भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 569, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 569

५१८ भावप्रकाशनिघण्टुः (३) आमवात में निर्गुण्डी, तुलसी एवं भँगरेया का स्वरस अजवायन के चूर्ण के साथ देते हैं तथा पत्तों से सेंकते हैं। गृध्रसी में नीले पुष्पवाली निर्गुण्डी के पत्तों का क्वाथ पिलाते हैं तथा पत्तों से सेंकते हैं। (४) शीतज्वर, विषमज्वर एवं सूतिकाज्वर आदि में इसके पत्तों का चूर्ण, पंचांग स्वरस, फांट या क्वाथ को देते हैं तथा इसके क्वाथ से शरीर पोंछते हैं। इससे शरीर का दाह एवं दुर्गन्धि कम होती है। विषमज्वर में प्लीहावृद्धि होने पर इसके पत्र एवं हरीतकी को गोमूत्र के साथ देते हैं या पत्तों को कुटकी एवं रसौत के साथ देते हैं। सूतिकाज्वर में इससे आर्तवशुद्धि होती है तथा गर्भाशय एवं उसके आसपास के अङ्गों का शोथ भी कम होता है। इसमें आन्तरिक प्रयोग के साथ इसके पत्तों को गरम करते बाँधते हैं। ज्वर में वमन तथा तृषाशान्ति के लिये इसके पुष्प मधु के साथ खिलाते हैं। (५) नहरुवा कृमि में इसको खिलाते हैं तथा इससे सेंकते हैं। (६) इसके मूल एवं पत्रस्वरस से सिद्ध तैल का शोथ, व्रण, नाड़ीव्रण, कुष्ठ, अपची, गंडमाला तथा सन्धिपीड़ा में व्यवहार किया जाता है। कर्णपूय में मधु के साथ इस तैल को कान में डालते हैं। (७) सोजाक में पेशाब रुकने पर इसके उष्ण क्वाथ में रोगी को बैठाते हैं। (८) पाँव की जलन में पत्तों को बाँधते हैं। शिरःशूल में पत्तों को पीसकर सर पर बाँधते हैं तथा फलों के चूर्ण का नस्य देते हैं। सोते समय सर के नीचे पत्तों की तकिया भी रखते हैं। (९) कीड़े आदि से रक्षा करने के लिये चावल, कपड़े तथा पुस्तकों में इसके पत्ते रखते हैं। मात्रा-पत्रस्वरस १-२ तो०; पत्रचूर्ण १/४-१/२ तो०; मूलत्वक् १-३ मा०। अथ कुटजः (कुडा-कोरैया) तस्य नामगुणानाह कुटजः कूटजः कौटो वत्सको गिरिमल्लिका ।।११६।। कालिङ्गः शक्रशाखी च मल्लिकापुष्प इत्यपि । इन्द्रो यवफलः प्रोक्तो वृक्षकः पाण्डुरद्रुमः ।।११७।। कुटजः कटुको रूक्षो दीपनस्तुवरो हिमः । अर्शोऽतिसारपित्तास्रकफतृष्णाऽऽमकुष्ठनुत् ।।११८।। कुडा के नाम तथा गुण-कुटज, कूटज, कौट, वत्सक, गिरिमल्लिका, कालिङ्ग, शक्रशाखी, मल्लिकापुष्प, इन्द्र (इन्द्र पर्यायवाची सभी शब्द), यवफल, वृक्षक और पाण्डुरद्रुम ये सब कुडा के संस्कृत नाम हैं। कुडा-कटु तथा कषायरसयुक्त, रूक्ष, अग्निदीपक और शीतवीर्य होता है। एवम् यह बवासीर, अतिसार, पित्त, रक्त, कफ, तृषा आम तथा कुष्ठ को दूर करता है। [११६-११८] ५२. कूड़ा हिं०-कूड़ा, कोरयां, कुड़ा, कोरैयाँ, कुरैयाँ। बं०-कुरचि। म०-पांढरा कुड़ा। गु०-कडो। क०-कोरासिमिन। ते०-कांककोडिसे, पला कोडसा। उ०-कुड़िया। ता०-वेप्पालै, कोडगपल। मल०-वेनपाला। फा०-जबानै गुजस्खे तल्ख। अ०-लसनुल्लास फिरुलमुर्र, तिबाज। अं०-Kurchi, Conessi or Tellicherry Bark (कुर्चि, कोनेसि या तेल्लिचेरि वार्क)। ले०-Holarrhena antidysenterica Wall. (होलेहेना एण्टिडिसेन्टेरिका वाल)। Fam. Apocynaceae (एपोसाइनेसी)। यह भारतवर्ष के प्रायः सभी भागों में आर्द्र भूमि को छोड़कर तथा हिमालय की ४००० फीट ऊँची चोटियों पर उत्पन्न होता है। इसके छोटे-छोटे वृक्ष दून और सहारनपुर के जङ्गलों में बहुत होते हैं। कहीं-कहीं रोपित भी किया जाता है।