भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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के होते हैं तथा बीच में पुंकेसरों की गहरे बैंगनी रंग की नलिका रहती है। फल—नीम की तरह अष्ठिल फल प्रायः १ इञ्च से कम लम्बे होते हैं। बीज—प्रत्येक फल में ५ बीज होते हैं जिनके बीच में मणि के समान छिद्र होता है जिसके कारण इनकी माला बनाई जाती है। इसके मूल की ताजी अन्तस्त्वक्, पुष्प, फलमज्जा एवं पत्र का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन—इसकी अन्तस्त्वक् में हलके पीतवर्ण का, कडुवा तथा राल की तरह का पदार्थ रहता है जो उबलते जल में घुलता है। बाह्यत्वक् में टैनिन् रहता है। इसमें शर्करा भी पाई जाती है। गुण और प्रयोग—बकायन के गुण साधारणतः नीम के समान हैं। यह कृमिघ्न, त्वग्दोषहर, गर्भाशयसंकोचक, वेदनाहर, अर्शोघ्न एवं शोधन है। अधिक मात्रा में यह वामक, विरेचक एवं संज्ञानाशन है। इससे केंचुए मरते हैं। प्रसूता में शिरःशूल एवं गर्भाशयपीड़ा कम करने के लिये इसके पुष्पों को पीसकर सर पर एवं पेडू पर बाँधते हैं। रक्तविकार के कारण उत्पन्न कुष्ठ, गंडमाला एवं खालित्य आदि त्वचा के विकारों में इसके बीज, छाल या पत्रस्वरस को देते हैं। अर्श में इसके फल की मज्जा का उपयोग किया जाता है। इसके पुष्प एवं पत्तों को पीसकर स्नायविक शिरःशूल में लेप करते हैं। इसके पत्तों का क्वाथ हिस्टीरिया में पिलाते हैं। मात्रा—छाल ३ से ६ माशा; फलमज्जा २ से ८ रत्ती। ४५. (ख) महानिंब हिं०—महानिंब, घोड़ाकरंज। बं०—महानिम। म०—महारूख। गु०—मोटो अडुसो, अरलबो। पं०—अरूअ। ता०—पेरुमरुत्तु। ते०—पेद्दमानु। क०—दोडुमणि। मल०—पेरुमरम्। उरि०—महानिम महाल। ले०—Ailanthus excelsa Roxb. (ऐलेन्थस् एक्सेल्सा राक्स) । Fam. Simarubaceae (सिमारुबेसी) । यह भारत के कई प्रान्त—उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिमी पेनिनसुला, कर्नाटक एवं गुजरात आदि में पाया जाता है। इसका वृक्ष—६० से ८० फ़ीट ऊँचा होता है। छाल—धूसर वर्ण की होती है। पत्ते—२-३ फीट लम्बे, पक्षवत्, संयुक्त पत्र होते हैं। पत्रक—३ १/२-६ लम्बे, २-३ चौड़े, अधरतल् पर रोमश, नोकदार, दन्तुर धारवाले, तिरछे आधारवाले, संख्या में १०-१३ जोड़े, १-२ लम्बे वृन्त से युक्त एवं आधार के पास दो रोमश ग्रंथियों से युक्त होते हैं। पत्तों में उग्र गंध आती हैं। पुष्प—पीताभ, बड़ी-बड़ी मंजरियों में आते हैं। फल—छीमी की तरह बीच से फूला हुआ एवं अन्त में अकुड़ेदार होता है जिसमें एक बीज रहता है। इसकी लकड़ी हलकी तथा मुलायम होती है। इसकी छाल का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। इसमें गन्ध नहीं होती किन्तु इसका स्वाद बहुत कड़वा होता है। यह मोटी, खुरदरी तथा रवेदार होती है। इसका बाह्यभाग तथा अन्दर का भाग पीताभ श्वेत रहता है तथा अन्दर रेशे मालूम होते हैं। भिगोने से यह फूलती है, चिपचिपी होती है तथा उसमें अप्रिय गन्ध आती है। इसे कुछ लोगों ने महानिंब तथा कुछ लोगों ने श्योनाक-भेद माना है। रासायनिक संगठन—इसकी छाल में ऐलेण्टिक् ॲसिड (Ailantic acid) नामक एक अत्यन्त कडुआ, रक्ताभ भूरे रंग का पदार्थ पाया जाता है जो जल में आसानी से घुल जाता है किन्तु मद्यसार में आसानी से नहीं घुलता। गुण और प्रयोग—यह कडुआ, पौष्टिक, दीपन, ग्राही एवं ज्वरहर है। इसका प्रभाव कुरैया के समान होता है। प्रसूता को इसके पत्रस्वरस या ताजी छाल के रस को नारियल के दूध, गुड़, मधु एवं सुगंधित पदार्थों के साथ खीर बनाकर देने से प्रसवपश्चात् पीडा कम होती है। इसकी छाल एवं पत्तों का क्वाथ प्रसवपश्चात् दौर्बल्य के लिये बल्यरूप में देते हैं। जीर्णज्वर या दौर्बल्य में इसके प्रयोग से बल बढ़ता है। अग्निमांद्य में इसके छाल का रस १ १/२ औं० की