भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
के होते हैं तथा बीच में पुंकेसरों की गहरे बैंगनी रंग की नलिका रहती है। फल—नीम की तरह अष्ठिल फल प्रायः १ इञ्च से कम लम्बे होते हैं। बीज—प्रत्येक फल में ५ बीज होते हैं जिनके बीच में मणि के समान छिद्र होता है जिसके कारण इनकी माला बनाई जाती है। इसके मूल की ताजी अन्तस्त्वक्, पुष्प, फलमज्जा एवं पत्र का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन—इसकी अन्तस्त्वक् में हलके पीतवर्ण का, कडुवा तथा राल की तरह का पदार्थ रहता है जो उबलते जल में घुलता है। बाह्यत्वक् में टैनिन् रहता है। इसमें शर्करा भी पाई जाती है। गुण और प्रयोग—बकायन के गुण साधारणतः नीम के समान हैं। यह कृमिघ्न, त्वग्दोषहर, गर्भाशयसंकोचक, वेदनाहर, अर्शोघ्न एवं शोधन है। अधिक मात्रा में यह वामक, विरेचक एवं संज्ञानाशन है। इससे केंचुए मरते हैं। प्रसूता में शिरःशूल एवं गर्भाशयपीड़ा कम करने के लिये इसके पुष्पों को पीसकर सर पर एवं पेडू पर बाँधते हैं। रक्तविकार के कारण उत्पन्न कुष्ठ, गंडमाला एवं खालित्य आदि त्वचा के विकारों में इसके बीज, छाल या पत्रस्वरस को देते हैं। अर्श में इसके फल की मज्जा का उपयोग किया जाता है। इसके पुष्प एवं पत्तों को पीसकर स्नायविक शिरःशूल में लेप करते हैं। इसके पत्तों का क्वाथ हिस्टीरिया में पिलाते हैं। मात्रा—छाल ३ से ६ माशा; फलमज्जा २ से ८ रत्ती। ४५. (ख) महानिंब हिं०—महानिंब, घोड़ाकरंज। बं०—महानिम। म०—महारूख। गु०—मोटो अडुसो, अरलबो। पं०—अरूअ। ता०—पेरुमरुत्तु। ते०—पेद्दमानु। क०—दोडुमणि। मल०—पेरुमरम्। उरि०—महानिम महाल। ले०—Ailanthus excelsa Roxb. (ऐलेन्थस् एक्सेल्सा राक्स) । Fam. Simarubaceae (सिमारुबेसी) । यह भारत के कई प्रान्त—उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिमी पेनिनसुला, कर्नाटक एवं गुजरात आदि में पाया जाता है। इसका वृक्ष—६० से ८० फ़ीट ऊँचा होता है। छाल—धूसर वर्ण की होती है। पत्ते—२-३ फीट लम्बे, पक्षवत्, संयुक्त पत्र होते हैं। पत्रक—३ १/२-६ लम्बे, २-३ चौड़े, अधरतल् पर रोमश, नोकदार, दन्तुर धारवाले, तिरछे आधारवाले, संख्या में १०-१३ जोड़े, १-२ लम्बे वृन्त से युक्त एवं आधार के पास दो रोमश ग्रंथियों से युक्त होते हैं। पत्तों में उग्र गंध आती हैं। पुष्प—पीताभ, बड़ी-बड़ी मंजरियों में आते हैं। फल—छीमी की तरह बीच से फूला हुआ एवं अन्त में अकुड़ेदार होता है जिसमें एक बीज रहता है। इसकी लकड़ी हलकी तथा मुलायम होती है। इसकी छाल का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। इसमें गन्ध नहीं होती किन्तु इसका स्वाद बहुत कड़वा होता है। यह मोटी, खुरदरी तथा रवेदार होती है। इसका बाह्यभाग तथा अन्दर का भाग पीताभ श्वेत रहता है तथा अन्दर रेशे मालूम होते हैं। भिगोने से यह फूलती है, चिपचिपी होती है तथा उसमें अप्रिय गन्ध आती है। इसे कुछ लोगों ने महानिंब तथा कुछ लोगों ने श्योनाक-भेद माना है। रासायनिक संगठन—इसकी छाल में ऐलेण्टिक् ॲसिड (Ailantic acid) नामक एक अत्यन्त कडुआ, रक्ताभ भूरे रंग का पदार्थ पाया जाता है जो जल में आसानी से घुल जाता है किन्तु मद्यसार में आसानी से नहीं घुलता। गुण और प्रयोग—यह कडुआ, पौष्टिक, दीपन, ग्राही एवं ज्वरहर है। इसका प्रभाव कुरैया के समान होता है। प्रसूता को इसके पत्रस्वरस या ताजी छाल के रस को नारियल के दूध, गुड़, मधु एवं सुगंधित पदार्थों के साथ खीर बनाकर देने से प्रसवपश्चात् पीडा कम होती है। इसकी छाल एवं पत्तों का क्वाथ प्रसवपश्चात् दौर्बल्य के लिये बल्यरूप में देते हैं। जीर्णज्वर या दौर्बल्य में इसके प्रयोग से बल बढ़ता है। अग्निमांद्य में इसके छाल का रस १ १/२ औं० की
गुडूच्यादिवर्गः ५०७ मात्रा में दिन में दो बार देते हैं। एइलेण्टिक् एसिड को बल्य एवं रसायन रूप में १/२-१ १/२ र० की मात्रा में दिया जाता है किन्तु अधिक मात्रा में इससे हल्लास, वमन एवं विरेचन होता है।१ मात्रा-१/४-१/८ तो०। अथ पारिभद्रः (फरहद)। तस्य नामानि तत्पत्रस्य च गुणाँश्चाह पारिभद्रो निम्बतरुर्मन्दारः पारिजातकः। पारिभद्रोऽनिलश्लेष्मशोथमेदःकृमिप्रणुत्। तत्पत्रं पित्तरोगघ्नं कर्णव्याधिविनाशनम्१॥१००॥ फरहद के नाम तथा गुण-पारिभद्र, निंबतक, मन्दार और पारिजातक ये सब संस्कृत नाम फरहद के हैं। फरहद-वायु, कफ, शोथ, मेदरोग और कृमि का नाशक होता है। इसके पत्ते-पित्तरोग तथा कान के रोगों को दूर करने वाले होते हैं। [१००] नोट-पारिभद्र के जो पर्याय निंबतरु, मंदार एवं पारिजातक दिये हुये हैं उनसे कुछ भ्रम उत्पन्न होता है। इसी प्रकार देवदार एवं पर्वतनिंब के लिये भी पारिभद्र नाम का उपयोग किया गया है। पारिभद्र से अधिकांश विद्वान् फरहद का ग्रहण करते हैं। संदर्भ के आधार पर या टीकाकारों के मतानुसार पारिभद्र का अर्थ निंब, देवदार या पारिजातक किया जा सकता है। पारिजाता यह नाम हरसिंगार के लिये अधिक प्रचलित होने के कारण एवं पारिभद्र का पारिजातक यह पर्याय होने के कारण हरसिंगार को ही कुछ लोग पारिभद्र मानते हैं। कुछ विद्वानों के मत से हरसिंगार 'शेफालिका' हो सकती है किन्तु भावप्रकाशकार तथा अन्य निघंटुकारो ने शेफाली(लिका) को निर्गुण्डी भेद लिखा है। पारिभद्रक नाम से सुश्रुत ने पूतनाप्रतिषेध (उ० अ० ३२-३) के लिये एवं कृमि (उ० अ० ५४-२६) के लिये उपयोग लिखा है। पारिजातक नाम से प्लीहोदर (चि० १४-१२) में एवं पारिजात नाम से उदकमेह (चि० ११-८) में उल्लेख है। यहाँ पर फरहद एवं हरसिंगार दोनों का अलग-अलग वर्णन किया गया है। ४६. फरहद हिं०-फरहद, पांगरा। बं०-पाल ते मादार। म०-पाङ्गारा। गु०-पांडेरवो, पनरवो। क०-होंगर, हलिवाणदमर। ते०-मोदुगो, बरिदे चेट्टु, बारिजमु। ता०-कल्याण मुरुक्क। अं०-Coral Tree (कोरल ट्री)। ले०-Erythrina indica Lam. (एरिथ्रिना इण्डिका लॅम०)। Fam. Leguminosae (लेगुमिनोसी)। यह प्रायः सब प्रान्तों में कहीं-न-कहीं पाया जाता है, विशेषकर कोंकण और उत्तर कनारा में अधिक मिलता है। इसका वृक्ष मध्यमाकार का, शीघ्रता से बढ़ने वाला तथा समय पाकर नष्ट हो जाने वाला होता है। कोमल डालियों पर सीधे, काले रङ्ग के तीक्ष्ण काँटे रहते हैं। छाल-चिकनी तथा हरी, भूरी, हलकी पीली या श्वेत खड़ी रेखाओं से युक्त एवं पतली पपड़ियाँ छूटने पर हरी होती है। पत्ते-पलाशपत्र के समान त्रिदल होते हैं। पत्रक-४-६ इञ्च के घेरे में गोलाकार और किञ्चित् नुकीले होते हैं। अग्र का पत्रक सबसे बड़ा होता है। पुष्पदंड ४ इञ्च लम्बा और मंजरी प्रायः ६ इञ्च लम्बी होती है। फूल-अत्यन्त रक्त वर्ण के सुहावने दिखाई पड़ते हैं। पुष्प का बाह्यकोश एक ओर मूल तक फट जाता है और अग्र पर पाँच दाँत बन जाते हैं। आभ्यंतर दल पाँच होते हैं जिनमें एक सबसे बड़ा होता है। इनके बीच से लाल पुंकेसरों का गुच्छा निकला रहता है। इनमें गन्ध नहीं होती। फलियाँ-६-१० इञ्च लम्बी, चिपटी, चोंचदार, किंचित् टेढ़ी, ताजी अवस्था में हरी किन्तु बाद में काली हो जाती है। बीज-संख्या में ६-१२, चिकने, भूरे या लाल, अंडाकार तथा करीब १ इञ्च बड़े होते हैं। १. पुष्पं पित्तरुजं हन्ति कर्णव्याधि विनाशयेत्। (नि. र.)
५०८ भावप्रकाशनिघण्टुः इसी का एक उपभेद होता है जिसके पुष्प मटमैले श्वेताभ रंग के होते हैं। इसकी दूसरी जाति ए. सुबरोजा राक्स. (E. suberosa Roxb.), धवलढाक-उत्तर भारत में अधिक होता है। इसके वृक्ष छोटे होते हैं। इसकी छाल मोटी कार्क वाली, पत्रक चौड़े लट्वाकार या तिर्यगायताकार एवं पुष्प का बाह्यकोश द्वयोष्ठक होता है। फरहद की छाल एवं पत्र का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। छाल हल्लासकारक तो होती है किन्तु कड़वी नहीं होती। रासायनिक संगठन-इसकी छाल में दो प्रकार की राल एवं एक कड़वा एरिथेराइन (Erytherine) नामक विषैला क्षाराभ पाया जाता है जो कुचले के क्षाराभ स्ट्रिकनीन (Strychnine) के विषैले प्रभाव का निवारक (Antidote) माना जाता है। यह क्षाराभ पत्तों में भी पाया जाता है। गुण और प्रयोग-फरहद की छाल ज्वरहर, ग्राही, बल्य, कृमिघ्न, स्वप्नजनन एवं शोथहर होती है। इसके पत्ते मूत्रल, मृदुविरेचक, आर्तवजनन, दुग्धवर्धक, शोथहर, व्रणशोधक एवं कृमिघ्न होते हैं। केन्द्रीयवातनाडीसंस्थान के ऊपर इसकी छाल का शामक प्रभाव पड़ने के कारण उसकी क्रिया कम होती है या बन्द होती है। हृदय पर भी इसका शामक प्रभाव पड़ता है। कुचले के प्रभाव के विरुद्ध इसका प्रभाव पड़ता है। इसकी छाल को रक्तयुक्त आँव, ज्वर तथा निद्रा लाने के लिये प्रयोग करते हैं। नेत्राभिष्यंद में छाल को पीसकर पलकों पर लगाते हैं। इसकी छाल के अन्दर के भाग पर घी लगाकर तथा उस पर घी के दिये का काजल जमाकर इसका नेत्र के विकारों में अञ्जन कराया जाता है। वाजीकरण के लिये सफेद फूल के फरहद की कोमल जड़ को पीस कर शीतल दूध के साथ पिलाते हैं। इसके पत्तों का स्वरस फिरंग, उपदंश, ज्वर, अनार्तव, कष्टार्तव, मूत्रकृच्छ्र एवं कृमि में पिलाया जाता है। व्रणप्रक्षालन के लिये एवं कर्णशूल, दंतशूल आदि के लिये भी इसका उपयोग करते हैं। पत्तों का लेप शोथ, बद, संधिपीड़ा तथा व्रण पर किया जाता है। इससे वेदना कम होती है। आर्तवशुद्धि तथा दुग्धवृद्धि के लिये नारियल के दूध के साथ इसके पत्तों को उबालकर बनाया हुआ क्वाथ प्रसूता को पिलाया जाता है। मात्रा-त्वक्चूर्ण १/२-१ तो०; पत्रस्वरस १/२-१ तो०। ४७. पारिजाता, हरसिंगार सं०-शेफालिका। हिं०-हरसिंगार, पारिजाता, कूरी, सिहारु। बं०-शेफालिका, शिउली। म०-पारिजातक। गु०-हारशणगार। पं०-कूरी, पकर। ता०-पवलमल्लिकै। ते०-पगडमल्ले। मल०-पविझमल्लि। क०- पारिजात। अं०-Night Jasmine (नाइट जस्मीन); Weeping Nyctanthes (वीपिंग् निक्टेन्थस्); Tree of Sorrow (ट्री ऑफ सारी)। ले०-Nyctanthes arbor-tristis, Linn. (निक्टॅन्थिस अर्बोर्-ट्रिस्टिस्, लिन.)। Fam. Oleaceae (ओलिएसी)। यह मध्यभारत तथा हिमालय के निचली प्रदेशों में बहुत होता है। यह प्रायः सब प्रांतों के बागों में लगाया हुआ मिलता है। इसका वृक्ष-छोटा, झाड़ीदार तथा कभी-कभी २५.३० फीट ऊँचा होता है। छाल-हलके भूरे रंग की तथा खुरदरी होती है। काष्ठ-श्वेत तथा हरित हलके लाल या पीताभ भूरे रंग का होता है। पत्ते-जपापत्र की तरह, करीब ४ इञ्च लम्बे, २ १/२ इञ्च चौड़े, विपरीत, स्पर्श में अत्यन्त रूक्ष (खर), नुकीले, अंडाकार, आधार की तरफ गोल, नीचे CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
गुडूच्यादिवर्गः ५०९ का पृष्ठ मृदुरोमश, पत्रतट अखंड या दूर-दूर पर कुछ दन्तुर एवं मजबूत पर्णवृन्त से युक्त होते हैं। पुष्प-अत्यन्त सुगन्धित होते हैं। इनकी पंखडियाँ श्वेत एवं पुष्पवृन्त केसरिया वर्ण के होते हैं। ये रात को खिलते हैं तथा सुबह झड़ जाते हैं। फल-चिपटे, गोल, हरे रंग के, करीब ३/४ इञ्च व्यास के एवं किनारे पर दबे हुए रहते हैं। बाद में ये भिदुर एवं भूरे रंग के हो जाते हैं। बीज-छोटे, दो, चिपटे तथा अंडाकार होते हैं। रासायनिक संगठन-इसके पुष्पों में एक सुगंधित उड़नशील तैल रहता है। पुष्पवृन्त से एक प्रकार का रंग निकाला जाता है जिससे रेशमी वस्त्र रँगा जाता है। इसके पत्तों में एक निक्टेन्थाइन (Nyctanthine) नामक क्षाराभ पाया जाता है। गुण और प्रयोग-पारिजातक ज्वरघ्न, कफघ्न, यकृत् उत्तेजक, मृदुविरेचक एवं शामक है। इसके पत्र सॅण्टोनिन् (Santonin) जैसे कृमिघ्न, ज्वरघ्न, तिक्तपौष्टिक, पित्तद्रावक एवं मृदुविरेचक होते हैं। बच्चों के लिये इसके पत्तों का स्वरस अच्छा मृदुविरेचक होता है। (१) इसके पत्तों का (शेफालिकादलैः) मंद आँच पर बनाया हुआ क्वाथ गृध्रसी (Sciatica) के लिये बहुत लाभदायक माना जाता है (चक्रदत्त) शेफालिका यह नाम नीलगिर्गुण्डी के पर्याय में आया हुआ है तथा व्यवहार में निर्गुण्डी का उपयोग गृध्रसी में किया जाता है। इस दृष्टि से हरसिंगार के पत्तों की अपेक्षा निर्गुण्डी का प्रयोग उचित मालूम पड़ता है। (२) जीर्ण ज्वर के लिये इसके ७-८ कोमल पत्तों का स्वरस, आर्द्रकस्वरस एवं मधु मिलाकर देते हैं। मलेरिया में यह बहुत लाभदायक है। जीर्ण मलेरिया में इसके साथ त्रिकटु का प्रयोग उचित है। इससे यकृत् एवं प्लीहावृद्धि कम होती है। पाण्डु होने पर इसके साथ लौह का प्रयोग किया जाता है। इसके सेवन के समय पथ्य में दुग्ध, घृत एवं शर्करा का अधिक उपयोग किया जाता है। (३) बच्चों के कृमि (केंचुए) के लिये पत्तों के स्वरस को चीनी मिलाकर देते हैं। (४) खाँसी तथा दमा में इसकी छाल के चूर्ण को १-२ र० की मात्रा में पान में रखकर दिन में ३-४ बार देने से कफ का चिपचिपापन कम होता है। (५) इसके बीजों को जल में पीसकर सर के गंज़ पर लगाते हैं जिससे नये बाल उगते हैं। मात्रा-पत्र २-४; छालचूर्ण १-२ रत्ती। अथ काञ्चनारो रक्तकाञ्चनारश्च, तयोर्नामानि तत्पुष्पस्य गुणाँश्चाह काञ्चनारः काञ्चनको गण्डारिः शोणपुष्पकः ॥१०१॥ कोविदारश्च मरिकः कुद्दालो युगपत्रकः। कुण्डली ताम्रपुष्पश्चाश्मन्तकः स्वल्पकेशरी ॥१०२॥ काञ्चनारो हिमो ग्राही तुवरः श्लेष्मपित्तनुत्। कृमिकुष्ठगुदभ्रंशगण्डमालाव्रणापहः ॥१०३॥ कोविदारोऽपि तद्वत्स्यात्तयोः पुष्पं लघु स्मृतम्। रूक्षं संग्राहि पित्तास्रप्रदरक्षयकासनुत् ॥१०४॥ कचनार तथा लाल कचनार के नाम और गुण-काञ्चनार, काञ्चनक, गण्डारि और शोणपुष्पक ये सब संस्कृत नाम कचनार के हैं। कचनारभेद कोविदार के संस्कृत नाम-कोविदार, मरिक, कुद्दाल, युगपत्रक, कुण्डली, ताम्रपुष्प, अश्मन्तक और स्वल्पकेशरी ये सब हैं। कचनार-शीतवीर्य, मलावरोधक, कषायरसयुक्त, कफ, पित्त, कृमि, कुष्ठ, गुदभ्रंश, गण्डमाला और व्रण को दूर करनेवाला होता है। इसी प्रकार से कचनारभेद कोविदार के भी गुण हैं। दोनों कचनारों के फूल-लघु, रूक्ष, मलावरोधक एवं पित्त, रक्त-प्रदर, क्षय तथा कास (खाँसी) को दूर करने वाले होते हैं। [१०१-१०४]
५१० भावप्रकाशनिघण्टुः नोट-भावप्रकाशकार ने काञ्चनार एवं कोविदार ये दो भेद लिखे हैं किन्तु दोनों के गुण समान ही लिखे हैं। रा० नि० एवं ध० नि० ने कोविदार एवं काञ्चनार ये पर्याय रूप में लिये हैं किन्तु रा० नि० ने इसके 'पीत पुष्प', 'गिरिज', 'महापुष्प' आदि अन्य पर्यायों का भी उल्लेख किया है। नि० र० ने पीत, रक्त एवं श्वेत ये ३ भेद दिये हैं तथा उनके गुणों का स्वतंत्र उल्लेख किया है। आधुनिक उद्भिद्वेत्ताओं ने इसकी कई जातियों का उल्लेख किया है। बौहिनिआ बेरिगेटा (Bauhinia variegata) को अधिकांश लोगों ने काञ्चनार माना है। इसके पुष्प चमकीलें बैंगनी, गुलाबी, किरमिजी, श्वेत आदि रंगों के होते हैं। इसी प्रकार बौहिनिआ पर्पूरिआ (B. purpurea) कोकोविदार मानते हैं क्योंकि इसको कहीं-कहीं स्थानिक भाषा में कोइलार कहते हैं जो संभवतः कोविदार का अपभ्रंश है। इसके पुष्प गहरे गुलाबी, नीलारुण या चमकीले बैंगनी आदि रंगों के होते हैं। इससे ऐसा मालूम होता है कि केवल पुष्पवर्ण के आधार पर कोविदार या काच्चनार का भेद नहीं किया जा सकता। वास्तव में इनके गुणों में अन्तर न होने के कारण इसकी आवश्यकता भी नहीं है। वैसे तो ध० नि० एवं रा० नि० ने इन्हें पर्याय ही माना है। कुछ लोगों ने श्वेत पुष्प को काञ्चनार एवं रक्तपुष्प को कोविदार माना है : बौ. टोमैण्टोसा (B. tomentosa) के पुष्प पीतवर्ण के होते हैं। भावप्रकाशकार ने कोविदार के पर्याय में अश्मंतक का उल्लेख किया है। रा० नि० एवं ध० नि० दोनों ने अश्मंतक का कोविदार से अलग स्वतंत्र वर्णन किया है। श्री ठा० बलवन्तसिंह जी 'बिहार की वनस्पतियाँ' नामक पुस्तक में लिखते हैं, 'उपर्युक्त दोनों जातियों को [ इसी वर्ग के बौ. रेसिमोसा लॅम. (B. racemosa Lam.) एवं बौ. मलबारिका राक्स. (B. malabarice Roxb.) ] कुछ ग्रन्थकारों ने प्राचीनों का अश्मंतक माना है, परन्तु इसमें सन्देह है। ४८. कचनार (क) हिं०-कचनार, कञ्चनार, कचनाल, गोरिआव। बं०-काञ्चन, रक्त काञ्चन। कोल०-जुरजु, बुज, वुरंग। म०-कोरल, काञ्चन। सन्ता०-झिंजर। गु०-चम्पाकाटी। ने०-टकी। मल०-चुवन्नमंदारम्। क०-केंयुमन्दार। ते०-देवकाञ्चनमु। ता०-सेगपुमुन्थरी। अं०-Mountain Ebony (माउण्टेन एबोनी)। ले०-Bauhinia variegata Linn. (बौहिनिया वेरिगेटा लिन.)। Fam. Leguminosae (लेगुमिनोसी)। यह हिमालय के निचले प्रदेशों में, सिक्किम की ओर तथा सब प्रान्तों में उत्पन्न होता है। इसका वृक्ष मध्यमाकार का अचिरस्थायी होता है। छाल-भूरे रङ्ग की और लकड़ी-किञ्चित् भूरापन युक्त बादामी रङ्ग की होती है। पत्ते-एकान्तर, ३-६ इञ्च लम्बे तथा उतने ही चौड़े, द्विखण्डित, खण्ड लगभग चौथाई या तिहाई दूरी तक गहरे (युग्मपत्र), पत्राग्र गोल, पंखे की तरह फैली हुई संख्या में १३-१५ शिराओं वाले एवं करीब एक इञ्च लम्बे वृन्त से युक्त होते हैं। पुष्प-शीत ऋतु में पत्ते गिर जाने के पश्चात् ही सुगंधित पुष्प गिरे हुए पत्तों के कोणों से निकले रहते हैं। पुष्पदंड छोटे तथा आपद्म या नीलारुण रंग के होते हैं। कलिकाएं घेरे में गोलाई लिये होती हैं। पुष्प-बड़े, श्वेत, गुलाबी, चमकीले बैंगनी तथा किरमिजी रङ्ग के होते हैं। श्वेत पुष्पों का एक या अधिक दलपत्र चित्रित पीतवर्ण का होता है। दलपत्रों में मजबूत मध्यशिरा होती है और आधार से लाल बैंगनी रंग की शिराएँ निकली रहती हैं। फली- लम्बी, चिपटी कुछ मुड़ी हुई, करीब १ फुट तक लम्बी एवं १०-१५ बीजों से युक्त होती है। (ख) सं०-कोविदार। हिं०-कोविदार, खैखरवाल, सोना, कोइना (ला) र। बं०-देवकाञ्चन, रक्तकाञ्चन। संथा०-सिंहरा। ता०-मंदारि, पेद्दाआरि। ते०-कांचनम्। ले०-Bauhinia purpurea Linn. (बौहिनिआ पर्पूरिआ लिन.)।
गुडूच्यादिवर्गः ५११ इसके भी (क) की तरह के ही मध्यम ऊँचाई के वृक्ष होते हैं । ये छोटे रहने पर ही फूलने-फलने लगते हैं । पत्ते— बहुत गहराई तक कटे हुए, आयताकार, ५-७ इञ्च लम्बे, खंड के अग्र प्रायः कोणीय एवं पत्रसिराएँ ९-११ रहती हैं । पुष्प—पुष्पकलिका गहरे हरे या भूरे रंग की एवं पाँच कोणों से युक्त होती है । पुष्प (क) की अपेक्षा छोटे, पाँच दलपत्रों से युक्त, चमकीले बैंगनी, नीलारुण या गहरे गुलाबी रंग के होते हैं । काञ्चनार तथा कोविदार दोनों में बाह्यनाल लंबा और पूर्ण पुंकेशर ३-५ होते हैं । फली—लम्बी हरिताभ बैंगनी रंग की होती है । इसकी जड़ विषैली होती है । (ग) सं०—पीत कोविदार । ता०—तिरूवत्ती । ते०—कांचीनी । म०—सोन । सिलो०—कहपेतन । ले०— Bauhinia tomentosa Linn. (बौहिनिया टोमॅण्टोसा लिन.) । यह लंका में अधिक होता है । इसके पुष्प पीतवर्ण के किन्तु आधार की तरफ कुछ हलके भूरे या किरमिजी रंग के धब्बों से युक्त होते हैं । सभी की छाल, पत्र एवं पुष्पों का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है । कोमल कलिकाओं का शाक बनाया जाता है । रासायनिक संगठन—इसकी छाल में टैनिन होता है । इससे एक प्रकार का गोंद भी निकलता है । गुण और प्रयोग—कांचनार की छाल, ग्राही, रसायन, बल्य व्रणशोधक एवं व्रणरोपक है । इसके पुष्प रक्तपित्तहर हैं । छाल की क्रिया त्वचा तथा रसग्रंथियों पर होती है जिससे वहाँ की विनिमयक्रिया सुधरती है । इसकी अधिक मात्रा से वमन तथा विरेचन होता है । (१) गंडमाला तथा अपची में इसकी छाल का बहुत प्रयोग किया जाता है । इसका क्वाथ गुग्गुल के साथ पिलाते हैं तथा इससे व्रणप्रक्षालन करते हैं । गंडमाला में सोंठ एवं इसका चूर्ण चावल के धोवन के साथ देते हैं । इसकी छाल को पीसकर लेप भी करते हैं । नये रोग में इससे अधिक लाभ होता है । इसकी छाल का क्वाथ कुष्ठ, चर्मरोग, अतिसार एवं व्रण में दिया जाता है । मसूरिका में इसके क्वाथ में सुवर्णमाक्षिक भस्म डालकर पिलाते हैं । खदिरफल, दाडिमपुष्प एवं इसकी छाल के क्वाथ से कुल्ला करने से अधिक लालास्राव तथा गले के विकारों में लाभ होता है । रक्तपित्त में इसके पुष्प का चूर्ण मधु के साथ चटाते हैं तथा इसके शाक खिलाते हैं । पुष्पों का क्वाथ रक्तप्रदर, रक्तार्श, रक्तमेह तथा कास एवं रक्तातिसार आदि में दिया जाता है । मृदुविरेचक रूप में इसके पुष्पों को चीनी के साथ खिलाते हैं । इसके मूल का चूर्ण मट्ठे के साथ अर्श में दिया जाता है । मूल का क्वाथ अपचन तथा आध्मान में दिया जाता है । मात्रा—त्वक्चूर्ण २-४ माशा । पुष्पकलिकाचूर्ण १-२ माशा । अथ शोभाञ्जनः (सहिजना), (श्यामः श्वेतो रक्तश्च) तन्नामानि तद्गुणाँश्चाह शोभाञ्जनः शिग्रुतीक्ष्णगन्धकाक्षीवमोचकाः । तद्बीजं श्वेतमरिचं मधुशिग्रुः सलोहितः । शिग्रुः कटुः कटुः पाके तीक्ष्णोष्णो मधुरो लघुः ।।१०५।। दीपनो रोचनो रूक्षः क्षारस्तिक्तो विदाहकृत् । संग्राही शुक्रलो हृद्यः पित्तरक्तप्रकोपणः ।।१०६।। चक्षुष्यः कफवातघ्नो विद्रधिश्वयथुकृमीन् । मेदोऽपचीविषप्लीहगुल्मगण्डव्रणान्हरेत् ।।१०७।। श्वेतः प्रोक्तगुणो ज्ञेयो विशेषाद्दाहकृद्भवेत् । प्लीहानं विद्रधिं हन्ति व्रणघ्नः पित्तरक्तहृत् । मधुशिग्रुः प्रोक्तगुणो विशेषाद्दीपनः सरः ।।१०८।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
५१२ भावप्रकाशनिघण्टुः सहिजन के भेद, नाम तथा गुण-सहिजन के (१) श्याम सहिजन, (२) श्वेत सहिजन तथा (३) लाल सहिजन इस प्रकार से ३ भेद होते हैं। शोभाञ्जन, शिग्रु, तीक्ष्णगन्धक, अक्षीव और मोचक ये सब संस्कृत नाम सहजन के हैं। सहजन के बीज को 'श्वेतमरिच' कहते हैं। जो 'लाल सहजन' होता है उसे 'मधुशिग्रु' कहते हैं। शिग्रु अर्थात् श्याम सहजन-स्वाद तथा पाक में कटुरसयुक्त, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, मधुर, लघु अग्निदीपक, रोचक, रूक्ष, क्षार, तिक्तरसयुक्त, विदाहकारक, मलावरोधक, शुक्रजनक, हृदय को हितकर, पित्त रक्त को कुपित करने वाला, नेत्रों को हितकर, कफवात- नाशक एवं विद्रधि, शोथ, कृमि, मेदरोग, अपची, विष, प्लीहा, गुल्म, गलगण्ड और व्रण का नाशक होता है। इसी प्रकार से 'सफेद सहजन' के भी गुण हैं किन्तु वह विशेष करके दाहकारक तथा प्लीहा, विद्रधि, व्रण और पित्त-रक्त का नाशक होता है। मधुशिग्रु अर्थात् 'लाल सहजन' के भी पूर्वोक्त सभी गुण हैं किन्तु विशेष करके वह अग्निदीपक तथा सारक (दस्तावर) होता है। [१०५-१०८] अथ शिग्रुवल्कलपत्रस्वरसगुणानाह शिग्रुवल्कलपत्राणां स्वरसः परमार्त्तिहृत् ॥१०९॥ सहजन की छाल तथा पत्तों के स्वरस के गुण-सहजन की छाल तथा पत्तों का स्वरस असह्य पीड़ा को दूर करता है। [१०९] अथ शिग्रुबीजगुणानाह चक्षुष्यं शिग्रुजं बीजं तीक्ष्णोष्णं विषनाशनम् । अवृष्यं कफवातघ्नं तन्नस्येन शिरोऽर्त्तिनुत् ॥११०॥ सहजन के बीज-नेत्रों को हितकर, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, विषनाशक, अवृष्य और कफ वातनाशक होते हैं। सहजन के बीजों का चूर्ण करके नस्य लेने (सूंघने) से शिर की पीड़ा दूर होती है। इसके पुष्प तथा पुष्प-मधु के गुण आगे शाकवर्ग में दिये हुए हैं। [११०] ४९. सहिजना हिं०-सहिजना, सहिजन, सहजन, सहजना, सैजन, मुनगा। बं०-सजिना। म०-शेवगा, शेगटा। मा०- सहिजनो, सहिंजणो। क०-नुग्गे। ते०-मुनग। गु०-सेकटो, सरगवो। ता०-मोरुङ्गै, मुरिणकै। पं०-सोंहजना। मला०-मुरिण्णा। ब्राह्मी०-डोडलों बिन। यू०-सिनोह। फा०-सर्वकोही। अं०-Horse Radish Tree (हौर्स रेडिश ट्री); (ड्रम स्टिक् ट्री)। ले०-Moringa Pteridosperma Gratin (मोरिङ्गा टेरीगोस्पर्मा ग्रर्ट.)। Fam. Moringaceae (मोरिंगेसी)। यह हिमालय के निचले प्रदेशों में चेनाब से लेकर अवध तक जंगली रूप में तथा भारत के प्रायः सभी प्रांतों में एवं वर्मा में लगाया हुआ मिलता है। इसका वृक्ष-साधारण वृक्षों के समान छोटा, २०-२५ फुट ऊँचा होता है। छाल-चिकनी, मोटी, कार्कयुक्त, भूरे रङ्ग की एवं लम्बाई में फटी हुई और लकड़ी कमजोर होती है। पत्ते-संयुक्त, प्रायः त्रिपक्षवत् तथा १-३ फीट क्वचिद् ५ फीट तक लम्बे होते हैं। पत्रक-अंडाकार, लट्वाकार, विपरीत एवं करीब १/२-३/४ इञ्च लम्बे होते हैं। कार्त्तिक महीने से वसन्त ऋतु के आरम्भ तक फूलों के गुच्छे टहनियों के अन्त में दिखाई पड़ते हैं। पुष्प-श्वेतवर्ण के तथा मधु की तरह गन्धवाले होते हैं। फलियाँ-गोल, त्रिकोणाकार, अंगुलिप्रमाण मोटी, ९-२० इञ्च लम्बी, बीजों के बीच-बीच में पतली एवं बड़ी-बड़ी खड़ी ९ रेखाओं से युक्त होती हैं। उनमें सफेद, सपक्ष, त्रिकोणाकार तथा लगभग १ इञ्च लम्बे बीज होते हैं। बीजों को सफेद मरिच भी कहते हैं। इससे गोंद भी निकलता है जो पहले दुधिया रहता है किन्तु बाद में वायु का सम्पर्क होने पर ऊपर से गुलाबी या लाल हो जाता है। इसकी कच्ची सेमों का साग और अचार बनाते हैं। इसकी छाल के रेशों से कागज, चटाई, डोरी आदि बनाते हैं। जानवर-विशेषकर ऊँट-इसकी टहनियों को खाते हैं।
गुडूच्यादिवर्गः ५१३ इसके मूल, मूल की ताजी छाल, फली, पत्र, बीज एवं गोंद आदि का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। इसकी जड़ बाहर से खुरदरी, जालीदार, हलके भूरे रंग की एवं अन्दर से श्वेत रंग की होती है। हॉसर्हेंडिश की तरह इसका स्वाद कुछ तीता एवं गन्ध की तीक्ष्ण होती है। मोरिंगा कोन्केनेन्सिस निम्मो (Moringa concanensis Nimmo) नामक एक जाति दक्षिण राजपूताना तथा सिन्ध में होती है। इसकी फलियाँ कड़वी होती हैं। इसके पुष्प अधिकांश लाल होते हैं। लाल, काले एवं श्वेतपुष्प भेद से सहजन ३ प्रकार का माना जाता है। अधिकांश श्वेतपुष्प का ही सहजन देखा जाता है। सम्भव है स्थानभेद से कहीं-कहीं रक्त तथा श्यामवर्ण के भी सहजन प्राप्त होते हों। भावप्रकाशकार रक्तपुष्प वाले को मधुशिग्रु कहते हैं। संभव है इस (श्वेत जो अधिकांश मिलता है) वृक्ष के पुष्पों में मधु की तरह गंध होने से इसका नाम मधुशिग्रु दिया हो। रासायनिक संगठन- इसके बीजों में करीब ३६% एक निर्गन्ध स्वच्छ तैल रहता है जो सूक्ष्म यन्त्रों में स्निग्धीकरण के काम आता है। यह रखने से खराब भी नहीं होता। बेन ऑइल (Ben-oil) नामक तैल जो घड़ीसाज व्यवहार में लाते हैं वह अधिकतर अफ्रीका में होने वाले इसी की जाति के वृक्ष (M. aptera, मो. आप्टेरा) के बीजों से निकाला जाता है। सुगंध व्यवसाय में भी इसका तैल उपयोग करते हैं। अस्थिर गन्ध भी इसमें स्थायी हो जाती है। इसके मूल में स्पाइरोचिन् (Spirochin) नामक कार्यशील क्षारीय द्रव्य (Basic) एवं प्टेरिगोस्पर्मिन् (Pterygospermin) नामक एक प्रतिजैविकीय पदार्थ (Antibiotic) रहता है। इसमें एक उग्र दुर्गन्धयुक्त तैल भी पाया जाता है। स्पाइरोचिन नामक क्रियाशील द्रव्य ग्रामग्राही (Gram positive) उपसर्गों, विशेषकर स्तवक गोलाणु एवं मालागोलाणुजन्य (Staphylococcal and streptococcal) उपसर्गों में लाभदायक है। यह अधिच्छदीय (Epithelil)) कोषाओं की कार्यवृद्धि करता है तथा इसमें कुछ वेदनाहरण का भी गुण है। वातनाडियों पर इसका सामान्यतया अवसादक प्रभाव (General paralysing effect) पड़ता है। इससे गर्भाशय के अनियमित संकोचों का शमन होकर उसे बल मिलता है। प्टेरिगोस्पर्मिन अनेक प्रकार के छत्राणुओं (Fungi) की वृद्धि को रोकता है। इसके साथ अल्प मात्रा में न्यूक्लिकू ॲसिड (Nucleic acid) होने पर इसकी कार्यशीलता बहुत बढ़ जाती है। यह ७५००० में १ एवं ४०००० में १ इस अल्प प्रमाण में क्रमशः ग्रामग्राही एवं ग्रामत्यागी (Gram negative) जीवाणुविरोधी कार्य करता है। ऑल्लिसिन् (Allicin) की तरह यह रक्त एवं आमाशयिक रस की उपस्थिति में कार्यशील रहता है किन्तु अग्न्याशयिक रस (Pancreatic Juice) की उपस्थिति में इसकी कार्यशीलता नष्ट हो जाती है। गुण और प्रयोग- सहिजन के मूल की ताजी छाल उष्ण, कटु, दीपन, पाचन, उत्तेजक, वातानुलोमक, वातहर, कफहर, कृमिघ्न, शिरोविरेचन, स्वेदजनन, मूत्रजनन, चक्षुष्य, शोथहर एवं व्रणदोषनाशक है। वृक्कशोथ में इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये। इसका बाह्यलेप स्वरांगकारक है। इसका उपयोग अपची, गुल्म, विद्रधि, शोथ, प्लीहावृद्धि, कृमि, रजःकृच्छ्र, हिक्का, श्वास, कफज्वर, पाचन के विकार एवं व्रण में किया जाता है। इसके नये वृक्ष की मूल को ज्वर, अपस्मार, अपतंत्रक, अंगघात, जीर्ण आमवात, जलोदर, यकृद् वृद्धि, प्लीहावृद्धि तथा अपचन में देते हैं। सैंधव एवं हींग के साथ मूलत्वक् का क्वाथ विद्रधि, शोथ, फोड़े, अश्मरी, अपस्मार एवं अपतंत्रक में दिया जाता है। संतरे का छिलका, जायफल एवं इसकी मूलत्वक् का मद्यसाररीय अर्क मूर्च्छा, चक्कर, ३६ भाव.I
स्नायविक, दौर्बल्य, अपतंत्रक, आध्मान एवं उद्वेष्टनयुक्त आंत्रिक विकारों में लाभदायक है। मुखजाड्य, अर्दित, पक्षाघात आदि वातनाड़ीसंस्थान के रोगों में इसका स्वरस दिया जाता है। व्रणशोथ पर छाल को पीसकर लेप करते हैं तथा खिलाते हैं। गले की शिथिलता, मुखविकार, कृमिदंत में इसके क्वाथ से कुल्ला कराते हैं। इसकी ताज़ी जड़ को सरसों एवं आदी के साथ पीस कर प्रतिक्षोभक एवं विस्फोटककारक प्रलेप के रूप में उपयोग करते हैं। संधिशोथ तथा शरीर की पीड़ा में छाल का उष्ण लेप थोड़ी देर के लिये करते हैं। इसके बीजों के तेल की संधिवात, आमवात तथा वातरक्त में मालिश करते हैं। मूर्च्छा में बीजों का चूर्ण नाक में डालते हैं। इसका गोंद ग्राही होता है तथा आमवात में प्रयोग किया जाता है। इसके पुष्प को दूध में उबालकर वाजीकरण के लिये पिलाते हैं। इसकी फली का साग आंत्रकृमिप्रतिबंधक मानते हैं। इसके कोमल पत्तों का साग खाने से शौच साफ होता है। मात्रा-मूलत्वक् ४ से ८ माशा। अथ श्वेतपुष्पा नीलपुष्पा चापराजिता (कोयल) तयोर्नामानि गुणाँश्चाह आस्फोता गिरिकर्णीस्याद्विष्णुक्रान्ताऽपराजिता । अपराजिते कटू मेध्ये शीते कण्ठ्ये सुदृष्टिदे ।।१११।। कुष्ठमूत्राग्निदोषामशोथव्रणविषापहे । कषाये कटुके पाके तिक्ते च स्मृतिबुद्धिदे ।।११२।। सफेद तथा नीले फूल की कोयल के नाम तथा गुण-आस्फोता, गिरिकर्णी, विष्णुक्रान्ता और अपराजिता ये दोनों प्रकार की 'कोयल' के संस्कृत नाम हैं। दोनों कोयल-कटु, तिक्त तथा कषायरसयुक्त, मेधा के लिये हितकर, शीतवीर्य, कण्ठस्वर को उत्तम बनाने वाली, देखने की शक्ति को बढ़ाने वाली तथा कुष्ठ, मूत्ररोग, त्रिदोष, आम, शोथ, व्रण एवं विष को नष्ट करनेवाली, विपाक में कटुरसयुक्त, स्मृति तथा बुद्धि को देने वाली होती है। [१११-११२] नोट-भावप्रकाशकार आस्फोता, गिरिकर्णी, विष्णुक्रान्ता तथा अपराजिता ये चार पर्याय लिखते हैं। ध० नि० एवं रा० नि० में इसके 'अश्वक्षुर', 'श्वेतस्पन्दा' आदि अन्य पर्याय दिये हुए हैं किन्तु विष्णुक्रान्ता का वहाँ उल्लेख नहीं है। आगे शंखपुष्पीभेद में विष्णुक्रान्ता १ का उन्होंने स्वतन्त्र उल्लेख किया है जिसके ध० नि० ने नील, शुक्ल एवं रक्तपुष्पभेद से ३ भेद किये हैं। वहाँ पर रा० नि० ने (शंखपुष्पी के अतिरिक्त) नीलपुष्पा, अपराजिता ये पर्याय विष्णुक्रान्ता के दिये हैं। भावप्रकाशकार शंखपुष्पी के पर्यायों में विष्णुक्रान्ता का उल्लेख नहीं करते। अधिकांश विद्वानों ने अपराजिता को क्लिटोरिआ टर्नेटिआ लिन. (Clitoria ternatea Linn.) माना है तथा इसके नील एवं श्वेतपुष्प भेद पाये भी जाते हैं। किन्तु केरल में इसका (क्लि. टर्नेटिआ को) शंखपुष्पी नाम से व्यवहार करते हैं ऐसा उल्लेख 'आयुर्वेदिक फ्लोरा मेडिका' में है। इसी प्रकार एव्होलह्यूलस् ऑल्सिनॉइडीस् लिन. (Evolvulus alsinoides Linn.) जिसे अधिकांश विद्वान् शंखपुष्पी मानते हैं उसका केरल में विष्णुक्रान्ता नाम से व्यवहार किया जाता है। श्री ठा० बलवन्तसिंह जी का मत है कि एहॉलह्यूलस् ऑल्सिनाइडीस् (पुष्प नीले) को ही विष्णुक्रान्ता मानना चाहिये तथा नीलापराजिता को विष्णुक्रान्ता नहीं मानना चाहिये। इसी प्रकार शंखपुष्पी के पुष्पों का श्वेत होना आवश्यक होने के कारण ए. अल्सिनॉइडीस् से मिलती जुलती उसी वर्ग की अन्य जाति कन्हॉव्हलस् प्लुरिकॉलिस चाइसी (Convolvulus pluricaulis Choisy) को शंखपुष्पी मानना चाहिये जिसके पुष्प हलके गुलाबी या श्वेत रंग के पाये जाते हैं तथा जिनके गुणों में विशेष अन्तर नहीं है। कुछ लोगों ने कन्स्कोरा डिकसेटा शुल्ट (Canscora decussata Schult) को शंखपुष्पी माना है। १. विष्णुक्रान्ता कटुस्तिक्ता कफवातामयापहा (ध.नि.)
गुडूच्यादिवर्गः ५१५ शंखपुष्पी का आगे स्वतन्त्र वर्णन किया गया है। यहाँ अपराजिता (क्लिटोरिआ टर्नेरिआ) का वर्णन किया गया है। ५०. अपराजिता हिं० - अपराजिता, कोयल, कालीजर । बं० - अपराजिता । म० - गोकर्णी, काजली, गोकर्ण । पं० - धनन्तर । गु० - गरणी । क० - शंखपुष्प, गिरिकर्णिके । ता० - काक्कणनकोटी । ते० - दिटेन । मल० - शंखपुष्पम् । इरा० - मझ़ेरियुन्-इ-हिंदी । अं० - Winged-leaved clitoria (विंगड लिव्ड क्लिटोरिआ) । ले० - Clitoria ternatea Linn. (क्लिटोरिआ टर्नेटिआ लिन.) । Fam. Leguminosae (लेगुमिनोसी.) । यह सब प्रान्तों में पाई जाती है । अधिकतर यह बगीचों में लगाई हुई मिलती है । बस्तियों के आस-पास वन्य अवस्था में भी कभी-कभी दिखाई देती है । पुष्पभेद से यह नील एवं श्वेत दो प्रकार की होती है । इसकी लता-बहुवर्षायु, सुन्दर तथा पतले काण्ड की होती है । यह वृक्षों या झाड़ियों पर लिपटती हुई (चक्रारोही) बढ़ती है । पत्ते-संयुक्त, असम-पक्षवत् (Imparipinnate) रहते हैं । पत्रक-प्रायः ५ कभी-कभी ७, अंडाकार एवं १-२ इञ्च लम्बे होते हैं । पुष्प-जलसीप के आकार वाले नलीयुक्त, गोल, चमकीले नीले अथवा कभी-कभी श्वेत पुष्प, १ १/२-२ इञ्च बड़े एवं पत्रकोणीय पुष्पपण्ड में एकाकी रहते हैं । ध्वजदल चम्मच के आकार का और पक्षदलों के नीचे फैला रहता है । कोणपुष्पक बड़े, स्थायी तथा पर्णसदृश होते हैं । फली-२-४ इञ्च लम्बी, चिपटी, नुकीली तथा सीधी या बहुत थोड़ी मुड़ी हुई होती है । बीज-६-१० अंडाकार, चिपटे, चिकने तथा गहरे भूरे रंग के होते हैं । इसके मूल का अधिक उपयोग किया जाता है । इसके पुष्प, पत्र एवं बीज आदि का भी उपयोग करते हैं । रासायनिक संगठन-इसकी जड़ की छाल में स्टार्च, टैनिन, राल तथा ११% राख होती है । बीज में तैल, कडुवी भूरे रङ्ग की राल तथा ६% राख होती है । गुण और प्रयोग-इसकी जड़ भेदन, मूत्रल एवं वेदनास्थापन है । इससे वमन भी होता है । वमन के साथ-साथ पेट में दर्द होकर विरेचन भी होता है । कभी-कभी वमन नहीं भी होता । इसके बीज जलप की तरह किन्तु सौम्य भेदन तथा अल्प मूत्रजनन हैं । विरेचन के लिये बीजों के साथ सोंठ एवं सैंधव का उपयोग किया जाता है । इसका उपयोग उदर, कफविकार, ज्वर, मूत्रविकार, गलगण्ड, गण्डमाला, अपची, शोथ, नेत्ररोग, उन्माद, आमवात, कुष्ठ एवं विष में किया जाता है । (१) सभी प्रकार के जलोदर में विरेचन के लिये इसका उपयोग करते हैं । इससे विष का निर्हरण होता है । (२) शुक्रमेह, बस्तिशोथ एवं मूत्रकृच्छ्र में इसकी जड़ का फांट पिलाया जाता है । (३) बच्चों के कास-श्वास में बीजों को सेंक पीसकर थोड़ा गुड़ एवं सैंधव मिलाकर पिलाने से दस्त के साथ कफ निकल कर आराम मिलता है । कफ विकारों में मूल को दूध के साथ पिलाते हैं । (४) अर्धभेदक में श्वेत अपराजिता की जड़ के स्वरस का नस्य कराया जाता है । (५) इसके पत्तों का रस, आर्द्रकरस के साथ पसीना रोकने के लिये देते हैं । त्वग्रोगों में पत्तों का फांट पिलाते हैं । कान के चारों तरफ सूजन होकर ग्रन्थियों की वृद्धि होने पर पत्तों को सैंधव के साथ पीसकर लगाते हैं । (६) सर्पविष में इसकी जड़ की छाल तथा निर्गुण्डी मूलत्वक् को जल में पीस कर पिलाने से लाभ होता है । (च० चि० अ० २५) मात्रा-मूलत्वक् चूर्ण १।।-३ माशा; बीजचूर्ण १०-२० र० । १. विष्णुकान्ता कटुस्तिक्ता कफवातामयापहा । (ध. नि.)
५१६ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ सिन्दुवारः (मेउड़ी-सेन्दुवार) निर्गुण्डी (नीलसम्हालू) इति च तयोर्नामानि गुणांश्चाह सिन्दुवारः श्वेतपुष्पः सिन्दुकः सिन्दुवारकः । नीलपुष्पी तु निर्गुण्डी शेफाली सुवहा च सा ।।१९३।। सिन्दुकः स्मृतिदस्तिक्तः कषायः कटुको लघुः । केश्यो नेत्रहितो हन्ति शूलशोथाममारुतान् । कृमिकुष्ठारुचिश्लेष्मज्वरान्नीलापि तद्विधा ।।१९४।। सम्हालू जिसे लोक में मेउड़ी तथा सेन्दुवार कहते हैं, उसके भेद, नाम तथा गुण—सम्हालू दो प्रकार का होता है एक सफेद फूल वाला, दूसरा नीले फूल वाला । सफेद फूल वाले सम्हालू के संस्कृत नाम—सिन्दुवार, सिन्दुक और सिन्दुवारक ये सब हैं। नीले फूल वाले सम्हालू के संस्कृत नाम—निर्गुण्डी, शेफाली और सुवहा ये सब हैं। सम्हालू- (सफेद फूल वाला) स्मरणशक्तिवर्धक, तिक्त, कषाय और कटुरसयुक्त, लघु, केश तथा नेत्र के लिये हितकारी होता है एवं यह शूल, शोथ, आमवात, कृमि, कुष्ठ, अरुचि और कफ-ज्वर को नष्ट करता है । इसी भाँति नीले फूल वाले सम्हालू के भी गुण हैं । [१९३-१९४] अथ सिन्दुवारपत्रगुणानाह सिन्दुवारदलं जन्तुवातश्लेष्महरं लघु ।।१९५।। सम्हालू के पत्तों के गुण—सम्हालू के पत्ते—कृमि, वात और कफ को दूर करने वाले तथा लघु होते हैं । [१९५] नोट—सम्हालू के दो भेदों का भावप्रकाशकार ने वर्णन किया है । 'निर्गुण्डी' यह नीले सम्हालू के लिये कहा गया है । निर्गुण्डी का ही पर्याय शेफाली दिया गया है । ध० नि० ने 'सिन्दुवार' के श्वेत एवं नील भेद दिये हैं तथा 'शेफालिका' के भी निर्गुण्डी (नीलपुष्प) एवं शुक्ला ये भेद दिये हैं । इसी प्रकार रा० नि० एवं म० नि० ने भी शेफाली से नील (निर्गुण्डी) का ग्रहण किया है । श्री ठा० बलवन्त सिंहजी शेफालिका यह नाम हरसिंगार (Nyctanthes arbortristis) के लिए उचित समझते हैं । हरसिंगार का वर्णन पहले पृष्ठ ३३५ पर किया गया है । कुछ लोगों ने 'नीलनिर्गुण्डी' नाम जस्टिसिआ जेण्डारुसा (Justicia gendarussa) को दिया है जिसका पृष्ठ ३२३ पर वर्णन किया गया है । आधुनिक उद्भिज्जवेत्ताओं ने भी इसके कई भेदों का वर्णन किया है। वाइटेक्स नेगुण्डो (Vitex negundo) में श्वेत या हलके नीले दोनों प्रकार के पुष्प पाये जाते हैं तथा पत्रक भी अखंड या दन्तुर दोनों प्रकार के होते हैं। इसके अतिरिक्त इसका एक भेद वाइटेक्स ट्राइफोलिआ (Vitex trifolia) भी पाया जाता है । रेणुकबीज, जिनका पृष्ठ २५१ पर वर्णन किया गया है वे भी ईरान में होने वाली निर्गुण्डी जाति के वृक्षों के फल हैं । ५१. सम्हालू-निर्गुण्डी हिं०-सम्भालू, सम्हालू, सन्दुआर, सिनुआर, मेउड़ी । बं०-निशिन्दा । म०-लिंगड, निगड़, निर्गुण्डी । पं०- वन्न, भरवन, मौरा । गु०-नगोड़, नगड़ । ता०-नोच्चि । म०-करिनोच्चि । ते०-वाविली, तेल्लावाविली । क०- बिलिनेक्कि । फा०-पंजंबगुस्त । अ०-असलक । अं०-Five Leaved Chaste Tree (फाइव लीव्ड् चेस्ट ट्री) । Indian Privet (इण्डियन प्रिवेट) । ले०-Vitex negundo Linn. (वाइटेक्स नेगुण्डो लिन.) । Fam. Verbenaceae (वर्बिनेसी) । इसके वृक्ष प्रायः सब प्रान्त के वन, उपवन, नदियों के किनारे, गावों के आसपास की परती जमीन में और बागों में भी पाये जाते हैं । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
गुडूच्यादिवर्गः ५१७ इसके बड़े-बड़े गुल्म प्रायः ६-२८ फीट ऊँचे अथवा कभी-कभी बड़े वृक्ष के समान होते हैं। इस पर श्वेताभ रोमावरण होता है। छाल-पतली, चिकनी तथा धूसरवर्ण की होती है। पत्ते-सदल तथा ३.५ पत्रकों से युक्त होते हैं। पत्रक-भालाकार, लम्बाग्र, अखण्ड या गोल दन्तुर, २-५ इञ्च लम्बे, १/२-१ १/२ इञ्च चौड़े तथा छोटे बड़े आकार के होते हैं। अग्र का पत्रक लम्बा एवं उसका वृन्त भी लम्बा होता है। नीचे के पत्रक या बगल वाले पत्रक छोटे तथा छोटे या बिना वृन्त के होते हैं। ये ऊपर से हरे तथा नीचे श्वेताभवर्ण के होते हैं। पुष्प-आयताकार और २-८ इञ्च लम्बी मञ्जरियों में निकले रहते हैं। ये श्वेत या हलके नीले (बैंगनी) रङ्ग के होते हैं। फल-छोटे, गोल, १/४ इञ्च व्यास के तथा पकने पर काले रङ्ग के होते हैं। इसकी जड़ पर पराश्रयी वनस्पति पाई जाती है जो एलेक्ट्रा पराझिटिका वेर. चित्रकूटेन्सिस् (Alectra parasitica, A. Rich, Var. Chitrakutensis) है। यह वर्षाकाल में होती है तथा अक्तूबर-नवंबर तक परिपक्व होने पर इसके कंद को संग्रह कर सुखा कर इसका चूर्ण बना प्रयोग करते हैं। बिहार के वैद्य इसको गलित कुष्ठ के लिये उपयोगी बतलाते हैं। प्रारंभिक परीक्षण से देखा गया है कि ४ ग्राम दैनिक विभक्त मात्रा से लाभ होता है। अधिक मात्रा से अतिसारादि उपद्रव होते हैं। (प्रसाद, बी. एन्.; लेप्रसी रिव्यू, जुलाई ६२ खण्ड XXXIII, अंक ३.) इसकी एक दूसरी जाति होती है जिसे (ले०) वाइटेक्स ट्राइफोलिया लिन. (Vitex trifolia Linn.) कहते हैं। इसके पत्ते-१-३ पत्रक होते हैं। पत्रक-१-३ इञ्च लम्बे, सभी अवृन्त, अभिलट्वाकार या अभिलट्वाकार-आयताकार, अखण्ड तथा किञ्चित् कुण्ठिताग्र होते हैं। पुष्प-हलके नीले वर्ण के होते हैं। फल-काले रङ्ग के तथा १/५ इञ्च व्यास में होते हैं। इनके पंचांग तथा पत्तों का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। कुछ विद्वानों के मत से दन्तुर पत्र अधिक लाभदायक माने जाते हैं। रासायनिक संगठन-इसके पत्तों में एक रंगहीन गन्धयुक्त उड़नशील तैल तथा एक राल होती है। इसके बीजों में अम्ल राल, कषाय आर्गेनिक अम्ल, मॅलिक् एसिड, अत्यल्प क्षाराभ तथा रंजक द्रव्य होते हैं। गुण और प्रयोग-यह कटु, तिक्त, कषाय, उष्ण, लघु, दीपन, वेदनास्थापन, वातहर, कफहर, ज्वरघ्न, मूत्रजनन, आर्तवजनन, कृमिघ्न, मस्तिष्कबलदायक, शोथघ्न, विषहर, बल्य एवं रसायन है। शोथघ्न, वेदनास्थापन एवं वातहर गुण बहुत प्रभावशाली हैं। इसके पुष्प शीतल तथा पित्तनाशक हैं। (सु० सू० अ० ४६) इसका प्रयोग आमवात, वातव्याधि, कास, ज्वर, प्रदर, शूल, अपचन, आध्मान, अपची, क्षय, कुष्ठ, शोथ, व्रण, प्लीहावृद्धि एवं कृमि में किया जाता है। सभी प्रकार के रोगों में शिलाजतु के साथ इसका प्रयोग लाभदायक होता है। (१) शोथयुक्त सभी व्याधियों में यह बहुत ही लाभदायक है। फुप्फुसशोथ, फुप्फुसावरणशोथ, उदरावरणशोथ, किसी प्रकार का संधिशोथ, तीव्र आमवातिक संधिशोथ एवं सोजाक में कभी-कभी होने वाले अंडशोथ में इसका अन्तर्बाह्य प्रयोग करते हैं। इसके पत्तों को पीसकर हाँड़ी में गरम कर शोथ पर दिन में ३, ४ बार बाँधना चाहिये। इसके साथ करञ्ज, नीम तथा धतूरे के पत्तों का भी उपयोग करने से अधिक लाभ होता है। निर्गुण्डी में अनुलोमिक गुण न होने के कारण शोथ में प्रारंभ में नागदन्ती या रसकपूर जैसे विरेचक औषध का उपयोग करना चाहिये। (२) कफज्वर, फुप्फुसपाक तथा फुप्फुसावरणशोथ आदि में इसके पत्तों का स्वरस या क्वाथ छोटी पीपल के साथ पिलाते हैं तथा पत्तों से सेकते हैं। प्रतिश्याय तथा गले के शोथ में इसके सूखे पत्तों का धूम्रपान कराया जाता है तथा पत्तों का क्वाथ छोटी पीपल एवं घोड़बच के साथ पिलाते हैं। कास में पत्रस्वरससिद्धघृत का उपयोग लाभदायक है। राजयक्ष्मा में इसके पंचांग के स्वरस से सिद्ध घृत या स्वरस में घृत मिलाकर प्रयोग करते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
५१८ भावप्रकाशनिघण्टुः (३) आमवात में निर्गुण्डी, तुलसी एवं भँगरेया का स्वरस अजवायन के चूर्ण के साथ देते हैं तथा पत्तों से सेंकते हैं। गृध्रसी में नीले पुष्पवाली निर्गुण्डी के पत्तों का क्वाथ पिलाते हैं तथा पत्तों से सेंकते हैं। (४) शीतज्वर, विषमज्वर एवं सूतिकाज्वर आदि में इसके पत्तों का चूर्ण, पंचांग स्वरस, फांट या क्वाथ को देते हैं तथा इसके क्वाथ से शरीर पोंछते हैं। इससे शरीर का दाह एवं दुर्गन्धि कम होती है। विषमज्वर में प्लीहावृद्धि होने पर इसके पत्र एवं हरीतकी को गोमूत्र के साथ देते हैं या पत्तों को कुटकी एवं रसौत के साथ देते हैं। सूतिकाज्वर में इससे आर्तवशुद्धि होती है तथा गर्भाशय एवं उसके आसपास के अङ्गों का शोथ भी कम होता है। इसमें आन्तरिक प्रयोग के साथ इसके पत्तों को गरम करते बाँधते हैं। ज्वर में वमन तथा तृषाशान्ति के लिये इसके पुष्प मधु के साथ खिलाते हैं। (५) नहरुवा कृमि में इसको खिलाते हैं तथा इससे सेंकते हैं। (६) इसके मूल एवं पत्रस्वरस से सिद्ध तैल का शोथ, व्रण, नाड़ीव्रण, कुष्ठ, अपची, गंडमाला तथा सन्धिपीड़ा में व्यवहार किया जाता है। कर्णपूय में मधु के साथ इस तैल को कान में डालते हैं। (७) सोजाक में पेशाब रुकने पर इसके उष्ण क्वाथ में रोगी को बैठाते हैं। (८) पाँव की जलन में पत्तों को बाँधते हैं। शिरःशूल में पत्तों को पीसकर सर पर बाँधते हैं तथा फलों के चूर्ण का नस्य देते हैं। सोते समय सर के नीचे पत्तों की तकिया भी रखते हैं। (९) कीड़े आदि से रक्षा करने के लिये चावल, कपड़े तथा पुस्तकों में इसके पत्ते रखते हैं। मात्रा-पत्रस्वरस १-२ तो०; पत्रचूर्ण १/४-१/२ तो०; मूलत्वक् १-३ मा०। अथ कुटजः (कुडा-कोरैया) तस्य नामगुणानाह कुटजः कूटजः कौटो वत्सको गिरिमल्लिका ।।११६।। कालिङ्गः शक्रशाखी च मल्लिकापुष्प इत्यपि । इन्द्रो यवफलः प्रोक्तो वृक्षकः पाण्डुरद्रुमः ।।११७।। कुटजः कटुको रूक्षो दीपनस्तुवरो हिमः । अर्शोऽतिसारपित्तास्रकफतृष्णाऽऽमकुष्ठनुत् ।।११८।। कुडा के नाम तथा गुण-कुटज, कूटज, कौट, वत्सक, गिरिमल्लिका, कालिङ्ग, शक्रशाखी, मल्लिकापुष्प, इन्द्र (इन्द्र पर्यायवाची सभी शब्द), यवफल, वृक्षक और पाण्डुरद्रुम ये सब कुडा के संस्कृत नाम हैं। कुडा-कटु तथा कषायरसयुक्त, रूक्ष, अग्निदीपक और शीतवीर्य होता है। एवम् यह बवासीर, अतिसार, पित्त, रक्त, कफ, तृषा आम तथा कुष्ठ को दूर करता है। [११६-११८] ५२. कूड़ा हिं०-कूड़ा, कोरयां, कुड़ा, कोरैयाँ, कुरैयाँ। बं०-कुरचि। म०-पांढरा कुड़ा। गु०-कडो। क०-कोरासिमिन। ते०-कांककोडिसे, पला कोडसा। उ०-कुड़िया। ता०-वेप्पालै, कोडगपल। मल०-वेनपाला। फा०-जबानै गुजस्खे तल्ख। अ०-लसनुल्लास फिरुलमुर्र, तिबाज। अं०-Kurchi, Conessi or Tellicherry Bark (कुर्चि, कोनेसि या तेल्लिचेरि वार्क)। ले०-Holarrhena antidysenterica Wall. (होलेहेना एण्टिडिसेन्टेरिका वाल)। Fam. Apocynaceae (एपोसाइनेसी)। यह भारतवर्ष के प्रायः सभी भागों में आर्द्र भूमि को छोड़कर तथा हिमालय की ४००० फीट ऊँची चोटियों पर उत्पन्न होता है। इसके छोटे-छोटे वृक्ष दून और सहारनपुर के जङ्गलों में बहुत होते हैं। कहीं-कहीं रोपित भी किया जाता है।
गुडूच्यादिवर्गः ५१९ कूड़े का वृक्ष बहुत ऊँचा नहीं होता, प्रायः ८-१० हाथ ऊँचा वृक्ष देखने में आता है । छाल-चौथाई इञ्च तक मोटी, खुरदरी, भूरे रंग की होती है । लकड़ी हलकी पीली और कोमल होती है । पत्ते-५-१० इञ्च लम्बे तथा २-४ इञ्च चौड़े, नोकीले, लट्त्वाकार-अंडाकार या कुछ आयताकार चिकने या मृदुरोमेश एवं प्रधान शिराएँ १०-१४ युग्म होती हैं । फूल-सफेद आते हैं और उनमें कुछ सुगन्धि जान पड़ती है । फलियाँ-दो-दो एक साथ परन्तु असंयुक्त, ८ से १६ इञ्च तक लम्बी, पतली, तिहाई इञ्च मोटी और कुछ टेढ़ी होती हैं । बीज-जई के समान आध इञ्च तक लम्बे, रेखाकार, आयताकार और अन्त के सिरे पर प्रायः हलके भूरे रङ्ग के रोमगुच्छ से युक्त होते हैं । इन्हें इन्द्रजव कहते हैं, और वे स्वाद में कड़वे होते हैं । इन्द्रजव तथा इसकी आर्द्र छाल का विशेष व्यवहार किया जाता है । इसी वृक्ष को श्वेत कुटज या पुंकुटज कहा जाता है तथा गुण में यह 'प्रतिनिधि तथा व्यामिश्रण' में लिखित राइटिया टिंक्टोरिया, सं०-कृष्ण कुटज या स्त्रीकुटज जिसके बीजों को मीठा इन्द्रजव कहते हैं उससे उत्कृष्ट है । रासायनिक संगठन-इसकी छाल एवं बीजों में अनेक प्रकार के क्षाराभ (Alkaloids) पाये जाते हैं जिनमें कोनेसाइन (Conessine, C₂₄ H₄₀ N₂), कुर्चिन (Kurchine, C₂₃ N₃₈ N₂), कुर्चिसीन (Kurchicine, C₂₀ H₃₆ ON₂) तथा होलेर्हेनाइन (Holarrhenine, C₂₄ H₃₈ ON₂) आदि मुख्य हैं । इसकी छाल में सम्पूर्ण क्षाराभों की अधिकतम मात्रा ४.५% से अधिक नहीं होती तथा बीजों में यह छाल की अपेक्षा कम होते हैं । प्रायः छाल में १.५% और बीज में .०२५% यह रहते हैं । इसके विभिन्न क्षाराभों का प्रयोग जानवरों पर तथा मनुष्यों में किया गया है तथा उसके परिणामों का अध्ययन किया गया है जिसमें सम्पूर्ण क्षाराभ अधिक उपयोगी सिद्ध हुआ है । (१) सम्पूर्ण क्षाराभ (Total alkaloids)—नवीन आमातिसार (Acute Amoebic Dysentery) में इसकी १/२ र० (१ ग्रेन) की मात्रा में प्रतिदिन पेश्यन्तर्य सूचिकाभरण करने से एमेटीन (Emetine) की अपेक्षा अधिक लाभ हुआ । एमेटीन के समान इससे कोई विषैला प्रभाव जैसे अवसाद (Depression), वमन, प्रक्षोभ (Irritation) एवं संचायि (Cumulative) प्रभाव नहीं हुआ । इसको प्र० दि० १ र० (२ ग्रेन) की मात्रा में भी सूचिकाभरण करने से एमेटीन के समान शारीरिक वा मानसिक किसी भी प्रकार का अवसाद (Depression) नहीं होता । सिवाय अत्यधिक मात्रा के इसका गर्भाशय पर कोई विषैला प्रभाव नहीं पड़ता । इसके सूचिकाभरण के स्थान पर केवल कुछ पीड़ा एवं सूजन हो जाती है जो २४ से ४८ घण्टे में दूर हो जाती है । इससे कोई स्थानिक कोथ (Necrosis) या रक्तस्राव नहीं होता जैसा एमेटीन में होता है । पुराने रोगियों में इसके सूचिकाभरण से विशेष लाभ नहीं होता । (२) कुरची बिस्मथ आयोडाइड (Kurchi bismuth iodide)—यह नारंगी लाल रंग का चूर्ण होता है । इसमें २७% सम्पूर्ण क्षाराभ तथा २२.८५% बिस्मथ तथा आयोडीन (Iodine) ५०.१५% रहता है । पुराने आमातिसार (Chronic Amoebic Dysentery) में इसका मुख द्वारा प्रयोग लाभदायक है । इसको ५ र० (१० ग्रेन) दिन में दो बार १० से २० दिन तक दिया जाता है । इससे नाड़ी की गति, वेग, बल एवं रक्त के दबाव पर कोई दुष्परिणाम नहीं होता । हृद्-विकारों के रोगियों में भी इसके देने से कोई विषैला प्रभाव नहीं दिखलाई देता । एमेटीन के समान वमन, अतिसार आदि अन्य प्रक्षोभक उपद्रव भी इसके प्रयोग से नहीं होते न कोई संचायि (Cumulative) प्रभाव ही होता है । इसके सेवन से १/२ घंटा पूर्व क्षारीय मिश्रण देना चाहिये क्योंकि प्रायः अतिसार में पाखाने की प्रतिक्रिया अम्ल होती है जिसमें कुरची कम प्रभावशाली होती है । उपर्युक्त सूचिकाभरण के साथ इसका प्रयोग किया जा सकता है अथवा इसके साथ एमेटीन की सूई भी दी जा सकती है । इन क्षाराभों का प्रभाव अमीबाजन्य यकृत् विकृति पर अभी निश्चित नहीं हुआ है । (३) कोनेसाइन (Conessine)—इस क्षाराभ को भी सूचिकाभरण द्वारा किया जा सकता है लेकिन इसकी अपेक्षा सम्पूर्ण क्षाराभ का प्रयोग करना अधिक अच्छा है । जानवरों में प्रयोग से मालूम हुआ है कि यह हृदय, श्वसन-
५२० भावप्रकाशनिघण्टुः संस्थान तथा मस्तिष्क के लिये हानिकर है। यह २८०,००० में १ हिस्से के अनुपात में भी अमीबा के लिये क्षारीय घोल में ८ मिनट में तथा बिना क्षारीय घोल में १८ मिनट में घातक है जबकि एमेटीन २००,००० में १ भाग में घातक होती है। इसके सूचिकाभरण से भी संपूर्ण क्षाराभ के समान स्थानिक प्रतिक्रिया होती है लेकिन जानवरों के समान मनुष्यों में कोई विशेष विषैला प्रभाव नहीं पड़ता। एक विशेष महत्त्व की बात यह है कि यह क्षाराभ परख नली (In vitro) में क्षय दण्डाणु (Tubercle bacillus) की वृद्धि रोकने में समर्थ है। गुण और प्रयोग- इसकी आर्द्र छाल कड़वी, अग्निदीपक, पाचक, ग्राही, अतिसारहर, ज्वरहर एवं रक्तसंग्राहक है। इसका प्रयोग रक्तातिसार, संग्रहणी, प्रवाहिका, ज्वरातिसार, जीर्णज्वर, पचन संस्थान के अनेक विकार, श्वास एवं वृक्कशूल आदि रोगों में किया जाता है। इसको पुटपाक, अवलेह, क्वाथ, फांट, चूर्ण या अरिष्ट के रूप में व्यवहार में लाते हैं। सुगन्धि, संग्राही तथा अतिसारनाशक अन्य औषधियों के साथ इसके क्वाथ या चूर्ण का प्रयोग लाभदायक है। इसकी छाल को खट्टे मट्ठे के साथ पीस कर लेने से अधिक गुण होता है। यह बच्चों एवं गर्भिणी में बिना किसी भय के दी जा सकती है। (१) अतिसार की किसी भी अवस्था में यह औषधि बहुत लाभदायक सिद्ध हुई है। विशेष कर रक्तातिसार तथा पुराने आमातिसार (Chronic amoebic dysentery) में इसके प्रवाही सत्त्व (Liquid extract) का स्वतंत्र प्रयोग या उसके साथ इसबगोल, एरंड तैल या इन्द्रजव आदि को देने से बहुत लाभ होता है। इसके क्वाथ या फांट के साथ अतीस, घोड़वच या मोचरस मिलाकर दे सकते हैं। एमेटीन के सूचिकाभरण के साथ इसको मुख द्वारा लेने से अधिक लाभ देखा गया है। इससे बनी हुई औषधियाँ जैसे कुर्चिसॉल (Kurchisol), कुर्चिलाइड (Kurchiloid), कुर्चिबार्क एक्स्ट्रैक्ट (Kurchi bark extract) आदि डाक्टरी दुकानों में बिकती हैं जिनका प्रयोग सुगम है एवं उनके क्षाराभों की मात्रा भी निश्चित रहती है। कुटज एपिकाकुआन्हा के समान कार्यकर औषधि है तथा उसमें इसके कुछ भी दोष नहीं हैं। आयुर्वेदिक योगों में अवलेहादि के अतिरिक्त कुटजाष्टक क्वाथ (शार्ङ्ग.) एवं पाठाद्य चूर्ण (चक्र.), लघु एवं बृहद् गंगाधर चूर्ण आदि उपयोगी हैं। (२) प्रसूति के पश्चात् योनिमार्ग की शिथिलता दूर करने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है। (३) जीर्ण ज्वर में इसका प्रयोग लाभदायक सिद्ध हुआ है। इससे सिनकोना की तरह वमन, हल्लास, शिरःशूल आदि नहीं होता। (४) इसकी कोमल फली तथा पत्रों की साग बच्चों में केचुवें की बीमारी में देते हैं। (५) इसका लेप आमवात एवं संधिशोथ में लाभदायक है तथा जलशोथ में इसके चूर्ण को शरीर पर मला जाता है। (६) दन्तशूल में इसके क्वाथ से कुल्ला करने से लाभ होता है। मात्रा- त्वक् चूर्ण १-४ मा, त्वक् चूर्ण १-४ तो. क्वाथ बना कर; फांट (१० में १) १ से २ औंस; प्रवाहीसत्त्व ६०-१२० बूँद; कुर्चि बिस्मथ आयोडाइड ४ ग्रा० द्वि० प्र० दि० २ हफ्ते तक। नोट- इन्द्रयव प्रकरण भी देखें। प्रतिनिधि और व्यामिश्रण- (क) राइटिया (Wrightia) की विभिन्न-विभिन्न उपजातियाँ जैसे—रा० टिन्क्टोरिया, रा० टोमेन्टोसा (W. tinctoria R. Br.; W. tomentosa Roem. & Schult), विशेषकर रा० टिन्क्टोरिया का गलती से अथवा मिलावट के रूप में कुटज के स्थान पर प्रयोग किया जाता रहा लेकिन इनमें कार्यकारी औषधि गुण
गुडूच्यादिवर्गः ५२१ बहुत ही अल्प मात्रा में रहते हैं। इसके वृक्ष-छोटे तथा इसकी छाल लाल-भूरे रंग की करीब-करीब चिकनी होती है। इसके मूल-गहरे भूरे रङ्ग के या काले तथा कुटज से कम कडुवे होते हैं। इसके पत्र-कुटज से छोटे होते हैं। इसके पुष्प-श्वेत चमेली की तरह तथा सुगन्धित होते हैं। फलियाँ-दो-दो एक साथ अग्र पर परस्पर जुड़ी हुई (फटने के समय दोनों अलग), ३-१२ इञ्च लम्बी और पृष्ठ पर सफेद दागों से युक्त होती हैं। बीज-१/२ से ३/४ इञ्च लम्बे, आधार के निचले सिरे पर श्वेत रेशमी तूल गुच्छ से युक्त एवं अन्त में नुकीले होते हैं। संस्कृत में इसको असित कुटज या स्त्रीकुटज कहते हैं तथा इसके बीजों को हिन्दी में मीठा इन्द्रजव कहा जाता है। गुण और प्रयोग-अल्प मात्रा में इससे आमाशय तथा यकृत की क्रिया सुधरती है लेकिन अधिक मात्रा से वमन तथा विरेचन होता है। (१) इसके पत्तों का स्वरस १/२ चम्मच की मात्रा में कर्नाटक, तेलगुप्रांत और मद्रास की तरफ कामला के लिये बहुत व्यवहार में आता है। (२) सड़े हुये दाँत के गढ़े के अन्दर इसके पत्तों को पीसकर रखने से दन्तशूल दूर होता है लेकिन यह मसूड़े तथा गाल में नहीं लगाना चाहिये, अन्यथा इससे दाह उत्पन्न होता है। (३) इसके पत्तों तथा छाल का क्वाथ अन्य कडुवी औषधियों के साथ दीपक, पाचक, बल्य तथा ज्वरहर है। इसका उपयोग ज्वर के पश्चात् अथवा अन्य तीव्र रोगों की संनिवृत्तावस्था में एवं पाचनसंस्थान के विकारों (Bowel complaints) में किया जाता है। (४) मीठा इन्द्रजव बलवर्धक है तथा धातुपौष्टिक के रूप में इसका प्रयोग किया जाता है। अथ कण्टककरञ्जघृतकरञ्जौ । (करञ्ज-करञ्जभेद) । तयोर्नामानि गुणाँश्चाह करञ्जो नक्तमालश्च करजश्चिरबिल्वकः । घृतपूर्णकरञ्जोऽन्यः प्रकीर्यः पूतिकोऽपि च ।।११९।। स चोक्तः पूतिकरञ्जः सोमवल्कश्च स स्मृतः। करञ्जः कटुकस्तीक्ष्णो वीर्योष्णो योनिदोषहृत् । कुष्ठोदावर्त्तगुल्मार्शोव्रणकृमिकफापहः ।।१२०।। करञ्ज के भेद, नाम तथा गुण-करञ्ज के दो भेद होते हैं-१. कण्टककरञ्ज, २. घृतकरञ्ज । 'कण्टककरञ्ज' के संस्कृत नाम-करञ्ज, नक्तमाल, करज और चिरबिल्वक ये सब हैं। 'घृतकरञ्ज' के संस्कृत नाम-प्रकीर्य, पूतिक, पूतिकरञ्ज और सोमवल्क ये सब हैं। करञ्ज-कटुरसयुक्त, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, योनिदोष को दूर करने वाला तथा कुष्ठ, उदावर्त्त, गुल्म, बवासीर, व्रण, कृमि तथा कफ का नाशक होता है। [११९-१२०] अथ करञ्जपत्रफलगुणानाह तत्पत्रं कफवातार्शःकृमिशोथहरं परम्। भेदनं कटुकं पाके वीर्योष्णं पित्तलं लघु ।।१२१।। तत्फलं कफवातघ्नं मेहार्शःकृमिकुष्ठजित् । घृतपूर्णकरञ्जोऽपि करञ्जसदृशो गुणैः ।।१२२।। करञ्ज के पत्ते तथा फलों के गुण-करञ्ज के पत्ते कफ, वायु, बवासीर, कृमि तथा शोथ को अत्यन्त नष्ट करने वाले होते हैं। ये मल को भेदन करने वाले, पाक में कटु रस युक्त, उष्णवीर्य, पित्तजनक तथा लघु होते हैं। इसके फल-कफ, वात, प्रमेह, बवासीर, कृमि और कुष्ठ नाशक होते हैं। घृतकरञ्ज के गुण भी करञ्ज के समान ही हैं ।[१२१- १२२] नोट-भावप्रकाशकार करञ्ज के ३ भेद-(१) करञ्ज (नक्तमाल, चिरबिल्व), (२) घृतकरञ्ज (प्रकीर्य, पूतिकरञ्ज, सोमवल्क) एवं (३) करञ्जी (उदकीर्य, षड्ग्रन्था, हस्तिवारुणी) लिखते हैं जिनमें से प्रथम दो के गुण समान लिखे हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
५२२ भावप्रकाशनिघण्टुः अन्य निघण्टुकारों ने भी इसके कई भेदों का उल्लेख किया है किन्तु इनके पर्यायवाची नामों के कारण भ्रम उत्पन्न होता है। उन्हीं नामों को किसी ने एक के साथ जोड़ा है तो किसी ने दूसरों के साथ जोड़ा है। इस तरह यह कहना कठिन है कि जिसे भावप्रकाशकार करञ्ज लिखते हैं उसी को अन्य निघण्टुकारों ने करञ्ज माना है या जिसे ये घृतकरञ्ज एवं करञ्जी लिखते हैं उसे ही अन्य निघण्टुकारों ने भी घृतकरञ्ज एवं करञ्जी माना है। आधुनिक विद्वानों ने भी (वृक्ष) करञ्ज, कंटकरञ्ज एवं चिरबिल्व नाम से इसके ३ भेदों का वर्णन किया है। भावप्रकाशकार चिरबिल्व करञ्ज का पर्याय मानते हैं। कुछ विद्वान् उदकीर्य नाम करञ्ज को देते हैं जो यहाँ करञ्जी के लिये आता है। प्रकीर्य नाम कण्टकरञ्ज के लिये कहा जाता है। यहाँ पर वृक्ष करञ्ज एवं लताकरञ्ज का स्वतन्त्र वर्णन किया गया है तथा करञ्जी के अन्तर्गत चिरबिल्व का वर्णन किया गया है। ५३. करञ्ज (वृक्ष करञ्ज) सं०-करञ्ज, नक्तमाल, उदकीर्य। हिं०-करञ्ज, करञ्झवा, किरमाल, पापर, दिठोरी। बं०-डहर करञ्जा। म०- करञ्ज। गु०-कणझी, करञ्ज। पं०-सूचचेइन। ता०-पुंगम्, पुंकु। ते०-पुंगु, कानुगुचेट्टु। मला०-पोन्नम्, उन्नेमरम्। कं०-होंगे। अं०-Smooth Leaved Pongamia (स्मूथ लीव्ड पोंगेमिया), Indian Beech (इण्डियन बीच)। ले०-Pongamia glabra Vent. (पोन्गोमिआ ग्लैब्रा वेण्ट.)। Fam. Leguminosae (लेगुमिनोसी)। यह प्रायः सब प्रान्तों में पाया जाता है। सड़कों के किनारे, बगीचों में एवं नदी तथा समुद्री किनारों पर यह बहुत पाया जाता है। इसका वृक्ष साधारण वृक्षों की ऊँचाई का होता है और सदा हरा-भरा रहता है। इसकी छाया ठण्डी और प्रिय होती है। शाखायें लटकी हुई होती हैं। पत्ते-पक्षवत्, ८.१४ इञ्च लम्बे एवं पत्रदण्ड आधार पर फूला हुआ होता है। पत्रक-हरे रङ्ग के चमकीले, चिकने, संख्या में ५.७, आयताकार या लट्वाकार, नुकीले, २.५ इञ्च लम्बे एवं छोटे वृन्त से युक्त होते हैं। फूल-जरा गुलाबी और आसमानी छाया लिये हुये श्वेतवर्ण के गुच्छों में आते हैं। एक दलपत्र बड़ा होता है जो अन्य चार दलपत्रों को ढँक कर रखता है। सूखने के पहिले ही असंख्य संख्या में पुष्प जमीन पर गिर कर भूमि को आच्छादित कर देते हैं। फलियाँ-चिकनी, चिपटी, कठोर, एक बीजयुक्त, गहरे धूसर रङ्ग की तथा १.२ इञ्च लम्बी सेम के आकार की होती हैं। बीज-चिपटे कृष्णाभ रक्त वर्ण के कुछ सिकुड़नदार गोलाई लिये आयताकार एवं तैल युक्त होते हैं। इसके पत्र, कांड एवं मूल की त्वचा, तैल एवं बीजों का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। बीजों का तैल जलाने के काम भी आता है। रासायनिक संगठन-इसके बीजों में २७-३६.४% एक कडुवा, भूरे रङ्ग का एवं विशिष्ट गन्ध का तैल पाया जाता है। इसे पोन्गोमॉल (Pongamal) या होंगे तैल (Hongay oil) कहते हैं। इस तैल से करंजीन (Karanjin, S₁₈ H₁₂ O₄) नामक एक रवेदार पदार्थ प्राप्त किया गया है। बीजों में अत्यल्प मात्रा में उड़नशील तैल रहता है। इसकी छाल में एक क्षाराभ एवं हरिताभ भूरे रंग की अम्लस्वभावी राल पाई जाती है। गुण और प्रयोग-करंज कुष्ठघ्न, आमवातघ्न, कृमिघ्न, व्रणरोपण, कासहर, पाचन एवं त्वचा के रोगों में लाभदायक है। (१) इसके बीजों का तेल बहुत अच्छा कृमिघ्न, पराश्रयी, जीवाणुनाशक या व्रणरोपक है। खुजली (Scabies) के लिये यह बहुत उपयोगी है। यह दद्रु, पामा, विचर्चिका, विसर्प, सर की खुजली, परिसर्प (Herpes) आदि त्वचा के रोगों में एवं संधिवात में लाभ-दायक है। त्वचा के रोगों में इसके साथ समान मात्रा में नींबू का रस मिलाकर लगाते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
गुडूच्यादिवर्गः ५२३ (२) वातिक पीड़ा, आमवात तथा संधिवात में इसके पत्तों के क्वाथ से सेंकते हैं तथा इसके बीजों के तैल में मालिश करते हैं। (३) दुर्गन्धयुक्त व्रण की शुद्धि के लिए तथा नाड़ीव्रण के पूरण के लिये इसके मूल का स्वरस लगाते हैं। (४) सोजाक में इसकी जड़ का स्वरस, नारियल का दूध एवं चूने का जल मिलाकर देते हैं। (५) इसके बीजों का चूर्ण ज्वरहर तथा बल्य मानते हैं। कुकास एवं अन्य प्रकार की खाँसी में इसके बीज को घिसकर देने से लाभ होता है। (६) इसके पत्तों को अपचन, अतिसार, आध्मान तथा गुल्म में खिलाते हैं। इससे उदरशूल कम होता है एवं अन्न का पाचन भी ठीक होता है। शीतपित्त में पत्र-स्वरस, दही, नमक एवं काली मिर्च के साथ देते हैं। (७) मधुमेह में इसके पुष्पों का फाण्ट पिलाते हैं। खालित्य में पुष्प पीस कर सर पर बाँधते हैं। (८) व्रणशोथ पर इसके पत्तों को निर्गुण्डी के पत्तों के साथ पीस कर बाँधने से सूजन कम हो जाती है। (९) रक्तार्श में इसके मूल को गोमूत्र में पीस कर पिलाते हैं तथा पथ्य में तक्र देते हैं। मात्रा-बीज १/२ - २ १/२ रत्ती बच्चों को, १ माशा बड़ों को; मूलस्वरस ३ माशा; छाल १.३ माशा। ५४. करंज (कंट करंज) सं०-पूतिकरंज, लताकरंज, कण्टकिकरंज, विटपकरंज, कुबेराक्ष, प्रकीर्य। हिं०-करंज, करंजवा, करंजुआ, कंटकरंज (जा), कंजा, करंजु, कटकलेजा, सागरगोटा। बं०-काँटा करंजा, नाटा करंजा, नाटा। म०-सागर गोटा, गज्रा, गजरघोटा, गाजगा। गु०-कांचका, कांक। क०-गज्जिकेकायि। ते०-गच्चकाय। ता०-कझ शिक्के। मला०- कलंचिकुरु। फा०-खाये इब्लीस। अ०-अक्तमक्त, इज्जुलविलादत। अं०-Bonduc nut (बॉण्डक् नट्); Physic nut (फ़िज़िक् नट्); Fever nut (फीवर् नट्)। ले०-Caesalpinia bonducella Fleming (सिसल्पिनिआ बॉण्डयुसेल्ला फ्लेमिंग); C. crista Linn. (सि० क्रिस्टा लिन.)। Fam. Leguminosae (लेगुमिनोसी)। यह भारतवर्ष, वर्मा एवं लंका के उष्ण प्रदेशों में विशेषकर समुद्री किनारों पर तथा पहाड़ियों पर २५०० फीट की ऊँचाई तक पाया जाता है। यह बंगाल तथा दक्षिण में बहुत होता है। इसे खेत और बागों की मेंड पर लगाते हैं। इसके सघन एवं विस्तृत काँटेदार गुल्म या लता होती है। शाखाएँ-फैली हुई तथा आरोहणशील होती हैं। इन पर सीधे, तीक्ष्ण तथा पीले रंग के काँटे होते हैं। छोटी शाखाएँ घनर्रोमश होती हैं। उपपत्र (Stipules) ६-८ जोड़े, २-३ इञ्च लम्बे तथा पत्र के आधार पर रहते हैं। पत्ते-संयुक्त द्विपक्षकार तथा १-२ फीट लम्बे होते हैं। पत्रदण्ड के काँटे टेढ़े होते हैं। पत्रक-६-९ जोड़े, ३/४-१ १/२ इञ्च लम्बे, १/२-१ इञ्च चौड़े, मुलायम, पतले, लट्वाकार, आयताकार, रोमश कुण्ठिताग्र, ऊपर से चिकने किन्तु अधो पृष्ठ मृदुरोमश एवं अत्यन्त सूक्ष्म वृन्त से युक्त होते हैं। पुष्प-हल्के पीले तथा लम्बी मंजरियों में होते हैं। फलियाँ-चौड़ी, आयताकार, २-३ इञ्च लम्बी, करीब २ इञ्च चौड़ी, १-२ बीजों से युक्त और ऊपर से काँटों से ढँकी रहती हैं। बीज-संख्या में १-२, गोल या अंडाकार, करीब १/२- ३/४ इञ्च बड़े, सीसे के रंग के चिकने तथा कठोर आवरण वाले होते हैं। बीजों के अन्दर पीताभ श्वेत रंग का गूदा रहता है जो स्वाद में अत्यन्त कड़वा होता है। बीजों को फूलने तक सेंक कर या केवल फोड़कर अन्दर का गूदा निकालकर काम में लाया जाता है। इसके अतिरिक्त पत्र एवं मूलत्वक् का भी चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। इसके बीजों में मज्जा करीब ४२% एवं छिलका ५८% होता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
५२४ भावप्रकाशनिघण्टुः **रासायनिक संगठन-**इसके बीजों में बोण्ड्युसिन (Bonducin, C₂₀ H₂₈ O₈) नामक एक कडुवा ग्लूकोसाइड चूर्णरूप में पाया जाता है। यह श्वेत रंग का होता है। यह जल में नहीं घुलता किन्तु मद्यसार तथा तैलों में घुल जाता है। इसके अतिरिक्त बीजों में २०-२४% हल्के पीले रंग का गाढ़ा दुर्गन्धयुक्त तैल, स्टार्च, शर्करा, सिटोस्टेरॉल् (Sitosterol), फाइटोस्टेराल् (Phytosterol) एवं हेप्टोकोसेन (Heptocosane) ये पदार्थ पाये जाते हैं। **गुण और प्रयोग-**इसके बीजों की मज्जा उष्ण, रूक्ष, बल्य, नियतकालिक ज्वर प्रतिबन्धक, ज्वरहर, शोथघ्न, अल्प स्तम्भन, रक्तस्तम्भक, वेदनाहर एवं कृमिघ्न है। इसका उपयोग विषमज्वर, सूतिकाज्वर, शूल, श्वास, वातविकार, चर्मरोग, शोथ एवं व्रण आदि में किया जाता है। (१) इसके बीज अर्धविसर्गोज्वर, साधारणज्वर, संतत ज्वर, शीतज्वर तथा विशेषकर मलेरिया (Malaria) के लिये बहुत ही लाभदायक हैं। बीजों का चूर्ण काली मरिच के साथ ५-१० र० की मात्रा में ज्वर आने के पूर्व दिया जाता है। इसे खाली पेट नहीं देना चाहिये। क्विनीन की तरह ही यह लाभदायक माना जाता है। ज्वर के पश्चात् बल्य रूप में भी इसका प्रयोग करते हैं। (२) सूतिकाज्वर में या प्रसूतावस्था में बीजों के प्रयोग करने से सभी प्रकार से लाभ होता है। इससे ज्वर कम होता है। गर्भाशय का संकोच होता है, शूल कम होता है, आर्तव शुद्धि होती है एवं यदि कहीं व्रण हुआ हो तो वह भी अच्छा हो जाता है। (३) उदरशूल में वेदना कम करने के लिये तथा वमन में करीब १ बीज की १/२ मज्जा, २, ३ लौंग के साथ देते हैं। शूल में इसका धूम्रपान भी लाभदायक होता है। अजीर्ण में हींग के साथ इसका उपयोग किया जाता है। कुपचन में मिरिच के साथ इसका चूर्ण मट्ठे के साथ देते हैं। रक्तातिसार में गाँजा के साथ इसका उपयोग किया जाता है। (४) क्षयज कास तथा श्वास में बीजों का क्वाथ पिलाते हैं। (५) इसके बीजों का चूर्ण एरण्डपत्र पर डालकर अंडवृद्धि एवं अंडशोथ पर बाँधते हैं तथा इसको खिलाते हैं। इसके (पूतिकरंज) पत्तों का स्वरस श्लीपद में लाभदायक होता है (सु० चि० १९)। बीजों को पीसकर एरण्ड तैल के साथ अन्य प्रकार के शोथ पर भी बाँधते हैं। (६) बीजों को दबाकर निकाला हुआ तैल मुँह पर के दाग, तारुण्यपिटिका एवं आमवात में लगाया जाता है। कर्णस्राव में इसे डालते हैं। दुष्टव्रण एवं क्षत आदि में इससे लाभ होता है। बीजों को तैल में पकाकर सिद्ध किया हुआ तैल भी इस प्रकार उपयोग में लाया जाता है। (७) इसकी जड़ एवं पत्ते ज्वरघ्न है। इसके पत्तों का स्वरस जीर्णज्वर, शीतपित्त, उपदंश की द्वितीयावस्था में उत्पन्न चर्मविकार, कृमि एवं यकृत् विकार में दिया जाता है। **मात्रा-**बीजमज्जा ५-१० र०; मूल ५-१० र०; पत्रस्वरस १-२ तो०। अथ करंजी (अरारी) । तस्या नामगुणानाह उदकीर्यस्तृतीयोऽन्यः षड्ग्रन्था हस्तिवारुणी । मर्कटी वायसी चापि करञ्जी करभञ्जिका ।। १२३ ।। करञ्जी स्तम्भनी तिक्ता तुवरा कटुपाकिनी । वीर्योष्णा वमिपित्तार्शःकृमिकुष्ठप्रमेहजित् ।। १२४ ।। करञ्ज के उक्त भेदों से भिन्न एक तीसरा करञ्ज और होता है जिसे करञ्जी (अरारी) कहते हैं, उसके नाम तथा **गुण—**उदकीर्य, षड्ग्रन्था, हस्तिवारुणी, मर्कटी, वायसी, करञ्जी और करभञ्जिका ये सब करञ्जी के संस्कृत नाम हैं। **करञ्जी—**स्तम्भक, तिक्त तथा कषाय रस युक्त, पाक में कटु रस युक्त और उष्णवीर्य होती है। यह—वमन, पित्त, बवासीर, कृमि, कुष्ठ तथा प्रमेह को दूर करने वाली होती है। [१२३-१२४] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
गुडूच्यादिवर्गः ५२५ नोट-यह भी करंज का एक भेद है। पहले वर्णन किये हुए वृक्ष करंज एवं लताकरंज के अतिरिक्त एक तीसरा भेद चिरबिल्व नाम से पाया जाता है जिसका यहाँ वर्णन किया गया है। भावप्रकाशकार चिरबिल्व नाम नक्तमल के पर्याय में लेते हैं। कुछ लोग उदकीर्य नाम नक्तमाल के लिये उचित मानते हैं जो यहाँ करंजी के पर्याय में आया है। ५५. चिरबिल्व (करंजभेद) सं०-चिरबिल्व, पूतिकरंज। हिं०-चिलबिल, चिरमिल, पापरी, करंजी, बनचिल्ला। म०-वावल। गु०- कणझो, चरेल। उड़ि०-दुरंजा, करंजी। ता०-अयम्। ते०-जविलि। क०-रसविज। ले०-Holoptelia integrifolia Planch. (हॉलोप्टेलिआ इण्टेग्रि-फोलिआ प्लॅच)। Fam. Ulmaceae (अल्मॅसी)। यह हिमालय के निचले प्रदेश, अजमेर, बुंदेलखंड, बिहार, आसाम एवं पश्चिम प्रायद्वीप में प्रायः घाटियों तथा नदियों के किनारे पाया जाता है। इसके वृक्ष-छोटे या बड़े एवं करंज के समान ही दिखलाई देते हैं। शाखाएँ-लटकी हुई, गुच्छाकार तथा श्वेत रंग की होती हैं। काण्ड-मजबूत होता है। पत्ते-दो कतारों में निकले हुये, अंडाकार या लट्वाकार, प्रायः (परिपक्व) अखण्ड, २-४.५ इञ्च लम्बे, १.५-३.७५ इञ्च चौड़े, नोकदार, दुर्गन्ध युक्त एवं बिन्दुकित होते हैं। हरे पत्तों में पारदर्शक बिन्दु होते हैं। शुष्क पत्तों में अधर तल पर छोटे-छोटे उभरे हुये बिन्दु दिखाई देते हैं। पुष्प-बहुत छोटे, हरित, शाखाओं के अग्र पर गुच्छों में पतझड़ होने पर निकलते हैं। फल-सपक्ष, चिपटा, प्रायः १ इञ्च लम्बा, गोल या अंडाकार एवं नताग्र होता है। फल भेद से इसके ३, ४ भेदों का उल्लेख है। इसके पत्तों एवं काष्ठ में दुर्गन्ध होती है। रासायनिक संगठन-इसकी छाल में लुआवदार पदार्थ बहुत होता है। गुण और प्रयोग-यह शोथहर, शोणितोत्क्लेशक एवं करंज के समान गुण वाला है। इसकी छाल को उबाल कर उसका लुआव अथवा मूल को पीस कर संधिशोथ पर लगाते हैं तथा उबली हुई छाल को ऊपर से बाँध देते हैं। इसके पत्तों का कल्क तैल में उबाल कर वह तैल व्रण पर लगाते हैं। दाद पर बीज को जल में घिसकर लगाया जाता है। अथ गुञ्जा-श्वेता रक्ता च। तयोर्नामगुणानाह श्वेता गुञ्जोच्चटा प्रोक्ता कृष्णला चापि सा स्मृता। रक्ता सा काकचिञ्ची स्यात्काकणन्ती च रक्तिका ।। १२५ ।। काकादनी काकपीलुः सा स्मृता काकवल्लरी। गुञ्जाद्वयन्तु केश्यं स्याद्वातपित्तज्वरापहम् ।। १२६ ।। मुखशोषभ्रमश्वासतृष्णामदविनाशनम् । नेत्रामयहरं वृष्यं बल्यं कण्डूं व्रणं हरेत् ।। १२७ ।। कृमीन्द्रलुप्तकुष्ठानि रक्ता च धवलाऽपि ।। १२८ ।। सफेद तथा लाल गुञ्जा के नाम तथा गुण-श्वेतगुंजा, उच्चटा (श्वेतोच्चटा) और कृष्णला ये सब संस्कृत नाम सफेद घुँघुची के हैं। लाली घुँघुची के संस्कृत नाम-रक्तगुञ्जा, काकचिञ्ची, काकणन्ती, रक्तिका, काकादनी, काकपीलु और काकवल्लरी ये सब हैं। दोनों प्रकार की घुँघुची केश के लिये हितकर, वात, पित्त, ज्वर, मुख का सूखना, भ्रमरोग, श्वास, तृषा, मद तथा नेत्ररोग को नष्ट करने वाली होती है। यह वृष्य, बलकारक तथा खुजली, व्रण, कृमि, इन्द्रलुप्तरोग तथा कुष्ठ इन सबों को भी दूर करनेवाली होती है। [१२५-१२८] ५६. गुञ्जा (श्वेत, रक्त) हिं०-गुंजा, घुंघची, घुँघुची, चिरमी, चिरमिटी, घुमची, करजनी, रत्ती, चौंटली। बं०-कुँच। म०-गुञ्ज। गु०-चणोठी। क०-गुलगुंति, गुरुगुंजी। मल०-कुत्रि। ता०-कुन्थमणि, कुँरि। पं०-चर्मटी। ते०-गुरुगिंज। फा०-चस्मे खरूस, सुर्ख। अं०-Jequirity (जेक्विरिटी)। ले०-Abrus precatorius Linn. (एब्रस् प्रिकेटोरिअस् लिन.)। Fam. Leguminosae (लेगुमिनोसी)। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA