भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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५०० भावप्रकाशनिघण्टुः के दोनों ऊपर की ओर संयुक्त, पुंकेशर ६, तीन-तीन एक साथ मिले हुए रहते हैं। फल-गोलाकार और बीज छोटे होते हैं। इसके पंचांग का उपयोग किया जाता है। शाहतरा-नामक फारस से आने वाला द्रव्य इसी की दूसरी जाति फ्यु. ऑफिसिनॅलिस् लिन. (F. officinalis Linn.) से प्राप्त होता है। यह स्वाद में कड़ुआ, कुछ तीता एवं कषाय रहता है। भारतीय की अपेक्षा फारसी शाहतरा अधिक गुणकारी होता है तथा उसी का अधिक प्रयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-शाहतरा में फ्युमॅरिक् ॲसिड (Fumaric acid) एवं फ्युमेरिन (Fumarine) नामक एक क्षाराभ रहता है। क्षाराभ की मात्रा ६% तक रहती है जिस पर इसके गुण निर्भर हैं। गुण और प्रयोग-शाहतरा स्वेदजनन, मूत्रल, सं्रसन एवं तिक्तपौष्टिक है। इसकी क्रिया 'घांटीपित्तपापड़ा' के समान होता है किन्तु उससे यह अधिक लाभदायक है। इसके पंचांग के क्वाथ का उपयोग ज्वर, प्रतिश्याय, रक्तविकार, गंडमाला, राजयक्ष्मा दण्डाणुजन्य त्वचा के विकार, यकृतपीड़ा, कुष्ठ, उपदंश एवं अन्य त्वचा के विकारों में किया जाता है। कफज्वर में गोल मिरिच के साथ इसका क्वाथ देते हैं। पित्तज्वर में इसका क्वाथ बहुत ही लाभदायक है। प्रतिश्याय आदि में इसका बहुत व्यवहार करते हैं। इससे पसीना होता है, पेशाब अधिक होता है। शरीरपीड़ा कम होती है एवं पाखाना साफ होता है। इसके लिये २ १/२ तोला शाहतरा, वनफशाह १/२ तोला, मिरिच एवं सोंठ १/४ तोला, मुनक्का १ तोला एवं जल १ सेर इनका चतुर्थांश क्वाथ बनाकर ५ तोला दिन में ३-४ बार देते हैं। आंत्रशैथिल्य से उत्पन्न कुपचन में शाहतरा लाभदायक है। मात्रा-क्वाथ २ १/२ से ५ तोला; चूर्ण २ से ७ माशा। ३९. पर्पट (३) हिं०-पित्तपापड़ा प्रतिनिधि । गु०-झीणा पाननो ओखराड़ । ता०-निलैसेदचि । ले०-Polycarpea corymbosa Lam. (पॉलिकार्पिआ कोरिम्बोसा लॅम्) । Fam. Caryophyllaceae (कॅरियोफाइलेसी) । यह प्रायः सब प्रान्तों में पाया जाता है। उत्तर प्रदेश में पूर्वी जिलों में क्वार-कार्तिक महीने में प्रायः बाजरे के खेतों में इसके पौधे उगे हुए मिलते हैं और ग्रामीण पित्तप्रकोप की शान्ति के लिये इसका पित्तपापड़ा के नाम से व्यवहार करते हैं। उत्तर प्रदेश में अनेक स्थानों पर पर्पट के नाम से इसका व्यवहार किया जाता है। छोटा नागपुर तथा सोन के आसपास पथरीली एवं बलुई जमीन में यह पाया जाता है। इसका क्षुप-अनेक शाखाओं से युक्त ३-६ इञ्च ऊँचा एवं कभी १२ इञ्च ऊँचा होता है। शाखाएँ-अत्यन्त कृश, तूलरोमश और सीधी होती है। पत्ते-रेखाकार और अभिमुख होते हैं। पुष्प-रजत वर्ण, बहुत छोटे तथा शीर्षस्थ सघन द्विविभक्त मंजरियों में आते हैं। बाह्यदल भूरे और फल बन जाने पर चमकीले या रजतवर्ण और आभ्यन्तरदल सूक्ष्म एवं रक्तवर्ण के होते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें साबुनसत्त्व पाया जाता है। गुण और प्रयोग-इसका उपयोग सर्पादि के दंश में विषनिवारण के लिये बाह्याभ्यन्तर करते हैं। इसके पत्तों को पीसकर, व्रण, व्रणशोथ एवं फोड़े आदि पर बाँधते हैं। इसके पत्तों का स्वरस राब के साथ कामला में पिलाया जाता है। मात्रा-१-३ माशा। ४०. पर्पट (४) म०-घांटी पित्तपापड़ा। ता०-नेरिपुट्टी। ले०-Justicia procumbens Linn. (जस्टिसिआ प्रोकम्बेन्स लिन.) । Fam. Acanthaceae (एकॅन्थेसी) । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmụ. Digitized by S3 Foundation USA