भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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गुडूच्यादिवर्गः ५१९ कूड़े का वृक्ष बहुत ऊँचा नहीं होता, प्रायः ८-१० हाथ ऊँचा वृक्ष देखने में आता है । छाल-चौथाई इञ्च तक मोटी, खुरदरी, भूरे रंग की होती है । लकड़ी हलकी पीली और कोमल होती है । पत्ते-५-१० इञ्च लम्बे तथा २-४ इञ्च चौड़े, नोकीले, लट्त्वाकार-अंडाकार या कुछ आयताकार चिकने या मृदुरोमेश एवं प्रधान शिराएँ १०-१४ युग्म होती हैं । फूल-सफेद आते हैं और उनमें कुछ सुगन्धि जान पड़ती है । फलियाँ-दो-दो एक साथ परन्तु असंयुक्त, ८ से १६ इञ्च तक लम्बी, पतली, तिहाई इञ्च मोटी और कुछ टेढ़ी होती हैं । बीज-जई के समान आध इञ्च तक लम्बे, रेखाकार, आयताकार और अन्त के सिरे पर प्रायः हलके भूरे रङ्ग के रोमगुच्छ से युक्त होते हैं । इन्हें इन्द्रजव कहते हैं, और वे स्वाद में कड़वे होते हैं । इन्द्रजव तथा इसकी आर्द्र छाल का विशेष व्यवहार किया जाता है । इसी वृक्ष को श्वेत कुटज या पुंकुटज कहा जाता है तथा गुण में यह 'प्रतिनिधि तथा व्यामिश्रण' में लिखित राइटिया टिंक्टोरिया, सं०-कृष्ण कुटज या स्त्रीकुटज जिसके बीजों को मीठा इन्द्रजव कहते हैं उससे उत्कृष्ट है । रासायनिक संगठन-इसकी छाल एवं बीजों में अनेक प्रकार के क्षाराभ (Alkaloids) पाये जाते हैं जिनमें कोनेसाइन (Conessine, C₂₄ H₄₀ N₂), कुर्चिन (Kurchine, C₂₃ N₃₈ N₂), कुर्चिसीन (Kurchicine, C₂₀ H₃₆ ON₂) तथा होलेर्हेनाइन (Holarrhenine, C₂₄ H₃₈ ON₂) आदि मुख्य हैं । इसकी छाल में सम्पूर्ण क्षाराभों की अधिकतम मात्रा ४.५% से अधिक नहीं होती तथा बीजों में यह छाल की अपेक्षा कम होते हैं । प्रायः छाल में १.५% और बीज में .०२५% यह रहते हैं । इसके विभिन्न क्षाराभों का प्रयोग जानवरों पर तथा मनुष्यों में किया गया है तथा उसके परिणामों का अध्ययन किया गया है जिसमें सम्पूर्ण क्षाराभ अधिक उपयोगी सिद्ध हुआ है । (१) सम्पूर्ण क्षाराभ (Total alkaloids)—नवीन आमातिसार (Acute Amoebic Dysentery) में इसकी १/२ र० (१ ग्रेन) की मात्रा में प्रतिदिन पेश्यन्तर्य सूचिकाभरण करने से एमेटीन (Emetine) की अपेक्षा अधिक लाभ हुआ । एमेटीन के समान इससे कोई विषैला प्रभाव जैसे अवसाद (Depression), वमन, प्रक्षोभ (Irritation) एवं संचायि (Cumulative) प्रभाव नहीं हुआ । इसको प्र० दि० १ र० (२ ग्रेन) की मात्रा में भी सूचिकाभरण करने से एमेटीन के समान शारीरिक वा मानसिक किसी भी प्रकार का अवसाद (Depression) नहीं होता । सिवाय अत्यधिक मात्रा के इसका गर्भाशय पर कोई विषैला प्रभाव नहीं पड़ता । इसके सूचिकाभरण के स्थान पर केवल कुछ पीड़ा एवं सूजन हो जाती है जो २४ से ४८ घण्टे में दूर हो जाती है । इससे कोई स्थानिक कोथ (Necrosis) या रक्तस्राव नहीं होता जैसा एमेटीन में होता है । पुराने रोगियों में इसके सूचिकाभरण से विशेष लाभ नहीं होता । (२) कुरची बिस्मथ आयोडाइड (Kurchi bismuth iodide)—यह नारंगी लाल रंग का चूर्ण होता है । इसमें २७% सम्पूर्ण क्षाराभ तथा २२.८५% बिस्मथ तथा आयोडीन (Iodine) ५०.१५% रहता है । पुराने आमातिसार (Chronic Amoebic Dysentery) में इसका मुख द्वारा प्रयोग लाभदायक है । इसको ५ र० (१० ग्रेन) दिन में दो बार १० से २० दिन तक दिया जाता है । इससे नाड़ी की गति, वेग, बल एवं रक्त के दबाव पर कोई दुष्परिणाम नहीं होता । हृद्-विकारों के रोगियों में भी इसके देने से कोई विषैला प्रभाव नहीं दिखलाई देता । एमेटीन के समान वमन, अतिसार आदि अन्य प्रक्षोभक उपद्रव भी इसके प्रयोग से नहीं होते न कोई संचायि (Cumulative) प्रभाव ही होता है । इसके सेवन से १/२ घंटा पूर्व क्षारीय मिश्रण देना चाहिये क्योंकि प्रायः अतिसार में पाखाने की प्रतिक्रिया अम्ल होती है जिसमें कुरची कम प्रभावशाली होती है । उपर्युक्त सूचिकाभरण के साथ इसका प्रयोग किया जा सकता है अथवा इसके साथ एमेटीन की सूई भी दी जा सकती है । इन क्षाराभों का प्रभाव अमीबाजन्य यकृत् विकृति पर अभी निश्चित नहीं हुआ है । (३) कोनेसाइन (Conessine)—इस क्षाराभ को भी सूचिकाभरण द्वारा किया जा सकता है लेकिन इसकी अपेक्षा सम्पूर्ण क्षाराभ का प्रयोग करना अधिक अच्छा है । जानवरों में प्रयोग से मालूम हुआ है कि यह हृदय, श्वसन-