भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 561, कुल 1167 में से

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५१० भावप्रकाशनिघण्टुः नोट-भावप्रकाशकार ने काञ्चनार एवं कोविदार ये दो भेद लिखे हैं किन्तु दोनों के गुण समान ही लिखे हैं। रा० नि० एवं ध० नि० ने कोविदार एवं काञ्चनार ये पर्याय रूप में लिये हैं किन्तु रा० नि० ने इसके 'पीत पुष्प', 'गिरिज', 'महापुष्प' आदि अन्य पर्यायों का भी उल्लेख किया है। नि० र० ने पीत, रक्त एवं श्वेत ये ३ भेद दिये हैं तथा उनके गुणों का स्वतंत्र उल्लेख किया है। आधुनिक उद्भिद्‌वेत्ताओं ने इसकी कई जातियों का उल्लेख किया है। बौहिनिआ बेरिगेटा (Bauhinia variegata) को अधिकांश लोगों ने काञ्चनार माना है। इसके पुष्प चमकीलें बैंगनी, गुलाबी, किरमिजी, श्वेत आदि रंगों के होते हैं। इसी प्रकार बौहिनिआ पर्पूरिआ (B. purpurea) कोकोविदार मानते हैं क्योंकि इसको कहीं-कहीं स्थानिक भाषा में कोइलार कहते हैं जो संभवतः कोविदार का अपभ्रंश है। इसके पुष्प गहरे गुलाबी, नीलारुण या चमकीले बैंगनी आदि रंगों के होते हैं। इससे ऐसा मालूम होता है कि केवल पुष्पवर्ण के आधार पर कोविदार या काच्चनार का भेद नहीं किया जा सकता। वास्तव में इनके गुणों में अन्तर न होने के कारण इसकी आवश्यकता भी नहीं है। वैसे तो ध० नि० एवं रा० नि० ने इन्हें पर्याय ही माना है। कुछ लोगों ने श्वेत पुष्प को काञ्चनार एवं रक्तपुष्प को कोविदार माना है : बौ. टोमैण्टोसा (B. tomentosa) के पुष्प पीतवर्ण के होते हैं। भावप्रकाशकार ने कोविदार के पर्याय में अश्मंतक का उल्लेख किया है। रा० नि० एवं ध० नि० दोनों ने अश्मंतक का कोविदार से अलग स्वतंत्र वर्णन किया है। श्री ठा० बलवन्तसिंह जी 'बिहार की वनस्पतियाँ' नामक पुस्तक में लिखते हैं, 'उपर्युक्त दोनों जातियों को [ इसी वर्ग के बौ. रेसिमोसा लॅम. (B. racemosa Lam.) एवं बौ. मलबारिका राक्स. (B. malabarice Roxb.) ] कुछ ग्रन्थकारों ने प्राचीनों का अश्मंतक माना है, परन्तु इसमें सन्देह है। ४८. कचनार (क) हिं०-कचनार, कञ्चनार, कचनाल, गोरिआव। बं०-काञ्चन, रक्त काञ्चन। कोल०-जुरजु, बुज, वुरंग। म०-कोरल, काञ्चन। सन्ता०-झिंजर। गु०-चम्पाकाटी। ने०-टकी। मल०-चुवन्नमंदारम्। क०-केंयुमन्दार। ते०-देवकाञ्चनमु। ता०-सेगपुमुन्थरी। अं०-Mountain Ebony (माउण्टेन एबोनी)। ले०-Bauhinia variegata Linn. (बौहिनिया वेरिगेटा लिन.)। Fam. Leguminosae (लेगुमिनोसी)। यह हिमालय के निचले प्रदेशों में, सिक्किम की ओर तथा सब प्रान्तों में उत्पन्न होता है। इसका वृक्ष मध्यमाकार का अचिरस्थायी होता है। छाल-भूरे रङ्ग की और लकड़ी-किञ्चित् भूरापन युक्त बादामी रङ्ग की होती है। पत्ते-एकान्तर, ३-६ इञ्च लम्बे तथा उतने ही चौड़े, द्विखण्डित, खण्ड लगभग चौथाई या तिहाई दूरी तक गहरे (युग्मपत्र), पत्राग्र गोल, पंखे की तरह फैली हुई संख्या में १३-१५ शिराओं वाले एवं करीब एक इञ्च लम्बे वृन्त से युक्त होते हैं। पुष्प-शीत ऋतु में पत्ते गिर जाने के पश्चात् ही सुगंधित पुष्प गिरे हुए पत्तों के कोणों से निकले रहते हैं। पुष्पदंड छोटे तथा आपद्म या नीलारुण रंग के होते हैं। कलिकाएं घेरे में गोलाई लिये होती हैं। पुष्प-बड़े, श्वेत, गुलाबी, चमकीले बैंगनी तथा किरमिजी रङ्ग के होते हैं। श्वेत पुष्पों का एक या अधिक दलपत्र चित्रित पीतवर्ण का होता है। दलपत्रों में मजबूत मध्यशिरा होती है और आधार से लाल बैंगनी रंग की शिराएँ निकली रहती हैं। फली- लम्बी, चिपटी कुछ मुड़ी हुई, करीब १ फुट तक लम्बी एवं १०-१५ बीजों से युक्त होती है। (ख) सं०-कोविदार। हिं०-कोविदार, खैखरवाल, सोना, कोइना (ला) र। बं०-देवकाञ्चन, रक्तकाञ्चन। संथा०-सिंहरा। ता०-मंदारि, पेद्दाआरि। ते०-कांचनम्। ले०-Bauhinia purpurea Linn. (बौहिनिआ पर्पूरिआ लिन.)।

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