भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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४९२ भावप्रकाशनिघण्टुः ३३. धतूरा हिं० - धतूर, धतूरा, धातूरा। बं० - धुतुरा, धुत्तूरा। म० - धोत्रां। गु० - धंतूरो, धत्तूरो। पं० - धत्तूर, धत्तूरा। मल० - उन्मं, उन्मत्तं। क० - मदकुणिके। ते० - उम्मेत्त, धुत्तुरम्। ता० - उम्मतई। फा० - तातूरह, तातूरा। अ० - बौजमासम, जौजुल्मासेल। अं० - Datura (दतूरा), Thornapple (थार्नेपल)। Fam. Solamaceae (सोलेनेसी)। नोट - राजनिघण्टु ने इसके श्वेत, नील, कृष्ण, रक्त एवं पीत ये पाँच भेद लिखे हैं तथा उनमें से कृष्ण पुष्पवाला अधिक गुणकारी माना है¹। धन्वन्तरिनिघण्टु एवं इसमें इसके भेदों का उल्लेख नहीं है। चरक में धुत्तूर का उल्लेख नहीं है किन्तु 'कनक' का उल्लेख आया है²। लेकिन टीकाकारों ने कनक के कई अर्थ किये हैं। सुश्रुत ने अलर्कविष में इसका उपयोग लिखा है³। यद्यपि तमक श्वास में इसका बहुत उपयोग होता आ रहा है तथापि प्राचीनों ने इसका उल्लेख नहीं किया है। आधुनिक विद्वानों ने भी इसके कई भेदों का वर्णन किया है। इनके गुणों में विशेष अन्तर नहीं है। पाश्चात्य चिकित्सा में स्ट्रैमोनियम् (राजधतूरा) का उपयोग किया जाता है, जिसके बीज काले होते हैं। यहाँ पर कुछ भेदों का वानस्पतिक वर्णन अलग-अलग किया गया है। किन्तु गुणों में साम्य होने के कारण उनको एक साथ ही लिखा गया है। (क) ले० - Datura stramonium Linn. (दतूरा स्ट्रैमोनियम् लिन.), Datura tatula Linn. (दतूरा टॅटुला लिन.), हिं० - राजधतूरा। यह हिमालय के मन्द कटिबन्ध में काश्मीर से लेकर सिक्किम तक ९००० फीट की ऊँचाई तक, मध्य भारत के पहाड़ी प्रदेश, दक्षिणी एवं अन्य प्रान्तों में भी पाया जाता है। इसका क्षुप - एकवर्षायु तथा करीब २-४ फीट ऊँचा होता है। काण्ड - हरा या जामुनी रंग का काला होता है। पत्ते - अंडाकार, धार पर लहरदार यां गहरे विच्छेदों से युक्त, करीब ७ इञ्च लम्बे, ५ इञ्च चौड़े, हलके हरे रंग के, चिकने (कोमल पत्र-लोमयुक्त) तथा पर्णवृन्त से युक्त होते हैं। इनमें उग्रगन्ध रहती है तथा इनका स्वाद कड़वा एवं अरुचिकारक होता है। पुष्प - श्वेत भूरे या कभी-कभी बैंगनी आभायुक्त, दलपत्र करीब ३-६ इञ्च लम्बे तथा संख्या में ५ रहते हैं। फल - अंडाकार, ऊर्ध्वमुख, चार खण्डों से युक्त तथा कठोर, लम्बे एवं छोटे कंटकों से ढका हुआ, शीर्ष पर चार फाँक में खुलनेवाला एवं इसके आधार पर बाहर और नीचे की ओर मुड़ा हुआ स्थायी प्रवृद्ध बाह्यदल रहता है। बीज - चिपटे, वृक्काकार, करीब ३ मि० मि० लम्बे, २ मि० मि० चौड़े, १ मि० मि० मोटे, काले से भूरे रंग के, खुरदरे, स्वाद में कड़वे, तैलीय एवं अत्यल्प गन्धवाले रहते हैं। दतूरा टॅटुला के क्षुप ऊपर के समान ही होते हैं। इसके काण्ड, पर्णवृन्त एवं पत्तों की प्रधान शिराएँ कुछ लालिमा किये हुए होती हैं एवं दलपत्र ताजी अवस्था में बैंगनीपन लिये हुए नीले रंग के तथा सूखने पर बैंगनी हरे रंग के होते हैं। इसके पत्ते पहले की अपेक्षा कुछ गहरे हरे रंग के होते हैं। इनके बीज, पुष्पयुक्त अग्रभाग एवं पत्तों का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। पाश्चात्य वैद्यक में इसके टिंक्चर एवं शुष्क तथा प्रवाही सत्व का उपयोग किया जाता है। १. सितनीलकृष्णलोहितपीतप्रसवाश्च सन्ति धत्तूराः। सामान्यगुणोपेतास्तेषु गुणाढ्यस्तु कृष्णकुसुमः स्यात्॥ २. च. चि. अ. ७, अ. २३। ३. श्वेतो पुनर्नवाञ्चास्य दद्याद्धत्तूरकायुताम् । (सु. क. अ. ७)