भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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गुडूच्यादिवर्गः ४८७ (३) इसके फली के क्वाथ से बाल धोने से जूएँ आदि मरती हैं, रूसी नष्ट होती है तथा केशवृद्धि होती है। क्वाथ में बत्ती डुबोकर बच्चों के गुदा में डालने से पाखाना होकर कंडी निकल जाती है। मात्रा-फली का फांट २-४ तो०। पत्रचूर्ण २-४ माशा। २९. सप्तला-३ (तितली) हिं०-जायची, तितली। संथा०-परवा। बं०-छागल दुपटी, जायची। पं०-कंगी। मद्रा०-तिल्ला-काड। ले०-Euphorbia dracunculoides Lam. (युफोर्बिआ ड्रॅकन्क्युलॉईडिस् लैम्)। Fam. Euphorbiaceae (युफोर्बिएसी)। इसके क्षुप-एकवर्षायु, प्रायः ४-८ इञ्च ऊँचे, चिकने तथा सामान्यतः धूसर वर्ण के होते हैं। इसमें पीताभ क्षीर होता है। शाखायें प्रायः द्विविभक्त क्रम में निकली हुई रहती हैं। पत्ते-अभिमुख (नीचे कुन्तल) अवृन्त, रेखाकार, रेखाकार प्रासवत् या रेखाकार आयताकार और .७-२ इञ्च लम्बे होते हैं। पुष्प-पुष्पाकार व्यूह एकाकी और द्विविभक्त काण्ड के बीच में होते हैं। इसे कुछ लोग यवतिक्ता भी मानते हैं क्योंकि जब आदि के साथ खेतों में ही इसके क्षुप अधिकतर पाये जाते हैं। श्रीयुत् ठा. बलवन्त सिंह जी ने इसे सप्तला या शंखिनी होने की ओर विद्वानों का ध्यान आकृष्ट किया है तथा उनके मत से इसकी सप्तला होने की अधिक सम्भावना है। वास्तविक सुद्घाव (Ruta graveolens Linn; Fam. Rutaceae रूटा-ग्रॅविओलेन्स) के स्थान पर कहीं- कहीं पंसारी इसको बेचते हैं जो गलत है। ग्रामीण इसके बीज तैल को जलाने के काम में लेते हैं। चर्म रोगों में भी यह उपयोगी बतलाया जाता है। अथ कलिहारी। तस्या नामानि गुणाँश्चाह कलिहारी तु हलिनी लाङ्गली शुक्रपुष्प्यपि। विशल्याऽग्निशिखाऽनन्ता वह्निवक्त्रा च गर्भनुत् ।। कलिहारी सरा कुष्ठशोफार्शोव्रणशूलजित् ॥८०॥ सक्षारा श्लेष्मजित्तिक्ता कटुका तुवराऽपि च। तीक्ष्णोष्णा कृमिहल्लघ्वी पित्तलागर्भपातिनी ॥८१॥ कलिहारी के नाम तथा गुण-कलिहारी, हलिनी, लाङ्गली, शुक्रपुष्पी, विशल्या, अग्निशिखा, अनन्ता, वह्निवक्त्रा और गर्भनुत् ये सब संस्कृत नाम 'कलिहारी' के हैं। कलिहारी-दस्तावर, कुष्ठ, शोथ, बवासीर, व्रण तथा शूल को नष्ट करनेवाली, क्षारगुणयुक्त, कफनाशक तथा तिक्त, कटु और कषायरसयुक्त, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, कृमि को दूर करनेवाली, लघु, पित्तजनक तथा गर्भ को गिरानेवाली होती है। [८०-८१] ३०. कलिहारी हिं०-कलिहारी, कलिकारी, करियारी, कलहंस, कलारी, लांगुली, करिहारी। बं०-विषलांगुली, उलटचण्डाल। म०-कललावी, इंदै, लालि, खड्याननाग, नागकरिआ। गु०-कलगारी, दूधियोबछनाग। क०-लांगुलिक। पं०- मलिम, करयारी। मा०-राजारड। ते०-अग्निशिखा, अडविनामी। ता०-कलईपैकिशंगु। मल०-मेशोत्रि, अं०- The glory lily (दि ग्लोरी लिली), Tiger's claws (टाइगर्स क्लॉज)। ले०-Gloriosa superba Linn. (ग्लोरिओजा सुपर्बा लिन.)। Fam. Liliaceae (लिलीएसी)। भारत के प्रायः सभी प्रान्तों के जंगल झाड़ियों में आप ही आप उत्पन्न होती है तथा वर्मा एवं लंका में भी पाई जाती है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA