भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुडूच्यादिवर्गः ५०७ मात्रा में दिन में दो बार देते हैं। एइलेण्टिक् एसिड को बल्य एवं रसायन रूप में १/२-१ १/२ र० की मात्रा में दिया जाता है किन्तु अधिक मात्रा में इससे हल्लास, वमन एवं विरेचन होता है।१ मात्रा-१/४-१/८ तो०। अथ पारिभद्रः (फरहद)। तस्य नामानि तत्पत्रस्य च गुणाँश्चाह पारिभद्रो निम्बतरुर्मन्दारः पारिजातकः। पारिभद्रोऽनिलश्लेष्मशोथमेदःकृमिप्रणुत्। तत्पत्रं पित्तरोगघ्नं कर्णव्याधिविनाशनम्१॥१००॥ फरहद के नाम तथा गुण-पारिभद्र, निंबतक, मन्दार और पारिजातक ये सब संस्कृत नाम फरहद के हैं। फरहद-वायु, कफ, शोथ, मेदरोग और कृमि का नाशक होता है। इसके पत्ते-पित्तरोग तथा कान के रोगों को दूर करने वाले होते हैं। [१००] नोट-पारिभद्र के जो पर्याय निंबतरु, मंदार एवं पारिजातक दिये हुये हैं उनसे कुछ भ्रम उत्पन्न होता है। इसी प्रकार देवदार एवं पर्वतनिंब के लिये भी पारिभद्र नाम का उपयोग किया गया है। पारिभद्र से अधिकांश विद्वान् फरहद का ग्रहण करते हैं। संदर्भ के आधार पर या टीकाकारों के मतानुसार पारिभद्र का अर्थ निंब, देवदार या पारिजातक किया जा सकता है। पारिजाता यह नाम हरसिंगार के लिये अधिक प्रचलित होने के कारण एवं पारिभद्र का पारिजातक यह पर्याय होने के कारण हरसिंगार को ही कुछ लोग पारिभद्र मानते हैं। कुछ विद्वानों के मत से हरसिंगार 'शेफालिका' हो सकती है किन्तु भावप्रकाशकार तथा अन्य निघंटुकारो ने शेफाली(लिका) को निर्गुण्डी भेद लिखा है। पारिभद्रक नाम से सुश्रुत ने पूतनाप्रतिषेध (उ० अ० ३२-३) के लिये एवं कृमि (उ० अ० ५४-२६) के लिये उपयोग लिखा है। पारिजातक नाम से प्लीहोदर (चि० १४-१२) में एवं पारिजात नाम से उदकमेह (चि० ११-८) में उल्लेख है। यहाँ पर फरहद एवं हरसिंगार दोनों का अलग-अलग वर्णन किया गया है। ४६. फरहद हिं०-फरहद, पांगरा। बं०-पाल ते मादार। म०-पाङ्गारा। गु०-पांडेरवो, पनरवो। क०-होंगर, हलिवाणदमर। ते०-मोदुगो, बरिदे चेट्टु, बारिजमु। ता०-कल्याण मुरुक्क। अं०-Coral Tree (कोरल ट्री)। ले०-Erythrina indica Lam. (एरिथ्रिना इण्डिका लॅम०)। Fam. Leguminosae (लेगुमिनोसी)। यह प्रायः सब प्रान्तों में कहीं-न-कहीं पाया जाता है, विशेषकर कोंकण और उत्तर कनारा में अधिक मिलता है। इसका वृक्ष मध्यमाकार का, शीघ्रता से बढ़ने वाला तथा समय पाकर नष्ट हो जाने वाला होता है। कोमल डालियों पर सीधे, काले रङ्ग के तीक्ष्ण काँटे रहते हैं। छाल-चिकनी तथा हरी, भूरी, हलकी पीली या श्वेत खड़ी रेखाओं से युक्त एवं पतली पपड़ियाँ छूटने पर हरी होती है। पत्ते-पलाशपत्र के समान त्रिदल होते हैं। पत्रक-४-६ इञ्च के घेरे में गोलाकार और किञ्चित् नुकीले होते हैं। अग्र का पत्रक सबसे बड़ा होता है। पुष्पदंड ४ इञ्च लम्बा और मंजरी प्रायः ६ इञ्च लम्बी होती है। फूल-अत्यन्त रक्त वर्ण के सुहावने दिखाई पड़ते हैं। पुष्प का बाह्यकोश एक ओर मूल तक फट जाता है और अग्र पर पाँच दाँत बन जाते हैं। आभ्यंतर दल पाँच होते हैं जिनमें एक सबसे बड़ा होता है। इनके बीच से लाल पुंकेसरों का गुच्छा निकला रहता है। इनमें गन्ध नहीं होती। फलियाँ-६-१० इञ्च लम्बी, चिपटी, चोंचदार, किंचित् टेढ़ी, ताजी अवस्था में हरी किन्तु बाद में काली हो जाती है। बीज-संख्या में ६-१२, चिकने, भूरे या लाल, अंडाकार तथा करीब १ इञ्च बड़े होते हैं। १. पुष्पं पित्तरुजं हन्ति कर्णव्याधि विनाशयेत्। (नि. र.)