भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
यह दक्षिण में बरसात के दिनों में अधिक होता है। इसका क्षुप-करीब ९-१० इञ्च ऊँचा होता है। इसके पत्ते-३/४-१ १/२ इञ्च लम्बे, १/४-३/४ इञ्च चौड़े तथा सूक्ष्मरोमावृत होते हैं। फूल-छोटे तथा हलके जामुनी रंग के होते हैं। पुष्पित होने पर इनको उखाड़ कर सुखाकर रखना चाहिये। इसकी गंध हल्लासकारक होती है। इसी वर्ग के अन्य क्षुपों का भी पर्पट नाम से कहीं-कहीं व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें एक कडुआ क्षाराभ पाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह मूत्रल, मृदुविरेचक एवं स्वेदकारक है। कडुए पदार्थों के साथ इसका क्वाथ पित्तज्वर में देने से पसीना होता है, दाह कम होता है, पेशाब अधिक होता है एवं एक दो पाखाना होकर यकृतशोथ एवं यकृत्पीड़ा कम होती है। नेत्राभिष्यन्द में इसके पत्रस्वरस को डालने से लाभ होता है। इसका शाहतरा के स्थान पर प्रयोग किया जाता है। मात्रा-१-३ माशा। J. diffusa Willd. (ज. डिफ्यूजा विल्ड.) के मूल का उपयोग मुंडा जाति के लोग पागलपन में करते हैं। यह राँची, सरकार तथा डेक्कन में होता है। ४१. पर्पट (५) हिं०-सेरी, दांतरीसा। बम्ब०-फत्तरसुबा। पूना-पित्तपापड़ा। ते०-परपलकम्। ले०-Glossocardia linearifolia Cass. (ग्लॉसोकार्डिआ लिनिएरिफोलिआ कॅस्.)। Fam. Compositae (कॉम्पोज़िटी)। यह मध्यभारत, दक्षिण तथा अन्य प्रान्तों में प्रायः चट्टानों के ऊपर पाया जाता है। इसका क्षुप-छोटा, सुन्दर, गंधयुक्त, १-६ इञ्च या कभी-कभी १० इञ्च तक ऊँचा, चिकना तथा अनेक शाखाओं वाला होता है। पत्ते-१-२ बार पञ्चवत्-खण्डित, एकान्तर और खण्ड,रेखाकार होते हैं। पुष्प-छोटे तथा पीले रंग के मुण्डकों (Capitulum) में आते हैं। प्रान्तीय जिह्वाकार पुष्प, स्त्रीपुष्प और प्रायः अकेला रहता है। केन्द्रीय पुष्प उभयलिंग, संख्या में कम और नालाकार होते हैं। अधःपत्रावलि (Involucre) के पत्र बाहर की ओर प्रायः संख्या में तीन और छोटे तथा भीतर के आयताकार, बड़े और धार पर झिल्ली सदृश होते हैं। इसका स्वाद कडुआ एवं गन्ध साधारण सीवा जैसी होती है। इसके पंचांग का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसके मूल में उड़नशील तैल तथा पत्र, पुष्प एवं काण्ड में एक क्षाराभ पाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह स्वेदजनन, ज्वरघ्न एवं गर्भाशयसंकोचक है। इसके गुण पित्तपापड़ा जैसे ही होते हैं किन्तु इसकी क्रिया यकृत् की अपेक्षा गर्भाशय पर अधिक होती है। इसका क्वाथ अन्य सुगंधित पदार्थों के साथ अनार्तव एवं पीड़ितार्तव में दिया जाता है। दाँतों से रक्तस्राव होने पर या दन्तकृमि में इसका उपयोग किया जाता है। मात्रा-१-३ माशा। ४२. पर्पट (६) सं०-पर्पटका। हिं०-तपझाड। बं०-जोलपप्र। ले०-Mollugo stricta Linn. (मोल्युगो स्ट्रिक्टा लिन.)। Fam. Ficoidaceae (फिकोइडिसी)। यह प्रायः सब जगह ऊसर या जोताऊ भूमि में होता है।
।इसका क्षुप-(क्षुद्र वनस्पति) ३-१० इञ्च ऊँचा होता है। शाखायें-अनेक, पतली, नालीदार या कोणयुक्त होती हैं। पत्ते-अभिमुख या चक्राभास क्रम में निकले हुये, .५-१.७ इञ्च लम्बे तथा प्रायः मांसल होते हैं। पुष्प-सूक्ष्म, हरित या श्वेत होते हैं। फल-आयताकार और तीन पक्षवाला होता है। इसका स्वाद कड़वा होता है। इसका साग बनाकर खाते हैं। गुण और प्रयोग-यह दीपन, आनुलोमिक, विषमज्वरहर एवं आर्तवजनन है। प्रसूता को इसकी साग खिलाई जाती है। इससे भूख बढ़ती है, पाखाना साफ होता है तथा आर्तवशुद्धि होती है। विषमज्वर में भी इसे खिलाते हैं।
अथ निम्बः । तस्य नामानि गुणाँश्चाह
निम्बः स्यात्पिचुमर्दश्च पिचुमन्दश्च तिक्तकः। अरिष्टः पारिभद्रश्च हिङ्गुनिर्यास इत्यपि ।।९३।। निम्बः शीतो लघुर्ग्राही कटुपाकोऽग्निवातनुत्¹। अहृद्यः श्रमहृत्तृट्कासज्वरारुचिकृमिप्रणुत्। व्रणपित
गुडूच्यादिवर्गः ५०३ सुगंधयुक्त फूलों के गुच्छे लगते हैं। फल-करीब १/२ इञ्च खिरनी के समान लम्बाई लिये गोल होते हैं जिसमें एक- एक बीज होते हैं। बीजों को निम्बोली कहते हैं। इसकी छाल से एक स्वच्छ, चमकीला अम्बर के वर्ण का गोंद निकलता है। इसकी छाल करीब १० मि० मि० मोटी, बाहर से भूरे-धूसर वर्ण की, खुरदरी शल्कसम एवं फटी हुई तथा अन्दर से पीताभ, परतदार एवं मोटे रेशों से युक्त होती है। इसकी छाल, मूलत्वक्, पत्र, गोंद, फल, बीज, पुष्प, ताड़ी एवं तैल का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसके काण्डत्वक् में एक कडुवा पदार्थ मार्गोसीन (Margosine), निम्बिडिन (Nimbidin, 0,5%), निम्बिन (Nimbin, C₂₈ H₄₀ O₈, 0.03%), निम्बिनिन् (Nimbinin C₂₇ H₃₀ O₉), निम्बोस्टेरोल् एवं पुष्पों में पाये जाने वाले उड़नशील तैल की तरह एक उड़नशील तैल ये पदार्थ पाये जाते हैं। इसमें करीब ६% टैनिन भी रहता है। इसके बाह्यत्वक् में टैनिन अधिक रहता है तथा अन्तस्त्वक में कडुवे पदार्थ पाये जाते हैं। इसके अन्तस्त्वक् का क्वाथ बनाना चाहिये। इसके पत्तों में भी कडुवा पदार्थ रहता है जो छाल की अपेक्षा कम मात्रा में होते हुए भी जल में अधिक मात्रा में एवं जल्दी घुलता है। इसके बीजों में ३१% तक एक तेल रहता है जो गहरे पीले रंग का, कडुवा, तीता एवं दुर्गन्धयुक्त होता है। इसमें करीब २% कडुवे पदार्थ रहते हैं जिनमें निम्बिन, निम्बिनिन, निम्बिडिन एवं तैल में घुलनशील एक द्रव निम्बिडोल (Nimbidol, 0,6%) ये पाये जाते हैं। इनके अतिरिक्त इस तैल में ओलिक एसिड (Oleic acid, 49-61.9%), लिनोलिक् एसिड (Linoleic acid, 2.12-15%), पामिटिक् एसिड् (Palmitic acid, 12.62-15%), स्टियरिक् एसिड् (Stearic acid, 14.4-21.3%), ॲरॅचिडिक् एसिड् (Arachidic acid, 1.3-1.8%) एवं लिग्नोसेरिक एसिड् (Lignoceric acid, 0.74%) ये रहते हैं। इस तैल के साबुन बनाने लायक भाग से बचे हुए हिस्से में निम्बोस्टेरॉल रहता है। इस तैल में 0.427% गंधक पाया जाता है। इसके तैल से अत्यन्त कडुवा एवं जल में घुलने वाला सोडियम् मार्गोसेट (Sodium margosate, B. C. P. W.) नामक एक लवण बनाया गया है। गुण और प्रयोग-इसके अन्दर की छाल शीतल, कडुवी, पौष्टिक, नियतकालिक-ज्वरप्रतिबन्धक, ग्राही त्वग्दोषहर, कृमिघ्न एवं रसायन है। सम्पूर्ण छाल अधिक ग्राही होती है। त्वचा पर निम्बत्वक् की क्रिया सोमल की तरह होती है। इसका ज्वरघ्न गुण सिंकोना की तरह है। इसकी मूलत्वक् कृमिघ्न (आन्त्रिक) मानी जाती है। इसके पत्ते शोधन, त्वचा के लिये उत्तेजक, त्वग्दोषहर, व्रणशोधक, व्रणरोपक, कृमिघ्न, प्रतिदूषक, यकृतोत्तेजक, कुष्ठहर एवं अधिक मात्रा में वामक होते हैं। इसका तेल उष्ण, वातहर, प्रतिदूषक, व्रणशोधक, व्रणरोपक, उत्तेजक, केश्य, कृमिघ्न, कुष्ठघ्न एवं रसायन है। निम्ब के सभी अङ्गों की अपेक्षा इसका तैल अधिक प्रभावशाली है। (१) नीम की छाल का चूर्ण मलेरिया के लिये बहुत लाभदायक है। शोथयुक्त ज्वर एवं विषमज्वर तथा ज्वर के पश्चात् दौर्बल्य दूर करने के लिये इसके चूर्ण या क्वाथ का उपयोग किया जाता है। क्विनीन आदि से जब लाभ नहीं होता तब इसका उपयोग करते हैं। ज्वर में इसके साथ धनियाँ, सोंठ, लौंग, दालचीनी या मिरिच, चिरायता तथा ग्राहीपन कम करने के लिये कुटकी का उपयोग किया जाता है। श्वेतप्रदर में बबूल की छाल एवं नीम की छाल का क्वाथ लाभदायक होता है। (२) इसके पत्तों का उपयोग त्वचा के विकार, व्रण, क्षत तथा कुष्ठ में किया जाता है। चर्मविकारों में इससे स्नान कराया जाता है। व्रण, पामा, कण्डू, छाजन, अरुंषिका, दूषितव्रण, पुराने व्रण एवं अन्य चर्मविकारों में इससे स्नान कराते हैं, इसके पत्तों को पीस कर बाँधते है या इससे सिद्ध घृत का मलहम आदि लगाते हैं। अर्श, बद, गाँठ एवं व्रणशोथ
में इसका पोल्टिस बाँधा जाता है। विचर्चिका (Weeping eczema) में यदि इसके पत्तों को पीस कर बाँध दें और जब तक अपने से निकले नहीं तब तक रहने दें तो बहुत जल्दी लाभ होता है। कुष्ठ में इसके पञ्चाङ्ग के चूर्ण या क्वाथ का स्नान, पान एवं लेपादि में उपयोग होता है। इसके पत्तों को पीसकर आँवला या हरीतकी के साथ खाने से कुष्ठ में लाभ होता है। यद्यपि इसके पत्तों का स्वरस आन्त्र के कृमियों (केंचुआ) में लाभदायक माना जाता है तथापि श्रीकेस और म्हसकर का मत है कि ४ ड्राम की मात्रा में इसके प्रयोग से कोई लाभ नहीं हुआ। इसके देने के पहले और पश्चात् विरेचन नहीं दिया गया था। फिरंग में इसका रस १ पाव की मात्रा में सुबह शाम पिलाते हैं। सोजाक में शिश्न में शोथ होकर मूत्र रुकता है तब इसके क्वाथ में रोगी को बैठाते हैं जिससे पेशाब होने लगती है। कामला में अधिक मात्रा में इसका स्वरस मधु के साथ सुबह पिलाया जाता है। इसके साथ सोंठ भी देते हैं। कभी-कभी अधिक मात्रा से वमन हो जाता है। प्रसूता को प्रथम दिन से ही इसका स्वरस देने से हर प्रकार से लाभ होता है। इससे गर्भाशय का संकोच होकर स्राव की शुद्धि होती है एवं शोथ कम होता है। भूख लगना, पाखाना साफ होना, ज्वर न आना या कम आना एवं बच्चे का स्वास्थ्य अच्छा रहना ये सब लाभ इसके देने से होते हैं। मसूरिका (Small pox) में इसके पत्तों से हवा की जाती है एवं रोगी के बिस्तर पर इसको बिछाते हैं। इसके कोमल पत्तों की दो रत्ती की गोली बना कर मुलेठी के साथ देने से लाभ होता है। पत्तों को पुस्तक तथा कपड़े आदि में रखने से कीड़े नहीं लगते। ज्वर में घृत एवं मधु के साथ इसके पत्तों का धूप दियां जाता है। (३) इसके तैल का कुष्ठ, फिरंग, श्लीपद, व्रण, दूषितव्रण, गण्डमाला, आमवात एवं विषमज्वर में उपयोग किया जाता है। कुष्ठ, फिरंग, त्वचा के रोग एवं विषमज्वर आदि में इसको ५-१० बूँद की मात्रा में दिन में २ बार देते हैं। इसका बाह्य प्रयोग भी करते हैं। अपची, नाड़ीव्रण, पामा, कण्डू, छाजन, दद्रु, विसर्प, आमवात, उददर्द्, शीतपित्त एवं दूषित व्रण में तैल को लगाते हैं। कुष्ठव्रण में इसके साथ चौलमोगरा का तैल मिलाकर लगाते हैं। तैल से दाह होने पर इसमें १/२ तिलतैल मिलाकर उपयोग करना चाहिये। आमवात में इसकी मालिश के साथ-साथ इसका आन्तरिक प्रयोग भी किया जाता है। शिरःशूल में सर पर इसको मलते हैं। खालित्य एवं पालित्य में इसके नस्य का विधान है। आन्त्रिक कृमि में पत्रस्वरस की तरह इसके तैल को १-४ ड्राम की मात्रा में देने से लाभ नहीं देखा गया, यद्यपि पूर्ण मात्रा से किसी-किसी में अतिसार, हल्लास तथा बेचैनी होती है। इसके तैल से बने हुए लवण सोडियम या पोटैशियम् मार्गोसेट (Margosate) का उपयोग त्वचा, मांसपेशी तथा सिरा के द्वारा किया जाता है। इसका शरीर में जीवाणुविरोधी कार्य होता है। पामा (Scabies), छाजन (Eczema) एवं स्फोट (Pemphigus) में इससे अच्छा लाभ होता है। फिरंग की प्रथम एवं द्वितीयावस्था में चिकित्सा जिनमें नहीं की गई उनकी अपेक्षा इसके द्वारा अधिक लाभ होता है। इसमें इसे ०.०१-०.३२ ग्राम सूचिकाभरण द्वारा दिया जाता है। फिरंग की तृतीयावस्था या द्वितीयावस्था के अन्त के ग्रन्थि (गमा) तथा त्वचा के विकार इससे जल्दी अच्छे होते हैं, यद्यपि इसका परिणाम पाश्चात्य चिकित्सा की अन्य पारद, आयोडाइड आदि औषधियों के इतना संतोषजनक नहीं होता। कुष्ठ एवं फिरंगादि में तैल की अपेक्षा इसके सूचिकाभरण एवं मार्गोसिक एसिड के स्थानिक प्रयोग से अधिक लाभ होता है। (४) इसके फल विरेचक एवं स्नेहन हैं तथा कृमि, अर्श एवं मूत्रविकार में इनका उपयोग करते हैं। अर्श में इसके बीज को गुड़ के साथ खिलाते हैं। (५) इसके पुष्प का फांट ज्वर के पश्चात् बल्यरूप में एवं पाचन की खराबी में देते हैं। (६) इसकी ताड़ी में शर्करा, ॲल्ब्युमिन, गोंद एवं लौह, खटिक तथा अल्युमिनिअम् के लवण होते हैं। यह दीपन, पोषक, बलप्रद, कृमिघ्न, रसायन एवं चर्मविकारों में लाभदायक मानी जाती है। मात्रा—अन्तस्त्वक् चूर्ण २-४ माशा; स्वरस १/२-१ छटाँक; तैल ५-१० बूँद।
गुडूच्यादिवर्गः ५०५ अथ महानिम्बः तस्य नामानि गुणाँश्चाह महानिम्बः स्मृतो द्रेका रम्यको विषमुष्टिकः । केशमुष्टिनिम्बकश्च कार्मुको जीव इत्यपि ॥९७॥ महानिम्बो हिमो रूक्षस्तिक्तो ग्राही कषायकः ॥९८॥ कफपित्तभ्रमच्छर्दिकुष्ठहल्लासरक्तजित् । प्रमेहश्वासगुल्मार्शोमूषिकाविषनाशनः ॥९९॥ महानिम्ब के नाम तथा गुण-महानिम्ब, द्रेका, रम्यक, विषमुष्टिक, केशमुष्टि, निम्बक, कार्मुक और जीव ये सब संस्कृत नाम 'बकायन' के हैं। बकायन-शीतवीर्य, रूक्ष, तिक्त तथा कषाय रसयुक्त और ग्राही (मलावरोधक) होता है। यह कफ, पित्त, भ्रम, वमन, कुष्ठ, हल्लास, रक्तदोष, प्रमेह, श्वास, गुल्म, बवासीर और चूहे का विष इन सबों का नाशक होता है। [९७-९९] नोट-महानिंब के विषय में कुछ भ्रम है। भावप्रकाश, धन्वन्तरि एवं मदनपाल निघंटुओं में निंब तथा महानिंब ये दो भेद मिलते हैं। राजनिघंटु में एक तृतीय भेद कैडर्य का उल्लेख किया है। कैडर्य नाम कायफल के लिये आता है। किन्तु टीकाकारों ने उसका अर्थ पर्वतनिव भी किया है। चरक एवं सुश्रुत में 'पर्वतनिंब' शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है। कुछ लोगों ने कैडर्य को मीठा नीम, ले०-मुरया कोनिजीआई स्प्रेंग (Murraya koenigii Spreng) माना है किन्तु रा० नि० ने कैडर्य का स्वाद कटु तिक्त कषाय लिखा है। ऐइलेन्थस् एक्सेल्सा राक्स (Ailanthus excelsa Roxb.) को कुछ लोगों ने महानिंब माना है जिसको पंजाबी में 'अरुआ' कहने के कारण कुछ लोग अरलू के स्थान पर प्रयोग करते हैं या अरलू (श्योनाक) का भेद मानते हैं। अधिकांश लोगों ने बकायन को, जिसका ले०-नाम मेलिआ एझेडैरॅक (Melia azedarach) है उसे महानिंब माना है। निघंटुओं में महानिंब का पर्याय 'ट्रेका' दिया हुआ है तथा बकायन को पंजाब में द्रेक कहते भी हैं। अर्श में महानिम्ब का प्रयोग वाग्भट ने किया है (चि० अ० ८) एवं वैद्य तथा हकीमी में बकायन के फलों का प्रयोग प्रचलित है। महानिंब का 'अक्षीर' यह पर्याय अन्य निघंटुओं ने दिया है तथा निंब का पर्याय 'हिंगुनिर्यास' दिया हुआ है जो क्रमशः बकायन एवं नीम की ओर संकेत करते हैं। सुश्रुत में पिप्पल्यादिगण (सू० अ० ३८) में महानिंब के फल का एवं अधोभागहरवर्ग (सू० अ० ३९) में 'रम्यक' नाम से इसकी त्वचा का उल्लेख है। आकाश नीम-नीम चमेली नामक वृक्ष होता है। इसका लेटिन नाम मिलिंगटोनिया हॉर्टेन्सिस् लिन. (Millingtonia hortensis Linn. fi; Fam. Bignoniaceae) है। इसके सुन्दर ऊँचे वृक्ष होते हैं जो बगीचों में इसके सुन्दर पत्र एवं श्वेत सुगंधित पुष्पों के लिये लगाये जाते हैं। इसमें एक तिक्त द्रव्य तथा टैनिन् होता है तथा ज्वरघ्न गुण के लिये इसका प्रयोग करते हैं। यहाँ पर दोनों प्रकार के महानिम्बों का वर्णन अलग-अलग किया गया है। ४४. (क) महानिंब (बकायन) हिं०-बकायन, बकाइन, महानीम। बं०-घोड़ानिम, महानिम। म०-बकाणानिंब। गु०-बकानलिंबडो। क०- बेट्टदबेड। ते०-तुरक, बेवक, कोड वेप। ता०-मलैवेम्बु। पं०-देक, धरेक, बकइन। कोल०-गरनिम। आसाम- थमगा। ने०-बकैनु। सिन्धु-बकयनु, ड्रेक। फा०-आजाद दरख्त। अ०-बान्, हर्बीत। अं०-Persian Lilac (पर्शियन् लिलॅक); The Bead Tree (बीड ट्री)। ले०-Melia azedarach Linn. (मेलिआ एझेडेरॅक् लिन.)। Fam. Meliaceae (मेलिएसी)। प्रायः सब प्रान्तों में इसका वृक्ष पाया जाता है। बकायन का वृक्ष सुन्दर, मध्यमाकार का, नीम वृक्ष से छोटा और अचिरस्थायी होता है। नीम के पत्तों के समान इसके भी पत्ते होते हैं। पत्ते-प्रायः त्रिपक्षवत्, २ फीट लम्बे और शाखाओं पर दलबद्ध होकर रहते हैं। पत्रक-प्रासवत, आरावत् दन्तुर, लम्बाय्र, नीम जैसे किन्तु उससे कुछ कम लम्बे तथा क्रम मुड़े हुए होते हैं। पुष्प-लिलॅक (Lilac) एवं सुगन्धित रहते हैं जिसके आभ्यंतर दल फैले हुए, श्वेत या बैंगनी रंग
के होते हैं तथा बीच में पुंकेसरों की गहरे बैंगनी रंग की नलिका रहती है। फल—नीम की तरह अष्ठिल फल प्रायः १ इञ्च से कम लम्बे होते हैं। बीज—प्रत्येक फल में ५ बीज होते हैं जिनके बीच में मणि के समान छिद्र होता है जिसके कारण इनकी माला बनाई जाती है। इसके मूल की ताजी अन्तस्त्वक्, पुष्प, फलमज्जा एवं पत्र का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन—इसकी अन्तस्त्वक् में हलके पीतवर्ण का, कडुवा तथा राल की तरह का पदार्थ रहता है जो उबलते जल में घुलता है। बाह्यत्वक् में टैनिन् रहता है। इसमें शर्करा भी पाई जाती है। गुण और प्रयोग—बकायन के गुण साधारणतः नीम के समान हैं। यह कृमिघ्न, त्वग्दोषहर, गर्भाशयसंकोचक, वेदनाहर, अर्शोघ्न एवं शोधन है। अधिक मात्रा में यह वामक, विरेचक एवं संज्ञानाशन है। इससे केंचुए मरते हैं। प्रसूता में शिरःशूल एवं गर्भाशयपीड़ा कम करने के लिये इसके पुष्पों को पीसकर सर पर एवं पेडू पर बाँधते हैं। रक्तविकार के कारण उत्पन्न कुष्ठ, गंडमाला एवं खालित्य आदि त्वचा के विकारों में इसके बीज, छाल या पत्रस्वरस को देते हैं। अर्श में इसके फल की मज्जा का उपयोग किया जाता है। इसके पुष्प एवं पत्तों को पीसकर स्नायविक शिरःशूल में लेप करते हैं। इसके पत्तों का क्वाथ हिस्टीरिया में पिलाते हैं। मात्रा—छाल ३ से ६ माशा; फलमज्जा २ से ८ रत्ती। ४५. (ख) महानिंब हिं०—महानिंब, घोड़ाकरंज। बं०—महानिम। म०—महारूख। गु०—मोटो अडुसो, अरलबो। पं०—अरूअ। ता०—पेरुमरुत्तु। ते०—पेद्दमानु। क०—दोडुमणि। मल०—पेरुमरम्। उरि०—महानिम महाल। ले०—Ailanthus excelsa Roxb. (ऐलेन्थस् एक्सेल्सा राक्स) । Fam. Simarubaceae (सिमारुबेसी) । यह भारत के कई प्रान्त—उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिमी पेनिनसुला, कर्नाटक एवं गुजरात आदि में पाया जाता है। इसका वृक्ष—६० से ८० फ़ीट ऊँचा होता है। छाल—धूसर वर्ण की होती है। पत्ते—२-३ फीट लम्बे, पक्षवत्, संयुक्त पत्र होते हैं। पत्रक—३ १/२-६ लम्बे, २-३ चौड़े, अधरतल् पर रोमश, नोकदार, दन्तुर धारवाले, तिरछे आधारवाले, संख्या में १०-१३ जोड़े, १-२ लम्बे वृन्त से युक्त एवं आधार के पास दो रोमश ग्रंथियों से युक्त होते हैं। पत्तों में उग्र गंध आती हैं। पुष्प—पीताभ, बड़ी-बड़ी मंजरियों में आते हैं। फल—छीमी की तरह बीच से फूला हुआ एवं अन्त में अकुड़ेदार होता है जिसमें एक बीज रहता है। इसकी लकड़ी हलकी तथा मुलायम होती है। इसकी छाल का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। इसमें गन्ध नहीं होती किन्तु इसका स्वाद बहुत कड़वा होता है। यह मोटी, खुरदरी तथा रवेदार होती है। इसका बाह्यभाग तथा अन्दर का भाग पीताभ श्वेत रहता है तथा अन्दर रेशे मालूम होते हैं। भिगोने से यह फूलती है, चिपचिपी होती है तथा उसमें अप्रिय गन्ध आती है। इसे कुछ लोगों ने महानिंब तथा कुछ लोगों ने श्योनाक-भेद माना है। रासायनिक संगठन—इसकी छाल में ऐलेण्टिक् ॲसिड (Ailantic acid) नामक एक अत्यन्त कडुआ, रक्ताभ भूरे रंग का पदार्थ पाया जाता है जो जल में आसानी से घुल जाता है किन्तु मद्यसार में आसानी से नहीं घुलता। गुण और प्रयोग—यह कडुआ, पौष्टिक, दीपन, ग्राही एवं ज्वरहर है। इसका प्रभाव कुरैया के समान होता है। प्रसूता को इसके पत्रस्वरस या ताजी छाल के रस को नारियल के दूध, गुड़, मधु एवं सुगंधित पदार्थों के साथ खीर बनाकर देने से प्रसवपश्चात् पीडा कम होती है। इसकी छाल एवं पत्तों का क्वाथ प्रसवपश्चात् दौर्बल्य के लिये बल्यरूप में देते हैं। जीर्णज्वर या दौर्बल्य में इसके प्रयोग से बल बढ़ता है। अग्निमांद्य में इसके छाल का रस १ १/२ औं० की
गुडूच्यादिवर्गः ५०७ मात्रा में दिन में दो बार देते हैं। एइलेण्टिक् एसिड को बल्य एवं रसायन रूप में १/२-१ १/२ र० की मात्रा में दिया जाता है किन्तु अधिक मात्रा में इससे हल्लास, वमन एवं विरेचन होता है।१ मात्रा-१/४-१/८ तो०। अथ पारिभद्रः (फरहद)। तस्य नामानि तत्पत्रस्य च गुणाँश्चाह पारिभद्रो निम्बतरुर्मन्दारः पारिजातकः। पारिभद्रोऽनिलश्लेष्मशोथमेदःकृमिप्रणुत्। तत्पत्रं पित्तरोगघ्नं कर्णव्याधिविनाशनम्१॥१००॥ फरहद के नाम तथा गुण-पारिभद्र, निंबतक, मन्दार और पारिजातक ये सब संस्कृत नाम फरहद के हैं। फरहद-वायु, कफ, शोथ, मेदरोग और कृमि का नाशक होता है। इसके पत्ते-पित्तरोग तथा कान के रोगों को दूर करने वाले होते हैं। [१००] नोट-पारिभद्र के जो पर्याय निंबतरु, मंदार एवं पारिजातक दिये हुये हैं उनसे कुछ भ्रम उत्पन्न होता है। इसी प्रकार देवदार एवं पर्वतनिंब के लिये भी पारिभद्र नाम का उपयोग किया गया है। पारिभद्र से अधिकांश विद्वान् फरहद का ग्रहण करते हैं। संदर्भ के आधार पर या टीकाकारों के मतानुसार पारिभद्र का अर्थ निंब, देवदार या पारिजातक किया जा सकता है। पारिजाता यह नाम हरसिंगार के लिये अधिक प्रचलित होने के कारण एवं पारिभद्र का पारिजातक यह पर्याय होने के कारण हरसिंगार को ही कुछ लोग पारिभद्र मानते हैं। कुछ विद्वानों के मत से हरसिंगार 'शेफालिका' हो सकती है किन्तु भावप्रकाशकार तथा अन्य निघंटुकारो ने शेफाली(लिका) को निर्गुण्डी भेद लिखा है। पारिभद्रक नाम से सुश्रुत ने पूतनाप्रतिषेध (उ० अ० ३२-३) के लिये एवं कृमि (उ० अ० ५४-२६) के लिये उपयोग लिखा है। पारिजातक नाम से प्लीहोदर (चि० १४-१२) में एवं पारिजात नाम से उदकमेह (चि० ११-८) में उल्लेख है। यहाँ पर फरहद एवं हरसिंगार दोनों का अलग-अलग वर्णन किया गया है। ४६. फरहद हिं०-फरहद, पांगरा। बं०-पाल ते मादार। म०-पाङ्गारा। गु०-पांडेरवो, पनरवो। क०-होंगर, हलिवाणदमर। ते०-मोदुगो, बरिदे चेट्टु, बारिजमु। ता०-कल्याण मुरुक्क। अं०-Coral Tree (कोरल ट्री)। ले०-Erythrina indica Lam. (एरिथ्रिना इण्डिका लॅम०)। Fam. Leguminosae (लेगुमिनोसी)। यह प्रायः सब प्रान्तों में कहीं-न-कहीं पाया जाता है, विशेषकर कोंकण और उत्तर कनारा में अधिक मिलता है। इसका वृक्ष मध्यमाकार का, शीघ्रता से बढ़ने वाला तथा समय पाकर नष्ट हो जाने वाला होता है। कोमल डालियों पर सीधे, काले रङ्ग के तीक्ष्ण काँटे रहते हैं। छाल-चिकनी तथा हरी, भूरी, हलकी पीली या श्वेत खड़ी रेखाओं से युक्त एवं पतली पपड़ियाँ छूटने पर हरी होती है। पत्ते-पलाशपत्र के समान त्रिदल होते हैं। पत्रक-४-६ इञ्च के घेरे में गोलाकार और किञ्चित् नुकीले होते हैं। अग्र का पत्रक सबसे बड़ा होता है। पुष्पदंड ४ इञ्च लम्बा और मंजरी प्रायः ६ इञ्च लम्बी होती है। फूल-अत्यन्त रक्त वर्ण के सुहावने दिखाई पड़ते हैं। पुष्प का बाह्यकोश एक ओर मूल तक फट जाता है और अग्र पर पाँच दाँत बन जाते हैं। आभ्यंतर दल पाँच होते हैं जिनमें एक सबसे बड़ा होता है। इनके बीच से लाल पुंकेसरों का गुच्छा निकला रहता है। इनमें गन्ध नहीं होती। फलियाँ-६-१० इञ्च लम्बी, चिपटी, चोंचदार, किंचित् टेढ़ी, ताजी अवस्था में हरी किन्तु बाद में काली हो जाती है। बीज-संख्या में ६-१२, चिकने, भूरे या लाल, अंडाकार तथा करीब १ इञ्च बड़े होते हैं। १. पुष्पं पित्तरुजं हन्ति कर्णव्याधि विनाशयेत्। (नि. र.)
५०८ भावप्रकाशनिघण्टुः इसी का एक उपभेद होता है जिसके पुष्प मटमैले श्वेताभ रंग के होते हैं। इसकी दूसरी जाति ए. सुबरोजा राक्स. (E. suberosa Roxb.), धवलढाक-उत्तर भारत में अधिक होता है। इसके वृक्ष छोटे होते हैं। इसकी छाल मोटी कार्क वाली, पत्रक चौड़े लट्वाकार या तिर्यगायताकार एवं पुष्प का बाह्यकोश द्वयोष्ठक होता है। फरहद की छाल एवं पत्र का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। छाल हल्लासकारक तो होती है किन्तु कड़वी नहीं होती। रासायनिक संगठन-इसकी छाल में दो प्रकार की राल एवं एक कड़वा एरिथेराइन (Erytherine) नामक विषैला क्षाराभ पाया जाता है जो कुचले के क्षाराभ स्ट्रिकनीन (Strychnine) के विषैले प्रभाव का निवारक (Antidote) माना जाता है। यह क्षाराभ पत्तों में भी पाया जाता है। गुण और प्रयोग-फरहद की छाल ज्वरहर, ग्राही, बल्य, कृमिघ्न, स्वप्नजनन एवं शोथहर होती है। इसके पत्ते मूत्रल, मृदुविरेचक, आर्तवजनन, दुग्धवर्धक, शोथहर, व्रणशोधक एवं कृमिघ्न होते हैं। केन्द्रीयवातनाडीसंस्थान के ऊपर इसकी छाल का शामक प्रभाव पड़ने के कारण उसकी क्रिया कम होती है या बन्द होती है। हृदय पर भी इसका शामक प्रभाव पड़ता है। कुचले के प्रभाव के विरुद्ध इसका प्रभाव पड़ता है। इसकी छाल को रक्तयुक्त आँव, ज्वर तथा निद्रा लाने के लिये प्रयोग करते हैं। नेत्राभिष्यंद में छाल को पीसकर पलकों पर लगाते हैं। इसकी छाल के अन्दर के भाग पर घी लगाकर तथा उस पर घी के दिये का काजल जमाकर इसका नेत्र के विकारों में अञ्जन कराया जाता है। वाजीकरण के लिये सफेद फूल के फरहद की कोमल जड़ को पीस कर शीतल दूध के साथ पिलाते हैं। इसके पत्तों का स्वरस फिरंग, उपदंश, ज्वर, अनार्तव, कष्टार्तव, मूत्रकृच्छ्र एवं कृमि में पिलाया जाता है। व्रणप्रक्षालन के लिये एवं कर्णशूल, दंतशूल आदि के लिये भी इसका उपयोग करते हैं। पत्तों का लेप शोथ, बद, संधिपीड़ा तथा व्रण पर किया जाता है। इससे वेदना कम होती है। आर्तवशुद्धि तथा दुग्धवृद्धि के लिये नारियल के दूध के साथ इसके पत्तों को उबालकर बनाया हुआ क्वाथ प्रसूता को पिलाया जाता है। मात्रा-त्वक्चूर्ण १/२-१ तो०; पत्रस्वरस १/२-१ तो०। ४७. पारिजाता, हरसिंगार सं०-शेफालिका। हिं०-हरसिंगार, पारिजाता, कूरी, सिहारु। बं०-शेफालिका, शिउली। म०-पारिजातक। गु०-हारशणगार। पं०-कूरी, पकर। ता०-पवलमल्लिकै। ते०-पगडमल्ले। मल०-पविझमल्लि। क०- पारिजात। अं०-Night Jasmine (नाइट जस्मीन); Weeping Nyctanthes (वीपिंग् निक्टेन्थस्); Tree of Sorrow (ट्री ऑफ सारी)। ले०-Nyctanthes arbor-tristis, Linn. (निक्टॅन्थिस अर्बोर्-ट्रिस्टिस्, लिन.)। Fam. Oleaceae (ओलिएसी)। यह मध्यभारत तथा हिमालय के निचली प्रदेशों में बहुत होता है। यह प्रायः सब प्रांतों के बागों में लगाया हुआ मिलता है। इसका वृक्ष-छोटा, झाड़ीदार तथा कभी-कभी २५.३० फीट ऊँचा होता है। छाल-हलके भूरे रंग की तथा खुरदरी होती है। काष्ठ-श्वेत तथा हरित हलके लाल या पीताभ भूरे रंग का होता है। पत्ते-जपापत्र की तरह, करीब ४ इञ्च लम्बे, २ १/२ इञ्च चौड़े, विपरीत, स्पर्श में अत्यन्त रूक्ष (खर), नुकीले, अंडाकार, आधार की तरफ गोल, नीचे CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
गुडूच्यादिवर्गः ५०९ का पृष्ठ मृदुरोमश, पत्रतट अखंड या दूर-दूर पर कुछ दन्तुर एवं मजबूत पर्णवृन्त से युक्त होते हैं। पुष्प-अत्यन्त सुगन्धित होते हैं। इनकी पंखडियाँ श्वेत एवं पुष्पवृन्त केसरिया वर्ण के होते हैं। ये रात को खिलते हैं तथा सुबह झड़ जाते हैं। फल-चिपटे, गोल, हरे रंग के, करीब ३/४ इञ्च व्यास के एवं किनारे पर दबे हुए रहते हैं। बाद में ये भिदुर एवं भूरे रंग के हो जाते हैं। बीज-छोटे, दो, चिपटे तथा अंडाकार होते हैं। रासायनिक संगठन-इसके पुष्पों में एक सुगंधित उड़नशील तैल रहता है। पुष्पवृन्त से एक प्रकार का रंग निकाला जाता है जिससे रेशमी वस्त्र रँगा जाता है। इसके पत्तों में एक निक्टेन्थाइन (Nyctanthine) नामक क्षाराभ पाया जाता है। गुण और प्रयोग-पारिजातक ज्वरघ्न, कफघ्न, यकृत् उत्तेजक, मृदुविरेचक एवं शामक है। इसके पत्र सॅण्टोनिन् (Santonin) जैसे कृमिघ्न, ज्वरघ्न, तिक्तपौष्टिक, पित्तद्रावक एवं मृदुविरेचक होते हैं। बच्चों के लिये इसके पत्तों का स्वरस अच्छा मृदुविरेचक होता है। (१) इसके पत्तों का (शेफालिकादलैः) मंद आँच पर बनाया हुआ क्वाथ गृध्रसी (Sciatica) के लिये बहुत लाभदायक माना जाता है (चक्रदत्त) शेफालिका यह नाम नीलगिर्गुण्डी के पर्याय में आया हुआ है तथा व्यवहार में निर्गुण्डी का उपयोग गृध्रसी में किया जाता है। इस दृष्टि से हरसिंगार के पत्तों की अपेक्षा निर्गुण्डी का प्रयोग उचित मालूम पड़ता है। (२) जीर्ण ज्वर के लिये इसके ७-८ कोमल पत्तों का स्वरस, आर्द्रकस्वरस एवं मधु मिलाकर देते हैं। मलेरिया में यह बहुत लाभदायक है। जीर्ण मलेरिया में इसके साथ त्रिकटु का प्रयोग उचित है। इससे यकृत् एवं प्लीहावृद्धि कम होती है। पाण्डु होने पर इसके साथ लौह का प्रयोग किया जाता है। इसके सेवन के समय पथ्य में दुग्ध, घृत एवं शर्करा का अधिक उपयोग किया जाता है। (३) बच्चों के कृमि (केंचुए) के लिये पत्तों के स्वरस को चीनी मिलाकर देते हैं। (४) खाँसी तथा दमा में इसकी छाल के चूर्ण को १-२ र० की मात्रा में पान में रखकर दिन में ३-४ बार देने से कफ का चिपचिपापन कम होता है। (५) इसके बीजों को जल में पीसकर सर के गंज़ पर लगाते हैं जिससे नये बाल उगते हैं। मात्रा-पत्र २-४; छालचूर्ण १-२ रत्ती। अथ काञ्चनारो रक्तकाञ्चनारश्च, तयोर्नामानि तत्पुष्पस्य गुणाँश्चाह काञ्चनारः काञ्चनको गण्डारिः शोणपुष्पकः ॥१०१॥ कोविदारश्च मरिकः कुद्दालो युगपत्रकः। कुण्डली ताम्रपुष्पश्चाश्मन्तकः स्वल्पकेशरी ॥१०२॥ काञ्चनारो हिमो ग्राही तुवरः श्लेष्मपित्तनुत्। कृमिकुष्ठगुदभ्रंशगण्डमालाव्रणापहः ॥१०३॥ कोविदारोऽपि तद्वत्स्यात्तयोः पुष्पं लघु स्मृतम्। रूक्षं संग्राहि पित्तास्रप्रदरक्षयकासनुत् ॥१०४॥ कचनार तथा लाल कचनार के नाम और गुण-काञ्चनार, काञ्चनक, गण्डारि और शोणपुष्पक ये सब संस्कृत नाम कचनार के हैं। कचनारभेद कोविदार के संस्कृत नाम-कोविदार, मरिक, कुद्दाल, युगपत्रक, कुण्डली, ताम्रपुष्प, अश्मन्तक और स्वल्पकेशरी ये सब हैं। कचनार-शीतवीर्य, मलावरोधक, कषायरसयुक्त, कफ, पित्त, कृमि, कुष्ठ, गुदभ्रंश, गण्डमाला और व्रण को दूर करनेवाला होता है। इसी प्रकार से कचनारभेद कोविदार के भी गुण हैं। दोनों कचनारों के फूल-लघु, रूक्ष, मलावरोधक एवं पित्त, रक्त-प्रदर, क्षय तथा कास (खाँसी) को दूर करने वाले होते हैं। [१०१-१०४]
५१० भावप्रकाशनिघण्टुः नोट-भावप्रकाशकार ने काञ्चनार एवं कोविदार ये दो भेद लिखे हैं किन्तु दोनों के गुण समान ही लिखे हैं। रा० नि० एवं ध० नि० ने कोविदार एवं काञ्चनार ये पर्याय रूप में लिये हैं किन्तु रा० नि० ने इसके 'पीत पुष्प', 'गिरिज', 'महापुष्प' आदि अन्य पर्यायों का भी उल्लेख किया है। नि० र० ने पीत, रक्त एवं श्वेत ये ३ भेद दिये हैं तथा उनके गुणों का स्वतंत्र उल्लेख किया है। आधुनिक उद्भिद्वेत्ताओं ने इसकी कई जातियों का उल्लेख किया है। बौहिनिआ बेरिगेटा (Bauhinia variegata) को अधिकांश लोगों ने काञ्चनार माना है। इसके पुष्प चमकीलें बैंगनी, गुलाबी, किरमिजी, श्वेत आदि रंगों के होते हैं। इसी प्रकार बौहिनिआ पर्पूरिआ (B. purpurea) कोकोविदार मानते हैं क्योंकि इसको कहीं-कहीं स्थानिक भाषा में कोइलार कहते हैं जो संभवतः कोविदार का अपभ्रंश है। इसके पुष्प गहरे गुलाबी, नीलारुण या चमकीले बैंगनी आदि रंगों के होते हैं। इससे ऐसा मालूम होता है कि केवल पुष्पवर्ण के आधार पर कोविदार या काच्चनार का भेद नहीं किया जा सकता। वास्तव में इनके गुणों में अन्तर न होने के कारण इसकी आवश्यकता भी नहीं है। वैसे तो ध० नि० एवं रा० नि० ने इन्हें पर्याय ही माना है। कुछ लोगों ने श्वेत पुष्प को काञ्चनार एवं रक्तपुष्प को कोविदार माना है : बौ. टोमैण्टोसा (B. tomentosa) के पुष्प पीतवर्ण के होते हैं। भावप्रकाशकार ने कोविदार के पर्याय में अश्मंतक का उल्लेख किया है। रा० नि० एवं ध० नि० दोनों ने अश्मंतक का कोविदार से अलग स्वतंत्र वर्णन किया है। श्री ठा० बलवन्तसिंह जी 'बिहार की वनस्पतियाँ' नामक पुस्तक में लिखते हैं, 'उपर्युक्त दोनों जातियों को [ इसी वर्ग के बौ. रेसिमोसा लॅम. (B. racemosa Lam.) एवं बौ. मलबारिका राक्स. (B. malabarice Roxb.) ] कुछ ग्रन्थकारों ने प्राचीनों का अश्मंतक माना है, परन्तु इसमें सन्देह है। ४८. कचनार (क) हिं०-कचनार, कञ्चनार, कचनाल, गोरिआव। बं०-काञ्चन, रक्त काञ्चन। कोल०-जुरजु, बुज, वुरंग। म०-कोरल, काञ्चन। सन्ता०-झिंजर। गु०-चम्पाकाटी। ने०-टकी। मल०-चुवन्नमंदारम्। क०-केंयुमन्दार। ते०-देवकाञ्चनमु। ता०-सेगपुमुन्थरी। अं०-Mountain Ebony (माउण्टेन एबोनी)। ले०-Bauhinia variegata Linn. (बौहिनिया वेरिगेटा लिन.)। Fam. Leguminosae (लेगुमिनोसी)। यह हिमालय के निचले प्रदेशों में, सिक्किम की ओर तथा सब प्रान्तों में उत्पन्न होता है। इसका वृक्ष मध्यमाकार का अचिरस्थायी होता है। छाल-भूरे रङ्ग की और लकड़ी-किञ्चित् भूरापन युक्त बादामी रङ्ग की होती है। पत्ते-एकान्तर, ३-६ इञ्च लम्बे तथा उतने ही चौड़े, द्विखण्डित, खण्ड लगभग चौथाई या तिहाई दूरी तक गहरे (युग्मपत्र), पत्राग्र गोल, पंखे की तरह फैली हुई संख्या में १३-१५ शिराओं वाले एवं करीब एक इञ्च लम्बे वृन्त से युक्त होते हैं। पुष्प-शीत ऋतु में पत्ते गिर जाने के पश्चात् ही सुगंधित पुष्प गिरे हुए पत्तों के कोणों से निकले रहते हैं। पुष्पदंड छोटे तथा आपद्म या नीलारुण रंग के होते हैं। कलिकाएं घेरे में गोलाई लिये होती हैं। पुष्प-बड़े, श्वेत, गुलाबी, चमकीले बैंगनी तथा किरमिजी रङ्ग के होते हैं। श्वेत पुष्पों का एक या अधिक दलपत्र चित्रित पीतवर्ण का होता है। दलपत्रों में मजबूत मध्यशिरा होती है और आधार से लाल बैंगनी रंग की शिराएँ निकली रहती हैं। फली- लम्बी, चिपटी कुछ मुड़ी हुई, करीब १ फुट तक लम्बी एवं १०-१५ बीजों से युक्त होती है। (ख) सं०-कोविदार। हिं०-कोविदार, खैखरवाल, सोना, कोइना (ला) र। बं०-देवकाञ्चन, रक्तकाञ्चन। संथा०-सिंहरा। ता०-मंदारि, पेद्दाआरि। ते०-कांचनम्। ले०-Bauhinia purpurea Linn. (बौहिनिआ पर्पूरिआ लिन.)।
गुडूच्यादिवर्गः ५११ इसके भी (क) की तरह के ही मध्यम ऊँचाई के वृक्ष होते हैं । ये छोटे रहने पर ही फूलने-फलने लगते हैं । पत्ते— बहुत गहराई तक कटे हुए, आयताकार, ५-७ इञ्च लम्बे, खंड के अग्र प्रायः कोणीय एवं पत्रसिराएँ ९-११ रहती हैं । पुष्प—पुष्पकलिका गहरे हरे या भूरे रंग की एवं पाँच कोणों से युक्त होती है । पुष्प (क) की अपेक्षा छोटे, पाँच दलपत्रों से युक्त, चमकीले बैंगनी, नीलारुण या गहरे गुलाबी रंग के होते हैं । काञ्चनार तथा कोविदार दोनों में बाह्यनाल लंबा और पूर्ण पुंकेशर ३-५ होते हैं । फली—लम्बी हरिताभ बैंगनी रंग की होती है । इसकी जड़ विषैली होती है । (ग) सं०—पीत कोविदार । ता०—तिरूवत्ती । ते०—कांचीनी । म०—सोन । सिलो०—कहपेतन । ले०— Bauhinia tomentosa Linn. (बौहिनिया टोमॅण्टोसा लिन.) । यह लंका में अधिक होता है । इसके पुष्प पीतवर्ण के किन्तु आधार की तरफ कुछ हलके भूरे या किरमिजी रंग के धब्बों से युक्त होते हैं । सभी की छाल, पत्र एवं पुष्पों का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है । कोमल कलिकाओं का शाक बनाया जाता है । रासायनिक संगठन—इसकी छाल में टैनिन होता है । इससे एक प्रकार का गोंद भी निकलता है । गुण और प्रयोग—कांचनार की छाल, ग्राही, रसायन, बल्य व्रणशोधक एवं व्रणरोपक है । इसके पुष्प रक्तपित्तहर हैं । छाल की क्रिया त्वचा तथा रसग्रंथियों पर होती है जिससे वहाँ की विनिमयक्रिया सुधरती है । इसकी अधिक मात्रा से वमन तथा विरेचन होता है । (१) गंडमाला तथा अपची में इसकी छाल का बहुत प्रयोग किया जाता है । इसका क्वाथ गुग्गुल के साथ पिलाते हैं तथा इससे व्रणप्रक्षालन करते हैं । गंडमाला में सोंठ एवं इसका चूर्ण चावल के धोवन के साथ देते हैं । इसकी छाल को पीसकर लेप भी करते हैं । नये रोग में इससे अधिक लाभ होता है । इसकी छाल का क्वाथ कुष्ठ, चर्मरोग, अतिसार एवं व्रण में दिया जाता है । मसूरिका में इसके क्वाथ में सुवर्णमाक्षिक भस्म डालकर पिलाते हैं । खदिरफल, दाडिमपुष्प एवं इसकी छाल के क्वाथ से कुल्ला करने से अधिक लालास्राव तथा गले के विकारों में लाभ होता है । रक्तपित्त में इसके पुष्प का चूर्ण मधु के साथ चटाते हैं तथा इसके शाक खिलाते हैं । पुष्पों का क्वाथ रक्तप्रदर, रक्तार्श, रक्तमेह तथा कास एवं रक्तातिसार आदि में दिया जाता है । मृदुविरेचक रूप में इसके पुष्पों को चीनी के साथ खिलाते हैं । इसके मूल का चूर्ण मट्ठे के साथ अर्श में दिया जाता है । मूल का क्वाथ अपचन तथा आध्मान में दिया जाता है । मात्रा—त्वक्चूर्ण २-४ माशा । पुष्पकलिकाचूर्ण १-२ माशा । अथ शोभाञ्जनः (सहिजना), (श्यामः श्वेतो रक्तश्च) तन्नामानि तद्गुणाँश्चाह शोभाञ्जनः शिग्रुतीक्ष्णगन्धकाक्षीवमोचकाः । तद्बीजं श्वेतमरिचं मधुशिग्रुः सलोहितः । शिग्रुः कटुः कटुः पाके तीक्ष्णोष्णो मधुरो लघुः ।।१०५।। दीपनो रोचनो रूक्षः क्षारस्तिक्तो विदाहकृत् । संग्राही शुक्रलो हृद्यः पित्तरक्तप्रकोपणः ।।१०६।। चक्षुष्यः कफवातघ्नो विद्रधिश्वयथुकृमीन् । मेदोऽपचीविषप्लीहगुल्मगण्डव्रणान्हरेत् ।।१०७।। श्वेतः प्रोक्तगुणो ज्ञेयो विशेषाद्दाहकृद्भवेत् । प्लीहानं विद्रधिं हन्ति व्रणघ्नः पित्तरक्तहृत् । मधुशिग्रुः प्रोक्तगुणो विशेषाद्दीपनः सरः ।।१०८।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
५१२ भावप्रकाशनिघण्टुः सहिजन के भेद, नाम तथा गुण-सहिजन के (१) श्याम सहिजन, (२) श्वेत सहिजन तथा (३) लाल सहिजन इस प्रकार से ३ भेद होते हैं। शोभाञ्जन, शिग्रु, तीक्ष्णगन्धक, अक्षीव और मोचक ये सब संस्कृत नाम सहजन के हैं। सहजन के बीज को 'श्वेतमरिच' कहते हैं। जो 'लाल सहजन' होता है उसे 'मधुशिग्रु' कहते हैं। शिग्रु अर्थात् श्याम सहजन-स्वाद तथा पाक में कटुरसयुक्त, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, मधुर, लघु अग्निदीपक, रोचक, रूक्ष, क्षार, तिक्तरसयुक्त, विदाहकारक, मलावरोधक, शुक्रजनक, हृदय को हितकर, पित्त रक्त को कुपित करने वाला, नेत्रों को हितकर, कफवात- नाशक एवं विद्रधि, शोथ, कृमि, मेदरोग, अपची, विष, प्लीहा, गुल्म, गलगण्ड और व्रण का नाशक होता है। इसी प्रकार से 'सफेद सहजन' के भी गुण हैं किन्तु वह विशेष करके दाहकारक तथा प्लीहा, विद्रधि, व्रण और पित्त-रक्त का नाशक होता है। मधुशिग्रु अर्थात् 'लाल सहजन' के भी पूर्वोक्त सभी गुण हैं किन्तु विशेष करके वह अग्निदीपक तथा सारक (दस्तावर) होता है। [१०५-१०८] अथ शिग्रुवल्कलपत्रस्वरसगुणानाह शिग्रुवल्कलपत्राणां स्वरसः परमार्त्तिहृत् ॥१०९॥ सहजन की छाल तथा पत्तों के स्वरस के गुण-सहजन की छाल तथा पत्तों का स्वरस असह्य पीड़ा को दूर करता है। [१०९] अथ शिग्रुबीजगुणानाह चक्षुष्यं शिग्रुजं बीजं तीक्ष्णोष्णं विषनाशनम् । अवृष्यं कफवातघ्नं तन्नस्येन शिरोऽर्त्तिनुत् ॥११०॥ सहजन के बीज-नेत्रों को हितकर, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, विषनाशक, अवृष्य और कफ वातनाशक होते हैं। सहजन के बीजों का चूर्ण करके नस्य लेने (सूंघने) से शिर की पीड़ा दूर होती है। इसके पुष्प तथा पुष्प-मधु के गुण आगे शाकवर्ग में दिये हुए हैं। [११०] ४९. सहिजना हिं०-सहिजना, सहिजन, सहजन, सहजना, सैजन, मुनगा। बं०-सजिना। म०-शेवगा, शेगटा। मा०- सहिजनो, सहिंजणो। क०-नुग्गे। ते०-मुनग। गु०-सेकटो, सरगवो। ता०-मोरुङ्गै, मुरिणकै। पं०-सोंहजना। मला०-मुरिण्णा। ब्राह्मी०-डोडलों बिन। यू०-सिनोह। फा०-सर्वकोही। अं०-Horse Radish Tree (हौर्स रेडिश ट्री); (ड्रम स्टिक् ट्री)। ले०-Moringa Pteridosperma Gratin (मोरिङ्गा टेरीगोस्पर्मा ग्रर्ट.)। Fam. Moringaceae (मोरिंगेसी)। यह हिमालय के निचले प्रदेशों में चेनाब से लेकर अवध तक जंगली रूप में तथा भारत के प्रायः सभी प्रांतों में एवं वर्मा में लगाया हुआ मिलता है। इसका वृक्ष-साधारण वृक्षों के समान छोटा, २०-२५ फुट ऊँचा होता है। छाल-चिकनी, मोटी, कार्कयुक्त, भूरे रङ्ग की एवं लम्बाई में फटी हुई और लकड़ी कमजोर होती है। पत्ते-संयुक्त, प्रायः त्रिपक्षवत् तथा १-३ फीट क्वचिद् ५ फीट तक लम्बे होते हैं। पत्रक-अंडाकार, लट्वाकार, विपरीत एवं करीब १/२-३/४ इञ्च लम्बे होते हैं। कार्त्तिक महीने से वसन्त ऋतु के आरम्भ तक फूलों के गुच्छे टहनियों के अन्त में दिखाई पड़ते हैं। पुष्प-श्वेतवर्ण के तथा मधु की तरह गन्धवाले होते हैं। फलियाँ-गोल, त्रिकोणाकार, अंगुलिप्रमाण मोटी, ९-२० इञ्च लम्बी, बीजों के बीच-बीच में पतली एवं बड़ी-बड़ी खड़ी ९ रेखाओं से युक्त होती हैं। उनमें सफेद, सपक्ष, त्रिकोणाकार तथा लगभग १ इञ्च लम्बे बीज होते हैं। बीजों को सफेद मरिच भी कहते हैं। इससे गोंद भी निकलता है जो पहले दुधिया रहता है किन्तु बाद में वायु का सम्पर्क होने पर ऊपर से गुलाबी या लाल हो जाता है। इसकी कच्ची सेमों का साग और अचार बनाते हैं। इसकी छाल के रेशों से कागज, चटाई, डोरी आदि बनाते हैं। जानवर-विशेषकर ऊँट-इसकी टहनियों को खाते हैं।
गुडूच्यादिवर्गः ५१३ इसके मूल, मूल की ताजी छाल, फली, पत्र, बीज एवं गोंद आदि का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। इसकी जड़ बाहर से खुरदरी, जालीदार, हलके भूरे रंग की एवं अन्दर से श्वेत रंग की होती है। हॉसर्हेंडिश की तरह इसका स्वाद कुछ तीता एवं गन्ध की तीक्ष्ण होती है। मोरिंगा कोन्केनेन्सिस निम्मो (Moringa concanensis Nimmo) नामक एक जाति दक्षिण राजपूताना तथा सिन्ध में होती है। इसकी फलियाँ कड़वी होती हैं। इसके पुष्प अधिकांश लाल होते हैं। लाल, काले एवं श्वेतपुष्प भेद से सहजन ३ प्रकार का माना जाता है। अधिकांश श्वेतपुष्प का ही सहजन देखा जाता है। सम्भव है स्थानभेद से कहीं-कहीं रक्त तथा श्यामवर्ण के भी सहजन प्राप्त होते हों। भावप्रकाशकार रक्तपुष्प वाले को मधुशिग्रु कहते हैं। संभव है इस (श्वेत जो अधिकांश मिलता है) वृक्ष के पुष्पों में मधु की तरह गंध होने से इसका नाम मधुशिग्रु दिया हो। रासायनिक संगठन- इसके बीजों में करीब ३६% एक निर्गन्ध स्वच्छ तैल रहता है जो सूक्ष्म यन्त्रों में स्निग्धीकरण के काम आता है। यह रखने से खराब भी नहीं होता। बेन ऑइल (Ben-oil) नामक तैल जो घड़ीसाज व्यवहार में लाते हैं वह अधिकतर अफ्रीका में होने वाले इसी की जाति के वृक्ष (M. aptera, मो. आप्टेरा) के बीजों से निकाला जाता है। सुगंध व्यवसाय में भी इसका तैल उपयोग करते हैं। अस्थिर गन्ध भी इसमें स्थायी हो जाती है। इसके मूल में स्पाइरोचिन् (Spirochin) नामक कार्यशील क्षारीय द्रव्य (Basic) एवं प्टेरिगोस्पर्मिन् (Pterygospermin) नामक एक प्रतिजैविकीय पदार्थ (Antibiotic) रहता है। इसमें एक उग्र दुर्गन्धयुक्त तैल भी पाया जाता है। स्पाइरोचिन नामक क्रियाशील द्रव्य ग्रामग्राही (Gram positive) उपसर्गों, विशेषकर स्तवक गोलाणु एवं मालागोलाणुजन्य (Staphylococcal and streptococcal) उपसर्गों में लाभदायक है। यह अधिच्छदीय (Epithelil)) कोषाओं की कार्यवृद्धि करता है तथा इसमें कुछ वेदनाहरण का भी गुण है। वातनाडियों पर इसका सामान्यतया अवसादक प्रभाव (General paralysing effect) पड़ता है। इससे गर्भाशय के अनियमित संकोचों का शमन होकर उसे बल मिलता है। प्टेरिगोस्पर्मिन अनेक प्रकार के छत्राणुओं (Fungi) की वृद्धि को रोकता है। इसके साथ अल्प मात्रा में न्यूक्लिकू ॲसिड (Nucleic acid) होने पर इसकी कार्यशीलता बहुत बढ़ जाती है। यह ७५००० में १ एवं ४०००० में १ इस अल्प प्रमाण में क्रमशः ग्रामग्राही एवं ग्रामत्यागी (Gram negative) जीवाणुविरोधी कार्य करता है। ऑल्लिसिन् (Allicin) की तरह यह रक्त एवं आमाशयिक रस की उपस्थिति में कार्यशील रहता है किन्तु अग्न्याशयिक रस (Pancreatic Juice) की उपस्थिति में इसकी कार्यशीलता नष्ट हो जाती है। गुण और प्रयोग- सहिजन के मूल की ताजी छाल उष्ण, कटु, दीपन, पाचन, उत्तेजक, वातानुलोमक, वातहर, कफहर, कृमिघ्न, शिरोविरेचन, स्वेदजनन, मूत्रजनन, चक्षुष्य, शोथहर एवं व्रणदोषनाशक है। वृक्कशोथ में इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये। इसका बाह्यलेप स्वरांगकारक है। इसका उपयोग अपची, गुल्म, विद्रधि, शोथ, प्लीहावृद्धि, कृमि, रजःकृच्छ्र, हिक्का, श्वास, कफज्वर, पाचन के विकार एवं व्रण में किया जाता है। इसके नये वृक्ष की मूल को ज्वर, अपस्मार, अपतंत्रक, अंगघात, जीर्ण आमवात, जलोदर, यकृद् वृद्धि, प्लीहावृद्धि तथा अपचन में देते हैं। सैंधव एवं हींग के साथ मूलत्वक् का क्वाथ विद्रधि, शोथ, फोड़े, अश्मरी, अपस्मार एवं अपतंत्रक में दिया जाता है। संतरे का छिलका, जायफल एवं इसकी मूलत्वक् का मद्यसाररीय अर्क मूर्च्छा, चक्कर, ३६ भाव.I
स्नायविक, दौर्बल्य, अपतंत्रक, आध्मान एवं उद्वेष्टनयुक्त आंत्रिक विकारों में लाभदायक है। मुखजाड्य, अर्दित, पक्षाघात आदि वातनाड़ीसंस्थान के रोगों में इसका स्वरस दिया जाता है। व्रणशोथ पर छाल को पीसकर लेप करते हैं तथा खिलाते हैं। गले की शिथिलता, मुखविकार, कृमिदंत में इसके क्वाथ से कुल्ला कराते हैं। इसकी ताज़ी जड़ को सरसों एवं आदी के साथ पीस कर प्रतिक्षोभक एवं विस्फोटककारक प्रलेप के रूप में उपयोग करते हैं। संधिशोथ तथा शरीर की पीड़ा में छाल का उष्ण लेप थोड़ी देर के लिये करते हैं। इसके बीजों के तेल की संधिवात, आमवात तथा वातरक्त में मालिश करते हैं। मूर्च्छा में बीजों का चूर्ण नाक में डालते हैं। इसका गोंद ग्राही होता है तथा आमवात में प्रयोग किया जाता है। इसके पुष्प को दूध में उबालकर वाजीकरण के लिये पिलाते हैं। इसकी फली का साग आंत्रकृमिप्रतिबंधक मानते हैं। इसके कोमल पत्तों का साग खाने से शौच साफ होता है। मात्रा-मूलत्वक् ४ से ८ माशा। अथ श्वेतपुष्पा नीलपुष्पा चापराजिता (कोयल) तयोर्नामानि गुणाँश्चाह आस्फोता गिरिकर्णीस्याद्विष्णुक्रान्ताऽपराजिता । अपराजिते कटू मेध्ये शीते कण्ठ्ये सुदृष्टिदे ।।१११।। कुष्ठमूत्राग्निदोषामशोथव्रणविषापहे । कषाये कटुके पाके तिक्ते च स्मृतिबुद्धिदे ।।११२।। सफेद तथा नीले फूल की कोयल के नाम तथा गुण-आस्फोता, गिरिकर्णी, विष्णुक्रान्ता और अपराजिता ये दोनों प्रकार की 'कोयल' के संस्कृत नाम हैं। दोनों कोयल-कटु, तिक्त तथा कषायरसयुक्त, मेधा के लिये हितकर, शीतवीर्य, कण्ठस्वर को उत्तम बनाने वाली, देखने की शक्ति को बढ़ाने वाली तथा कुष्ठ, मूत्ररोग, त्रिदोष, आम, शोथ, व्रण एवं विष को नष्ट करनेवाली, विपाक में कटुरसयुक्त, स्मृति तथा बुद्धि को देने वाली होती है। [१११-११२] नोट-भावप्रकाशकार आस्फोता, गिरिकर्णी, विष्णुक्रान्ता तथा अपराजिता ये चार पर्याय लिखते हैं। ध० नि० एवं रा० नि० में इसके 'अश्वक्षुर', 'श्वेतस्पन्दा' आदि अन्य पर्याय दिये हुए हैं किन्तु विष्णुक्रान्ता का वहाँ उल्लेख नहीं है। आगे शंखपुष्पीभेद में विष्णुक्रान्ता १ का उन्होंने स्वतन्त्र उल्लेख किया है जिसके ध० नि० ने नील, शुक्ल एवं रक्तपुष्पभेद से ३ भेद किये हैं। वहाँ पर रा० नि० ने (शंखपुष्पी के अतिरिक्त) नीलपुष्पा, अपराजिता ये पर्याय विष्णुक्रान्ता के दिये हैं। भावप्रकाशकार शंखपुष्पी के पर्यायों में विष्णुक्रान्ता का उल्लेख नहीं करते। अधिकांश विद्वानों ने अपराजिता को क्लिटोरिआ टर्नेटिआ लिन. (Clitoria ternatea Linn.) माना है तथा इसके नील एवं श्वेतपुष्प भेद पाये भी जाते हैं। किन्तु केरल में इसका (क्लि. टर्नेटिआ को) शंखपुष्पी नाम से व्यवहार करते हैं ऐसा उल्लेख 'आयुर्वेदिक फ्लोरा मेडिका' में है। इसी प्रकार एव्होलह्यूलस् ऑल्सिनॉइडीस् लिन. (Evolvulus alsinoides Linn.) जिसे अधिकांश विद्वान् शंखपुष्पी मानते हैं उसका केरल में विष्णुक्रान्ता नाम से व्यवहार किया जाता है। श्री ठा० बलवन्तसिंह जी का मत है कि एहॉलह्यूलस् ऑल्सिनाइडीस् (पुष्प नीले) को ही विष्णुक्रान्ता मानना चाहिये तथा नीलापराजिता को विष्णुक्रान्ता नहीं मानना चाहिये। इसी प्रकार शंखपुष्पी के पुष्पों का श्वेत होना आवश्यक होने के कारण ए. अल्सिनॉइडीस् से मिलती जुलती उसी वर्ग की अन्य जाति कन्हॉव्हलस् प्लुरिकॉलिस चाइसी (Convolvulus pluricaulis Choisy) को शंखपुष्पी मानना चाहिये जिसके पुष्प हलके गुलाबी या श्वेत रंग के पाये जाते हैं तथा जिनके गुणों में विशेष अन्तर नहीं है। कुछ लोगों ने कन्स्कोरा डिकसेटा शुल्ट (Canscora decussata Schult) को शंखपुष्पी माना है। १. विष्णुक्रान्ता कटुस्तिक्ता कफवातामयापहा (ध.नि.)
गुडूच्यादिवर्गः ५१५ शंखपुष्पी का आगे स्वतन्त्र वर्णन किया गया है। यहाँ अपराजिता (क्लिटोरिआ टर्नेरिआ) का वर्णन किया गया है। ५०. अपराजिता हिं० - अपराजिता, कोयल, कालीजर । बं० - अपराजिता । म० - गोकर्णी, काजली, गोकर्ण । पं० - धनन्तर । गु० - गरणी । क० - शंखपुष्प, गिरिकर्णिके । ता० - काक्कणनकोटी । ते० - दिटेन । मल० - शंखपुष्पम् । इरा० - मझ़ेरियुन्-इ-हिंदी । अं० - Winged-leaved clitoria (विंगड लिव्ड क्लिटोरिआ) । ले० - Clitoria ternatea Linn. (क्लिटोरिआ टर्नेटिआ लिन.) । Fam. Leguminosae (लेगुमिनोसी.) । यह सब प्रान्तों में पाई जाती है । अधिकतर यह बगीचों में लगाई हुई मिलती है । बस्तियों के आस-पास वन्य अवस्था में भी कभी-कभी दिखाई देती है । पुष्पभेद से यह नील एवं श्वेत दो प्रकार की होती है । इसकी लता-बहुवर्षायु, सुन्दर तथा पतले काण्ड की होती है । यह वृक्षों या झाड़ियों पर लिपटती हुई (चक्रारोही) बढ़ती है । पत्ते-संयुक्त, असम-पक्षवत् (Imparipinnate) रहते हैं । पत्रक-प्रायः ५ कभी-कभी ७, अंडाकार एवं १-२ इञ्च लम्बे होते हैं । पुष्प-जलसीप के आकार वाले नलीयुक्त, गोल, चमकीले नीले अथवा कभी-कभी श्वेत पुष्प, १ १/२-२ इञ्च बड़े एवं पत्रकोणीय पुष्पपण्ड में एकाकी रहते हैं । ध्वजदल चम्मच के आकार का और पक्षदलों के नीचे फैला रहता है । कोणपुष्पक बड़े, स्थायी तथा पर्णसदृश होते हैं । फली-२-४ इञ्च लम्बी, चिपटी, नुकीली तथा सीधी या बहुत थोड़ी मुड़ी हुई होती है । बीज-६-१० अंडाकार, चिपटे, चिकने तथा गहरे भूरे रंग के होते हैं । इसके मूल का अधिक उपयोग किया जाता है । इसके पुष्प, पत्र एवं बीज आदि का भी उपयोग करते हैं । रासायनिक संगठन-इसकी जड़ की छाल में स्टार्च, टैनिन, राल तथा ११% राख होती है । बीज में तैल, कडुवी भूरे रङ्ग की राल तथा ६% राख होती है । गुण और प्रयोग-इसकी जड़ भेदन, मूत्रल एवं वेदनास्थापन है । इससे वमन भी होता है । वमन के साथ-साथ पेट में दर्द होकर विरेचन भी होता है । कभी-कभी वमन नहीं भी होता । इसके बीज जलप की तरह किन्तु सौम्य भेदन तथा अल्प मूत्रजनन हैं । विरेचन के लिये बीजों के साथ सोंठ एवं सैंधव का उपयोग किया जाता है । इसका उपयोग उदर, कफविकार, ज्वर, मूत्रविकार, गलगण्ड, गण्डमाला, अपची, शोथ, नेत्ररोग, उन्माद, आमवात, कुष्ठ एवं विष में किया जाता है । (१) सभी प्रकार के जलोदर में विरेचन के लिये इसका उपयोग करते हैं । इससे विष का निर्हरण होता है । (२) शुक्रमेह, बस्तिशोथ एवं मूत्रकृच्छ्र में इसकी जड़ का फांट पिलाया जाता है । (३) बच्चों के कास-श्वास में बीजों को सेंक पीसकर थोड़ा गुड़ एवं सैंधव मिलाकर पिलाने से दस्त के साथ कफ निकल कर आराम मिलता है । कफ विकारों में मूल को दूध के साथ पिलाते हैं । (४) अर्धभेदक में श्वेत अपराजिता की जड़ के स्वरस का नस्य कराया जाता है । (५) इसके पत्तों का रस, आर्द्रकरस के साथ पसीना रोकने के लिये देते हैं । त्वग्रोगों में पत्तों का फांट पिलाते हैं । कान के चारों तरफ सूजन होकर ग्रन्थियों की वृद्धि होने पर पत्तों को सैंधव के साथ पीसकर लगाते हैं । (६) सर्पविष में इसकी जड़ की छाल तथा निर्गुण्डी मूलत्वक् को जल में पीस कर पिलाने से लाभ होता है । (च० चि० अ० २५) मात्रा-मूलत्वक् चूर्ण १।।-३ माशा; बीजचूर्ण १०-२० र० । १. विष्णुकान्ता कटुस्तिक्ता कफवातामयापहा । (ध. नि.)
५१६ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ सिन्दुवारः (मेउड़ी-सेन्दुवार) निर्गुण्डी (नीलसम्हालू) इति च तयोर्नामानि गुणांश्चाह सिन्दुवारः श्वेतपुष्पः सिन्दुकः सिन्दुवारकः । नीलपुष्पी तु निर्गुण्डी शेफाली सुवहा च सा ।।१९३।। सिन्दुकः स्मृतिदस्तिक्तः कषायः कटुको लघुः । केश्यो नेत्रहितो हन्ति शूलशोथाममारुतान् । कृमिकुष्ठारुचिश्लेष्मज्वरान्नीलापि तद्विधा ।।१९४।। सम्हालू जिसे लोक में मेउड़ी तथा सेन्दुवार कहते हैं, उसके भेद, नाम तथा गुण—सम्हालू दो प्रकार का होता है एक सफेद फूल वाला, दूसरा नीले फूल वाला । सफेद फूल वाले सम्हालू के संस्कृत नाम—सिन्दुवार, सिन्दुक और सिन्दुवारक ये सब हैं। नीले फूल वाले सम्हालू के संस्कृत नाम—निर्गुण्डी, शेफाली और सुवहा ये सब हैं। सम्हालू- (सफेद फूल वाला) स्मरणशक्तिवर्धक, तिक्त, कषाय और कटुरसयुक्त, लघु, केश तथा नेत्र के लिये हितकारी होता है एवं यह शूल, शोथ, आमवात, कृमि, कुष्ठ, अरुचि और कफ-ज्वर को नष्ट करता है । इसी भाँति नीले फूल वाले सम्हालू के भी गुण हैं । [१९३-१९४] अथ सिन्दुवारपत्रगुणानाह सिन्दुवारदलं जन्तुवातश्लेष्महरं लघु ।।१९५।। सम्हालू के पत्तों के गुण—सम्हालू के पत्ते—कृमि, वात और कफ को दूर करने वाले तथा लघु होते हैं । [१९५] नोट—सम्हालू के दो भेदों का भावप्रकाशकार ने वर्णन किया है । 'निर्गुण्डी' यह नीले सम्हालू के लिये कहा गया है । निर्गुण्डी का ही पर्याय शेफाली दिया गया है । ध० नि० ने 'सिन्दुवार' के श्वेत एवं नील भेद दिये हैं तथा 'शेफालिका' के भी निर्गुण्डी (नीलपुष्प) एवं शुक्ला ये भेद दिये हैं । इसी प्रकार रा० नि० एवं म० नि० ने भी शेफाली से नील (निर्गुण्डी) का ग्रहण किया है । श्री ठा० बलवन्त सिंहजी शेफालिका यह नाम हरसिंगार (Nyctanthes arbortristis) के लिए उचित समझते हैं । हरसिंगार का वर्णन पहले पृष्ठ ३३५ पर किया गया है । कुछ लोगों ने 'नीलनिर्गुण्डी' नाम जस्टिसिआ जेण्डारुसा (Justicia gendarussa) को दिया है जिसका पृष्ठ ३२३ पर वर्णन किया गया है । आधुनिक उद्भिज्जवेत्ताओं ने भी इसके कई भेदों का वर्णन किया है। वाइटेक्स नेगुण्डो (Vitex negundo) में श्वेत या हलके नीले दोनों प्रकार के पुष्प पाये जाते हैं तथा पत्रक भी अखंड या दन्तुर दोनों प्रकार के होते हैं। इसके अतिरिक्त इसका एक भेद वाइटेक्स ट्राइफोलिआ (Vitex trifolia) भी पाया जाता है । रेणुकबीज, जिनका पृष्ठ २५१ पर वर्णन किया गया है वे भी ईरान में होने वाली निर्गुण्डी जाति के वृक्षों के फल हैं । ५१. सम्हालू-निर्गुण्डी हिं०-सम्भालू, सम्हालू, सन्दुआर, सिनुआर, मेउड़ी । बं०-निशिन्दा । म०-लिंगड, निगड़, निर्गुण्डी । पं०- वन्न, भरवन, मौरा । गु०-नगोड़, नगड़ । ता०-नोच्चि । म०-करिनोच्चि । ते०-वाविली, तेल्लावाविली । क०- बिलिनेक्कि । फा०-पंजंबगुस्त । अ०-असलक । अं०-Five Leaved Chaste Tree (फाइव लीव्ड् चेस्ट ट्री) । Indian Privet (इण्डियन प्रिवेट) । ले०-Vitex negundo Linn. (वाइटेक्स नेगुण्डो लिन.) । Fam. Verbenaceae (वर्बिनेसी) । इसके वृक्ष प्रायः सब प्रान्त के वन, उपवन, नदियों के किनारे, गावों के आसपास की परती जमीन में और बागों में भी पाये जाते हैं । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
गुडूच्यादिवर्गः ५१७ इसके बड़े-बड़े गुल्म प्रायः ६-२८ फीट ऊँचे अथवा कभी-कभी बड़े वृक्ष के समान होते हैं। इस पर श्वेताभ रोमावरण होता है। छाल-पतली, चिकनी तथा धूसरवर्ण की होती है। पत्ते-सदल तथा ३.५ पत्रकों से युक्त होते हैं। पत्रक-भालाकार, लम्बाग्र, अखण्ड या गोल दन्तुर, २-५ इञ्च लम्बे, १/२-१ १/२ इञ्च चौड़े तथा छोटे बड़े आकार के होते हैं। अग्र का पत्रक लम्बा एवं उसका वृन्त भी लम्बा होता है। नीचे के पत्रक या बगल वाले पत्रक छोटे तथा छोटे या बिना वृन्त के होते हैं। ये ऊपर से हरे तथा नीचे श्वेताभवर्ण के होते हैं। पुष्प-आयताकार और २-८ इञ्च लम्बी मञ्जरियों में निकले रहते हैं। ये श्वेत या हलके नीले (बैंगनी) रङ्ग के होते हैं। फल-छोटे, गोल, १/४ इञ्च व्यास के तथा पकने पर काले रङ्ग के होते हैं। इसकी जड़ पर पराश्रयी वनस्पति पाई जाती है जो एलेक्ट्रा पराझिटिका वेर. चित्रकूटेन्सिस् (Alectra parasitica, A. Rich, Var. Chitrakutensis) है। यह वर्षाकाल में होती है तथा अक्तूबर-नवंबर तक परिपक्व होने पर इसके कंद को संग्रह कर सुखा कर इसका चूर्ण बना प्रयोग करते हैं। बिहार के वैद्य इसको गलित कुष्ठ के लिये उपयोगी बतलाते हैं। प्रारंभिक परीक्षण से देखा गया है कि ४ ग्राम दैनिक विभक्त मात्रा से लाभ होता है। अधिक मात्रा से अतिसारादि उपद्रव होते हैं। (प्रसाद, बी. एन्.; लेप्रसी रिव्यू, जुलाई ६२ खण्ड XXXIII, अंक ३.) इसकी एक दूसरी जाति होती है जिसे (ले०) वाइटेक्स ट्राइफोलिया लिन. (Vitex trifolia Linn.) कहते हैं। इसके पत्ते-१-३ पत्रक होते हैं। पत्रक-१-३ इञ्च लम्बे, सभी अवृन्त, अभिलट्वाकार या अभिलट्वाकार-आयताकार, अखण्ड तथा किञ्चित् कुण्ठिताग्र होते हैं। पुष्प-हलके नीले वर्ण के होते हैं। फल-काले रङ्ग के तथा १/५ इञ्च व्यास में होते हैं। इनके पंचांग तथा पत्तों का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। कुछ विद्वानों के मत से दन्तुर पत्र अधिक लाभदायक माने जाते हैं। रासायनिक संगठन-इसके पत्तों में एक रंगहीन गन्धयुक्त उड़नशील तैल तथा एक राल होती है। इसके बीजों में अम्ल राल, कषाय आर्गेनिक अम्ल, मॅलिक् एसिड, अत्यल्प क्षाराभ तथा रंजक द्रव्य होते हैं। गुण और प्रयोग-यह कटु, तिक्त, कषाय, उष्ण, लघु, दीपन, वेदनास्थापन, वातहर, कफहर, ज्वरघ्न, मूत्रजनन, आर्तवजनन, कृमिघ्न, मस्तिष्कबलदायक, शोथघ्न, विषहर, बल्य एवं रसायन है। शोथघ्न, वेदनास्थापन एवं वातहर गुण बहुत प्रभावशाली हैं। इसके पुष्प शीतल तथा पित्तनाशक हैं। (सु० सू० अ० ४६) इसका प्रयोग आमवात, वातव्याधि, कास, ज्वर, प्रदर, शूल, अपचन, आध्मान, अपची, क्षय, कुष्ठ, शोथ, व्रण, प्लीहावृद्धि एवं कृमि में किया जाता है। सभी प्रकार के रोगों में शिलाजतु के साथ इसका प्रयोग लाभदायक होता है। (१) शोथयुक्त सभी व्याधियों में यह बहुत ही लाभदायक है। फुप्फुसशोथ, फुप्फुसावरणशोथ, उदरावरणशोथ, किसी प्रकार का संधिशोथ, तीव्र आमवातिक संधिशोथ एवं सोजाक में कभी-कभी होने वाले अंडशोथ में इसका अन्तर्बाह्य प्रयोग करते हैं। इसके पत्तों को पीसकर हाँड़ी में गरम कर शोथ पर दिन में ३, ४ बार बाँधना चाहिये। इसके साथ करञ्ज, नीम तथा धतूरे के पत्तों का भी उपयोग करने से अधिक लाभ होता है। निर्गुण्डी में अनुलोमिक गुण न होने के कारण शोथ में प्रारंभ में नागदन्ती या रसकपूर जैसे विरेचक औषध का उपयोग करना चाहिये। (२) कफज्वर, फुप्फुसपाक तथा फुप्फुसावरणशोथ आदि में इसके पत्तों का स्वरस या क्वाथ छोटी पीपल के साथ पिलाते हैं तथा पत्तों से सेकते हैं। प्रतिश्याय तथा गले के शोथ में इसके सूखे पत्तों का धूम्रपान कराया जाता है तथा पत्तों का क्वाथ छोटी पीपल एवं घोड़बच के साथ पिलाते हैं। कास में पत्रस्वरससिद्धघृत का उपयोग लाभदायक है। राजयक्ष्मा में इसके पंचांग के स्वरस से सिद्ध घृत या स्वरस में घृत मिलाकर प्रयोग करते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
५१८ भावप्रकाशनिघण्टुः (३) आमवात में निर्गुण्डी, तुलसी एवं भँगरेया का स्वरस अजवायन के चूर्ण के साथ देते हैं तथा पत्तों से सेंकते हैं। गृध्रसी में नीले पुष्पवाली निर्गुण्डी के पत्तों का क्वाथ पिलाते हैं तथा पत्तों से सेंकते हैं। (४) शीतज्वर, विषमज्वर एवं सूतिकाज्वर आदि में इसके पत्तों का चूर्ण, पंचांग स्वरस, फांट या क्वाथ को देते हैं तथा इसके क्वाथ से शरीर पोंछते हैं। इससे शरीर का दाह एवं दुर्गन्धि कम होती है। विषमज्वर में प्लीहावृद्धि होने पर इसके पत्र एवं हरीतकी को गोमूत्र के साथ देते हैं या पत्तों को कुटकी एवं रसौत के साथ देते हैं। सूतिकाज्वर में इससे आर्तवशुद्धि होती है तथा गर्भाशय एवं उसके आसपास के अङ्गों का शोथ भी कम होता है। इसमें आन्तरिक प्रयोग के साथ इसके पत्तों को गरम करते बाँधते हैं। ज्वर में वमन तथा तृषाशान्ति के लिये इसके पुष्प मधु के साथ खिलाते हैं। (५) नहरुवा कृमि में इसको खिलाते हैं तथा इससे सेंकते हैं। (६) इसके मूल एवं पत्रस्वरस से सिद्ध तैल का शोथ, व्रण, नाड़ीव्रण, कुष्ठ, अपची, गंडमाला तथा सन्धिपीड़ा में व्यवहार किया जाता है। कर्णपूय में मधु के साथ इस तैल को कान में डालते हैं। (७) सोजाक में पेशाब रुकने पर इसके उष्ण क्वाथ में रोगी को बैठाते हैं। (८) पाँव की जलन में पत्तों को बाँधते हैं। शिरःशूल में पत्तों को पीसकर सर पर बाँधते हैं तथा फलों के चूर्ण का नस्य देते हैं। सोते समय सर के नीचे पत्तों की तकिया भी रखते हैं। (९) कीड़े आदि से रक्षा करने के लिये चावल, कपड़े तथा पुस्तकों में इसके पत्ते रखते हैं। मात्रा-पत्रस्वरस १-२ तो०; पत्रचूर्ण १/४-१/२ तो०; मूलत्वक् १-३ मा०। अथ कुटजः (कुडा-कोरैया) तस्य नामगुणानाह कुटजः कूटजः कौटो वत्सको गिरिमल्लिका ।।११६।। कालिङ्गः शक्रशाखी च मल्लिकापुष्प इत्यपि । इन्द्रो यवफलः प्रोक्तो वृक्षकः पाण्डुरद्रुमः ।।११७।। कुटजः कटुको रूक्षो दीपनस्तुवरो हिमः । अर्शोऽतिसारपित्तास्रकफतृष्णाऽऽमकुष्ठनुत् ।।११८।। कुडा के नाम तथा गुण-कुटज, कूटज, कौट, वत्सक, गिरिमल्लिका, कालिङ्ग, शक्रशाखी, मल्लिकापुष्प, इन्द्र (इन्द्र पर्यायवाची सभी शब्द), यवफल, वृक्षक और पाण्डुरद्रुम ये सब कुडा के संस्कृत नाम हैं। कुडा-कटु तथा कषायरसयुक्त, रूक्ष, अग्निदीपक और शीतवीर्य होता है। एवम् यह बवासीर, अतिसार, पित्त, रक्त, कफ, तृषा आम तथा कुष्ठ को दूर करता है। [११६-११८] ५२. कूड़ा हिं०-कूड़ा, कोरयां, कुड़ा, कोरैयाँ, कुरैयाँ। बं०-कुरचि। म०-पांढरा कुड़ा। गु०-कडो। क०-कोरासिमिन। ते०-कांककोडिसे, पला कोडसा। उ०-कुड़िया। ता०-वेप्पालै, कोडगपल। मल०-वेनपाला। फा०-जबानै गुजस्खे तल्ख। अ०-लसनुल्लास फिरुलमुर्र, तिबाज। अं०-Kurchi, Conessi or Tellicherry Bark (कुर्चि, कोनेसि या तेल्लिचेरि वार्क)। ले०-Holarrhena antidysenterica Wall. (होलेहेना एण्टिडिसेन्टेरिका वाल)। Fam. Apocynaceae (एपोसाइनेसी)। यह भारतवर्ष के प्रायः सभी भागों में आर्द्र भूमि को छोड़कर तथा हिमालय की ४००० फीट ऊँची चोटियों पर उत्पन्न होता है। इसके छोटे-छोटे वृक्ष दून और सहारनपुर के जङ्गलों में बहुत होते हैं। कहीं-कहीं रोपित भी किया जाता है।
गुडूच्यादिवर्गः ५१९ कूड़े का वृक्ष बहुत ऊँचा नहीं होता, प्रायः ८-१० हाथ ऊँचा वृक्ष देखने में आता है । छाल-चौथाई इञ्च तक मोटी, खुरदरी, भूरे रंग की होती है । लकड़ी हलकी पीली और कोमल होती है । पत्ते-५-१० इञ्च लम्बे तथा २-४ इञ्च चौड़े, नोकीले, लट्त्वाकार-अंडाकार या कुछ आयताकार चिकने या मृदुरोमेश एवं प्रधान शिराएँ १०-१४ युग्म होती हैं । फूल-सफेद आते हैं और उनमें कुछ सुगन्धि जान पड़ती है । फलियाँ-दो-दो एक साथ परन्तु असंयुक्त, ८ से १६ इञ्च तक लम्बी, पतली, तिहाई इञ्च मोटी और कुछ टेढ़ी होती हैं । बीज-जई के समान आध इञ्च तक लम्बे, रेखाकार, आयताकार और अन्त के सिरे पर प्रायः हलके भूरे रङ्ग के रोमगुच्छ से युक्त होते हैं । इन्हें इन्द्रजव कहते हैं, और वे स्वाद में कड़वे होते हैं । इन्द्रजव तथा इसकी आर्द्र छाल का विशेष व्यवहार किया जाता है । इसी वृक्ष को श्वेत कुटज या पुंकुटज कहा जाता है तथा गुण में यह 'प्रतिनिधि तथा व्यामिश्रण' में लिखित राइटिया टिंक्टोरिया, सं०-कृष्ण कुटज या स्त्रीकुटज जिसके बीजों को मीठा इन्द्रजव कहते हैं उससे उत्कृष्ट है । रासायनिक संगठन-इसकी छाल एवं बीजों में अनेक प्रकार के क्षाराभ (Alkaloids) पाये जाते हैं जिनमें कोनेसाइन (Conessine, C₂₄ H₄₀ N₂), कुर्चिन (Kurchine, C₂₃ N₃₈ N₂), कुर्चिसीन (Kurchicine, C₂₀ H₃₆ ON₂) तथा होलेर्हेनाइन (Holarrhenine, C₂₄ H₃₈ ON₂) आदि मुख्य हैं । इसकी छाल में सम्पूर्ण क्षाराभों की अधिकतम मात्रा ४.५% से अधिक नहीं होती तथा बीजों में यह छाल की अपेक्षा कम होते हैं । प्रायः छाल में १.५% और बीज में .०२५% यह रहते हैं । इसके विभिन्न क्षाराभों का प्रयोग जानवरों पर तथा मनुष्यों में किया गया है तथा उसके परिणामों का अध्ययन किया गया है जिसमें सम्पूर्ण क्षाराभ अधिक उपयोगी सिद्ध हुआ है । (१) सम्पूर्ण क्षाराभ (Total alkaloids)—नवीन आमातिसार (Acute Amoebic Dysentery) में इसकी १/२ र० (१ ग्रेन) की मात्रा में प्रतिदिन पेश्यन्तर्य सूचिकाभरण करने से एमेटीन (Emetine) की अपेक्षा अधिक लाभ हुआ । एमेटीन के समान इससे कोई विषैला प्रभाव जैसे अवसाद (Depression), वमन, प्रक्षोभ (Irritation) एवं संचायि (Cumulative) प्रभाव नहीं हुआ । इसको प्र० दि० १ र० (२ ग्रेन) की मात्रा में भी सूचिकाभरण करने से एमेटीन के समान शारीरिक वा मानसिक किसी भी प्रकार का अवसाद (Depression) नहीं होता । सिवाय अत्यधिक मात्रा के इसका गर्भाशय पर कोई विषैला प्रभाव नहीं पड़ता । इसके सूचिकाभरण के स्थान पर केवल कुछ पीड़ा एवं सूजन हो जाती है जो २४ से ४८ घण्टे में दूर हो जाती है । इससे कोई स्थानिक कोथ (Necrosis) या रक्तस्राव नहीं होता जैसा एमेटीन में होता है । पुराने रोगियों में इसके सूचिकाभरण से विशेष लाभ नहीं होता । (२) कुरची बिस्मथ आयोडाइड (Kurchi bismuth iodide)—यह नारंगी लाल रंग का चूर्ण होता है । इसमें २७% सम्पूर्ण क्षाराभ तथा २२.८५% बिस्मथ तथा आयोडीन (Iodine) ५०.१५% रहता है । पुराने आमातिसार (Chronic Amoebic Dysentery) में इसका मुख द्वारा प्रयोग लाभदायक है । इसको ५ र० (१० ग्रेन) दिन में दो बार १० से २० दिन तक दिया जाता है । इससे नाड़ी की गति, वेग, बल एवं रक्त के दबाव पर कोई दुष्परिणाम नहीं होता । हृद्-विकारों के रोगियों में भी इसके देने से कोई विषैला प्रभाव नहीं दिखलाई देता । एमेटीन के समान वमन, अतिसार आदि अन्य प्रक्षोभक उपद्रव भी इसके प्रयोग से नहीं होते न कोई संचायि (Cumulative) प्रभाव ही होता है । इसके सेवन से १/२ घंटा पूर्व क्षारीय मिश्रण देना चाहिये क्योंकि प्रायः अतिसार में पाखाने की प्रतिक्रिया अम्ल होती है जिसमें कुरची कम प्रभावशाली होती है । उपर्युक्त सूचिकाभरण के साथ इसका प्रयोग किया जा सकता है अथवा इसके साथ एमेटीन की सूई भी दी जा सकती है । इन क्षाराभों का प्रभाव अमीबाजन्य यकृत् विकृति पर अभी निश्चित नहीं हुआ है । (३) कोनेसाइन (Conessine)—इस क्षाराभ को भी सूचिकाभरण द्वारा किया जा सकता है लेकिन इसकी अपेक्षा सम्पूर्ण क्षाराभ का प्रयोग करना अधिक अच्छा है । जानवरों में प्रयोग से मालूम हुआ है कि यह हृदय, श्वसन-
५२० भावप्रकाशनिघण्टुः संस्थान तथा मस्तिष्क के लिये हानिकर है। यह २८०,००० में १ हिस्से के अनुपात में भी अमीबा के लिये क्षारीय घोल में ८ मिनट में तथा बिना क्षारीय घोल में १८ मिनट में घातक है जबकि एमेटीन २००,००० में १ भाग में घातक होती है। इसके सूचिकाभरण से भी संपूर्ण क्षाराभ के समान स्थानिक प्रतिक्रिया होती है लेकिन जानवरों के समान मनुष्यों में कोई विशेष विषैला प्रभाव नहीं पड़ता। एक विशेष महत्त्व की बात यह है कि यह क्षाराभ परख नली (In vitro) में क्षय दण्डाणु (Tubercle bacillus) की वृद्धि रोकने में समर्थ है। गुण और प्रयोग- इसकी आर्द्र छाल कड़वी, अग्निदीपक, पाचक, ग्राही, अतिसारहर, ज्वरहर एवं रक्तसंग्राहक है। इसका प्रयोग रक्तातिसार, संग्रहणी, प्रवाहिका, ज्वरातिसार, जीर्णज्वर, पचन संस्थान के अनेक विकार, श्वास एवं वृक्कशूल आदि रोगों में किया जाता है। इसको पुटपाक, अवलेह, क्वाथ, फांट, चूर्ण या अरिष्ट के रूप में व्यवहार में लाते हैं। सुगन्धि, संग्राही तथा अतिसारनाशक अन्य औषधियों के साथ इसके क्वाथ या चूर्ण का प्रयोग लाभदायक है। इसकी छाल को खट्टे मट्ठे के साथ पीस कर लेने से अधिक गुण होता है। यह बच्चों एवं गर्भिणी में बिना किसी भय के दी जा सकती है। (१) अतिसार की किसी भी अवस्था में यह औषधि बहुत लाभदायक सिद्ध हुई है। विशेष कर रक्तातिसार तथा पुराने आमातिसार (Chronic amoebic dysentery) में इसके प्रवाही सत्त्व (Liquid extract) का स्वतंत्र प्रयोग या उसके साथ इसबगोल, एरंड तैल या इन्द्रजव आदि को देने से बहुत लाभ होता है। इसके क्वाथ या फांट के साथ अतीस, घोड़वच या मोचरस मिलाकर दे सकते हैं। एमेटीन के सूचिकाभरण के साथ इसको मुख द्वारा लेने से अधिक लाभ देखा गया है। इससे बनी हुई औषधियाँ जैसे कुर्चिसॉल (Kurchisol), कुर्चिलाइड (Kurchiloid), कुर्चिबार्क एक्स्ट्रैक्ट (Kurchi bark extract) आदि डाक्टरी दुकानों में बिकती हैं जिनका प्रयोग सुगम है एवं उनके क्षाराभों की मात्रा भी निश्चित रहती है। कुटज एपिकाकुआन्हा के समान कार्यकर औषधि है तथा उसमें इसके कुछ भी दोष नहीं हैं। आयुर्वेदिक योगों में अवलेहादि के अतिरिक्त कुटजाष्टक क्वाथ (शार्ङ्ग.) एवं पाठाद्य चूर्ण (चक्र.), लघु एवं बृहद् गंगाधर चूर्ण आदि उपयोगी हैं। (२) प्रसूति के पश्चात् योनिमार्ग की शिथिलता दूर करने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है। (३) जीर्ण ज्वर में इसका प्रयोग लाभदायक सिद्ध हुआ है। इससे सिनकोना की तरह वमन, हल्लास, शिरःशूल आदि नहीं होता। (४) इसकी कोमल फली तथा पत्रों की साग बच्चों में केचुवें की बीमारी में देते हैं। (५) इसका लेप आमवात एवं संधिशोथ में लाभदायक है तथा जलशोथ में इसके चूर्ण को शरीर पर मला जाता है। (६) दन्तशूल में इसके क्वाथ से कुल्ला करने से लाभ होता है। मात्रा- त्वक् चूर्ण १-४ मा, त्वक् चूर्ण १-४ तो. क्वाथ बना कर; फांट (१० में १) १ से २ औंस; प्रवाहीसत्त्व ६०-१२० बूँद; कुर्चि बिस्मथ आयोडाइड ४ ग्रा० द्वि० प्र० दि० २ हफ्ते तक। नोट- इन्द्रयव प्रकरण भी देखें। प्रतिनिधि और व्यामिश्रण- (क) राइटिया (Wrightia) की विभिन्न-विभिन्न उपजातियाँ जैसे—रा० टिन्क्टोरिया, रा० टोमेन्टोसा (W. tinctoria R. Br.; W. tomentosa Roem. & Schult), विशेषकर रा० टिन्क्टोरिया का गलती से अथवा मिलावट के रूप में कुटज के स्थान पर प्रयोग किया जाता रहा लेकिन इनमें कार्यकारी औषधि गुण