भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 552, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंयह दक्षिण में बरसात के दिनों में अधिक होता है। इसका क्षुप-करीब ९-१० इञ्च ऊँचा होता है। इसके पत्ते-३/४-१ १/२ इञ्च लम्बे, १/४-३/४ इञ्च चौड़े तथा सूक्ष्मरोमावृत होते हैं। फूल-छोटे तथा हलके जामुनी रंग के होते हैं। पुष्पित होने पर इनको उखाड़ कर सुखाकर रखना चाहिये। इसकी गंध हल्लासकारक होती है। इसी वर्ग के अन्य क्षुपों का भी पर्पट नाम से कहीं-कहीं व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें एक कडुआ क्षाराभ पाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह मूत्रल, मृदुविरेचक एवं स्वेदकारक है। कडुए पदार्थों के साथ इसका क्वाथ पित्तज्वर में देने से पसीना होता है, दाह कम होता है, पेशाब अधिक होता है एवं एक दो पाखाना होकर यकृतशोथ एवं यकृत्पीड़ा कम होती है। नेत्राभिष्यन्द में इसके पत्रस्वरस को डालने से लाभ होता है। इसका शाहतरा के स्थान पर प्रयोग किया जाता है। मात्रा-१-३ माशा। J. diffusa Willd. (ज. डिफ्यूजा विल्ड.) के मूल का उपयोग मुंडा जाति के लोग पागलपन में करते हैं। यह राँची, सरकार तथा डेक्कन में होता है। ४१. पर्पट (५) हिं०-सेरी, दांतरीसा। बम्ब०-फत्तरसुबा। पूना-पित्तपापड़ा। ते०-परपलकम्। ले०-Glossocardia linearifolia Cass. (ग्लॉसोकार्डिआ लिनिएरिफोलिआ कॅस्.)। Fam. Compositae (कॉम्पोज़िटी)। यह मध्यभारत, दक्षिण तथा अन्य प्रान्तों में प्रायः चट्टानों के ऊपर पाया जाता है। इसका क्षुप-छोटा, सुन्दर, गंधयुक्त, १-६ इञ्च या कभी-कभी १० इञ्च तक ऊँचा, चिकना तथा अनेक शाखाओं वाला होता है। पत्ते-१-२ बार पञ्चवत्-खण्डित, एकान्तर और खण्ड,रेखाकार होते हैं। पुष्प-छोटे तथा पीले रंग के मुण्डकों (Capitulum) में आते हैं। प्रान्तीय जिह्वाकार पुष्प, स्त्रीपुष्प और प्रायः अकेला रहता है। केन्द्रीय पुष्प उभयलिंग, संख्या में कम और नालाकार होते हैं। अधःपत्रावलि (Involucre) के पत्र बाहर की ओर प्रायः संख्या में तीन और छोटे तथा भीतर के आयताकार, बड़े और धार पर झिल्ली सदृश होते हैं। इसका स्वाद कडुआ एवं गन्ध साधारण सीवा जैसी होती है। इसके पंचांग का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसके मूल में उड़नशील तैल तथा पत्र, पुष्प एवं काण्ड में एक क्षाराभ पाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह स्वेदजनन, ज्वरघ्न एवं गर्भाशयसंकोचक है। इसके गुण पित्तपापड़ा जैसे ही होते हैं किन्तु इसकी क्रिया यकृत् की अपेक्षा गर्भाशय पर अधिक होती है। इसका क्वाथ अन्य सुगंधित पदार्थों के साथ अनार्तव एवं पीड़ितार्तव में दिया जाता है। दाँतों से रक्तस्राव होने पर या दन्तकृमि में इसका उपयोग किया जाता है। मात्रा-१-३ माशा। ४२. पर्पट (६) सं०-पर्पटका। हिं०-तपझाड। बं०-जोलपप्र। ले०-Mollugo stricta Linn. (मोल्युगो स्ट्रिक्टा लिन.)। Fam. Ficoidaceae (फिकोइडिसी)। यह प्रायः सब जगह ऊसर या जोताऊ भूमि में होता है।