भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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गुडूच्यादिवर्गः ४९९ यह भारतवर्ष के प्रायः सभी भागों में ६००० फीट की ऊँचाई तक होता है। इसके क्षुप गीले स्थानों एवं सूखे धान के खेतों में पाये जाते हैं। इसका क्षुप-वर्षायु, ३-१५ इञ्च ऊँचा, अनेक शाखाओंवाला, प्रसरणशील, प्रायः चिकना या कभी-कभी मृदुरोमश होता है। पत्ते-रेखाकार, रेखाकार-भालाकार या पतले लम्बे परन्तु अंडाकार प्रासवत् एवं .५-२ इञ्च लम्बे होते हैं। पुष्प-सूक्ष्म, प्रायः दो-दो एक साथ और सफेद होते हैं। फली-गोलाकार एवं चिकनी होती है। बीज-हलके भूरे रंग के एवं कोणयुक्त होते हैं। इसके तथा इसके अन्य उपभेदों के ताजे अथवा सुखाये हुये पौधे का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। बंगाल के वैद्य पर्पट के नाम से इसका प्रयोग करते हैं। रासायनिक संगठन-इसके पंचांग में दो समान प्रकार के क्षाराभ बाइफ्लोरीन एवं बाइफ्लोरोन (Biflorine and Biflorone) तथा एक रंजित द्रव्य ये पदार्थ पाये जाते हैं। क्षाराभ की मात्रा शुष्क पौधे के वजन के अनुपात में ०.१२% तक रहती है। इसकी राख में सोडियम्, पोटैशियम् एवं कॉल्शियम के क्षार विशेषकर क्लोराइड पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-खेतपापड़ा, शीतल, ज्वरघ्न, दाहशामक, कफघ्न, तिक्तपौष्टिक एवं अल्प स्तम्भन है। इसका उपयोग ज्वर, यकृद्विकार, कामला एवं कृमि में किया जाता है। (१) पित्त तथा वातप्रधान ज्वर में इसका बहुत उपयोग किया जाता है। अर्धविसर्गी ज्वर एवं जीर्ण मलेरिया में इसका क्वाथ दिया जाता है। इससे शरीर का दाह, तृष्णा, आमाशयिक प्रक्षोभ, भ्रम एवं सुस्ती आदि दूर होती है तथा पसीना एवं पेशाब अधिक होती है। पित्तज्वर में इसके साथ 'शाहतराभेद' का उपयोग करते हैं। सन्ततज्वर में वमन, विरेचन, भ्रम एवं शरीर में शिथिलता आदि लक्षण होने पर इसके साथ हंसराज, ब्राह्मी, चन्दन, विरेचन, भ्रम एवं शरीर में शिथिलता आदि लक्षण होने पर इसके साथ हंसराज, ब्राह्मी, चन्दन, खस, नागरमोथा, गुडूच एवं हरी चाय का क्वाथ बनाकर पिलाते हैं। खेतपापड़ा, गुडुच, नागरमोथा, चिरायता एवं घोडवच इनका पंचभद्र नामक क्वाथ सब प्रकार के ज्वरों में दिया जाता है। दाहशान्ति के लिये चन्दन एवं इसका लेप किया जाता है। इसके स्वरस को हाथ-पैर की जलन में लगाते हैं। (२) क्षेत्रपर्पट, रोमान्तिका (Measles) के लिए बिल्कुल निश्चित औषध मानी जाती है। (३) गले एवं श्वासनलिका की सूजन में इसके धूम्रपान से कफ ढीला होकर शीघ्र गिरने लगता है। तमकश्वास, में छोटी पीपल, मुलेठी एवं क्षेत्रपर्पट मधु के साथ देते हैं तथा इससे थोड़ा धूम्रपान भी कराते हैं। मात्रा-२ से ८ माशा। ३८. पर्पट (२) हिं०-शाहतराभेद, पित्तपापड़ा, धमगजरा। बं०-वनशुल्फा। म०-पित्तपापड़ा, शातरा। गु०-पित्तपापड़ा। ता०-तुरा। ते०-चाटराशि। अ०-शाहतरज। फा०-शाहतर। ले०-Fumaria indica Pugsley (फ्युमेरिआ इण्डिका, पग्सले); Fam. Fuma-riaceae (फ्युमॅरिएसी)। यह पंजाब, दिल्ली, चित्तौड़ एवं खानदेश तथा अन्य सभी प्रान्तों में गेहूँ के खेतों में जाड़े के दिनों में पाया जाता है। इसका क्षुप-(क्षुद्र वनस्पति) अनेक शाखाओं वाला स्वावलम्बी या प्रसरणशील एवं ½-१ फुट ऊँचा होता है। पत्ते-गाजर के पत्ते के समान बहु विभक्त होते हैं। पुष्प-श्वेताभ या गुलाबीलाल, सिरे पर जामुनी रंग के और .२- ३ इञ्च लम्बे होते हैं। पुष्प के बाह्यदल दो, आभ्यन्तर दल २-२ और इनमें बाहरवाले नीचे की ओर चोंचदार, भीतर

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