भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 560

गुडूच्यादिवर्गः ५०९ का पृष्ठ मृदुरोमश, पत्रतट अखंड या दूर-दूर पर कुछ दन्तुर एवं मजबूत पर्णवृन्त से युक्त होते हैं। पुष्प-अत्यन्त सुगन्धित होते हैं। इनकी पंखडियाँ श्वेत एवं पुष्पवृन्त केसरिया वर्ण के होते हैं। ये रात को खिलते हैं तथा सुबह झड़ जाते हैं। फल-चिपटे, गोल, हरे रंग के, करीब ३/४ इञ्च व्यास के एवं किनारे पर दबे हुए रहते हैं। बाद में ये भिदुर एवं भूरे रंग के हो जाते हैं। बीज-छोटे, दो, चिपटे तथा अंडाकार होते हैं। रासायनिक संगठन-इसके पुष्पों में एक सुगंधित उड़नशील तैल रहता है। पुष्पवृन्त से एक प्रकार का रंग निकाला जाता है जिससे रेशमी वस्त्र रँगा जाता है। इसके पत्तों में एक निक्टेन्थाइन (Nyctanthine) नामक क्षाराभ पाया जाता है। गुण और प्रयोग-पारिजातक ज्वरघ्न, कफघ्न, यकृत् उत्तेजक, मृदुविरेचक एवं शामक है। इसके पत्र सॅण्टोनिन् (Santonin) जैसे कृमिघ्न, ज्वरघ्न, तिक्तपौष्टिक, पित्तद्रावक एवं मृदुविरेचक होते हैं। बच्चों के लिये इसके पत्तों का स्वरस अच्छा मृदुविरेचक होता है। (१) इसके पत्तों का (शेफालिकादलैः) मंद आँच पर बनाया हुआ क्वाथ गृध्रसी (Sciatica) के लिये बहुत लाभदायक माना जाता है (चक्रदत्त) शेफालिका यह नाम नीलगिर्गुण्डी के पर्याय में आया हुआ है तथा व्यवहार में निर्गुण्डी का उपयोग गृध्रसी में किया जाता है। इस दृष्टि से हरसिंगार के पत्तों की अपेक्षा निर्गुण्डी का प्रयोग उचित मालूम पड़ता है। (२) जीर्ण ज्वर के लिये इसके ७-८ कोमल पत्तों का स्वरस, आर्द्रकस्वरस एवं मधु मिलाकर देते हैं। मलेरिया में यह बहुत लाभदायक है। जीर्ण मलेरिया में इसके साथ त्रिकटु का प्रयोग उचित है। इससे यकृत् एवं प्लीहावृद्धि कम होती है। पाण्डु होने पर इसके साथ लौह का प्रयोग किया जाता है। इसके सेवन के समय पथ्य में दुग्ध, घृत एवं शर्करा का अधिक उपयोग किया जाता है। (३) बच्चों के कृमि (केंचुए) के लिये पत्तों के स्वरस को चीनी मिलाकर देते हैं। (४) खाँसी तथा दमा में इसकी छाल के चूर्ण को १-२ र० की मात्रा में पान में रखकर दिन में ३-४ बार देने से कफ का चिपचिपापन कम होता है। (५) इसके बीजों को जल में पीसकर सर के गंज़ पर लगाते हैं जिससे नये बाल उगते हैं। मात्रा-पत्र २-४; छालचूर्ण १-२ रत्ती। अथ काञ्चनारो रक्तकाञ्चनारश्च, तयोर्नामानि तत्पुष्पस्य गुणाँश्चाह काञ्चनारः काञ्चनको गण्डारिः शोणपुष्पकः ॥१०१॥ कोविदारश्च मरिकः कुद्दालो युगपत्रकः। कुण्डली ताम्रपुष्पश्चाश्मन्तकः स्वल्पकेशरी ॥१०२॥ काञ्चनारो हिमो ग्राही तुवरः श्लेष्मपित्तनुत्। कृमिकुष्ठगुदभ्रंशगण्डमालाव्रणापहः ॥१०३॥ कोविदारोऽपि तद्वत्स्यात्तयोः पुष्पं लघु स्मृतम्। रूक्षं संग्राहि पित्तास्रप्रदरक्षयकासनुत् ॥१०४॥ कचनार तथा लाल कचनार के नाम और गुण-काञ्चनार, काञ्चनक, गण्डारि और शोणपुष्पक ये सब संस्कृत नाम कचनार के हैं। कचनारभेद कोविदार के संस्कृत नाम-कोविदार, मरिक, कुद्दाल, युगपत्रक, कुण्डली, ताम्रपुष्प, अश्मन्तक और स्वल्पकेशरी ये सब हैं। कचनार-शीतवीर्य, मलावरोधक, कषायरसयुक्त, कफ, पित्त, कृमि, कुष्ठ, गुदभ्रंश, गण्डमाला और व्रण को दूर करनेवाला होता है। इसी प्रकार से कचनारभेद कोविदार के भी गुण हैं। दोनों कचनारों के फूल-लघु, रूक्ष, मलावरोधक एवं पित्त, रक्त-प्रदर, क्षय तथा कास (खाँसी) को दूर करने वाले होते हैं। [१०१-१०४]