भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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गुडूच्यादिवर्गः ४८९ अथ श्वेतरक्तकरवीरौ । तयोर्नामानि गुणाँश्चाह करवीरः श्वेतपुष्पः शतकुम्भोऽश्वमारकः । द्वितीयो रक्तपुष्पश्च चण्डालो लगुडस्तथा ।। ८२ ।। करवीरद्वयं तिक्तं कषायं कटुकञ्च तत् । व्रणलाघवकृन्नेत्रकोपकुष्ठव्रणापहम् ।। ८३ ।। वीर्योष्णं कृमिकण्डूघ्नं भक्षितं विषवन्मतम् ।। ८४ ।। सफेद और लाल करवीर (कनेर) के नाम तथा गुण-करवीर, श्वेतपुष्प, शतकुम्भ और अश्वमारक ये सब 'सफेद कनेर' के संस्कृत नाम हैं। 'लाल कनेर' के संस्कृत नाम-रक्तपुष्प, चण्डात और लगुड ये सब हैं। दोनों कनेर- तिक्त, कषाय और कटुरसयुक्त, उष्णवीर्य और व्रण में लघुता कारक होते हैं एवम् ये दोनों नेत्रकोप (नेत्रसम्बन्धी रोगविशेष), कुष्ठ, व्रण, कृमि और खुजली को नष्ट करते हैं। यह खा लेने पर विष की भाँति हानिकारक होते हैं। [८२- ८४] नोट-भावप्रकाशकार ने इसके श्वेत एवं रक्त ये दो भेद लिखे हैं। धन्वन्तरिनिघंटु में भी इसके दो भेद मिलते हैं किन्तु राजनिघंटु ने श्वेत, रक्त, पीत एवं कृष्ण ये ४ भेद लिखे हैं। यह अत्यन्त विषैला होने के कारण इसका आंतरिक प्रयोग बहुत कम मिलता है। भावप्रकाश में 'भक्षितं विषवन्मतम्' एवं ध० नि० में 'प्रक्षेपाद्विषमन्यथा' ऐसा लिखने से मालूम होता है कि इसका बाह्य प्रयोग ही अधिक किया जाता था। चरक एवं सुश्रुत में भी कुष्ठ एवं व्रण आदि के लिये इसके प्रयोग मिलते हैं। किन्तु चरक में कुष्ठ के लिये एवं सुश्रुत में अश्मरी और उदर के लिये इसके आन्तरिक प्रयोग भी मिलते हैं।¹ आन्तरिक प्रयोग के समय बहुत सावधानी की आवश्यकता है। आधुनिक विद्वानों ने श्वेत, रक्त एवं पीत इन ३ भेदों का ही उल्लेख किया है। कृष्ण करवीर का उल्लेख नहीं मिलता। श्वेत एवं रक्त करवीर का एक ही लेटिन नाम है। केवल पुष्प वर्ण में भिन्नता है। यहाँ पर श्वेत एवं रक्त का एक साथ तथा उसके पश्चात् पीत करवीर का वर्णन किया गया है। चिकित्सा में श्वेत एवं रक्त करवीर का ही अधिक व्यवहार किया जाता है। ३१. कनेर (श्वेत एवं रक्त) हिं०-कनेर, कन्हल, कनैल, करवीर। बं०-कराबी, करवी। म०-कणहेर। गु०-कणेर, करेण। ता०- अलरी। ते०-कस्तूरिपट्टे, गन्नेस। क०-कणगिलु। मल०-कणावीरम्। संथा०-राजबाहा। पं०-कनिर। अ०- दिल्फी, सम्मुलहिमार। फा०-खरजहरा। अं०-Sweet-scented oleander (स्वीट सेंटेड ऑलिएण्डर), Rooseberry spurge (रूजबेरी स्पर्ज)। ले०-Nerium odorum Soland (नेरियम् ओडोरम् सोलंड)। Fam. Apocynaceae (एपोसाइनेसी)। यह प्रायः सब प्रान्तों में पाया जाता है। दक्षिण एवं उत्तर प्रदेश में यह जंगली होता है। बगीचों में फूलों के लिये यह लगाया हुआ मिलता है। इसका क्षुप-मजबूत, सदा हरित, सीधी शाखाओं से युक्त एवं प्रायः १० फीट से अधिक ऊँचा नहीं होता। पत्ते- ४-६ इञ्च लम्बे, करीब १ इञ्च चौड़े, नुकीले एवं एक साथ ३-३ रहते हैं। फूल-सुगन्धयुक्त, श्वेत, रक्त एवं गुलाबी वर्ण के, करीब १ १/२ इञ्च व्यास के एवं व्यस्त छत्राकार (Salver shaped) होते हैं। फली-करीब ५-६ इञ्च लम्बी, चिपटी एवं गोलाकार होती है। बीज-भूरे वर्ण के रोमावृत अनेक बीज होते हैं। इसके काण्ड को काटने से दुग्ध रहता है। १. स्नाने पाने च मतः तस्याष्टमक्षाश्ममारस्य (च. चि. अ. ७-९५)। दूष्योदरिणं तु प्रत्याख्याय शुद्धकोष्ठन्त मद्येन अश्वमारकगुंजाकाकादनी मूलकल्कं पाययेत् इक्षुकाण्डानि वा (सु. चि. अ. १४-८)। तिलापामार्गकदलीपला-शयववल्कजः । क्षारः पेयोऽविमूत्रेण शर्करानाशनः परः। पाटलाकरवीराणां क्षारमेवं समाचरेत् (सु. चि. अ. ७-२२-२३)।