भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुडूच्यादिवर्गः ५११ इसके भी (क) की तरह के ही मध्यम ऊँचाई के वृक्ष होते हैं । ये छोटे रहने पर ही फूलने-फलने लगते हैं । पत्ते— बहुत गहराई तक कटे हुए, आयताकार, ५-७ इञ्च लम्बे, खंड के अग्र प्रायः कोणीय एवं पत्रसिराएँ ९-११ रहती हैं । पुष्प—पुष्पकलिका गहरे हरे या भूरे रंग की एवं पाँच कोणों से युक्त होती है । पुष्प (क) की अपेक्षा छोटे, पाँच दलपत्रों से युक्त, चमकीले बैंगनी, नीलारुण या गहरे गुलाबी रंग के होते हैं । काञ्चनार तथा कोविदार दोनों में बाह्यनाल लंबा और पूर्ण पुंकेशर ३-५ होते हैं । फली—लम्बी हरिताभ बैंगनी रंग की होती है । इसकी जड़ विषैली होती है । (ग) सं०—पीत कोविदार । ता०—तिरूवत्ती । ते०—कांचीनी । म०—सोन । सिलो०—कहपेतन । ले०— Bauhinia tomentosa Linn. (बौहिनिया टोमॅण्टोसा लिन.) । यह लंका में अधिक होता है । इसके पुष्प पीतवर्ण के किन्तु आधार की तरफ कुछ हलके भूरे या किरमिजी रंग के धब्बों से युक्त होते हैं । सभी की छाल, पत्र एवं पुष्पों का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है । कोमल कलिकाओं का शाक बनाया जाता है । रासायनिक संगठन—इसकी छाल में टैनिन होता है । इससे एक प्रकार का गोंद भी निकलता है । गुण और प्रयोग—कांचनार की छाल, ग्राही, रसायन, बल्य व्रणशोधक एवं व्रणरोपक है । इसके पुष्प रक्तपित्तहर हैं । छाल की क्रिया त्वचा तथा रसग्रंथियों पर होती है जिससे वहाँ की विनिमयक्रिया सुधरती है । इसकी अधिक मात्रा से वमन तथा विरेचन होता है । (१) गंडमाला तथा अपची में इसकी छाल का बहुत प्रयोग किया जाता है । इसका क्वाथ गुग्गुल के साथ पिलाते हैं तथा इससे व्रणप्रक्षालन करते हैं । गंडमाला में सोंठ एवं इसका चूर्ण चावल के धोवन के साथ देते हैं । इसकी छाल को पीसकर लेप भी करते हैं । नये रोग में इससे अधिक लाभ होता है । इसकी छाल का क्वाथ कुष्ठ, चर्मरोग, अतिसार एवं व्रण में दिया जाता है । मसूरिका में इसके क्वाथ में सुवर्णमाक्षिक भस्म डालकर पिलाते हैं । खदिरफल, दाडिमपुष्प एवं इसकी छाल के क्वाथ से कुल्ला करने से अधिक लालास्राव तथा गले के विकारों में लाभ होता है । रक्तपित्त में इसके पुष्प का चूर्ण मधु के साथ चटाते हैं तथा इसके शाक खिलाते हैं । पुष्पों का क्वाथ रक्तप्रदर, रक्तार्श, रक्तमेह तथा कास एवं रक्तातिसार आदि में दिया जाता है । मृदुविरेचक रूप में इसके पुष्पों को चीनी के साथ खिलाते हैं । इसके मूल का चूर्ण मट्ठे के साथ अर्श में दिया जाता है । मूल का क्वाथ अपचन तथा आध्मान में दिया जाता है । मात्रा—त्वक्चूर्ण २-४ माशा । पुष्पकलिकाचूर्ण १-२ माशा । अथ शोभाञ्जनः (सहिजना), (श्यामः श्वेतो रक्तश्च) तन्नामानि तद्गुणाँश्चाह शोभाञ्जनः शिग्रुतीक्ष्णगन्धकाक्षीवमोचकाः । तद्बीजं श्वेतमरिचं मधुशिग्रुः सलोहितः । शिग्रुः कटुः कटुः पाके तीक्ष्णोष्णो मधुरो लघुः ।।१०५।। दीपनो रोचनो रूक्षः क्षारस्तिक्तो विदाहकृत् । संग्राही शुक्रलो हृद्यः पित्तरक्तप्रकोपणः ।।१०६।। चक्षुष्यः कफवातघ्नो विद्रधिश्वयथुकृमीन् । मेदोऽपचीविषप्लीहगुल्मगण्डव्रणान्हरेत् ।।१०७।। श्वेतः प्रोक्तगुणो ज्ञेयो विशेषाद्दाहकृद्भवेत् । प्लीहानं विद्रधिं हन्ति व्रणघ्नः पित्तरक्तहृत् । मधुशिग्रुः प्रोक्तगुणो विशेषाद्दीपनः सरः ।।१०८।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA