भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४९० भावप्रकाशनिघण्टुः इसके सभी भाग विषैले होते हैं। जानवर इसको नहीं खाते। आत्मघात, परहत्या एवं गर्भपात आदि के लिये इसके जड़ को खाते हैं। इसके पुष्प शिवजी को चढ़ाये जाते हैं। इसके मूलत्वक् एवं पत्र का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसके मूल में नेरिओडोरिन (Neriodorin) नामक जल में अविलेय तथा नेरिओ डोरेन (Neriodorein) नामक जल में विलेय ये दो कडुवे पदार्थ पाये जाते हैं जो हृदय के लिये अत्यन्त विषैले होते हैं। इसके अतिरिक्त इसमें उड़नशील तैल, कषायाम्ल, मोम, डिजिटेलिन के सदृश नेरिन (Neriene) नामक रवेदार पदार्थ एवं रोसेजिनीन (Rosaginine) नामक ग्लूकोसाइड ये पदार्थ पाये जाते हैं। इसके पत्तों में ओलिएण्ड्रन (Oleandrine) नामक क्षाराम्र, सूडोफ्युरारीन (Pseudocurarine) नामक ग्लूकोसाइड एवं नेरीन तथा नेरिएण्टाइन (Neriantine) ये द्रव्य पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-यह उष्ण, चक्षुष्य, ज्वरहर, शोथघ्न, हृदय के लिये घातक एवं कुष्ठ, कण्डू, नेत्रप्रकोप, त्वग्रोग तथा व्रण के लिये लाभदायक है। यह सब प्राणियों के लिये विषैला है। अल्प मात्रा में इसके मूल की क्रिया हृदय पर पीत कनेर की तरह होती है। मूल तीव्र मूत्रल एवं डिजिटेलिस् तथा स्ट्रोफॅन्थस् के सदृश हृदय के लिये बलदायक है। पीत कनेर की अपेक्षा यह अधिक तीव्र है। ओलिएण्ड्रिन के सूचिकाभरण से हृदय की गति १०-१२ तक प्रतिमिनट कम हो जाती है जो स्वस्थवस्था में ७२-८० तक रहती है। यदि इसको और देते रहें तो हृदय एवं श्वसन दोनों की क्रिया बन्द हो जाती है। इसका आन्तरिक प्रयोग बहुत सावधानी के साथ करना चाहिये। (१) अल्प मात्रा में हृद्रोग एवं तज्जन्य जलोदर में इसका बहुत सावधानी के साथ प्रयोग करने से मूत्रोत्सर्ग होकर जलोदर कम होता है। इसे खाली पेट नहीं देना चाहिये। अधिक मात्रा से शीत आकर नाड़ी की गति बहुत कम हो जाती है, आक्षेप आते हैं एवं हृदयं तथा श्वसन क्रिया बन्द पड़ती है। (२) सर्पदंश में इसकी जड़ की छाल १-२ रत्ती की मात्रा में या १-२ पत्ते थोड़े-थोड़े अन्तर से देते हैं। इतनी अधिक मात्रा से वमन तथा एकाध दो पाखाना हो जाता है। ज्यादा से ज्यादा यह ६ माशे तक दिया जाता है। (३) इसकी जड़ की छाल एवं पत्तों का बाह्य प्रयोग ही अधिक किया जाता है। त्वग्रोग, व्रणशोथ, कुष्ठ, कण्डू, शुष्क एवं पपड़ी युक्त त्वचा के विकारों में इसके मूल को तैल में पकाकर उस तैल की मालिश करते हैं। शोथ में पत्ते के क्वाथ से सेंकते हैं। व्रण, अर्श, कुष्ठ, दाद तथ चकत्ता आदि पर इसकी जड़ को गोमूत्र में घिसकर लगाने से शोथ एवं पीड़ा कम होती है। अधिक दीर्घ व्रण में इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये अन्यथा इसमें के सत्व का शोषण होकर तीव्र विषैले सार्वदैहिक परिणाम हो सकते हैं। उपदंशजन्य व्रण पर इसके मूल को जल में घिसकर लगाने से वेदना कम होती है एवं इसी प्रकार इसके पत्तों के क्वाथ से प्रक्षालन करने से भी लाभ होता है। इसके पंचांग के स्वरस से सिद्ध तैल का व्यवहार पामा, कण्डू आदि त्वचा के रोगों में किया जाता है। नेत्रकोष में कोमल पत्तों को तोड़ने से प्राप्त रस को डालने से लाभ होता है। पलित में इसके दूध में पीसकर लगाने से लाभ होता है। मात्रा-मूलत्वक चूर्ण १/८-१ रत्ती। ३२. कनेर (पीत) हिं०-पीला कनेर। बं०-कल्केफुल, कोलका फूल। म०-पिंवली कणहेर। गु०-पीली करेण। ता०- पच्चैअलर। ते०-पच्चागत्रेरु। अं०-Yellow oleander (यलो ओलिएण्डर); Exile Tree (एक्साइल् ट्री); Lucky nut (लकी नट)। ले०-Thevetia neriifolia Juss. (थिवेटिआ नेराइफोलिआ जस्.)। Fam. Apocynaceae (एपोसाइनेसी)। यह प्रायः सभी प्रान्तों में पाया जाता है। उष्ण प्रदेशों में यह अधिक होता है। यह अमेरिका का आदिवासी है परन्तु अब भारत में सर्वत्र फैल गया है। इसके पुष्पों के लिये यह बगीचों में लगाया जाता है।