भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुडूच्यादिवर्गः ४९१ इसका क्षुप-सदाहरित, सुन्दर एवं करीब १२ फीट ऊँचा होता है। पत्ते-रेखाकार-भालाकार, चमकीले एवं नुकीले होते हैं। फूल-घंटाकृति, पीतवर्ण के, किञ्चित् गन्धयुक्त, पाँच दलवाले तथा शाखाओं के अग्र पर होते हैं। फल-गोल, कच्ची अवस्था में हलके हरे रंग का तथा पकने पर भूरे रंग का १ १/२-२ इञ्च व्यास का होता है जिसके अन्दर एक विशिष्ट त्रिकोणाकृति गुठली होती है। बीज-गुठली के अन्दर हलके पीतवर्ण के २ बीज रहते हैं। इसके प्रत्येक भाग से दुग्ध निकलता है। इसके बीज अत्यन्त विषैले होते हैं तथा आत्महत्या, परहत्या एवं गर्भपात आदि के लिये प्रयोग किये जाते हैं। जानवरों के लिये भी यह विषैले होते हैं। इसकी छाल का व्यवहार चिकित्सा में किया जाता है। कोमल टहनियों की छाल को खुली हवा में सुखाकर प्रयोग करना चाहिये। सुखाकर रखी हुई छाल कुछ महीनों में निःसत्त्व हो जाती है। रासायनिक संगठन-इसके बीजों के गूदे में ५७% तैल पाया जाता है जिससे एक थिवेटीन नामक रवेदार, श्वेतवर्ण का ग्लूकोसाइड प्राप्त किया गया है। इसके अतिरिक्त इसमें अन्य विषैले तत्त्व भी रहते हैं। इसकी छाल में भी यह पाया जाता है। गुण और प्रयोग-इसकां क्षीर दाहजनक तथा तीव्र विषैला है। इसकी छाल कड़वी, भेदन, प्रभावशाली ज्वरघ्न तथा नियतकालिक-ज्वरप्रतिबन्धक है। छाल की मात्रा अधिक होने से पानी की तरह पतले दस्त एवं वमन होता है। इसके फल से वमन होता है। छाल की क्रिया तीव्र होने के कारण इसको हमेशा कम मात्रा में ही प्रयोग करना चाहिये। बिल्ली में इसके ग्लूकोसाइड के सूचिकाभरण से देखा गया है कि .२ ग्राम प्रति कि. ग्राम की मात्रा में देने से वह दो घण्टे के अन्दर मर जाती है। इसका मुख्य विषैला परिणाम हृदय की मांसपेशियों पर होता है। तीव्र विषैला होने के कारण इसका आन्तरिक प्रयोग बहुत कम किया जाता है। (१) पर्यायिक ज्वर में इसकी छाल का टिंक्चर (५ में १) १०, १५ बूँद की मात्रा में दिन में ३ बार दिया जाता है। १ रत्ती इसकी छाल का चूर्ण १५ रत्ती सिंकोना के बराबर गुणकारक होता है। १/२ रत्ती घनक्वाथ देने से ज्वर की पारी नहीं आती। ज्वर आने पर फांट का प्रयोग करते हैं। इसको खाली पेट कभी भी प्रयोग न करें। इससे बहुत पसीना होकर शरीर ठंडा होता है। यदि थकावट हो तो उष्ण दुग्ध एवं थोड़ी अच्छी मदिरा देनी चाहिये। (२) हृदयरोग तथा हृदयोदर में इसके प्रयोग से हृदय को बल मिलता है जिससे रुधिराभिसरणक्रिया ठीक होने लगती है। वृक्कों में रक्ताभिसरण अधिक होने से मूत्रोत्सर्ग अधिक होकर उदर कम होता है। इसका यह प्रभाव डिजिटॅलिस् तथा इसी प्रकार कार्य करने वाली अन्य औषधियों जैसे कडू (हेलीबोर नाइग्रम्), श्वेत रक्त कनेर एवं जंगली प्याज आदि की तरह होता है। इस प्रकार की औषधियों का मिश्रण करके नहीं देना चाहिये। इनके साथ स्वेदजनन, मूत्रजनन तथा विरेचन द्रव्यों का प्रयोग किया जा सकता है। मात्रा-टिंक्चर (५ में १) १०-१५ बूँद; घनक्वाथ १/२ रत्ती। अथ धत्तूरः । तस्य नामानि गुणाँश्चाह धत्तूरधूर्त्तधुस्तूरा उन्मत्तः कनकाह्वयः । देवता कितवस्तूरी महामोही शिवप्रियः ।। ८५ ।। मातुलो मदनश्चास्य फले मातुलपुत्रकः । धत्तूरो मदवर्णाग्निवातकृज्ज्वरकुष्ठनुत् ।। ८६ ।। कषायो मधुरस्तिक्तो यूकालिक्षाविनाशकः । उष्णो गुरुर्व्रणश्लेष्मकण्डूकृमिविषापहः ।। ८७ ।। धत्तूर के नाम तथा गुण-धत्तूर, धूर्त्त, धुत्तूर, उन्मत्त, कनकाह्वय (सुवर्ण वाचक सभी शब्द), देवता, कितव, तूरी, महामोही, शिवप्रिय, मातुल और मदन ये सब इसके संस्कृत नाम हैं। इसके फल को 'मातुलपुत्रक' कहते हैं। धतूरा-मद, वर्ण तथा वातकारक एवं जठराग्निवर्धक, ज्वर-कुष्ठ-नाशक, कषाय, मधुर तथा तिक्तरसयुक्त, जूंयें और लीखों को दूर करने वाला, उष्णवीर्य, गुरु तथा व्रण, कफ, खुजली, कृमि एवं विष का नाशक होता है। [८५-८७] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA