भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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गुडूच्यादिवर्गः ५०५ अथ महानिम्बः तस्य नामानि गुणाँश्चाह महानिम्बः स्मृतो द्रेका रम्यको विषमुष्टिकः । केशमुष्टिनिम्बकश्च कार्मुको जीव इत्यपि ॥९७॥ महानिम्बो हिमो रूक्षस्तिक्तो ग्राही कषायकः ॥९८॥ कफपित्तभ्रमच्छर्दिकुष्ठहल्लासरक्तजित् । प्रमेहश्वासगुल्मार्शोमूषिकाविषनाशनः ॥९९॥ महानिम्ब के नाम तथा गुण-महानिम्ब, द्रेका, रम्यक, विषमुष्टिक, केशमुष्टि, निम्बक, कार्मुक और जीव ये सब संस्कृत नाम 'बकायन' के हैं। बकायन-शीतवीर्य, रूक्ष, तिक्त तथा कषाय रसयुक्त और ग्राही (मलावरोधक) होता है। यह कफ, पित्त, भ्रम, वमन, कुष्ठ, हल्लास, रक्तदोष, प्रमेह, श्वास, गुल्म, बवासीर और चूहे का विष इन सबों का नाशक होता है। [९७-९९] नोट-महानिंब के विषय में कुछ भ्रम है। भावप्रकाश, धन्वन्तरि एवं मदनपाल निघंटुओं में निंब तथा महानिंब ये दो भेद मिलते हैं। राजनिघंटु में एक तृतीय भेद कैडर्य का उल्लेख किया है। कैडर्य नाम कायफल के लिये आता है। किन्तु टीकाकारों ने उसका अर्थ पर्वतनिव भी किया है। चरक एवं सुश्रुत में 'पर्वतनिंब' शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है। कुछ लोगों ने कैडर्य को मीठा नीम, ले०-मुरया कोनिजीआई स्प्रेंग (Murraya koenigii Spreng) माना है किन्तु रा० नि० ने कैडर्य का स्वाद कटु तिक्त कषाय लिखा है। ऐइलेन्थस् एक्सेल्सा राक्स (Ailanthus excelsa Roxb.) को कुछ लोगों ने महानिंब माना है जिसको पंजाबी में 'अरुआ' कहने के कारण कुछ लोग अरलू के स्थान पर प्रयोग करते हैं या अरलू (श्योनाक) का भेद मानते हैं। अधिकांश लोगों ने बकायन को, जिसका ले०-नाम मेलिआ एझेडैरॅक (Melia azedarach) है उसे महानिंब माना है। निघंटुओं में महानिंब का पर्याय 'ट्रेका' दिया हुआ है तथा बकायन को पंजाब में द्रेक कहते भी हैं। अर्श में महानिम्ब का प्रयोग वाग्भट ने किया है (चि० अ० ८) एवं वैद्य तथा हकीमी में बकायन के फलों का प्रयोग प्रचलित है। महानिंब का 'अक्षीर' यह पर्याय अन्य निघंटुओं ने दिया है तथा निंब का पर्याय 'हिंगुनिर्यास' दिया हुआ है जो क्रमशः बकायन एवं नीम की ओर संकेत करते हैं। सुश्रुत में पिप्पल्यादिगण (सू० अ० ३८) में महानिंब के फल का एवं अधोभागहरवर्ग (सू० अ० ३९) में 'रम्यक' नाम से इसकी त्वचा का उल्लेख है। आकाश नीम-नीम चमेली नामक वृक्ष होता है। इसका लेटिन नाम मिलिंगटोनिया हॉर्टेन्सिस् लिन. (Millingtonia hortensis Linn. fi; Fam. Bignoniaceae) है। इसके सुन्दर ऊँचे वृक्ष होते हैं जो बगीचों में इसके सुन्दर पत्र एवं श्वेत सुगंधित पुष्पों के लिये लगाये जाते हैं। इसमें एक तिक्त द्रव्य तथा टैनिन् होता है तथा ज्वरघ्न गुण के लिये इसका प्रयोग करते हैं। यहाँ पर दोनों प्रकार के महानिम्बों का वर्णन अलग-अलग किया गया है। ४४. (क) महानिंब (बकायन) हिं०-बकायन, बकाइन, महानीम। बं०-घोड़ानिम, महानिम। म०-बकाणानिंब। गु०-बकानलिंबडो। क०- बेट्टदबेड। ते०-तुरक, बेवक, कोड वेप। ता०-मलैवेम्बु। पं०-देक, धरेक, बकइन। कोल०-गरनिम। आसाम- थमगा। ने०-बकैनु। सिन्धु-बकयनु, ड्रेक। फा०-आजाद दरख्त। अ०-बान्, हर्बीत। अं०-Persian Lilac (पर्शियन् लिलॅक); The Bead Tree (बीड ट्री)। ले०-Melia azedarach Linn. (मेलिआ एझेडेरॅक् लिन.)। Fam. Meliaceae (मेलिएसी)। प्रायः सब प्रान्तों में इसका वृक्ष पाया जाता है। बकायन का वृक्ष सुन्दर, मध्यमाकार का, नीम वृक्ष से छोटा और अचिरस्थायी होता है। नीम के पत्तों के समान इसके भी पत्ते होते हैं। पत्ते-प्रायः त्रिपक्षवत्, २ फीट लम्बे और शाखाओं पर दलबद्ध होकर रहते हैं। पत्रक-प्रासवत, आरावत् दन्तुर, लम्बाय्र, नीम जैसे किन्तु उससे कुछ कम लम्बे तथा क्रम मुड़े हुए होते हैं। पुष्प-लिलॅक (Lilac) एवं सुगन्धित रहते हैं जिसके आभ्यंतर दल फैले हुए, श्वेत या बैंगनी रंग