भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुडूच्यादिवर्गः ५१५ शंखपुष्पी का आगे स्वतन्त्र वर्णन किया गया है। यहाँ अपराजिता (क्लिटोरिआ टर्नेरिआ) का वर्णन किया गया है। ५०. अपराजिता हिं० - अपराजिता, कोयल, कालीजर । बं० - अपराजिता । म० - गोकर्णी, काजली, गोकर्ण । पं० - धनन्तर । गु० - गरणी । क० - शंखपुष्प, गिरिकर्णिके । ता० - काक्कणनकोटी । ते० - दिटेन । मल० - शंखपुष्पम् । इरा० - मझ़ेरियुन्-इ-हिंदी । अं० - Winged-leaved clitoria (विंगड लिव्ड क्लिटोरिआ) । ले० - Clitoria ternatea Linn. (क्लिटोरिआ टर्नेटिआ लिन.) । Fam. Leguminosae (लेगुमिनोसी.) । यह सब प्रान्तों में पाई जाती है । अधिकतर यह बगीचों में लगाई हुई मिलती है । बस्तियों के आस-पास वन्य अवस्था में भी कभी-कभी दिखाई देती है । पुष्पभेद से यह नील एवं श्वेत दो प्रकार की होती है । इसकी लता-बहुवर्षायु, सुन्दर तथा पतले काण्ड की होती है । यह वृक्षों या झाड़ियों पर लिपटती हुई (चक्रारोही) बढ़ती है । पत्ते-संयुक्त, असम-पक्षवत् (Imparipinnate) रहते हैं । पत्रक-प्रायः ५ कभी-कभी ७, अंडाकार एवं १-२ इञ्च लम्बे होते हैं । पुष्प-जलसीप के आकार वाले नलीयुक्त, गोल, चमकीले नीले अथवा कभी-कभी श्वेत पुष्प, १ १/२-२ इञ्च बड़े एवं पत्रकोणीय पुष्पपण्ड में एकाकी रहते हैं । ध्वजदल चम्मच के आकार का और पक्षदलों के नीचे फैला रहता है । कोणपुष्पक बड़े, स्थायी तथा पर्णसदृश होते हैं । फली-२-४ इञ्च लम्बी, चिपटी, नुकीली तथा सीधी या बहुत थोड़ी मुड़ी हुई होती है । बीज-६-१० अंडाकार, चिपटे, चिकने तथा गहरे भूरे रंग के होते हैं । इसके मूल का अधिक उपयोग किया जाता है । इसके पुष्प, पत्र एवं बीज आदि का भी उपयोग करते हैं । रासायनिक संगठन-इसकी जड़ की छाल में स्टार्च, टैनिन, राल तथा ११% राख होती है । बीज में तैल, कडुवी भूरे रङ्ग की राल तथा ६% राख होती है । गुण और प्रयोग-इसकी जड़ भेदन, मूत्रल एवं वेदनास्थापन है । इससे वमन भी होता है । वमन के साथ-साथ पेट में दर्द होकर विरेचन भी होता है । कभी-कभी वमन नहीं भी होता । इसके बीज जलप की तरह किन्तु सौम्य भेदन तथा अल्प मूत्रजनन हैं । विरेचन के लिये बीजों के साथ सोंठ एवं सैंधव का उपयोग किया जाता है । इसका उपयोग उदर, कफविकार, ज्वर, मूत्रविकार, गलगण्ड, गण्डमाला, अपची, शोथ, नेत्ररोग, उन्माद, आमवात, कुष्ठ एवं विष में किया जाता है । (१) सभी प्रकार के जलोदर में विरेचन के लिये इसका उपयोग करते हैं । इससे विष का निर्हरण होता है । (२) शुक्रमेह, बस्तिशोथ एवं मूत्रकृच्छ्र में इसकी जड़ का फांट पिलाया जाता है । (३) बच्चों के कास-श्वास में बीजों को सेंक पीसकर थोड़ा गुड़ एवं सैंधव मिलाकर पिलाने से दस्त के साथ कफ निकल कर आराम मिलता है । कफ विकारों में मूल को दूध के साथ पिलाते हैं । (४) अर्धभेदक में श्वेत अपराजिता की जड़ के स्वरस का नस्य कराया जाता है । (५) इसके पत्तों का रस, आर्द्रकरस के साथ पसीना रोकने के लिये देते हैं । त्वग्रोगों में पत्तों का फांट पिलाते हैं । कान के चारों तरफ सूजन होकर ग्रन्थियों की वृद्धि होने पर पत्तों को सैंधव के साथ पीसकर लगाते हैं । (६) सर्पविष में इसकी जड़ की छाल तथा निर्गुण्डी मूलत्वक् को जल में पीस कर पिलाने से लाभ होता है । (च० चि० अ० २५) मात्रा-मूलत्वक् चूर्ण १।।-३ माशा; बीजचूर्ण १०-२० र० । १. विष्णुकान्ता कटुस्तिक्ता कफवातामयापहा । (ध. नि.)