भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८८ भावप्रकाशनिघण्टुः इसकी लता-मृदु, आरोहणशील और सुन्दर होती है जो झाड़ियों या छोटे वृक्षों के ऊपर चढ़ी हुई पाई जाती है। काण्ड-पतला, कलम जितनी मोटाई का, गोल, मृदु एवं हरे रंग का होता है। यह १।।-२ फीट लम्बी होने पर भूमि की ओर नत हो जाती है किन्तु जब उसे किसी दूसरे वृक्ष का आश्रय मिलता है तब उसके सहारे ८-१० फुट तक ऊँची बढ़ जाती है। यह चौमासे के प्रारंभ में निकलती है और शीतकालके पहले ही सूख जाती है। इसका भौमिक तना हलाकार टेढ़ा, बेलनाकार परन्तु जगह-जगह कुछ संकुचित रहता है। इसी से प्रतिवर्ष इसकी पुनरुत्पत्ति होती है। पत्ते- विषमवर्ती, ३ से ९ इञ्च तक लम्बे, पौन से एक इञ्च तक चौड़े, प्रायः विनाल, लट्वाकार-भालाकार एवं उनके अग्र सूत्राकार होते हैं जिनसे आश्रय को लपेट कर यह बढ़ती है। वर्षा के अन्त में इसमें फूल आते हैं। फूल-व्यास में ३- ४ इञ्च, अधोमुखी और सुन्दर होते हैं। पुष्पनाल-३-६ इञ्च लम्बा और उसका अग्र टेढ़ा होता है। पंखुड़ियाँ-६, लहरदार, नीचे आधार की ओर पीताभ, ऊपर नारंगी लाल और अन्त में पूर्णतः लाल होती हैं तथा जैसे-जैसे इनका विकास होता है वैसे-वैसे इनका रंग भी पीत से रक्त होता जाता है। फलियाँ-वेराव की फलियों के समान होती है। उनमें केराव के आकार के गोल-गोल लाल रङ्ग के बीज होते हैं। कंदों के भेद से कलिहारी दो प्रकार की मानी जाती है। जिसका कन्द लम्बा, गोल, दो भागों में विभक्त अथवा दो लम्बे टुकड़े समकोण के समान जुड़े हुए होते हैं वह पुरुषजाति और जिसका कन्द गोल, किञ्चित् लम्बा एक ही रहता है वह स्त्री जाति कहलाती है। पुरुषजाति की जड़-फूलने के समय संग्रह करनी चाहिये और स्त्रीजाति का कन्द फलने के बाद संग्रह किया जाता है। इसके कन्द (भौमिक तना) का व्यवहार किया जाता है। यह श्वेत, मृदु, मांसल और स्वाद में तिक्त होता है। इसकी गणना सप्त उपविषों में की गई है। यद्यपि यह साधारण मात्रा में विषैला नहीं है। सुखप्रसव एवं अपरापातन के लिये इसके लेप धारण आदि का विधान है। लांगली यह नाक केंवाच के लिये भी आया हुआ है। कुछ लोग भूल से कोस्टस् स्पेसिओसस् (Costus speciosus (Koenn.) Sm.) को लांगली मानते हैं जो वास्तव में केमुक है। शोधन-इसके कन्द को टुकड़े कर चार-पाँच दिन कुछ सैंधव मिश्रित तक्र में भिगोकर गरम जल से धोकर सुखा लेने से इसका विष कम हो जाता है। प्रतिदिन तक्र नया डालना चाहिये। १ दिन गोमूत्र में भिगोकर रखने से भी यह शुद्ध हो जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें दो रालें, कषाय द्रव्य, एक कडुवा विषैला क्षाराभ सुपर्बाइन (Superbine) एवं अन्य क्षाराभ ग्लोरिओसाइन ये द्रव्य पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-यह कटु, उष्ण, दीपन, बल्य, वामक, रेचक, पित्तविरेचक, गर्भघातक एवं कृमिघ्न है। इससे आक्षेप एवं पाचननलिका तथा गर्भाशय का दाह होता है। १-२ रत्ती की मात्रा में इससे भूख एवं शक्ति बढ़ती है। इसका प्रयोग साजाक, त्वग्रोग, बिच्छू एवं सर्पविष, कुष्ठ, अर्श एवं कृमि में किया जाता है। यह गर्भ के लिये हानिप्रद माना जाता है। (१) इसके कंद को कूट कर जल में बहुत देर तक धोते हैं जिससे नीचे पिष्टवत् पदार्थ जमता है। उसका प्रयोग सोजाक में करते हैं। (२) इसके कंद को पीसकर शुष्क त्वग्रोगों में एवं बिच्छू आदि के काटने पर करते हैं जिससे वेदना कम होती है। मात्रा-१-२ रत्ती। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA