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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 567

५१६ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ सिन्दुवारः (मेउड़ी-सेन्दुवार) निर्गुण्डी (नीलसम्हालू) इति च तयोर्नामानि गुणांश्चाह सिन्दुवारः श्वेतपुष्पः सिन्दुकः सिन्दुवारकः । नीलपुष्पी तु निर्गुण्डी शेफाली सुवहा च सा ।।१९३।। सिन्दुकः स्मृतिदस्तिक्तः कषायः कटुको लघुः । केश्यो नेत्रहितो हन्ति शूलशोथाममारुतान् । कृमिकुष्ठारुचिश्लेष्मज्वरान्नीलापि तद्विधा ।।१९४।। सम्हालू जिसे लोक में मेउड़ी तथा सेन्दुवार कहते हैं, उसके भेद, नाम तथा गुण—सम्हालू दो प्रकार का होता है एक सफेद फूल वाला, दूसरा नीले फूल वाला । सफेद फूल वाले सम्हालू के संस्कृत नाम—सिन्दुवार, सिन्दुक और सिन्दुवारक ये सब हैं। नीले फूल वाले सम्हालू के संस्कृत नाम—निर्गुण्डी, शेफाली और सुवहा ये सब हैं। सम्हालू- (सफेद फूल वाला) स्मरणशक्तिवर्धक, तिक्त, कषाय और कटुरसयुक्त, लघु, केश तथा नेत्र के लिये हितकारी होता है एवं यह शूल, शोथ, आमवात, कृमि, कुष्ठ, अरुचि और कफ-ज्वर को नष्ट करता है । इसी भाँति नीले फूल वाले सम्हालू के भी गुण हैं । [१९३-१९४] अथ सिन्दुवारपत्रगुणानाह सिन्दुवारदलं जन्तुवातश्लेष्महरं लघु ।।१९५।। सम्हालू के पत्तों के गुण—सम्हालू के पत्ते—कृमि, वात और कफ को दूर करने वाले तथा लघु होते हैं । [१९५] नोट—सम्हालू के दो भेदों का भावप्रकाशकार ने वर्णन किया है । 'निर्गुण्डी' यह नीले सम्हालू के लिये कहा गया है । निर्गुण्डी का ही पर्याय शेफाली दिया गया है । ध० नि० ने 'सिन्दुवार' के श्वेत एवं नील भेद दिये हैं तथा 'शेफालिका' के भी निर्गुण्डी (नीलपुष्प) एवं शुक्ला ये भेद दिये हैं । इसी प्रकार रा० नि० एवं म० नि० ने भी शेफाली से नील (निर्गुण्डी) का ग्रहण किया है । श्री ठा० बलवन्त सिंहजी शेफालिका यह नाम हरसिंगार (Nyctanthes arbortristis) के लिए उचित समझते हैं । हरसिंगार का वर्णन पहले पृष्ठ ३३५ पर किया गया है । कुछ लोगों ने 'नीलनिर्गुण्डी' नाम जस्टिसिआ जेण्डारुसा (Justicia gendarussa) को दिया है जिसका पृष्ठ ३२३ पर वर्णन किया गया है । आधुनिक उद्भिज्जवेत्ताओं ने भी इसके कई भेदों का वर्णन किया है। वाइटेक्स नेगुण्डो (Vitex negundo) में श्वेत या हलके नीले दोनों प्रकार के पुष्प पाये जाते हैं तथा पत्रक भी अखंड या दन्तुर दोनों प्रकार के होते हैं। इसके अतिरिक्त इसका एक भेद वाइटेक्स ट्राइफोलिआ (Vitex trifolia) भी पाया जाता है । रेणुकबीज, जिनका पृष्ठ २५१ पर वर्णन किया गया है वे भी ईरान में होने वाली निर्गुण्डी जाति के वृक्षों के फल हैं । ५१. सम्हालू-निर्गुण्डी हिं०-सम्भालू, सम्हालू, सन्दुआर, सिनुआर, मेउड़ी । बं०-निशिन्दा । म०-लिंगड, निगड़, निर्गुण्डी । पं०- वन्न, भरवन, मौरा । गु०-नगोड़, नगड़ । ता०-नोच्चि । म०-करिनोच्चि । ते०-वाविली, तेल्लावाविली । क०- बिलिनेक्कि । फा०-पंजंबगुस्त । अ०-असलक । अं०-Five Leaved Chaste Tree (फाइव लीव्ड् चेस्ट ट्री) । Indian Privet (इण्डियन प्रिवेट) । ले०-Vitex negundo Linn. (वाइटेक्स नेगुण्डो लिन.) । Fam. Verbenaceae (वर्बिनेसी) । इसके वृक्ष प्रायः सब प्रान्त के वन, उपवन, नदियों के किनारे, गावों के आसपास की परती जमीन में और बागों में भी पाये जाते हैं । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA