भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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५०८ भावप्रकाशनिघण्टुः इसी का एक उपभेद होता है जिसके पुष्प मटमैले श्वेताभ रंग के होते हैं। इसकी दूसरी जाति ए. सुबरोजा राक्स. (E. suberosa Roxb.), धवलढाक-उत्तर भारत में अधिक होता है। इसके वृक्ष छोटे होते हैं। इसकी छाल मोटी कार्क वाली, पत्रक चौड़े लट्वाकार या तिर्यगायताकार एवं पुष्प का बाह्यकोश द्वयोष्ठक होता है। फरहद की छाल एवं पत्र का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। छाल हल्लासकारक तो होती है किन्तु कड़वी नहीं होती। रासायनिक संगठन-इसकी छाल में दो प्रकार की राल एवं एक कड़वा एरिथेराइन (Erytherine) नामक विषैला क्षाराभ पाया जाता है जो कुचले के क्षाराभ स्ट्रिकनीन (Strychnine) के विषैले प्रभाव का निवारक (Antidote) माना जाता है। यह क्षाराभ पत्तों में भी पाया जाता है। गुण और प्रयोग-फरहद की छाल ज्वरहर, ग्राही, बल्य, कृमिघ्न, स्वप्नजनन एवं शोथहर होती है। इसके पत्ते मूत्रल, मृदुविरेचक, आर्तवजनन, दुग्धवर्धक, शोथहर, व्रणशोधक एवं कृमिघ्न होते हैं। केन्द्रीयवातनाडीसंस्थान के ऊपर इसकी छाल का शामक प्रभाव पड़ने के कारण उसकी क्रिया कम होती है या बन्द होती है। हृदय पर भी इसका शामक प्रभाव पड़ता है। कुचले के प्रभाव के विरुद्ध इसका प्रभाव पड़ता है। इसकी छाल को रक्तयुक्त आँव, ज्वर तथा निद्रा लाने के लिये प्रयोग करते हैं। नेत्राभिष्यंद में छाल को पीसकर पलकों पर लगाते हैं। इसकी छाल के अन्दर के भाग पर घी लगाकर तथा उस पर घी के दिये का काजल जमाकर इसका नेत्र के विकारों में अञ्जन कराया जाता है। वाजीकरण के लिये सफेद फूल के फरहद की कोमल जड़ को पीस कर शीतल दूध के साथ पिलाते हैं। इसके पत्तों का स्वरस फिरंग, उपदंश, ज्वर, अनार्तव, कष्टार्तव, मूत्रकृच्छ्र एवं कृमि में पिलाया जाता है। व्रणप्रक्षालन के लिये एवं कर्णशूल, दंतशूल आदि के लिये भी इसका उपयोग करते हैं। पत्तों का लेप शोथ, बद, संधिपीड़ा तथा व्रण पर किया जाता है। इससे वेदना कम होती है। आर्तवशुद्धि तथा दुग्धवृद्धि के लिये नारियल के दूध के साथ इसके पत्तों को उबालकर बनाया हुआ क्वाथ प्रसूता को पिलाया जाता है। मात्रा-त्वक्चूर्ण १/२-१ तो०; पत्रस्वरस १/२-१ तो०। ४७. पारिजाता, हरसिंगार सं०-शेफालिका। हिं०-हरसिंगार, पारिजाता, कूरी, सिहारु। बं०-शेफालिका, शिउली। म०-पारिजातक। गु०-हारशणगार। पं०-कूरी, पकर। ता०-पवलमल्लिकै। ते०-पगडमल्ले। मल०-पविझमल्लि। क०- पारिजात। अं०-Night Jasmine (नाइट जस्मीन); Weeping Nyctanthes (वीपिंग् निक्टेन्थस्); Tree of Sorrow (ट्री ऑफ सारी)। ले०-Nyctanthes arbor-tristis, Linn. (निक्टॅन्थिस अर्बोर्-ट्रिस्टिस्, लिन.)। Fam. Oleaceae (ओलिएसी)। यह मध्यभारत तथा हिमालय के निचली प्रदेशों में बहुत होता है। यह प्रायः सब प्रांतों के बागों में लगाया हुआ मिलता है। इसका वृक्ष-छोटा, झाड़ीदार तथा कभी-कभी २५.३० फीट ऊँचा होता है। छाल-हलके भूरे रंग की तथा खुरदरी होती है। काष्ठ-श्वेत तथा हरित हलके लाल या पीताभ भूरे रंग का होता है। पत्ते-जपापत्र की तरह, करीब ४ इञ्च लम्बे, २ १/२ इञ्च चौड़े, विपरीत, स्पर्श में अत्यन्त रूक्ष (खर), नुकीले, अंडाकार, आधार की तरफ गोल, नीचे CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA