होते हैं। अधःपत्रावलि (Involucre) पीताभ होती है। फूल-छोटे-छोटे हरापनयुक्त पीले और फल-आधा इञ्च तक चौड़े होते हैं। बीज-चपटे तथा कोमल लोमयुक्त होते हैं। इसकी शाखाओं और पत्तों से दूध निकलता है। इसकी दूसरी जाति यु. निवुलिया बुच, हैम (E. nivulia Buch. & Ham.) के वृक्ष-१०-३० फीट ऊँचे, शाखाएँ-सीधी, गोल, खण्डमय, चक्राकार क्रम में निकली हुई और सीधे दो-दो एक साथ कंटकीभूत उपपत्रों से युक्त होते हैं। पत्ते-अस्थायी, मांसल, ९ इञ्च लम्बे, २ १/२ इञ्च चौड़े, रेखाकार अभिप्रासवत् अथवा स्रुवाकार कुण्ठिताग्र और अवृन्त होते हैं। शीत व ग्रीष्मकाल में पत्ते नहीं रहते। एकाभव्यूह (Cyathium) में अधः पत्रावलि (Involucre) पीली होती है। ये पौधे विशेषकर शुष्क तथा नग्न पहाड़ियों पर अधिक होते हैं। पहली जाति के पौधे गाँवों की बाड़ों पर अधिक पाये जाते हैं। चिकित्सा में इनके ताजे वा सुखाये दुग्ध, पत्र एवं मूल का व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें युफोर्बिन, राल, गोंद, रबर की तरह पदार्थ एवं कॅल्शियम मॅलेट ये पदार्थ पाये जाते हैं। सेहुण्ड की जाति में पाये जाने वाला दाहजनक द्रव्य इसमें बहुत रहता है। गुण और प्रयोग-इसका क्षीर अत्यन्त तीव्र विरेचन है। इससे वमन तथा पानी की तरह जुलाब होते हैं। इसके काण्ड का रस रेचन है। इसके पत्र का रस मूत्रजनन है। इसके मूल का रस उत्तेजक एवं उद्वेष्टननिरोधी है। (१) उदररोग में इसका क्षीर देते हैं। मिरिच को इसके क्षीर में डुबोकर सुखाकर रखते हैं तथा आवश्यकता पड़ने पर १-२ मिरिच के दाने खिलाते हैं। इसी प्रकार पिप्पली, लौङ्ग एवं त्रिवृतमूल आदि को इसके क्षीर की भावना देकर उनका उपयोग अत्यन्त तीव्र विरेचन की आवश्यकता होने पर करते हैं। उदर रोगी को विबन्ध होने पर भोजन के पूर्व इसके पत्तों का शाक खिलाते हैं। क्षीर चर्म पर लगने से दाह उत्पन्न होकर फोड़े उत्पन्न होते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

४८४ भावप्रकाशनिघण्टुः (२) इसकी जड़ की मिरिच के साथ सूतिका-ज्वर एवं सर्पविष में देते हैं । (३) इसके कांड का स्वरस त्वचा पर मलने से त्वचा लाल होती है। चर्मकील (Warts) में इसे लगाने से वे गिर पड़ते हैं। जीर्ण आमवात में संधिपीड़ा होने पर इसका स्वरस निबौली के तेल में मिलाकर मलते हैं। इसके कांड को भूनकर उसका स्वरस निकाल कर मधु, टंकणक्षार तथा अडूसा के साथ कफविकारों में देते हैं। केवल स्वरस को कर्णशूल में डालते हैं। (४) तमकश्वास में पत्तों का स्वरस या कांड का रस मधु के साथ देते हैं। पत्तों के अन्य गुण आगे शाक वर्ग में दिये हुये हैं। (५) व्रण में इसके क्षीर को घृत के साथ मिलाकर लगाया जाता है। मात्रा-मूल २ से ४ रत्ती; स्वरस २-५ बूँद; क्षीर १/२-१ रत्ती। २६. तिधारा थूहर सं०-वज्रकण्टक, वज्री। हिं०-तिधारासेंहुड, तिधारा थूहर। बं०-बाजबारग, तेशिरेमनसा, तेकाँटासिज । म०-तीनधारी निवडुंग। ता०, मल०-चतुरकल्ली । ते०-बोम्मजेमुडु। अं०-Triangular sponge (ट्राएन्युलर स्पॉञ्ज)। ले०-Euphorbia antiquorum Linn. (युफोर्बिआ एण्टिक्क्योरम् लिन.)। Fam. Euphorbiaceae (युफोर्बिएसी)। यह प्रायः सभी प्रान्तों में पाया जाता है। इसके वृक्ष-१२-१५ फीट ऊँचे होते हैं। काण्ड-खण्डमय और शाखाएँ-प्रायः ३ या कभी-कभी ४-५ पक्षों वाली होती हैं। इन पर कंटकीभूत उपपत्र होते हैं जो छोटे होते हैं। काण्डखण्ड भी इसमे छोटे होते हैं तथा ऊपर के काण्डखंड प्रायः उतने ही लम्बे होते हैं जितने मोटे। पत्ते-छोटे-छोटे होते हैं तथा सब वृक्षों में नहीं होते। पुष्प-द्विलिंगी प्रायः १/२ इञ्च बड़े हरिताभ पीत या लाल रंग के होते हैं। फल- १/२ इञ्च बड़े होते हैं। इसके दुग्ध, मूल एवं काण्ड का व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें युफोर्बिन ३५%, दो प्रकार की राल जिनमें से एक ईथर में घुलनशील तथा दूसरी न घुलने वाली, गोंद एवं रबर सदृश पदार्थ १.५% ये द्रव्य पाये जाते हैं। थूहर के जाति में पाया जाने वाला दाहजनक द्रव्य इसमें बहुत अल्प मात्रा में है। गुण और प्रयोग-यह कफघ्न, ज्वरघ्न, रेचन एवं रक्तशोधक है। इससे कफ पतला होकर मुख एवं गुदा के द्वारा निकल जाता है। इसका प्रयोग प्लीहावृद्धि, कामला, कुष्ठ तथा सर्पविष में किया जाता है। (१) बच्चों के कफविकारों में इसके कांड को गरम कर निकाले हुए रस में टंकणक्षार, मधु एवं अडूसा मिलाकर बहुत प्रयोग किया जाता है। बच्चों को इसमें नुकसान नहीं होता। यदि मात्रा अधिक भी हो जाय तो इससे अधिक-से- अधिक एकाध वमन होता है तथा पाखाना साफ होता है। (२) इसके मूल का क्वाथ जीर्ण आमवात एवं उपदंश में दिया जाता है। (३) इसके दुग्ध को आमवातिक पीड़ा, दंतशूल एवं मस्से आदि में लगाते हैं। (४) इसके दुग्ध को बेसन के साथ पकाकर गोली बनाकर सोजाक में देते हैं। मात्रा-काण्डस्वरस बच्चों को १ १/२-३ माशा; बड़ों को १ १/२-२ तोला। अथ सेहुण्डभेदः शातला । तस्या नामानि गुणांश्चाह शातला सप्तला सारा विमला विदुला च सा । तथा निगदिता भूरिफेना चर्मकपेत्यपि ।।७८।। शातला कटुका पाके वातला शीतला लघुः । तिक्ता शोथकफानाहपित्तोदावर्त्तरक्तजित् ।।७९।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmau. Digitized by S3 Foundation USA

गुडूच्यादिवर्गः ४८५ **शातला (सेंहुड़ भेद) के नाम तथा गुण—**शातला, सप्तला, सारा, विमला, विदुला, भूरिफेना और चर्मकषा ये सब संस्कृत नाम शातला के हैं। **शातला—**पाक में कटु, वातकारक, शीतवीर्य, लघु और तिक्तरसयुक्त होती है तथा यह शोथ, कफ, आनाह, पित्त, उदावर्त तथा रक्त-प्रकोप का नाश करती है। [७८-७९] **नोट—**सप्तला एक संदिग्ध द्रव्य है— चरक क० अ० ११ में 'सप्तला शंखिनी' कल्प का वर्णन है। यहाँ सप्तला के मूल का एवं शंखिनी के फल का जो अधिक शुष्क न हों तथा जिनका छिलका निकाल दिया गया हो उनका व्यवहार कफ की अधिकतायुक्त गुल्म, गरदोष, हृद्रोग, कुष्ठ, शोफ एवं उदररोग में करने को लिखा है क्योंकि यह विकासि, तीक्ष्ण एवं रूक्ष होता है।$^१$ चरक ने विरेचनद्रव्यों में (सू० अ० २, वि० अ० ८) इसका उल्लेख किया है। सुश्रुत में श्यामादिगण में एवं उभयतोभागहर द्रव्यों में इसके स्वरस का तथा अधोभागहर द्रव्यों में मूल का उपयोग लिखा है। सप्तला के साथ प्रायः प्रत्येक स्थान पर शंखिनी का उल्लेख मिलता है। टीकाकारों ने शंखिनी को यवतिक्ता तथा कहीं यवतिक्ता भेद लिखा है। सप्तला का अर्थ कहीं पर स्नुहीभेद तथा कहीं पर यवतिक्ताभेद किया गया है। कहीं पर 'बुध्नामाहुः' तथा 'अपरे श्रीफलिकामाहुः' इस प्रकार उल्लेख करते हुए बुध्ना या श्रीफलिका नामक वनस्पति की तरफ निर्देश किया है। कुछ लोगों ने पीतदुग्ध सेहुण्ड की सप्तला लिखा है। उपर्युक्त वर्णन से यह मालूम होता है कि सप्तला यह कोई सेहुण्ड का ही भेद होगा। कुछ आधुनिक विद्वानों ने युफोर्बिआ तिरुकेल्लि लिन. (Euphorbia tirucalli Linn.), अंगुलिया थूहर-नामक सेंहुण्ड के भेद को सप्तला माना है। श्रीमान् ठा. बलवन्त सिंह जी ने युफोर्बिआ ड्रॅकन्क्युलॉइड्स, लैम (Euphorbia dracunculoides Lam.)-तितली के लिये सप्तला होने की सम्भावना पर विचार करने को लिखा है। (बिहार की वनस्पतियाँ, पृ० २४) कुछ अन्य विद्वानों ने सप्तला को शिकाकाई (Acacia concinna DC.) लिखा है। सप्तला को 'विमला', 'भूरिफेना' एवं 'चर्मकषा' ये पर्याय शिकाकाई के होने की सम्भावना दर्शित करते हैं तथा यह भी वामक एवं विरेचक है। कुछ लोगों ने ले०-Origanum vulgare Linn. (ओरिगॅनमू ह्वलगेर् लिन.), हिं०-सथरा, Fam. Labiatae (लेबिएटी) को सप्तला लिखा है जिसमें का सुगन्धि उड़नशील तैल. उत्तेजक एवं अतिसार में बल्य होता है तथा आमवात, दन्तशूल एवं कर्णशूल में उसका उपयोग किया जाता है। यहाँ अंगुलिया थूहर, तितली एवं शिकाकाई तीनों का अलग-अलग वर्णन किया गया है। २७. सातला १ (अंगुलिया थूहर) **हिं०-**अंगुलिया, थूहर, छिमिया सेहुण्ड। **बं०-**जटालंका, लंकासिज। **म०-**निवल, थोर, शेर। गु०- डांडलीओ थोर, खरसानी थोर। **ता०-**कल्लि। **ते०-**जेमुदु। **क०-**मोंडगलि। **मल०-**तिरुक्कल्लिल। **ले०-**Euphorbia tirucalli Linn. (युफोर्बिआ तिरुकॅल्लि लिन.)। Fam. Euphorbiaceae (युफोर्बिएसी)। यह बंगाल, बिहार, सिन्ध, कोंकण एवं गुजरात आदि स्थानों में पाया जाता है। इसका आदिम स्थान अफ्रीका है। इसका **वृक्ष-**छोटा, १५-२० फीट ऊँचा होता है। इसे कहीं से काटने से बहुत दूध निकलता है। इसकी मुख्य शाखायें सीधी परन्तु उपशाखायें हरी, चिकनी, चमकीली, गोल (घेरे में), चक्राकार निकली हुई और बहुत पतली होती हैं। इस पर काँटे नहीं होते। **पत्ते-**बरसात में १/२ इञ्च तक लम्बे एवं गूदेदार पत्र निकलते हैं। **पुष्प-**उपशाखाओं के १. ते गुल्मगरहृद्रोगकुष्ठशोफोदरादिषु । विकासितीक्ष्णरूक्षत्वाद्वोज्ये श्लेष्माधिकेषु तु ॥ नातिशुष्कं फलं ग्राह्यं शंखिन्या निस्तुषीकृतम् । सप्तलायाश्च मूलानि गृहीत्वा भाजने क्षिपेत् ॥

बीच, छोटे एवं प्रायः स्त्री पुष्प रहते हैं। फल-५ मि० मि० चपटा एवं बीज-अंडाकार तथा चिकना रहता है। इसके दुग्ध से मछली मरती है। इसके दुग्ध एवं छाल का प्रयोग चिकित्सा में किया जाता है। **रासायनिक संगठन-**थूहर की तरह। **गुण और प्रयोग-**इसका दुग्ध अत्यन्त प्रक्षोभकारक है। इससे वमन एवं विरेचन होता है तथा त्वचा पर इसे लगाने से फोड़े उत्पन्न होते हैं। जीर्ण उपदंश में संधिपीड़ा के लिये इसके दुग्ध का प्रयोग करते हैं। नाड़ीशूल में दुग्ध का लेप लाभदायक होता है। इसको लगाने से मस्से गल कर गिर पड़ते हैं। इसको लगाते समय इसमें तिल का तेल मिला लेना चाहिये। विरेचन के लिये २ बूँद दुग्ध, बेसन एवं मधु के साथ गोली बना कर दिया जाता है। इसके कोमल कांड एवं मूल का क्वाथ उदरशूल में दिया जाता है। **मात्रा-**दुग्ध १-२ रत्ती।

२८. सातला- २ (शिकाकाई) **हिं०-**शिकाकाई, सिकाकाई, चिकेकाई ऐला। **बं०-**बनरीठा। **म०-**शिकेकाई। **गु०-**चिकाखाई। ता०- शीयक्काय्। **ते०-**शीकाय। **क०-**शिगे। ले०-Acacia concinna DC. (एर्केसिआ कॉन्सिन्रा डीसी.)। Fam. Leguminosae (लेगुमिनोसी)। उत्तर भारत तथा हिमालय में उत्पन्न होने वाले वृक्ष गुणों की दृष्टि से दक्षिण में होने वालों की अपेक्षा श्रेष्ठ माने जाते हैं। इसके गुल्म प्रायः कम मिलते हैं किन्तु सभी स्थानों पर पाये जाते हैं। इसका गुल्म (क्षुप)-बहुत फैला हुआ, अत्यन्त काँटेदार एवं लम्बी आरोही शाखाओं से युक्त रहता है। उपशाखायें हल्की श्वेताभ और टेढ़े, मजबूत काँटों की पाँच कतारों से युक्त रहती हैं। **पत्ते-**पक्षाकार एवं पत्रक खट्टे होते हैं। फूल- मुण्डक (Capitulum) पीताभ श्वेत या गुलाबी रंग के लगभग १/२ इञ्च व्यास में होते हैं। **फली-**३-५ इञ्च लम्बी, १ इञ्च चौड़ी, मोटी, मांसल, चोंचदार एवं बीजों के बीच-बीच संधियों पर संकुचित होती है। इसका स्वाद रीठे के समान परन्तु अधिक खट्टा, कम कड़वा तथा अधिक तीता रहता है। इसे पानी में भिगोकर मसलने से रीठे के समान झाग निकलता है। सिर के बाल एवं रेशमी वस्त्र धोने के लिये इसका उपयोग करते हैं। इसके पत्र एवं फली का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। **रासायनिक संगठन-**इसकी फली में सॅपोनिन् (Saponin) ११.२%, मॅलिक् एसिद् (Malc acid) १२.७५%, राल १%, ग्लूकोज् १३.९%, गोंद एवं रंजक द्रव्य २१.५%, तन्तु २२% एवं राख ३.७५% रहती है। **गुण और प्रयोग-**इसकी फली उत्तेजक, कफघ्न, वामक एवं आनुलोमिक है। इसकी क्रिया रीठा या सेनेगा जैसी होती है। इससे नाड़ी की गति कम होती है तथा मूत्र की मात्रा बढ़ती है। इसके पत्र खट्टे, रोचक, यकृत् उत्तेजक तथा विरेचन होते हैं। इमली के बदले इनका उपयोग किया जा सकता है। (२) पुराने कफविकारों में कफ पतला करने के लिये एवं श्वासावरोध कम करने के लिये इसके फलियों का फांट (१-२०) २ से ४ तोले की मात्रा में देते हैं। इससे पाखाना भी साफ होता है। (२) कामला में काली मिरिच के साथ इसके पत्तों का उपयोग किया जाता है। इससे विरेचन तथा कभी-कभी वमन भी होता है तथा पित्त का स्राव उचित होने लगता है। यकृत की क्रिया ठीक न होती हो तो भोजन में खटाई के लिये इसके पत्तों का एवं लाल मिर्र्च के स्थान पर काली मिरच का उपयोग किया जाता है।

गुडूच्यादिवर्गः ४८७ (३) इसके फली के क्वाथ से बाल धोने से जूएँ आदि मरती हैं, रूसी नष्ट होती है तथा केशवृद्धि होती है। क्वाथ में बत्ती डुबोकर बच्चों के गुदा में डालने से पाखाना होकर कंडी निकल जाती है। मात्रा-फली का फांट २-४ तो०। पत्रचूर्ण २-४ माशा। २९. सप्तला-३ (तितली) हिं०-जायची, तितली। संथा०-परवा। बं०-छागल दुपटी, जायची। पं०-कंगी। मद्रा०-तिल्ला-काड। ले०-Euphorbia dracunculoides Lam. (युफोर्बिआ ड्रॅकन्क्युलॉईडिस् लैम्)। Fam. Euphorbiaceae (युफोर्बिएसी)। इसके क्षुप-एकवर्षायु, प्रायः ४-८ इञ्च ऊँचे, चिकने तथा सामान्यतः धूसर वर्ण के होते हैं। इसमें पीताभ क्षीर होता है। शाखायें प्रायः द्विविभक्त क्रम में निकली हुई रहती हैं। पत्ते-अभिमुख (नीचे कुन्तल) अवृन्त, रेखाकार, रेखाकार प्रासवत् या रेखाकार आयताकार और .७-२ इञ्च लम्बे होते हैं। पुष्प-पुष्पाकार व्यूह एकाकी और द्विविभक्त काण्ड के बीच में होते हैं। इसे कुछ लोग यवतिक्ता भी मानते हैं क्योंकि जब आदि के साथ खेतों में ही इसके क्षुप अधिकतर पाये जाते हैं। श्रीयुत् ठा. बलवन्त सिंह जी ने इसे सप्तला या शंखिनी होने की ओर विद्वानों का ध्यान आकृष्ट किया है तथा उनके मत से इसकी सप्तला होने की अधिक सम्भावना है। वास्तविक सुद्घाव (Ruta graveolens Linn; Fam. Rutaceae रूटा-ग्रॅविओलेन्स) के स्थान पर कहीं- कहीं पंसारी इसको बेचते हैं जो गलत है। ग्रामीण इसके बीज तैल को जलाने के काम में लेते हैं। चर्म रोगों में भी यह उपयोगी बतलाया जाता है। अथ कलिहारी। तस्या नामानि गुणाँश्चाह कलिहारी तु हलिनी लाङ्गली शुक्रपुष्प्यपि। विशल्याऽग्निशिखाऽनन्ता वह्निवक्त्रा च गर्भनुत् ।। कलिहारी सरा कुष्ठशोफार्शोव्रणशूलजित् ॥८०॥ सक्षारा श्लेष्मजित्तिक्ता कटुका तुवराऽपि च। तीक्ष्णोष्णा कृमिहल्लघ्वी पित्तलागर्भपातिनी ॥८१॥ कलिहारी के नाम तथा गुण-कलिहारी, हलिनी, लाङ्गली, शुक्रपुष्पी, विशल्या, अग्निशिखा, अनन्ता, वह्निवक्त्रा और गर्भनुत् ये सब संस्कृत नाम 'कलिहारी' के हैं। कलिहारी-दस्तावर, कुष्ठ, शोथ, बवासीर, व्रण तथा शूल को नष्ट करनेवाली, क्षारगुणयुक्त, कफनाशक तथा तिक्त, कटु और कषायरसयुक्त, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, कृमि को दूर करनेवाली, लघु, पित्तजनक तथा गर्भ को गिरानेवाली होती है। [८०-८१] ३०. कलिहारी हिं०-कलिहारी, कलिकारी, करियारी, कलहंस, कलारी, लांगुली, करिहारी। बं०-विषलांगुली, उलटचण्डाल। म०-कललावी, इंदै, लालि, खड्याननाग, नागकरिआ। गु०-कलगारी, दूधियोबछनाग। क०-लांगुलिक। पं०- मलिम, करयारी। मा०-राजारड। ते०-अग्निशिखा, अडविनामी। ता०-कलईपैकिशंगु। मल०-मेशोत्रि, अं०- The glory lily (दि ग्लोरी लिली), Tiger's claws (टाइगर्स क्लॉज)। ले०-Gloriosa superba Linn. (ग्लोरिओजा सुपर्बा लिन.)। Fam. Liliaceae (लिलीएसी)। भारत के प्रायः सभी प्रान्तों के जंगल झाड़ियों में आप ही आप उत्पन्न होती है तथा वर्मा एवं लंका में भी पाई जाती है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

४८८ भावप्रकाशनिघण्टुः इसकी लता-मृदु, आरोहणशील और सुन्दर होती है जो झाड़ियों या छोटे वृक्षों के ऊपर चढ़ी हुई पाई जाती है। काण्ड-पतला, कलम जितनी मोटाई का, गोल, मृदु एवं हरे रंग का होता है। यह १।।-२ फीट लम्बी होने पर भूमि की ओर नत हो जाती है किन्तु जब उसे किसी दूसरे वृक्ष का आश्रय मिलता है तब उसके सहारे ८-१० फुट तक ऊँची बढ़ जाती है। यह चौमासे के प्रारंभ में निकलती है और शीतकालके पहले ही सूख जाती है। इसका भौमिक तना हलाकार टेढ़ा, बेलनाकार परन्तु जगह-जगह कुछ संकुचित रहता है। इसी से प्रतिवर्ष इसकी पुनरुत्पत्ति होती है। पत्ते- विषमवर्ती, ३ से ९ इञ्च तक लम्बे, पौन से एक इञ्च तक चौड़े, प्रायः विनाल, लट्वाकार-भालाकार एवं उनके अग्र सूत्राकार होते हैं जिनसे आश्रय को लपेट कर यह बढ़ती है। वर्षा के अन्त में इसमें फूल आते हैं। फूल-व्यास में ३- ४ इञ्च, अधोमुखी और सुन्दर होते हैं। पुष्पनाल-३-६ इञ्च लम्बा और उसका अग्र टेढ़ा होता है। पंखुड़ियाँ-६, लहरदार, नीचे आधार की ओर पीताभ, ऊपर नारंगी लाल और अन्त में पूर्णतः लाल होती हैं तथा जैसे-जैसे इनका विकास होता है वैसे-वैसे इनका रंग भी पीत से रक्त होता जाता है। फलियाँ-वेराव की फलियों के समान होती है। उनमें केराव के आकार के गोल-गोल लाल रङ्ग के बीज होते हैं। कंदों के भेद से कलिहारी दो प्रकार की मानी जाती है। जिसका कन्द लम्बा, गोल, दो भागों में विभक्त अथवा दो लम्बे टुकड़े समकोण के समान जुड़े हुए होते हैं वह पुरुषजाति और जिसका कन्द गोल, किञ्चित् लम्बा एक ही रहता है वह स्त्री जाति कहलाती है। पुरुषजाति की जड़-फूलने के समय संग्रह करनी चाहिये और स्त्रीजाति का कन्द फलने के बाद संग्रह किया जाता है। इसके कन्द (भौमिक तना) का व्यवहार किया जाता है। यह श्वेत, मृदु, मांसल और स्वाद में तिक्त होता है। इसकी गणना सप्त उपविषों में की गई है। यद्यपि यह साधारण मात्रा में विषैला नहीं है। सुखप्रसव एवं अपरापातन के लिये इसके लेप धारण आदि का विधान है। लांगली यह नाक केंवाच के लिये भी आया हुआ है। कुछ लोग भूल से कोस्टस् स्पेसिओसस् (Costus speciosus (Koenn.) Sm.) को लांगली मानते हैं जो वास्तव में केमुक है। शोधन-इसके कन्द को टुकड़े कर चार-पाँच दिन कुछ सैंधव मिश्रित तक्र में भिगोकर गरम जल से धोकर सुखा लेने से इसका विष कम हो जाता है। प्रतिदिन तक्र नया डालना चाहिये। १ दिन गोमूत्र में भिगोकर रखने से भी यह शुद्ध हो जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें दो रालें, कषाय द्रव्य, एक कडुवा विषैला क्षाराभ सुपर्बाइन (Superbine) एवं अन्य क्षाराभ ग्लोरिओसाइन ये द्रव्य पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-यह कटु, उष्ण, दीपन, बल्य, वामक, रेचक, पित्तविरेचक, गर्भघातक एवं कृमिघ्न है। इससे आक्षेप एवं पाचननलिका तथा गर्भाशय का दाह होता है। १-२ रत्ती की मात्रा में इससे भूख एवं शक्ति बढ़ती है। इसका प्रयोग साजाक, त्वग्रोग, बिच्छू एवं सर्पविष, कुष्ठ, अर्श एवं कृमि में किया जाता है। यह गर्भ के लिये हानिप्रद माना जाता है। (१) इसके कंद को कूट कर जल में बहुत देर तक धोते हैं जिससे नीचे पिष्टवत् पदार्थ जमता है। उसका प्रयोग सोजाक में करते हैं। (२) इसके कंद को पीसकर शुष्क त्वग्रोगों में एवं बिच्छू आदि के काटने पर करते हैं जिससे वेदना कम होती है। मात्रा-१-२ रत्ती। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

गुडूच्यादिवर्गः ४८९ अथ श्वेतरक्तकरवीरौ । तयोर्नामानि गुणाँश्चाह करवीरः श्वेतपुष्पः शतकुम्भोऽश्वमारकः । द्वितीयो रक्तपुष्पश्च चण्डालो लगुडस्तथा ।। ८२ ।। करवीरद्वयं तिक्तं कषायं कटुकञ्च तत् । व्रणलाघवकृन्नेत्रकोपकुष्ठव्रणापहम् ।। ८३ ।। वीर्योष्णं कृमिकण्डूघ्नं भक्षितं विषवन्मतम् ।। ८४ ।। सफेद और लाल करवीर (कनेर) के नाम तथा गुण-करवीर, श्वेतपुष्प, शतकुम्भ और अश्वमारक ये सब 'सफेद कनेर' के संस्कृत नाम हैं। 'लाल कनेर' के संस्कृत नाम-रक्तपुष्प, चण्डात और लगुड ये सब हैं। दोनों कनेर- तिक्त, कषाय और कटुरसयुक्त, उष्णवीर्य और व्रण में लघुता कारक होते हैं एवम् ये दोनों नेत्रकोप (नेत्रसम्बन्धी रोगविशेष), कुष्ठ, व्रण, कृमि और खुजली को नष्ट करते हैं। यह खा लेने पर विष की भाँति हानिकारक होते हैं। [८२- ८४] नोट-भावप्रकाशकार ने इसके श्वेत एवं रक्त ये दो भेद लिखे हैं। धन्वन्तरिनिघंटु में भी इसके दो भेद मिलते हैं किन्तु राजनिघंटु ने श्वेत, रक्त, पीत एवं कृष्ण ये ४ भेद लिखे हैं। यह अत्यन्त विषैला होने के कारण इसका आंतरिक प्रयोग बहुत कम मिलता है। भावप्रकाश में 'भक्षितं विषवन्मतम्' एवं ध० नि० में 'प्रक्षेपाद्विषमन्यथा' ऐसा लिखने से मालूम होता है कि इसका बाह्य प्रयोग ही अधिक किया जाता था। चरक एवं सुश्रुत में भी कुष्ठ एवं व्रण आदि के लिये इसके प्रयोग मिलते हैं। किन्तु चरक में कुष्ठ के लिये एवं सुश्रुत में अश्मरी और उदर के लिये इसके आन्तरिक प्रयोग भी मिलते हैं।¹ आन्तरिक प्रयोग के समय बहुत सावधानी की आवश्यकता है। आधुनिक विद्वानों ने श्वेत, रक्त एवं पीत इन ३ भेदों का ही उल्लेख किया है। कृष्ण करवीर का उल्लेख नहीं मिलता। श्वेत एवं रक्त करवीर का एक ही लेटिन नाम है। केवल पुष्प वर्ण में भिन्नता है। यहाँ पर श्वेत एवं रक्त का एक साथ तथा उसके पश्चात् पीत करवीर का वर्णन किया गया है। चिकित्सा में श्वेत एवं रक्त करवीर का ही अधिक व्यवहार किया जाता है। ३१. कनेर (श्वेत एवं रक्त) हिं०-कनेर, कन्हल, कनैल, करवीर। बं०-कराबी, करवी। म०-कणहेर। गु०-कणेर, करेण। ता०- अलरी। ते०-कस्तूरिपट्टे, गन्नेस। क०-कणगिलु। मल०-कणावीरम्। संथा०-राजबाहा। पं०-कनिर। अ०- दिल्फी, सम्मुलहिमार। फा०-खरजहरा। अं०-Sweet-scented oleander (स्वीट सेंटेड ऑलिएण्डर), Rooseberry spurge (रूजबेरी स्पर्ज)। ले०-Nerium odorum Soland (नेरियम् ओडोरम् सोलंड)। Fam. Apocynaceae (एपोसाइनेसी)। यह प्रायः सब प्रान्तों में पाया जाता है। दक्षिण एवं उत्तर प्रदेश में यह जंगली होता है। बगीचों में फूलों के लिये यह लगाया हुआ मिलता है। इसका क्षुप-मजबूत, सदा हरित, सीधी शाखाओं से युक्त एवं प्रायः १० फीट से अधिक ऊँचा नहीं होता। पत्ते- ४-६ इञ्च लम्बे, करीब १ इञ्च चौड़े, नुकीले एवं एक साथ ३-३ रहते हैं। फूल-सुगन्धयुक्त, श्वेत, रक्त एवं गुलाबी वर्ण के, करीब १ १/२ इञ्च व्यास के एवं व्यस्त छत्राकार (Salver shaped) होते हैं। फली-करीब ५-६ इञ्च लम्बी, चिपटी एवं गोलाकार होती है। बीज-भूरे वर्ण के रोमावृत अनेक बीज होते हैं। इसके काण्ड को काटने से दुग्ध रहता है। १. स्नाने पाने च मतः तस्याष्टमक्षाश्ममारस्य (च. चि. अ. ७-९५)। दूष्योदरिणं तु प्रत्याख्याय शुद्धकोष्ठन्त मद्येन अश्वमारकगुंजाकाकादनी मूलकल्कं पाययेत् इक्षुकाण्डानि वा (सु. चि. अ. १४-८)। तिलापामार्गकदलीपला-शयववल्कजः । क्षारः पेयोऽविमूत्रेण शर्करानाशनः परः। पाटलाकरवीराणां क्षारमेवं समाचरेत् (सु. चि. अ. ७-२२-२३)।

४९० भावप्रकाशनिघण्टुः इसके सभी भाग विषैले होते हैं। जानवर इसको नहीं खाते। आत्मघात, परहत्या एवं गर्भपात आदि के लिये इसके जड़ को खाते हैं। इसके पुष्प शिवजी को चढ़ाये जाते हैं। इसके मूलत्वक् एवं पत्र का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसके मूल में नेरिओडोरिन (Neriodorin) नामक जल में अविलेय तथा नेरिओ डोरेन (Neriodorein) नामक जल में विलेय ये दो कडुवे पदार्थ पाये जाते हैं जो हृदय के लिये अत्यन्त विषैले होते हैं। इसके अतिरिक्त इसमें उड़नशील तैल, कषायाम्ल, मोम, डिजिटेलिन के सदृश नेरिन (Neriene) नामक रवेदार पदार्थ एवं रोसेजिनीन (Rosaginine) नामक ग्लूकोसाइड ये पदार्थ पाये जाते हैं। इसके पत्तों में ओलिएण्ड्रन (Oleandrine) नामक क्षाराम्र, सूडोफ्युरारीन (Pseudocurarine) नामक ग्लूकोसाइड एवं नेरीन तथा नेरिएण्टाइन (Neriantine) ये द्रव्य पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-यह उष्ण, चक्षुष्य, ज्वरहर, शोथघ्न, हृदय के लिये घातक एवं कुष्ठ, कण्डू, नेत्रप्रकोप, त्वग्रोग तथा व्रण के लिये लाभदायक है। यह सब प्राणियों के लिये विषैला है। अल्प मात्रा में इसके मूल की क्रिया हृदय पर पीत कनेर की तरह होती है। मूल तीव्र मूत्रल एवं डिजिटेलिस् तथा स्ट्रोफॅन्थस् के सदृश हृदय के लिये बलदायक है। पीत कनेर की अपेक्षा यह अधिक तीव्र है। ओलिएण्ड्रिन के सूचिकाभरण से हृदय की गति १०-१२ तक प्रतिमिनट कम हो जाती है जो स्वस्थवस्था में ७२-८० तक रहती है। यदि इसको और देते रहें तो हृदय एवं श्वसन दोनों की क्रिया बन्द हो जाती है। इसका आन्तरिक प्रयोग बहुत सावधानी के साथ करना चाहिये। (१) अल्प मात्रा में हृद्रोग एवं तज्जन्य जलोदर में इसका बहुत सावधानी के साथ प्रयोग करने से मूत्रोत्सर्ग होकर जलोदर कम होता है। इसे खाली पेट नहीं देना चाहिये। अधिक मात्रा से शीत आकर नाड़ी की गति बहुत कम हो जाती है, आक्षेप आते हैं एवं हृदयं तथा श्वसन क्रिया बन्द पड़ती है। (२) सर्पदंश में इसकी जड़ की छाल १-२ रत्ती की मात्रा में या १-२ पत्ते थोड़े-थोड़े अन्तर से देते हैं। इतनी अधिक मात्रा से वमन तथा एकाध दो पाखाना हो जाता है। ज्यादा से ज्यादा यह ६ माशे तक दिया जाता है। (३) इसकी जड़ की छाल एवं पत्तों का बाह्य प्रयोग ही अधिक किया जाता है। त्वग्रोग, व्रणशोथ, कुष्ठ, कण्डू, शुष्क एवं पपड़ी युक्त त्वचा के विकारों में इसके मूल को तैल में पकाकर उस तैल की मालिश करते हैं। शोथ में पत्ते के क्वाथ से सेंकते हैं। व्रण, अर्श, कुष्ठ, दाद तथ चकत्ता आदि पर इसकी जड़ को गोमूत्र में घिसकर लगाने से शोथ एवं पीड़ा कम होती है। अधिक दीर्घ व्रण में इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये अन्यथा इसमें के सत्व का शोषण होकर तीव्र विषैले सार्वदैहिक परिणाम हो सकते हैं। उपदंशजन्य व्रण पर इसके मूल को जल में घिसकर लगाने से वेदना कम होती है एवं इसी प्रकार इसके पत्तों के क्वाथ से प्रक्षालन करने से भी लाभ होता है। इसके पंचांग के स्वरस से सिद्ध तैल का व्यवहार पामा, कण्डू आदि त्वचा के रोगों में किया जाता है। नेत्रकोष में कोमल पत्तों को तोड़ने से प्राप्त रस को डालने से लाभ होता है। पलित में इसके दूध में पीसकर लगाने से लाभ होता है। मात्रा-मूलत्वक चूर्ण १/८-१ रत्ती। ३२. कनेर (पीत) हिं०-पीला कनेर। बं०-कल्केफुल, कोलका फूल। म०-पिंवली कणहेर। गु०-पीली करेण। ता०- पच्चैअलर। ते०-पच्चागत्रेरु। अं०-Yellow oleander (यलो ओलिएण्डर); Exile Tree (एक्साइल् ट्री); Lucky nut (लकी नट)। ले०-Thevetia neriifolia Juss. (थिवेटिआ नेराइफोलिआ जस्.)। Fam. Apocynaceae (एपोसाइनेसी)। यह प्रायः सभी प्रान्तों में पाया जाता है। उष्ण प्रदेशों में यह अधिक होता है। यह अमेरिका का आदिवासी है परन्तु अब भारत में सर्वत्र फैल गया है। इसके पुष्पों के लिये यह बगीचों में लगाया जाता है।

गुडूच्यादिवर्गः ४९१ इसका क्षुप-सदाहरित, सुन्दर एवं करीब १२ फीट ऊँचा होता है। पत्ते-रेखाकार-भालाकार, चमकीले एवं नुकीले होते हैं। फूल-घंटाकृति, पीतवर्ण के, किञ्चित् गन्धयुक्त, पाँच दलवाले तथा शाखाओं के अग्र पर होते हैं। फल-गोल, कच्ची अवस्था में हलके हरे रंग का तथा पकने पर भूरे रंग का १ १/२-२ इञ्च व्यास का होता है जिसके अन्दर एक विशिष्ट त्रिकोणाकृति गुठली होती है। बीज-गुठली के अन्दर हलके पीतवर्ण के २ बीज रहते हैं। इसके प्रत्येक भाग से दुग्ध निकलता है। इसके बीज अत्यन्त विषैले होते हैं तथा आत्महत्या, परहत्या एवं गर्भपात आदि के लिये प्रयोग किये जाते हैं। जानवरों के लिये भी यह विषैले होते हैं। इसकी छाल का व्यवहार चिकित्सा में किया जाता है। कोमल टहनियों की छाल को खुली हवा में सुखाकर प्रयोग करना चाहिये। सुखाकर रखी हुई छाल कुछ महीनों में निःसत्त्व हो जाती है। रासायनिक संगठन-इसके बीजों के गूदे में ५७% तैल पाया जाता है जिससे एक थिवेटीन नामक रवेदार, श्वेतवर्ण का ग्लूकोसाइड प्राप्त किया गया है। इसके अतिरिक्त इसमें अन्य विषैले तत्त्व भी रहते हैं। इसकी छाल में भी यह पाया जाता है। गुण और प्रयोग-इसकां क्षीर दाहजनक तथा तीव्र विषैला है। इसकी छाल कड़वी, भेदन, प्रभावशाली ज्वरघ्न तथा नियतकालिक-ज्वरप्रतिबन्धक है। छाल की मात्रा अधिक होने से पानी की तरह पतले दस्त एवं वमन होता है। इसके फल से वमन होता है। छाल की क्रिया तीव्र होने के कारण इसको हमेशा कम मात्रा में ही प्रयोग करना चाहिये। बिल्ली में इसके ग्लूकोसाइड के सूचिकाभरण से देखा गया है कि .२ ग्राम प्रति कि. ग्राम की मात्रा में देने से वह दो घण्टे के अन्दर मर जाती है। इसका मुख्य विषैला परिणाम हृदय की मांसपेशियों पर होता है। तीव्र विषैला होने के कारण इसका आन्तरिक प्रयोग बहुत कम किया जाता है। (१) पर्यायिक ज्वर में इसकी छाल का टिंक्चर (५ में १) १०, १५ बूँद की मात्रा में दिन में ३ बार दिया जाता है। १ रत्ती इसकी छाल का चूर्ण १५ रत्ती सिंकोना के बराबर गुणकारक होता है। १/२ रत्ती घनक्वाथ देने से ज्वर की पारी नहीं आती। ज्वर आने पर फांट का प्रयोग करते हैं। इसको खाली पेट कभी भी प्रयोग न करें। इससे बहुत पसीना होकर शरीर ठंडा होता है। यदि थकावट हो तो उष्ण दुग्ध एवं थोड़ी अच्छी मदिरा देनी चाहिये। (२) हृदयरोग तथा हृदयोदर में इसके प्रयोग से हृदय को बल मिलता है जिससे रुधिराभिसरणक्रिया ठीक होने लगती है। वृक्कों में रक्ताभिसरण अधिक होने से मूत्रोत्सर्ग अधिक होकर उदर कम होता है। इसका यह प्रभाव डिजिटॅलिस् तथा इसी प्रकार कार्य करने वाली अन्य औषधियों जैसे कडू (हेलीबोर नाइग्रम्), श्वेत रक्त कनेर एवं जंगली प्याज आदि की तरह होता है। इस प्रकार की औषधियों का मिश्रण करके नहीं देना चाहिये। इनके साथ स्वेदजनन, मूत्रजनन तथा विरेचन द्रव्यों का प्रयोग किया जा सकता है। मात्रा-टिंक्चर (५ में १) १०-१५ बूँद; घनक्वाथ १/२ रत्ती। अथ धत्तूरः । तस्य नामानि गुणाँश्चाह धत्तूरधूर्त्तधुस्तूरा उन्मत्तः कनकाह्वयः । देवता कितवस्तूरी महामोही शिवप्रियः ।। ८५ ।। मातुलो मदनश्चास्य फले मातुलपुत्रकः । धत्तूरो मदवर्णाग्निवातकृज्ज्वरकुष्ठनुत् ।। ८६ ।। कषायो मधुरस्तिक्तो यूकालिक्षाविनाशकः । उष्णो गुरुर्व्रणश्लेष्मकण्डूकृमिविषापहः ।। ८७ ।। धत्तूर के नाम तथा गुण-धत्तूर, धूर्त्त, धुत्तूर, उन्मत्त, कनकाह्वय (सुवर्ण वाचक सभी शब्द), देवता, कितव, तूरी, महामोही, शिवप्रिय, मातुल और मदन ये सब इसके संस्कृत नाम हैं। इसके फल को 'मातुलपुत्रक' कहते हैं। धतूरा-मद, वर्ण तथा वातकारक एवं जठराग्निवर्धक, ज्वर-कुष्ठ-नाशक, कषाय, मधुर तथा तिक्तरसयुक्त, जूंयें और लीखों को दूर करने वाला, उष्णवीर्य, गुरु तथा व्रण, कफ, खुजली, कृमि एवं विष का नाशक होता है। [८५-८७] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

४९२ भावप्रकाशनिघण्टुः ३३. धतूरा हिं० - धतूर, धतूरा, धातूरा। बं० - धुतुरा, धुत्तूरा। म० - धोत्रां। गु० - धंतूरो, धत्तूरो। पं० - धत्तूर, धत्तूरा। मल० - उन्मं, उन्मत्तं। क० - मदकुणिके। ते० - उम्मेत्त, धुत्तुरम्। ता० - उम्मतई। फा० - तातूरह, तातूरा। अ० - बौजमासम, जौजुल्मासेल। अं० - Datura (दतूरा), Thornapple (थार्नेपल)। Fam. Solamaceae (सोलेनेसी)। नोट - राजनिघण्टु ने इसके श्वेत, नील, कृष्ण, रक्त एवं पीत ये पाँच भेद लिखे हैं तथा उनमें से कृष्ण पुष्पवाला अधिक गुणकारी माना है¹। धन्वन्तरिनिघण्टु एवं इसमें इसके भेदों का उल्लेख नहीं है। चरक में धुत्तूर का उल्लेख नहीं है किन्तु 'कनक' का उल्लेख आया है²। लेकिन टीकाकारों ने कनक के कई अर्थ किये हैं। सुश्रुत ने अलर्कविष में इसका उपयोग लिखा है³। यद्यपि तमक श्वास में इसका बहुत उपयोग होता आ रहा है तथापि प्राचीनों ने इसका उल्लेख नहीं किया है। आधुनिक विद्वानों ने भी इसके कई भेदों का वर्णन किया है। इनके गुणों में विशेष अन्तर नहीं है। पाश्चात्य चिकित्सा में स्ट्रैमोनियम् (राजधतूरा) का उपयोग किया जाता है, जिसके बीज काले होते हैं। यहाँ पर कुछ भेदों का वानस्पतिक वर्णन अलग-अलग किया गया है। किन्तु गुणों में साम्य होने के कारण उनको एक साथ ही लिखा गया है। (क) ले० - Datura stramonium Linn. (दतूरा स्ट्रैमोनियम् लिन.), Datura tatula Linn. (दतूरा टॅटुला लिन.), हिं० - राजधतूरा। यह हिमालय के मन्द कटिबन्ध में काश्मीर से लेकर सिक्किम तक ९००० फीट की ऊँचाई तक, मध्य भारत के पहाड़ी प्रदेश, दक्षिणी एवं अन्य प्रान्तों में भी पाया जाता है। इसका क्षुप - एकवर्षायु तथा करीब २-४ फीट ऊँचा होता है। काण्ड - हरा या जामुनी रंग का काला होता है। पत्ते - अंडाकार, धार पर लहरदार यां गहरे विच्छेदों से युक्त, करीब ७ इञ्च लम्बे, ५ इञ्च चौड़े, हलके हरे रंग के, चिकने (कोमल पत्र-लोमयुक्त) तथा पर्णवृन्त से युक्त होते हैं। इनमें उग्रगन्ध रहती है तथा इनका स्वाद कड़वा एवं अरुचिकारक होता है। पुष्प - श्वेत भूरे या कभी-कभी बैंगनी आभायुक्त, दलपत्र करीब ३-६ इञ्च लम्बे तथा संख्या में ५ रहते हैं। फल - अंडाकार, ऊर्ध्वमुख, चार खण्डों से युक्त तथा कठोर, लम्बे एवं छोटे कंटकों से ढका हुआ, शीर्ष पर चार फाँक में खुलनेवाला एवं इसके आधार पर बाहर और नीचे की ओर मुड़ा हुआ स्थायी प्रवृद्ध बाह्यदल रहता है। बीज - चिपटे, वृक्काकार, करीब ३ मि० मि० लम्बे, २ मि० मि० चौड़े, १ मि० मि० मोटे, काले से भूरे रंग के, खुरदरे, स्वाद में कड़वे, तैलीय एवं अत्यल्प गन्धवाले रहते हैं। दतूरा टॅटुला के क्षुप ऊपर के समान ही होते हैं। इसके काण्ड, पर्णवृन्त एवं पत्तों की प्रधान शिराएँ कुछ लालिमा किये हुए होती हैं एवं दलपत्र ताजी अवस्था में बैंगनीपन लिये हुए नीले रंग के तथा सूखने पर बैंगनी हरे रंग के होते हैं। इसके पत्ते पहले की अपेक्षा कुछ गहरे हरे रंग के होते हैं। इनके बीज, पुष्पयुक्त अग्रभाग एवं पत्तों का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। पाश्चात्य वैद्यक में इसके टिंक्चर एवं शुष्क तथा प्रवाही सत्व का उपयोग किया जाता है। १. सितनीलकृष्णलोहितपीतप्रसवाश्च सन्ति धत्तूराः। सामान्यगुणोपेतास्तेषु गुणाढ्यस्तु कृष्णकुसुमः स्यात्॥ २. च. चि. अ. ७, अ. २३। ३. श्वेतो पुनर्नवाञ्चास्य दद्याद्धत्तूरकायुताम् । (सु. क. अ. ७)

गुडूच्यादिवर्गः ४९३ रासायनिक संगठन-इसके पत्तों एवं पुष्पयुक्त अग्रभाग में क्षाराभ की मात्रा ०.४७-०.६५% होती है जिसमें मुख्यतया हायोसायमीन (Hyoscyamine) एवं अल्पमात्रा में ॲट्रोपीन (Atropine) तथा हायोसीन (Hyoscine) रहते हैं। इसके अतिरिक्त इसमें क्लोरोजेनिक् एसिड (Chlorogenic acid) एवं गहरे रंग का उड़नशील तैल (०.०४५%) पाया जाता है। इसके बीजों में क्षाराभ की मात्रा ०.१-०.५% (औसतन ०.२%) रहती है जिसमें हायोसायमीन अधिक एवं ॲट्रोपीन तथा हायोसीन अल्प रहते हैं। इसमें १५-३०% स्थिर तैल भी होता है। (ख) ले०-Datura metel Linn. (दतूरा मेटल् लिन.)। हिं०-काला धतूरा। यह भारतवर्ष के प्रायः सभी भागों में परती भूमि में पाया जाता है। इसका पौधा-वर्षायु, ३-५ फीट ऊँचा एवं चिकना होता है। पत्ते-अंडाकार-भालाकार, कुछ लहरदार, नोकीले, पर्णवृन्त की तरफ असम, कुछ दन्तुर या खण्डित, ऊपर के दोनों पृष्ठों पर चिकने, पतले, अकेले या युग्म जिसमें से एक बड़ा (७-८ इञ्च) एक छोटा एवं प्रायः ४ इञ्च लम्बे तथा ३ इञ्च चौड़े होते हैं। पुष्प-सीधे एवं ६.५-७ इञ्च लम्बे होते हैं। आभ्यन्तर दल श्वेत, प्रायः बाहर से नीललोहित एवं अन्दर से पीताभ होते हैं। फल-गोलाकार, लटकते हुये, छोटे काँटों से युक्त, १। इञ्च व्यास के एवं इनका स्फुटन अनियमित होता है। बीज-कर्णाकृति, चिपटे, ४-५ मि० मि० लम्बे, ३-४ मि० मि० चौड़े एवं १ मि० मि० मोटे होते हैं। इनका किनारा लहरदार, मोटा तथा ३ धारियों से युक्त होता है। इनकी बाह्य सतह पीताभ, भूरी तथा गड्ढेदार होती है। इनमें गन्ध नहीं होती तथा इनका स्वाद कड़वा होता है। (ग) ले०-Datura innoxia Miller (दतूरा इन्नॉक्सिआ मिलर)। यह यद्यपि मेक्सिओ का आदिवासी है तथापि अपने यहाँ भी अब बहुत उत्पन्न होता है। यह (घ) के समान ही होता है किन्तु यह मृदुरोमश होता है तथा इसके आभ्यन्तर कोश १० कोणों से युक्त होते हैं। इसके फल के काँटें कमजोर होते हैं तथा बीज भूरे रङ्ग के होते हैं। रासायनिक सङ्गठन-(ख) एवं (ग) के पत्तों में क्षाराभ की मात्रा ०.२५-०.५५% रहती है जिसमें मुख्यतया हायोसायमीन एवं अल्पमात्रा में हायोसीन रहता है। ख-के बीजों में हायोसीन ०.२% एवं अल्पमात्रा में हायोसायमीन रहता है। इसके अतिरिक्त राल एवं तैल भी इसमें पाया जाता है। गुण और प्रयोग-धतूरा के पत्ते एवं बीज वेदनाहर, उद्वेष्टननिरोधी, संज्ञानाशक, कासहर, श्वासहर, नियतकालिकज्वरप्रतिबन्धक एवं शोथहर हैं। धतूरे की क्रिया बेलाडोना (Belladona) की तरह होती है किन्तु श्वासनलिकाओं पर इसकी क्रिया अधिक तीव्र होने के कारण उनका अधिक विस्फार होता है। यह ॲसीटिल्कोलीन् (Acetylcholine) के कार्य को रोकता है जिससे श्वासनलिकाओं में रहने वाले प्राणदा (Vagus) नाड़ी के अग्रों का घात होने से श्वासनलिकाओं का विस्फार होता है। कभी-कभी इससे हृदय की गति में अनियमितता आती है। इससे विबन्ध नहीं होता। अधिक मात्रा में यह अत्यन्त तीव्र विष है। कुछ लोगों में यह उन्मादकारक होने के कारण उनके लिये यह वाजीकर है। (१) तमक श्वास में उद्वेष्टन रोकने के लिये इसका बहुत प्रयोग किया जाता है। इसके चूर्ण का धूँआ या इसकी बनी सिगरेट का धूम्रपान इसमें लाभदायक होता है। इसका आन्तरिक प्रयोग भी किया जाता है। धूँए के लिए धतूरा की पत्ती, कलमी सोरा, काले चाय की पत्ती, लोबेलिआ एवं अनीसी का तेल इनसे बना हुआ मिश्रण (पल्ह लोबेलिआ कम्पाउण्ड) मिलता है जिसमें से चाय की चम्मच बराबर चूर्ण को कमरे में जलाते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

४९४ भावप्रकाशनिघण्टुः (२) पारी से आने वाले शीतज्वर में इसके बीज दही के साथ ज्वर आने के पूर्व खिलाते हैं। इससे ज्वरजन्य कष्ट कम होता है। (३) उदरशूल, पित्ताश्मरीशूल एवं वृक्कशूल आदि में वेदनाहर एवं उद्वेष्टननिरोधिरूप में इसका उपयोग करते हैं। (४) शोथ पर इसके पत्तों का लेप करने से वेदना एवं शोथ कम होता है। अंडशोथ, आमवात, सन्धिशोथ, आध्मान, फुफ्फुसावरणशोथ, नाडीशूल एवं गृध्रसी आदि में इसके पत्तों के क्वाथ से सेंक पत्तों का बन्धन या इससे सिद्ध तैल की मालिश की जाती है। इसके पत्तों के स्वरस का भी उपयोग किया जाता है। शोथयुक्त अर्श तथा गुदविदार में इसका मलहम उपयोगी है। अनेक चर्मरोगों में तथा वातिकविकारों में इससे सिद्ध तैल का उपयोग किया जाता है। स्तनशोथ पर हरिद्रा के साथ इसका पोल्टिस बाँधने से शोथ एवं दुग्ध कम होता है। (५) उन्माद, धनुर्वात एवं जलसंत्रास आदि में इसका प्रयोग करते हैं। शोधन—इसके बीजों को दुग्ध से साथ दोलायन्त्र में शोधन कर लेना आवश्यक है। विषपरिणाम—इसके बीजों को ठग लोग दूसरों को बेहोश कर लूटने के लिये अन्नादि के साथ मिलाकर खिला दिया करते हैं या इसकी सिगरेट आदि पिला देते हैं। इससे गले में शुष्कता, चक्कर, चेहरा लाल, आँखों की पुतलियों का विकास, उन्माद, प्रलाप एवं संन्यास ये लक्षण होकर मृत्यु हो सकती है। उन्माद में रोगी काल्पनिक वस्तुओं को पकड़ने जैसी क्रियायें करने लगता है। विषचिकित्सा—वमन, आमाशयप्रक्षालन, उत्तेजक औषधियों का प्रयोग, शीतल जल से छींटा देना एवं कृत्रिम श्वसन करना चाहिये। प्रलाप अधिक होने पर अफीम का उपयोग किया जा सकता है। शर्करा मिश्रित दुग्ध तथा घृत पिलाना भी हितकर है। विनौले की गरी को दुग्ध के साथ पीसकर पिलाते हैं। कपास के पंचांग का क्वाथ, चौलाई की जड़, गिलोय, दही, नींबू का रस इनका उपयोग भी किया जाता है। पाश्चात्य वैद्यक के फाइसोस्टिग्मीन् या पाइलोकार्पिन नाइट्रेट (१/४-१/२ ग्रेन) इनका प्रयोग बहुत सावधानीपूर्वक किया जा सकता है। मात्रा—बीजचूर्ण १/२-१ रत्ती; पत्रचूर्ण १/२-१ १/२ रत्ती; धूम्रपान के लिये पत्रचूर्ण ५-१५ रत्ती; बीज का टिंक्चर (४ में १) ५-१५ बूँद (५ बूँद से प्रारम्भ करें); टिंक्चर स्ट्रैमोनियम् ५-३० बूँद। अथारूषः (अडूसा)। तस्य नामानि गुणाँश्चाह वासको वासिका वासा भिषङ्माता च सिंहिका। सिंहास्यो वाजिदन्ता स्यादाटरूषोऽटरूषकः॥८८॥ अटरूपो वृषस्ताम्रः सिंहपर्णश्च स स्मृतः। वासको वातकृत्स्वर्यः कफपित्तास्रनाशनः॥८९॥ तिक्तस्तुवरको हृद्यो लघुशीतस्तृडर्त्तिहृत्। श्वासकासज्वरच्छर्दिमेहकुष्ठक्षयापहः॥९०॥ अडूसा के नाम तथा गुण—वासक, वासिका, वासा, भिषङ्माता, सिंहिका, सिंहास्य, वाजिदन्ता, आटरूप, अटरूषक, अटरूष, वृष, ताम्र और सिंहपर्ण ये सब संस्कृत नाम अडूसा के हैं। अडूसा—वातकारक, स्वर उत्तम करनेवाला, तिक्त तथा कषाय-रसयुक्त, हृदय को हितकर, लघु और शीतवीर्य होता है। यह—कफ, पित्त, रक्तकोप (या रक्तपित्त), तृषा, श्वास, खाँसी, ज्वर, वमन, प्रमेह, कुष्ठ एवं क्षय को दूर करता है। [८८-९०] नोट—प्राचीन ग्रन्थों में अडूसा एक ही प्रकार का लिखा है। श्री डॉ० देसाई ने अडूसा, अधाटोडा वासिका (Adhatoda vasica) के अतिरिक्त एक श्वेत (रक्तपुष्प) अडूसा, जस्टिसिआ पिक्टा (Justicia picta) एवं अन्य

गुडूच्यादिवर्गः ४९५ काला अडूसा (नील निर्गुण्डी), जस्टिसिआ जेण्डारुसा (Justicia gendarùssa) इनका वर्णन किया है। केरल देश में अडूसा का अन्य छोटा भेद अधाटोडा बेड्डोमी सी० बी० क्ला० (Adhatoda beddomei C. B. Clarke) का अधिक व्यवहार किया जाता है क्योंकि वह अधिक गुणकारी होता है ऐसा कोट्टयम से प्रकाशित ‘आयुर्वेदिक फ्लोरा मेडिका’ में लिखा हुआ है। उसके पुष्प बिलकुल श्वेत होते हैं। ३४. अडूसा हिं०-अडूसा, अडूस, अरुस, बाकस, बिसोंटा, रूसा, अरुशा। बं.-बासक, बाकस। म०-अडुलसा। मा०- अडुसो। गु०-अरडुसो (सी)। क०-आडुसोगे। ते०- आडा सारं, अडुसरमु। मल०-वलिय आटलोटकम्। ता०-अटतोटै। पं०-भेकर। फा०-वाँसा, ख्वाजा। अ०-हशीशतुस्सुआल। अं०-Malabar nut (मलाबारनट)। ले०-Adhatoda vasica, Nees. (अधाटोडा वासिका नीज)। Fam. Acanthaceae (एकैन्थ्येसी)। यह भारतवर्ष के प्रायः सब प्रान्तों में एवं हिमालय के निचले भागों में ४००० फीट की ऊँचाई तक उत्पन्न होता है। इसका क्षुप-सदाहरित, झाड़ीदार, दुर्गन्धयुक्त, ३-८ फीट ऊँचा एवं प्रायः समूहबद्ध होकर लगता है। काण्ड की गाँठें फूली हुई रहती हैं। पत्ते-५-८ इञ्च लम्बे, १॥-२॥ इञ्च चौड़े, भालाकार, या अंडाकार, दोनों सिरों पर नोकीले, अखण्ड, अत्यन्त सूक्ष्म मृदुरोमश, विशेषकर नये पत्ते एवं १/२-१ इञ्च लम्बे पर्णवृन्त से युक्त होते हैं। पुष्प-श्वेत, विनाल, द्वयोष्ठी एवं १.३ इञ्च लम्बे होते हैं तथा १-३ इञ्च लम्बी मञ्जरियों में पाये जाते हैं जो उपशाखाओं के अग्र पर प्रायः समूहबद्ध रहती हैं। पुष्पों पर २ टेढ़ी बैंगनी धारियाँ होती हैं। इसमें बड़े-बड़े कोणपुष्पक और वृन्तपत्र भी रहते हैं। फली-पौन इञ्च लम्बी, तिहाई इञ्च चौड़ी, मुद्रराकार, लम्बाई में धारीदार मृदुरोमश एवं ४ छोटे बीजों से युक्त होती. है। इसके पत्तों से एक प्रकार का पीला रंग निकलता है। इसके पत्र, पुष्प एवं मूलत्वक् का व्यवहार चिकित्सा में किया जाता है। मूलत्वक् पुराने क्षुप की लेनी चाहिये। रासायनिक संगठन-इसके पत्तों में एक कडुवा खेदार क्षाराभ वॅसिसिन (Vasicine, C₁₁ H₁₂ N₂ O) करीब .२५%, अधाटोडिक एसिड, उड़नशील तैल, वसा, राल, शर्करा, गोंद एवं पीत रंजक द्रव्य में पाये जाते हैं। मूलत्वक् में भी क्षाराभ की करीब इतनी ही मात्रा होती है। यह क्षाराभ मद्यसार में घुलनशील, शीत जल में अल्प एवं उष्ण जल में अधिक घुलनशील होता है। यह क्षाराभ हरमल (Peganum harmala) में पाये जाने वाले पेगॅनीन (Peganine) के सदृश होता है। गुण और प्रयोग-अडूसा उत्तेजक, कफनिःसारक, शीतवीर्य, उद्वेष्टननिरोधी, स्वर्य, कृमिघ्न, कुष्ठहर, रक्तपित्तघ्न, श्वासहर, कासहर एवं क्षयघ्न है। इसके पुष्प तिक्त, कटु, ज्वरघ्न, मूत्रजनन, उद्वेष्टननिरोधी एवं शीतल हैं। इसकी मूलत्वक् ज्वरघ्न, मूत्रजनन, कफनिःसारक, नियतकालिक ज्वरहर, कृमिघ्न एवं कोथप्रशमन है। उद्वेष्टननिरोधी गुण मूल एवं पत्र की अपेक्षा पुष्पों में एवं कफनिःसारक गुण पत्तों की अपेक्षा मूल में अधिक रहता है। पत्र स्वेदजनन है। इसका प्रधान गुण कफ को पतला करना एवं आसानी से बाहर निकालना है। अधिक मात्रा में इससे वमन एवं विरेचन होता है। इसमें के क्षाराभ वासिसिन को जानवरों में शिरान्तर्गत सूचिकाभरण से देखा गया कि रक्तसंवहन एवं महास्रोत पर इसका कोई प्रभाव नहीं होता। इससे श्वासनलिकाओं में अल्प किन्तु स्थायी विस्फार होता है.जो ॲट्रोपीन साथ में देने से अधिक हो जाता है। इसमें का कफनिःसारक गुण सम्भवतः मुख्यतया इसमें के उड़नशील तैल के कारण है। इसके पत्ते निम्न श्रेणी के जलाश्रयी जीव, बुरा, पराश्रयी जीवाणु, मच्छर, मक्खी एवं गोजर आदि के लिये विषैले माने जाते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

४९६ भावप्रकाशनिघण्टुः (१) कफविकारों में इसका बहुत प्रयोग करते हैं। नवीन श्वसनीशोथ में इससे आराम मिलता है विशेषकर जब कफ गाढ़ा तथा चिपचिपा होता है। जीर्ण श्वसनीशोथ में इससे खाँसी में आराम मिलता है तथा कफ ढीला होकर आसानी से बाहर निकल जाता है। कफयुक्त प्रलेपक ज्वर में इसका बहुत उपयोग करते हैं। इनमें इसके पुटपाक करके निकाले स्वरस को १/२-१ १/२ तो० की मात्रा में आर्द्रक स्वरस या छोटी पीपल, कुछ सैंधव एवं मधु के साथ देते हैं। श्वास, कास एवं रक्तपित्त में अडूसा, द्राक्षा एवं हर्रा इनका क्वाथ मधु एवं शर्करा के साथ उपयोगी है। नये श्वसनीशोथ में कण्टकारी, जवासा, नागरमोथा, सोंठ एवं अडूसा इनका क्वाथ उपयोगी है। बच्चों के कफविकारों में इसके स्वरस के साथ टंकण देते हैं। वासावलेह का भी अच्छा उपयोग होता है। (२) राजयक्ष्मा में हाथ-पैर आदि में जलन, ज्वर एवं ऊर्ध्वग रक्तपित्त होने पर वासाघृत (च० चि० अ० ८) का उपयोग किया जाता है। इसमें पत्रस्वरस, वंशलोचन, तालीसपत्र, कोहड़े का रस एवं मधु भी दिया जाता है। नवीन प्रयोगों से देखा गया है कि राजयक्ष्मा में इसका कोई प्रभाव नहीं है। केवल इससे वातनाडियों पर शामक प्रभाव के कारण एवं कफ के पतला होने से खाँसी में आराम मिलता है। (३) तमकश्वास में इसके पत्तों का धूम्रपान लाभदायक है। इसके साथ धतूरे के पत्र का उपयोग करने से जल्दी गुण होता है। इसका आंतरिक प्रयोग भी किया जाता है। इससे सिद्ध घृत का प्रयोग करते हैं। यह तमकश्वास के आवेग को बन्द करने में समर्थ नहीं है। (४) रक्तपित्त में इसका स्वरस मधु के साथ देते हैं। इसके फूलों के गुलकंद तथा पत्र चूर्ण का भी उपयोग किया जाता है। वासाघृत (च० चि० अ० ४) मधु के साथ सेवन करने से रक्तपित्त जल्दी रुकता है। (५) मलेरिया में इसके पत्तों के चूर्ण या मूलत्वक्चूर्ण का उपयोग करते हैं। (६) आध्मान, अतिसार एवं प्रवाहिका में इसका स्वरस दिया जाता है। इससे आंत्रस्थ जीवाणुओं का नाश होता है एवं अन्न का सड़न रुकता है। (७) आमवातिक संधिशोथ, शोथ एवं नाड़ीशूल आदि में पत्तों का पोल्टिस लगाया जाता है। (८) त्वचा के रोगों में इसका रस पिलाते हैं तथा इसके पत्तों का लेप एवं क्वाथ से स्नान आदि कराते हैं। (९) जंतुघ्न होने के कारण इसके पत्तों को जल में रखने पर जल खराब नहीं होता। इसके पत्तों में फल बाँध कर रखने से फल सड़ता नहीं। इसका मद्यसारीय अर्क मक्खी, पिस्सू एवं मच्छर आदि के लिये घातक होता है। खेत में इसके पत्तों का खाद देने से इनमें रोग नहीं होते। ऊनी कपड़ों में इसके पत्ते रखने से कीड़े नहीं लगते। मात्रा-पत्रचूर्ण १-२ माशा, स्वरस १/२-१ १/२ तोला, मूलत्वक् ४ र०-१ माशा, पुष्प ५-१० र० क्वाथ १- २ तो०। ३५. रक्तपुष्प अडूसा ले०-Justicia picta Linn. (जस्टिसिआ पिक्टा लिन.)। Fam. Acan-thaceae (एकैन्थ्येसी)। यह बागों में लगाया हुआ मिलता है। इसके क्षुप बड़े होते हैं। इसके पत्ते दीर्घवृत्ताकार, ३-८ इञ्च बड़े, गहरे रंग के एवं इन पर सफेद छींटे रहते हैं। इसके काण्ड की गाँठें फूली हुई और रक्ताभ होती है। इसमें गहरे लाल वर्ण के पुष्प आते हैं। गुण और प्रयोग-इसके गुण अडूसा के समान ही होते हैं किन्तु इसमें स्नेहन एवं शोथघ्न ये गुण अधिक हैं। बच्चों के गले में जब कफ से घुरघुराहट होती है तब इसके पत्तों का पुटपाक करके निकाला स्वरस एवं टंकणक्षार देते

गुडूच्यादिवर्गः ४९७ हैं। इसको मधु एवं छोटी पीपल के साथ भी दिया जाता है। दुग्ध के कारण स्तन में शोथ होने पर या अन्य स्थान में शोथ होने पर इसके पत्तों को नारियल के रस में पीसकर बाँधने से सूजन कम होती है। मात्रा—बच्चों में १०-२० बूँद स्वरस मधु एवं छोटी पीपल के साथ। ३६. काला अडूसा सं०-नीलनिर्गुण्डी ? हिं०-काला अडूसा, नील निर्गुण्डी। बं०-जगतमदन, मामलक। म०-काला अडूलसा, कालोशंबालू। बंब०-वाकस। ता०, मल०-करुनोचचि। ते०-नल्लनोचिलि। ले०-Justicia gendarussa Burm. (जस्टिसिआ जेण्डारुसा बर्म)। Fam. Acanthaceae (एकैन्थेसी)। इसके क्षुप बागों में रास्ते के किनारों पर लगाये जाते हैं। इसके क्षुप-२-४ फी ऊँचे होते हैं। काण्ड-कभी-कभी धारीदार होते हैं। पत्ते-३-५ इञ्च लम्बे, पासवत् या रेखाकार प्रासवत्, चिकने एवं १/४ इञ्च लम्बे पर्णवृन्त से युक्त होते हैं। पुष्प-बरसात में श्वेतवर्ण के पुष्प अवृन्त काण्डज क्रम में निकले रहते हैं। पुष्पों के अन्दर जामुनी रंग के चिह्न रहते हैं। बीजकोष १/२ इञ्च, सूक्ष्म, लोमयुक्त तथा ४ बीजों से युक्त होता है। इसके पत्तों में मनोहर गन्ध आती है। इसके पत्तों का स्वरस चिकित्सा में उपयोग में लाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह उष्ण, ज्वरघ्न, कफनिःसारक, वामक एवं रेचन है। यह वनस्पति अत्यन्त तीव्र होती है इसलिये बाल एवं वृद्ध में इसका उपयोग नहीं करना चाहिये। इससे वमन एवं विरेचन होने लगता है। इसके प्रयोग के समय चावल की माँड़ घृत डालकर देनी चाहिये। (१) फुफ्फुस के विकारों में इसका प्रयोग करते हैं। तीव्र कफविकारों में इसके २-४ पत्ते एवं अपामार्ग की राख १/८ तो०, एक तोला मधु के साथ देते हैं। न्युमोनिया (Pneumonia) में चार पत्तों का रस, सहेजन की छाल का रस एवं सामुद्र नमक मधु के साथ देते हैं। (२) ज्वर एवं आमवात में इससे पसीना निकलता है। आमवात में इसके पत्तों के क्वाथ से सेकने से आराम मिलता है। (३) इसका रस सरसों के तेल के साथ पिलाने से वमन होता है। (४) इसके रस को तैल में मिलाकर गाँठों पर लगाया जाता है। अथ पर्पटः (पित्तपापड़ा) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह पर्पटो वरतिक्तश्च स्मृतः पर्पटकश्च सः। कथितः पांशुपर्यायस्तथा कवचनामकः ।।९१।। पर्पटो हन्ति पित्तास्रभ्रमतृष्णाकफज्वरान् । संग्राही शीतलस्तिक्तो दाहनुद्वातलो लघुः ।।९२।। पित्तपापड़ा के नाम तथा गुण-पर्पट, वरतिक्त, पर्पटक, पांशुपर्याय ('पांशु' वाचक सभी शब्द इसके पर्यायवाची हैं) एवं कवचनामक ('कवच'वाची सभी शब्द इसके पर्यायवाचक हैं) ये सब संस्कृत नाम 'पित्तपापड़ा' के हैं। पित्तपापड़ा-संग्राही, शीतवीर्य, तिक्तरसयुक्त, दाह को दूर करने वाला, वातकारक और लघु होता है एवं यह पित्त, रक्तदोष, भ्रमरोग, तृषा, कफ और ज्वर इन सबों को नष्ट करता है। [९१-९२] नोट-पित्तपापड़ा के नाम से विभिन्न प्रान्तों में भिन्न-भिन्न वर्गों की वनस्पतियों का एवं उनके उपभेदों का उपयोग किया जाता है इस कारण इसके लेटिन नामों में पर्याप्त विभिन्नता पाई जाती है। जिन द्रव्यों का प्रयोग किया जाता है उनमें उपर्युक्त शास्त्रीय गुणों में से कुछ-न-कुछ पाये जाते हैं। अन्य निघण्टुओं में भी उपर्युक्त प्रकार के ही गुण लिखे हैं। चरक मे तृष्णानिग्रहण गण में इसका पाठ है एवं रक्तपित्त, ज्वर, कुष्ठ, संग्रहणी, पांडु एवं अतिसार आदि में इसका उपयोग किया गया है। ३५ भाव.I

४९८ भावप्रकाशनिघण्टुः विभिन्न ग्रन्थों में निम्नलिखित विभिन्न वनस्पतियों का पर्पट नाम से उल्लेख है :— (१) Oldenlandia corymbosa, Linn. Fam.; Rubiaceae (ओल्डेन्लेण्डिआ कोरिम्बोसा, लिन. रुबिएसी), बं०-खेतपापड़ा। इसका बंगाल में अधिक व्यवहार किया जाता है। श्रीयुत यादवजी ने अपनी पुस्तक में जो नव्य मत दिया है उसे श्री डॉ० देसाई ने इसी वर्ग के हेडिओटिस् बाइफ्लोरा (Hedyotis biflora) के अन्तर्गत किया है। लेकिन डॉ० देसाई ने इसका बंगाली नाम खेतपाप्रा ही लिखा है। श्री डॉ० चोपरा ने खेतपाप्रा का नाम ओ० बाइफ्लोरा, लिन. (O. biflora, Linn.) लिखा है। श्री बापालालजी की पुस्तक में हे० बर्मानिआना (H. burmanniana) का भी उल्लेख है। इन उपर्युक्त नामों से ऐसा मालूम होता है कि ये या तो एक दूसरे के पर्याय हों या एक ही वनस्पति के उपभेदों में से हों। (२) Fumaria indica, Pugsley; Fam. Fumariaceae (फ्युमेरिया इण्डिका, पग्सले, फ्युमेरिएसी), हिं-शाहतराभेद—यह शाहतरा, फ्यु० ऑफिसिनॅलिस् (Fumaria officinalis) का भेद है। इन दोनों का व्यवहार पंजाब, सिंध, राजपुताना, उत्तर प्रदेश और बिहार के वैद्य पर्पट नाम से करते हैं ऐसा श्री यादवजी ने लिखा है। (३) Polycarpea corymbosa, Lam.; Fam. Caryophyllaceae (पॉलिकार्पीआ कोरिम्बोसा, लॅम्, कॅरियोफाइलेसी)। श्री ठा० बलवन्तसिंहजी लिखते हैं कि उत्तर प्रदेश में अनेक स्थानों पर पर्पट के नाम से इसका व्यवहार किया जाता है। (४) (क) Justicia procumbens, Linn.; Fam Acanthaceae (जस्टिसिआ प्रोकम्बेन्स, लिन., एकेन्थेसी)। बम्ब०-घांटी पित्तपापडा। इसे श्री डॉ० चोपरा ने नं० २ का प्रतिनिधि लिखा है। कुछ लोगों ने ज० डिफ्यूजा विल्ड (J. diffusa Wild) को घांटी पित्तपापड़ा माना है। (ख) Rungia repens, Nees.; Fam. Acanthaceae (रंजिआ रिपेन्स, नीज; एकन्थेसी)। श्री यादवजी ने लिखा है कि गुजरात के वैद्य ‘खडसलियो’ नाम से इसका व्यवहार करते हैं। श्री बापालालजी ने नं० ४ (क) को ‘खडसलियो पीतपापडो’ लिखा है। (ग) Rungia parviflora, Nees. (रंजिआ पार्विफ्लोरा, नीज.)—इसका भी ‘खडसलीयो’ नाम से व्यवहार किया जाता है। (घ) Peristrophe bicalyculata Nees.; Fam. Acanthaceae (पेरिस्ट्रोफ बाइकॅलिकुलेटा. नीज. एकेन्थेसी)। श्री डॉ० सखाराम अर्जुन ने ‘बाम्बेड्रग्स’ पुस्तक में इसका ‘घाटीपित्तपापड़ा, नाम से उल्लेख किया है। इसका विशेष वर्णन आगे काकजंघा के अन्तर्गत किया गया है। (५) Glossocardia linearifolia, Cass.; Fam. Compositae (ग्लॉसो-कार्डिआ लिनिएरिफोलिआ, कॅस; कॉम्पोझिटी)। श्री डॉ० देसाई ने इसका ‘पूना’ का नाम पित्तपापडा दिया है तथा अन्य प्रान्तों में भी कहीं-कहीं इसका पित्तपापड़ा के स्थान पर व्यवहार किया जाता है। (६) Mollugo stricta, Linn.; Fam. Ficoidaceae (मोल्युगो स्ट्रिक्टा, लिन.; फिको इडीसी)। श्री डॉ० देसाई ने इसका संस्कृत नाम ‘पर्पटका’ लिखा है। ३७. पर्पट (१) सं०-क्षेत्रपर्पट, पर्पट। हिं०-दमनपापड़ा। बं०-खेतपापड़ा। म०-परिपाठ, पापटी। गु०-परपट। ता०- पर्पदागम। ते०-वेरिनेल्लावेमु। गोआ-पोपटी, कड्डरी। ले०-Oldenanldia corymbosa Linn. (ओल्डेन्लेण्डिआ कोरिम्बोसा लिन.); Fam. Rubiaceae (रुबिएसी)।

गुडूच्यादिवर्गः ४९९ यह भारतवर्ष के प्रायः सभी भागों में ६००० फीट की ऊँचाई तक होता है। इसके क्षुप गीले स्थानों एवं सूखे धान के खेतों में पाये जाते हैं। इसका क्षुप-वर्षायु, ३-१५ इञ्च ऊँचा, अनेक शाखाओंवाला, प्रसरणशील, प्रायः चिकना या कभी-कभी मृदुरोमश होता है। पत्ते-रेखाकार, रेखाकार-भालाकार या पतले लम्बे परन्तु अंडाकार प्रासवत् एवं .५-२ इञ्च लम्बे होते हैं। पुष्प-सूक्ष्म, प्रायः दो-दो एक साथ और सफेद होते हैं। फली-गोलाकार एवं चिकनी होती है। बीज-हलके भूरे रंग के एवं कोणयुक्त होते हैं। इसके तथा इसके अन्य उपभेदों के ताजे अथवा सुखाये हुये पौधे का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। बंगाल के वैद्य पर्पट के नाम से इसका प्रयोग करते हैं। रासायनिक संगठन-इसके पंचांग में दो समान प्रकार के क्षाराभ बाइफ्लोरीन एवं बाइफ्लोरोन (Biflorine and Biflorone) तथा एक रंजित द्रव्य ये पदार्थ पाये जाते हैं। क्षाराभ की मात्रा शुष्क पौधे के वजन के अनुपात में ०.१२% तक रहती है। इसकी राख में सोडियम्, पोटैशियम् एवं कॉल्शियम के क्षार विशेषकर क्लोराइड पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-खेतपापड़ा, शीतल, ज्वरघ्न, दाहशामक, कफघ्न, तिक्तपौष्टिक एवं अल्प स्तम्भन है। इसका उपयोग ज्वर, यकृद्विकार, कामला एवं कृमि में किया जाता है। (१) पित्त तथा वातप्रधान ज्वर में इसका बहुत उपयोग किया जाता है। अर्धविसर्गी ज्वर एवं जीर्ण मलेरिया में इसका क्वाथ दिया जाता है। इससे शरीर का दाह, तृष्णा, आमाशयिक प्रक्षोभ, भ्रम एवं सुस्ती आदि दूर होती है तथा पसीना एवं पेशाब अधिक होती है। पित्तज्वर में इसके साथ 'शाहतराभेद' का उपयोग करते हैं। सन्ततज्वर में वमन, विरेचन, भ्रम एवं शरीर में शिथिलता आदि लक्षण होने पर इसके साथ हंसराज, ब्राह्मी, चन्दन, विरेचन, भ्रम एवं शरीर में शिथिलता आदि लक्षण होने पर इसके साथ हंसराज, ब्राह्मी, चन्दन, खस, नागरमोथा, गुडूच एवं हरी चाय का क्वाथ बनाकर पिलाते हैं। खेतपापड़ा, गुडुच, नागरमोथा, चिरायता एवं घोडवच इनका पंचभद्र नामक क्वाथ सब प्रकार के ज्वरों में दिया जाता है। दाहशान्ति के लिये चन्दन एवं इसका लेप किया जाता है। इसके स्वरस को हाथ-पैर की जलन में लगाते हैं। (२) क्षेत्रपर्पट, रोमान्तिका (Measles) के लिए बिल्कुल निश्चित औषध मानी जाती है। (३) गले एवं श्वासनलिका की सूजन में इसके धूम्रपान से कफ ढीला होकर शीघ्र गिरने लगता है। तमकश्वास, में छोटी पीपल, मुलेठी एवं क्षेत्रपर्पट मधु के साथ देते हैं तथा इससे थोड़ा धूम्रपान भी कराते हैं। मात्रा-२ से ८ माशा। ३८. पर्पट (२) हिं०-शाहतराभेद, पित्तपापड़ा, धमगजरा। बं०-वनशुल्फा। म०-पित्तपापड़ा, शातरा। गु०-पित्तपापड़ा। ता०-तुरा। ते०-चाटराशि। अ०-शाहतरज। फा०-शाहतर। ले०-Fumaria indica Pugsley (फ्युमेरिआ इण्डिका, पग्सले); Fam. Fuma-riaceae (फ्युमॅरिएसी)। यह पंजाब, दिल्ली, चित्तौड़ एवं खानदेश तथा अन्य सभी प्रान्तों में गेहूँ के खेतों में जाड़े के दिनों में पाया जाता है। इसका क्षुप-(क्षुद्र वनस्पति) अनेक शाखाओं वाला स्वावलम्बी या प्रसरणशील एवं ½-१ फुट ऊँचा होता है। पत्ते-गाजर के पत्ते के समान बहु विभक्त होते हैं। पुष्प-श्वेताभ या गुलाबीलाल, सिरे पर जामुनी रंग के और .२- ३ इञ्च लम्बे होते हैं। पुष्प के बाह्यदल दो, आभ्यन्तर दल २-२ और इनमें बाहरवाले नीचे की ओर चोंचदार, भीतर

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५०० भावप्रकाशनिघण्टुः के दोनों ऊपर की ओर संयुक्त, पुंकेशर ६, तीन-तीन एक साथ मिले हुए रहते हैं। फल-गोलाकार और बीज छोटे होते हैं। इसके पंचांग का उपयोग किया जाता है। शाहतरा-नामक फारस से आने वाला द्रव्य इसी की दूसरी जाति फ्यु. ऑफिसिनॅलिस् लिन. (F. officinalis Linn.) से प्राप्त होता है। यह स्वाद में कड़ुआ, कुछ तीता एवं कषाय रहता है। भारतीय की अपेक्षा फारसी शाहतरा अधिक गुणकारी होता है तथा उसी का अधिक प्रयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-शाहतरा में फ्युमॅरिक् ॲसिड (Fumaric acid) एवं फ्युमेरिन (Fumarine) नामक एक क्षाराभ रहता है। क्षाराभ की मात्रा ६% तक रहती है जिस पर इसके गुण निर्भर हैं। गुण और प्रयोग-शाहतरा स्वेदजनन, मूत्रल, सं्रसन एवं तिक्तपौष्टिक है। इसकी क्रिया 'घांटीपित्तपापड़ा' के समान होता है किन्तु उससे यह अधिक लाभदायक है। इसके पंचांग के क्वाथ का उपयोग ज्वर, प्रतिश्याय, रक्तविकार, गंडमाला, राजयक्ष्मा दण्डाणुजन्य त्वचा के विकार, यकृतपीड़ा, कुष्ठ, उपदंश एवं अन्य त्वचा के विकारों में किया जाता है। कफज्वर में गोल मिरिच के साथ इसका क्वाथ देते हैं। पित्तज्वर में इसका क्वाथ बहुत ही लाभदायक है। प्रतिश्याय आदि में इसका बहुत व्यवहार करते हैं। इससे पसीना होता है, पेशाब अधिक होता है। शरीरपीड़ा कम होती है एवं पाखाना साफ होता है। इसके लिये २ १/२ तोला शाहतरा, वनफशाह १/२ तोला, मिरिच एवं सोंठ १/४ तोला, मुनक्का १ तोला एवं जल १ सेर इनका चतुर्थांश क्वाथ बनाकर ५ तोला दिन में ३-४ बार देते हैं। आंत्रशैथिल्य से उत्पन्न कुपचन में शाहतरा लाभदायक है। मात्रा-क्वाथ २ १/२ से ५ तोला; चूर्ण २ से ७ माशा। ३९. पर्पट (३) हिं०-पित्तपापड़ा प्रतिनिधि । गु०-झीणा पाननो ओखराड़ । ता०-निलैसेदचि । ले०-Polycarpea corymbosa Lam. (पॉलिकार्पिआ कोरिम्बोसा लॅम्) । Fam. Caryophyllaceae (कॅरियोफाइलेसी) । यह प्रायः सब प्रान्तों में पाया जाता है। उत्तर प्रदेश में पूर्वी जिलों में क्वार-कार्तिक महीने में प्रायः बाजरे के खेतों में इसके पौधे उगे हुए मिलते हैं और ग्रामीण पित्तप्रकोप की शान्ति के लिये इसका पित्तपापड़ा के नाम से व्यवहार करते हैं। उत्तर प्रदेश में अनेक स्थानों पर पर्पट के नाम से इसका व्यवहार किया जाता है। छोटा नागपुर तथा सोन के आसपास पथरीली एवं बलुई जमीन में यह पाया जाता है। इसका क्षुप-अनेक शाखाओं से युक्त ३-६ इञ्च ऊँचा एवं कभी १२ इञ्च ऊँचा होता है। शाखाएँ-अत्यन्त कृश, तूलरोमश और सीधी होती है। पत्ते-रेखाकार और अभिमुख होते हैं। पुष्प-रजत वर्ण, बहुत छोटे तथा शीर्षस्थ सघन द्विविभक्त मंजरियों में आते हैं। बाह्यदल भूरे और फल बन जाने पर चमकीले या रजतवर्ण और आभ्यन्तरदल सूक्ष्म एवं रक्तवर्ण के होते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें साबुनसत्त्व पाया जाता है। गुण और प्रयोग-इसका उपयोग सर्पादि के दंश में विषनिवारण के लिये बाह्याभ्यन्तर करते हैं। इसके पत्तों को पीसकर, व्रण, व्रणशोथ एवं फोड़े आदि पर बाँधते हैं। इसके पत्तों का स्वरस राब के साथ कामला में पिलाया जाता है। मात्रा-१-३ माशा। ४०. पर्पट (४) म०-घांटी पित्तपापड़ा। ता०-नेरिपुट्टी। ले०-Justicia procumbens Linn. (जस्टिसिआ प्रोकम्बेन्स लिन.) । Fam. Acanthaceae (एकॅन्थेसी) । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmụ. Digitized by S3 Foundation USA

यह दक्षिण में बरसात के दिनों में अधिक होता है। इसका क्षुप-करीब ९-१० इञ्च ऊँचा होता है। इसके पत्ते-३/४-१ १/२ इञ्च लम्बे, १/४-३/४ इञ्च चौड़े तथा सूक्ष्मरोमावृत होते हैं। फूल-छोटे तथा हलके जामुनी रंग के होते हैं। पुष्पित होने पर इनको उखाड़ कर सुखाकर रखना चाहिये। इसकी गंध हल्लासकारक होती है। इसी वर्ग के अन्य क्षुपों का भी पर्पट नाम से कहीं-कहीं व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें एक कडुआ क्षाराभ पाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह मूत्रल, मृदुविरेचक एवं स्वेदकारक है। कडुए पदार्थों के साथ इसका क्वाथ पित्तज्वर में देने से पसीना होता है, दाह कम होता है, पेशाब अधिक होता है एवं एक दो पाखाना होकर यकृतशोथ एवं यकृत्पीड़ा कम होती है। नेत्राभिष्यन्द में इसके पत्रस्वरस को डालने से लाभ होता है। इसका शाहतरा के स्थान पर प्रयोग किया जाता है। मात्रा-१-३ माशा। J. diffusa Willd. (ज. डिफ्यूजा विल्ड.) के मूल का उपयोग मुंडा जाति के लोग पागलपन में करते हैं। यह राँची, सरकार तथा डेक्कन में होता है। ४१. पर्पट (५) हिं०-सेरी, दांतरीसा। बम्ब०-फत्तरसुबा। पूना-पित्तपापड़ा। ते०-परपलकम्। ले०-Glossocardia linearifolia Cass. (ग्लॉसोकार्डिआ लिनिएरिफोलिआ कॅस्.)। Fam. Compositae (कॉम्पोज़िटी)। यह मध्यभारत, दक्षिण तथा अन्य प्रान्तों में प्रायः चट्टानों के ऊपर पाया जाता है। इसका क्षुप-छोटा, सुन्दर, गंधयुक्त, १-६ इञ्च या कभी-कभी १० इञ्च तक ऊँचा, चिकना तथा अनेक शाखाओं वाला होता है। पत्ते-१-२ बार पञ्चवत्-खण्डित, एकान्तर और खण्ड,रेखाकार होते हैं। पुष्प-छोटे तथा पीले रंग के मुण्डकों (Capitulum) में आते हैं। प्रान्तीय जिह्वाकार पुष्प, स्त्रीपुष्प और प्रायः अकेला रहता है। केन्द्रीय पुष्प उभयलिंग, संख्या में कम और नालाकार होते हैं। अधःपत्रावलि (Involucre) के पत्र बाहर की ओर प्रायः संख्या में तीन और छोटे तथा भीतर के आयताकार, बड़े और धार पर झिल्ली सदृश होते हैं। इसका स्वाद कडुआ एवं गन्ध साधारण सीवा जैसी होती है। इसके पंचांग का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसके मूल में उड़नशील तैल तथा पत्र, पुष्प एवं काण्ड में एक क्षाराभ पाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह स्वेदजनन, ज्वरघ्न एवं गर्भाशयसंकोचक है। इसके गुण पित्तपापड़ा जैसे ही होते हैं किन्तु इसकी क्रिया यकृत् की अपेक्षा गर्भाशय पर अधिक होती है। इसका क्वाथ अन्य सुगंधित पदार्थों के साथ अनार्तव एवं पीड़ितार्तव में दिया जाता है। दाँतों से रक्तस्राव होने पर या दन्तकृमि में इसका उपयोग किया जाता है। मात्रा-१-३ माशा। ४२. पर्पट (६) सं०-पर्पटका। हिं०-तपझाड। बं०-जोलपप्र। ले०-Mollugo stricta Linn. (मोल्युगो स्ट्रिक्टा लिन.)। Fam. Ficoidaceae (फिकोइडिसी)। यह प्रायः सब जगह ऊसर या जोताऊ भूमि में होता है।

।इसका क्षुप-(क्षुद्र वनस्पति) ३-१० इञ्च ऊँचा होता है। शाखायें-अनेक, पतली, नालीदार या कोणयुक्त होती हैं। पत्ते-अभिमुख या चक्राभास क्रम में निकले हुये, .५-१.७ इञ्च लम्बे तथा प्रायः मांसल होते हैं। पुष्प-सूक्ष्म, हरित या श्वेत होते हैं। फल-आयताकार और तीन पक्षवाला होता है। इसका स्वाद कड़वा होता है। इसका साग बनाकर खाते हैं। गुण और प्रयोग-यह दीपन, आनुलोमिक, विषमज्वरहर एवं आर्तवजनन है। प्रसूता को इसकी साग खिलाई जाती है। इससे भूख बढ़ती है, पाखाना साफ होता है तथा आर्तवशुद्धि होती है। विषमज्वर में भी इसे खिलाते हैं।

अथ निम्बः । तस्य नामानि गुणाँश्चाह

निम्बः स्यात्पिचुमर्दश्च पिचुमन्दश्च तिक्तकः। अरिष्टः पारिभद्रश्च हिङ्गुनिर्यास इत्यपि ।।९३।। निम्बः शीतो लघुर्ग्राही कटुपाकोऽग्निवातनुत्¹। अहृद्यः श्रमहृत्तृट्कासज्वरारुचिकृमिप्रणुत्। व्रणपित