भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
५२६ भावप्रकाशनिघण्टुः गुंजा प्रायः सब प्रान्तों के जङ्गल-झाड़ियों में उत्पन्न होती है तथा हिमालय में ३००० फीट की ऊँचाई तक पायी जाती है। इसकी लता-सुन्दर तथा चक्रारोही होती है। शाखायें-पतली, लचीली तथा काष्ठमय होती हैं। यह बरसात के दिनों में खूब हरी-भरी दिखाई देती है। पत्ते-इमली के जैसे, २-३ १/२ इञ्च लम्बे, युग्म पक्षाकार होते हैं। पत्रक- १०-२० जोड़े, विपरीत, आधे से एक इञ्च लम्बे, १/३ इञ्च तक चौड़े, रेखाकार-आयताकार, अखण्ड तथा दोनों सिरों पर कुछ गोल एवं स्वाद में मीठे रहते हैं। पुष्प-वर्षाकाल में ३ इञ्च लम्बी और गुच्छे में निकली हुई मञ्जरियों में प्रायः सफेद या गुलाबी छाया लिये हुये या हल्के बैंगनी रङ्ग के आते हैं। फली-१-१ १/३ इञ्च लम्बी नुकीली तथा गुच्छों में आती है। यह शीतकाल के अन्त तक पक जाती है। बीज-छोटे, चिकने, चमकीले, कड़े, काले दाग के साथ और सिन्दूरवर्ण के या कभी-कभी बिल्कुल श्वेत रंग के या बिलकुल काले, संख्या में ३-६ तथा अंडाकार होते हैं। इसकी जड़-काष्ठमय, अनेक शाखाओं से युक्त टेढ़ी-मेढ़ी होती है। **नोट-**मूलविषों के अन्तर्गत सुश्रुत में इसका उल्लेख है (सु० क० अ० २)। चरक में स्थावर विष वर्ग में इसका पाठ नहीं है। उच्चटा नाम से वाजीकरण के लिये इसका प्रयोग किया गया है। गुञ्जा बीज में जो विष होता है वह उबालने से नष्ट हो जाता है तथा इसका विषैला प्रभाव केवल अधस्त्वगीय प्रवेश से ही होता है। वंगसेन ने गृध्रसी में वेदना शान्ति के लिये शिराप्रच्छन्न करके गुञ्जाकल्क लेप का निर्देश किया है।¹ बाह्य प्रयोग में गुञ्जा की उपयोगिता होने पर शुद्ध गुञ्जाबीज का ही व्यवहार करना चाहिये। इसकी जड़ गुणों में कुछ-कुछ मुलेठी के समान होती है तथा उसमें भी मुलेठी में पाया जाने वाला ग्लिसिहाइझिन् (Glycyrrhizin) नामक तत्त्व होता है। इस कारण कभी-कभी मुलेठी के प्रतिनिधि रूप में यह ले ली जाती है। किन्तु इसे मुलेठी मानना उचित नहीं है। गुञ्जा की जड़, शोधित (श्वेत) बीज एवं पत्र का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। **रासायनिक संगठन-**गुंजा के बीजों में ॲब्रिन् (Abrin) नामक एक विषैला तथा प्रक्षोभक प्रभूजिन जातीय द्रव्य है। इसके अतिरिक्त बीजों में विषैले प्रभूजिन जातीय अन्य द्रव्य, वसाविच्छेदक किण्व (Fat-splitting enzyme), ॲब्रूसिक् ॲसिड Abrussic acid), हीमॅग्लूटिनिन् (Haemagglutinin) एवं यूरिएस् (Urease) पाये जाते हैं। बीजों के छिलकों में लाल रंजक द्रव्य होता है। इसके मूल में मुलेठी में पाया जाने वाला द्रव्य ग्लिसिहाइझिन् (Glycyrrhizin) करीब १५% एवं अम्ल राल ८% पाई जाती है। इसके पत्तों में भी करीब १०% ग्लिसिहाइझिन् (Glycyrrhizin) एवं ॲब्रिन् (Abrin) रहता है। ॲब्रिन् (Abrin) यह अत्यन्त विषैला द्रव्य है। इसमें ग्लोब्युलिन् (Globulin) एवं ॲल्ब्युमोस (Albumose) ये दो प्रभूजिन (Protein) होते हैं जिनमें से प्रथम अधिक शक्तिशाली है। यह द्रव्य उबालने से नष्ट हो जाता है। इसको एरंड बीज में पाये जाने वाले रिसिन (Ricin) सदृश मानते हैं। शरीर भार के प्रति किलोग्राम के लिये १/१००० से १/२००० मिलिग्राम की मात्रा में इसका अधस्त्वगीय सूचिकाभरण घातक होता है। बीजों के क्वाथ को आँखों में डालने से भी मृत्यु हो सकती है क्योंकि वहाँ अत्यन्त तीव्र प्रक्षोभ उत्पन्न होता है तथा विष का प्रचूषण होता है। त्वचान्तर्गत प्रयोग से स्थानिक अत्यन्त तीव्र प्रक्षोभ उत्पन्न होकर शोथ एवं त्वचा में रक्तस्राव होता है। मुख द्वारा सेवन से इससे अल्प या बिलकुल ही प्रक्षोभ नहीं होता एवं आमाशय में पहुँचने पर यह विषरहित हो जाता है। जानवरों में अतिसूक्ष्मातिसूक्ष्म मात्रा में सूचिकाभरण से उनमें इस विष के प्रति सहनशीलता उत्पन्न हो जाती है। चर्मकार चर्म के लोभ में जानवरों को मारने के लिये बीजों की वर्ति बनाकर चमड़े में प्रवेश करते थे। गर्भपात कराने के लिये भी इस प्रकार की वर्तियों का उपयोग किया जाता था। १. द्वित्रिस्यानेषु गृध्रस्यां शिरा प्रच्छन्नवेधिता। गुञ्जाकल्केन लिप्ता च सद्यस्त्यजति वेदनाम्॥ वंगसेनः॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA
गुड़ूच्यादिवर्गः ५२७ शोधन-श्वेतगुंजा के बीज गोदुग्ध में १ प्रहर उबाल कर, छिलके निकाल कर गरम जल से धोकर फिर प्रयोग करना चाहिये। कांजी में भी स्वेदन करने से इनकी शुद्धि हो जाती है। विष प्रभाव-बिना शोधन के बीजों का प्रयोग तीव्र वामक एवं विरेचक होता है। अधिक मात्रा में प्रयोग से भी इस प्रकार के विसूचिका सदृश लक्षण उत्पन्न होते हैं। यदि इसके प्रयोग से बेचैनी आदि हो तो चौलाई का रस मिश्री मिला कर पिलाना चाहिये तथा ऊपर से दूध पिलाना चाहिये। गुण और प्रयोग-गुंजा की जड़ की क्रिया मुलेठी की तरह होती है। पत्ते भी मधुर होते हैं। यह भी मुलेठी की ही तरह मधुर, स्नेहन, कफ शामक, मूत्रजनन एवं व्रणरोपण हैं। इसके बीज उष्ण, बल्य, वृष्य, केश्य, वातहर एवं स्थानिक प्रक्षोभक हैं। (१) स्वरभंग में श्वेत के पत्र कवाबचीनी के साथ या अकेले मिश्री मिलाकर चूसने को दिये जाते हैं। मुखपाक में भी पत्र चूसने से लाभ होता है। व्रण पर भी इसका उपयोग करते हैं। उपदंश में लाल गुंजा के पत्र १/२ माशा, जीरा २ माशा तथा मिश्री १ तोला मिलाकर दिन में दो बार ७ दिन तक प्रयोग किया जाता है। (२) वीर्य विकार में २ माशे जड़ को दूध में पका कर भोजन के पूर्व रात में देते हैं। कास तथा मूत्र रोगों में भी जड़ का अन्य औषधों के साथ उपयोग करते हैं। (३) इसकी जड़ तथा फल से सिद्ध तैल गण्डमाला, गलग्रन्थि आदि पर लगाया जाता है तथा उसका नस्य देते हैं। (४) दाद तथा खुजली पर बीजों के कल्क तथा भृंगराजपत्र-स्वरस से सिद्ध तैल का उपयोग किया जाता है। श्वेत कुष्ठ में तैलपाक के पूर्व उसमें चित्रककल्क मिलाते हैं। पत्रस्वरस का भी चित्रकमूल के साथ श्वेत कुष्ठ में प्रयोग किया जाता है। (५) ॲब्रिन या छिलका निकाले बीजों का फांट आँखों की फूली या रोहा में प्रक्षोभक औषध के रूप में उपयोग किया जाता था किन्तु कभी-कभी इससे अनियंत्रित शोथ आदि होकर आँख भी नष्ट हो जाने के कारण अब इसका उपयोग नहीं करते हैं। (६) बीजों का कल्क खालित्य, गृध्रसी, अंगघात तथा अन्य वातिक विकारों पर लगाते हैं। मात्रा-मूल २-४ माशा, बीज १/२-१ १/२ रत्ती। अथ कपिकच्छूः (कौंच)। तस्या नामगुणानाह कपिकच्छूरात्मगुप्ता वृष्या प्रोक्ता च मर्कटी। अजडा कण्डुरा व्यङ्गा दुःस्पर्शा प्रावृषायणी ।। १२९ ।। लाङ्गली शूकशिम्बी च सैव प्रोक्ता महर्षिभिः। कपिकच्छूर्भृशं वृष्या मधुरा बृंहणी गुरुः। तिक्ता वातहरी बल्या कफपित्तास्रनाशिनी ।। १३० ।। कौंच (केवांच) के नाम तथा गुण-कपिकच्छू, आत्मगुप्ता, वृष्या, मर्कटी, अजडा, कण्डुरा, व्यङ्गा, दुःस्पर्शा, प्रावृषायणी, लाङ्गली और शूकशिम्बी ये सब कौंच के पर्यायवाचक शब्द महर्षियों ने कहे हैं। कौंच-अत्यन्त वृष्य, मधुर तथा तिक्तरस युक्त, बृंहण, गुरु, वातनाशक, बलकारक तथा कफ, पित्त एवम् रक्तदोष नाशक है। [१२९-१३०] अथ तद्बीजगुणानाह तद्बीजं वातशमनं स्मृतं वाजीकरं परम् ।। १३१ ।। इसके बीज के गुण-कौंच के बीज-वातशामक एवम् अत्यन्त वाजीकरण हैं। [१३१]
५२८ भावप्रकाशनिघण्टुः ५७. कपिकच्छू (केवाँच) हिं०-केवाँच, कौंच, कौंछ, केवाछ, खुजनी। बं०-आलकुशी। म०-खाज कुहिली, कुहिली, कवच। गु०- कवच, कौंचा। क०-नासुगुन्नी। ते०-पिल्ली अडुगु। ता०-पुनाइक काली, पुनैक्कल्लिल। पं०-कवांच, कूँच। अं०-Cowhage (काउहेज); Cowitch (काउइच)। ले०-Mucuna pruriens Bek. (म्युक्युना प्रूरिएन्स बेक्)। Fam. Leguminosae (लेगुमिनोसी)। यह भारतवर्ष के सभी मैदानी भागों में एवं लंका तथा वर्मा में पाया जाता है। यह सभी उष्ण प्रदेशों में होता है एवं इसकी खेती भी की जाती है। इसकी लता-पतली, चक्रारोही, एकवर्षायु तथा चौमासे में अधिक होती है। पत्ते-त्रिपत्रक एवं २ १/२-५ १/२ इञ्च लम्बे पर्णवृन्त से युक्त होते हैं। पत्रक-३-६ इञ्च लम्बे, पार्श्वपत्रक किञ्चित् हृद्वत् और लट्वाकार एवं अग्र्य पत्रक तिर्यगायताकार (Rhomboid), पतले तथा ऊपर चिकने किन्तु अधर तल पर तलशयी रोमों से युक्त होते हैं। पुष्प- नीलारुण (Purple), १ १/२ इञ्च तक लम्बे, सघन, लटकी हुई और ६-१२ इञ्च लम्बी मंजरियों में आते हैं। फली- २-३ इञ्च लम्बी, १/२ इञ्च चौड़ी, दोनों अग्रों पर विपरीत दिशाओं में टेढ़ी, कुछ फूली सी एवं लम्बाई में धारियों से युक्त होती है। यह भूरे रंग के करीब ०.१ इञ्च लम्बे सघन दृढ़ रोमों से ढँकी रहती हैं। ये रोम शरीर में लगाने से अत्यन्त खुजली उत्पन्न होकर दाह तथा सूजन उत्पन्न होती है। बीज-प्रत्येक फली में ५-६ काले चमकीले तथा अन्तभित्ति के पतले आवरण में ढँके रहते हैं। कौंच जंगली और बागी दो प्रकार का होता है, जंगली के फलियों के ऊपर तीक्ष्ण रोवें होते हैं। इसके शरीर में लगने से खुजलाहट, सूजन और पीड़ा उत्पन्न होती है। बागी किवाँच को बाग और खेतों में लगाते हैं। यह दो प्रकार का होता है। एक की फलियों के ऊपर रोवें कम होते हैं और उनमें अधिक तीक्ष्णता नहीं होती और दूसरे में रोवें नहीं होते हैं। दोनों की तरकारी बनती है। किन्तु इसकी तरकारी सर्वप्रिय नहीं होती। रोवें निकाल कर ही तरकारी बनाते हैं। नोट-चरक में ऋषभी नाम से बल्यवर्ग में, कच्छुरा नाम से पुरीषविरजनीय गण में एवं मधुरस्कंध में ऋष्यप्रोक्ता नाम से तथा सुश्रुत में कच्छुरा नाम से विदारिगन्धादि गण तथा वातसंशमनवर्ग में इसका उल्लेख है। 'पंजाब में सफेद रंग के कौंच के बीज पन्सारी बेचते हैं। ये चरक में लिखी हुई काकाण्डोला¹ नाम की सेम की जाति के बीज हैं' (श्री यादवजी कृत द्रव्यगुणविज्ञानम्, उत्तरार्ध द्वितीय खण्ड, पृष्ठ १७३)। इसके बीज, मूल एवं फली के ऊपर के रोमों का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। चिकित्सा की दृष्टि से जंगली केंवाच के बीजों का ही व्यवहार करना चाहिये। रासायनिक संगठन-इसमें राल, टैनिन, वसा एवं मॅन्गॅनीझ रहता है। बीजों की मज्जा की अपेक्षा ऊपर के छिलके में मॅन्गॅनीझ (Manganese) अधिक रहता है। गुण और प्रयोग-केवाँच के बीज पौष्टिक, उत्तेजक, वाजीकर एवं वातशामक होते हैं। फली के ऊपर के रोम उत्तम आंत्रकृमिघ्न होते हैं। इसकी जड़ वातनाड़ियों के लिये बल्य, उत्तेजक एवं मूत्रजनन है। रोम के स्थानिक प्रयोग से कण्डू, दाह, शोथ एवं स्फोट उत्पन्न होता है। (१) इसके रोमों को घृत, मधु या गुड़ के साथ गोला बनाकर केंचुए की बीमारी में खिला देते हैं। इससे प्रक्षोभ उत्पन्न होकर कृमि बाहर निकलते हैं। इसके पश्चात् विरेचन देना आवश्यक है। १. काकाण्डोलात्मगुप्तानां माषवत्फलमादिशेत् (चरक सू. अ. २७-३२)।
गुडूच्यादिवर्गः ५२९ (२) इसके बीजों की मज्जा का चूर्ण या पाक (वानरीवटिका) आदि बनाकर वाजीकरण के लिये प्रयोग किया जाता है। प्रायः वाजीकरण के प्रत्येक योग में इसका उपयोग किया जाता है। (३) इसकी जड़ का क्वाथ या स्वरस वातनाडी-दौर्बल्य, अंगघात, अर्दित एवं अवबाहुक आदि वातरोगों में तथा ज्वर में भ्रम उत्पन्न होने पर देते हैं। यह मूत्रजनन होने के कारण इसे वृक्करोग में पिलाते हैं तथा शरीर पर लेप भी करते हैं। हैजा में इसके फांट में मधु मिलाकर पिलाने से लाभ होता है। पक्वातिसार तथा रक्तातिसार में मूल का कल्क दिया जाता है तथा पथ्य में मूलसिद्ध दुग्ध का प्रयोग करते हैं (सु० उ० अ० ४०-७४)। श्लीपद में मूल का लेप किया जाता है। इसके मूलक्वाथ के धारण से योनिसंकोच होता है (भा० प्र०)। (४) इसके रोमों से बनाया हुआ मलहम स्थानिक उत्तेजक तथा साधारण स्फोटोत्पादक माना जाता है। मात्रा—बीजचूर्ण २-६ माशा; रोम ५-१० रत्ती। अथ मांसरोहिणी। तस्या नामगुणानाह मांसरोहिण्यतिरुहा वृत्ता चर्मकषावसा१,२। प्रहारवल्ली विकशा वीरवत्यपि कथ्यते ।। स्यान्मांसरोहिणी वृष्या सरा दोषत्रयापहा ।।१३२।। मांसरोहिणी के नाम तथा गुण—मांसरोहिणी, अतिरुहा (अग्निरुहा), वृत्ता, चर्मकषा, वसा, प्रहारवल्ली, विकशा और वीरवती ये सब पर्यायवाचक शब्द हैं। मांसरोहिणी—वीर्यवर्द्धक, सारक (दस्तावर) और त्रिदोषनाशक है।[१३२] ५८. मांसरोहिणी हिं०—मांसरोहिणी, रोहण, रोहिनी, रोहन, रोहिना, रकत रोहन। म०, बें०—रोहण। गु०—रोण, रोहणी। कोल०—रोहिनी। सन्ता०—रोहन। गोंड०—सोइमि। भील—रोयटा। ता०—शेम्मरम्। क०—स्वामीमर। ते०— सूमि, सोमिडमनु। अं०—Red wood tree (रेड वुड् ट्री)। ले०—Soymida febrifuqa A. Juss. (सॉयमिडा फेब्रीफ्युजा ए. जस्.)। Fam. Meliaceae (मेलिएसी)। यह प्रायद्वीप से उत्तर की तरफ मेरवारा तक तथा मिर्जापुर एवं छोटा नागपुर आदि स्थानों में पाई जाती है। इसका वृक्ष—बहुत ऊँचा और स्तम्भ मोटा होता है। इसकी छाल—तिहाई इञ्च मोटी नीलापन युक्त खाकी अथवा कालापनयुक्त भूरे रंग की एवं कड़वी होती है। लकड़ी—लालीयुक्त भूरे रंग की और खूब टिकाऊ होती है। पत्ते—पक्षवत् तथा ९-१८ इञ्च लम्बे होते हैं। पत्रक—२ से ४ इञ्च तक लम्बे, अंडाकार या आयताकार, लगभग अवृन्त, चिकने, तिर्यक् आधार वाले तथा संख्या में ३ से ६ जोड़े होते हैं। नवीन पत्ते ग्रंथियों से युक्त और लाल होते हैं। पत्रक-दण्ड तथा पत्रक-सिरा सर्वदा लाल बनी रहती है। फूल—नन्हें-नन्हें हरियाली लिये सफेद रंग के अग्रद्य मंजरियों में आते हैं। फल—१ से २।। इञ्च बड़े, बहुत कठोर, भूरे लाल रंग के किन्तु पकने पर काले एवं अग्र पर खुल जाते हैं। प्रत्येक फल में अगणित पङ्खदार बीज होते हैं जो आषाढ़, श्रावण में पककर गिर जाते हैं। इसकी छाल का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। नोट—चरक में बल्य एवं सुश्रुत में न्यग्रोधादिगण में इसका उल्लेख है। सुश्रुत के टीकाकार डल्हण ने रोहिणी का अर्थ कुटकी, कायफल, कडुवी तुम्बी तथा हरीतकी भेद आदि किये हैं। इसके रकतरोहक, रोहिनी आदि प्रचलित नाम मांसरोहिणी के समानार्थक मालूम होते हैं तथा इसकी छाल भी मांसवर्ण की होती है। इस दृष्टि से इसके मांसरोहिणी होने में सन्देह नहीं मालूम पड़ता। अन्य निघंटुकारों ने इसके गुणों में 'ग्राही' लिखा है जो अधिक उचित मालूम पड़ता १. चर्मकरी इति पाठा०। २. कुशा इति पाठा०—गुण तथा आकृति की दृष्टि से इसका वसा पर्याय अधिक उचित है। ३७ भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
५३० भावप्रकाशनिघण्टुः है। उपर्युक्त डल्हण की टीका के अनुसार यदि किसी द्रव्य को रोहिणी माना जाय तो उस अवस्था में 'सरा' यह उचित हो सकता है। **रासायनिक संगठन-**इसकी छाल में एक रंगहीन, जल में न घुलने वाला किन्तु मद्यसार में घुलनशील रालयुक्त कड़वा पदार्थ एवं अधिक मात्रा में टॅनिक ॲसिड् तथा गॅलिक ॲसिड् रहता है। **गुण और प्रयोग-**इसकी छाल शीत, ग्राही, तिक्त, कषाय, वृष्य, पौष्टिक, अल्प नियतकालिक, ज्वर- प्रतिबन्धक, सन्थानीय, व्रणरोपण एवं कण्ठशुद्धिकर है। अधिक मात्रा में इससे चक्कर एवं संज्ञानाश होता है। ओक वृक्ष की छाल की तरह इसका क्वाथ बाह्य प्रयोग में व्यवहार में लाते हैं। आन्तरिक प्रयोग के लिये चूर्ण का ही व्यवहार उचित है। (१) विसर्पों या जीर्णज्वरों में शरीर व आंतों में जब शिथिलता आती है तब इसका चूर्ण देते हैं। मलेरिया में इसका क्वाथ १ औंस की मात्रा में दिन में ३ बार देने से लाभ होता है। (२) पुरानी आंव तथा अतिसार में इससे अच्छा लाभ होता है। (३) इसकी छाल के क्वाथ से व्रण धोते हैं, बस्ति देते हैं तथा कुल्ले कराते हैं। **मात्रा-**त्वक् चूर्ण ३० रत्ती त्रिवार। अथ चिल्हकः 'चिल्ह' इति लोके तस्य नामगुणानाह चिल्हको वातनिर्हारः श्लेष्मघ्नो धातुपुष्टिकृत्। आग्नेयो विषवद्यस्य फलं मत्स्यनिषूदनम् ।।१३३।। चिल्हक के गुण-चिल्हक वातनाशक, कफ को दूर करने वाला, धातु की पुष्टि करने वाला और आग्नेय (अत्यन्त गरम) होता है और इसका **फल-**विषतुल्य मछलियों को मारने वाला होता है। [१३३] ५९. चिल्हक **हिं०-**चिल्ला, चिलर, चिल्हक। **म०-**मस्सी, करी लेंज। **संथा०-**चोरचो। **खर०-**बेरी। **कोल-**रोरी। **उडि०-**गिरटि। **ले०-**Casearia tomentosa Roxb. (केसएरिआ टोमेण्टोसा राक्स.)। Fam. Samydaceae (सॅमिडेसी)। यह सब जगह पाया जाता है। शाल वनों के पास या झाड़ीदार जंगलों में यह बहुत होता है। इसके **वृक्ष-**छोटे एवं शाखाएँ दिगन्तसम फैली हुई होती हैं। **छाल-**मोटी-भंगुर और चौकोर टुकड़ों में छूटती है। **काष्ठ-**पीताभ श्वेत, कठोर एवं खुरदरा होता है। **पत्ते-**आयताकार (छोटे लट्त्वाकार या अंडाकार), अधरपृष्ठ की नसों पर मृदु रोमश, २-७ इञ्च लम्बे, २ इञ्च चौड़े एवं दन्तुर होते हैं। पत्रसिरायें रक्ताभ होती हैं। **पुष्प-**हरिताभ पीत वर्ण के पुष्प नवीन टहनियों पर आते हैं। **फल-**मांसल, अंडाकृति, ३/४ इञ्च बड़े, कड़वे एवं ६ रेखाओं से युक्त होते हैं। फलों का चूर्ण पानी में डाल देने से मछलियाँ मर जाती हैं। इसके सभी भागों का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। **नोट-**अन्य निघण्टुओं में इसका उल्लेख नहीं पाया जाता। इसकी एक दूसरी उपजाति केसिएरिआ एस्क्यू लेण्टा राक्स. (C. esculenta Roxb.), के मूल एवं पत्र का उपयोग सप्तरंगा या स्वर्णमूला नाम से यकृत्-वृद्धि, अर्श तथा यकृतोद्भव मधुमेह में किया जाता है। **गुण और प्रयोग-**जलशोथ में फल का गूदा खिलाते हैं, सर्वांग में छाल का लेप करते हैं तथा पत्रक्वाथ से स्नान कराते हैं। इससे पेशाब अधिक होती है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
गुडूच्यादिवर्गः ५३१ अथ टङ्कारी । तस्या गुणानाह टङ्कारी वातजित्तिक्ता श्लेष्मघ्नी दीपनी लघुः । शोथोदरव्यथाहन्त्री हिता पीठविसर्पिणाम् ।। १३४ ।। नोट-टंकारी का उल्लेख अन्य निघण्टुओं में नहीं मिलता। लघु अग्निमन्थ (Clerodendrum phlomidis) को कहीं-कहीं 'टेकारी' कहते हैं जो 'तर्कारी' का अपभ्रंश मालूम पड़ता है। इसका वर्णन ४५९ पृष्ठ पर किया गया है। टंकारी नाम से फाइसेलिस मिनिमा (Physalis minima) का वर्णन आधुनिक उद्भिदवेत्ताओं ने किया है जिसका यहाँ वर्णन किया जा रहा है। यह विदेश से आने वाले मकोय की जाति के फल 'काकनज' (Physalis alkekenji Linn.) के प्रतिनिधि माने जाते हैं। डॉ० देसाई ने सम्भवतः इसका उल्लेख फा० इण्डिका (P. indica) नाम से किया है। ६० टंकारी सं०-टंकारी, लक्ष्मीप्रिया, चिरपोटा। हिं०-तुलसीपति। बं०-वनटेपारि। म०-थानमोडी, चिरबोटी, चिरबुटले। गु०-पोपटी, पर्पोटी। पं०-हुब्बककनज। क०-बोंडुल। ता०-सिसयक्कालिक। ते०-कुपण्टे। ले०-Physalis minima Linn. (फाइसेलिस मिनिमा लिन.)। Fam. Solanaceae (सोलेनॅसी)। यह सब प्रान्तों में पाया जाता है। इसका क्षुप-६-१८ इञ्च ऊँचा, नरम लोमयुक्त एवं वर्षजीवी होता है। पत्ते- २ इञ्च लम्बे, अंडाकार तथा दन्तुर होते हैं। पुष्प-घंटाकृति, पीतवर्ण तथा १/८ इञ्च बड़े होते हैं। फल-१ १/२ इञ्च लम्बा, १/२ इञ्च चौड़ा, लाल रंग का रुचिकर होता है जिसमें छोटे-छोटे अनेक बीज होते हैं। गुण और प्रयोग-इसके फल बलकारक, मूत्रजनन एवं विरेचक होते हैं। 'काकनज' के स्थान पर इनका उपयोग किया जाता है। सोजाक में फलों को खिलाते हैं। स्तनशिथिलता दूर करने के लिये इसके पंचांग को चावल को धोवन में पीस कर लेप करते हैं। मलावष्टम्भ में इसके फलों का पाक बहुत लाभदायक है। तमकश्वास में इसकी जड़ तथा टंकण का लावा मधु के साथ देने से श्वासावरोध कम होकर कफ निकलता है। मात्रा-३-६ माशा। अथ वेतसः । तस्य नामगुणानाह वेतसो नम्रकः प्रोक्तो वानीरो वञ्जुलस्तथा। अभ्रपुष्पश्च विदुलो रथः शीतश्च कीर्त्तितः ।। १३५ ।। वेतसः शीतलो दाहशोथार्शोयोनिरुक्प्रणुत्। हन्ति वीसर्पकृच्छ्रास्रपित्ताश्मरीकफानिलान् ।। १३६ ।। वेतस के नाम तथा गुण-वेतस, नम्रक, वानीर, वञ्जुल, अभ्रपुष्प, विदुल, रथ और शीत ये सब वेतस के नाम हैं। वेतस-शीतल है तथा दाह, शोथ, अर्श (बवासीर), योनिरोग, विसर्प, मूत्रकृच्छ्र, रक्तपित्त, अश्मरी (पथरी), कफ तथा वात को दूर करने वाला है। [१३५-१३६] नोट-वेतस के विषय में विद्वानों में मतभेद है। भावप्रकाश, ध० नि०, रा० नि० आदि में वेतस तथा जलवेतस इन दो भेदों का उल्लेख है। रा० नि० ने वेत्र १ नाम से एक स्वतन्त्र द्रव्य का भी उल्लेख किया है। अन्य निघंटुओं ने वेतस के पर्याय में या स्वतंत्र रूप से वेत्र का उल्लेख नहीं किया है। कुछ विद्वान् वेतस से बेंत का ग्रहण करते हैं जो कॅलॅमस् टेनुइस् (Calamus tenuis) है। कुछ लोगों के मत से वेतस से वेदमूद्रक का ग्रहण उचित है जो सॉलिक्स कॅप्रिआ (Salix caprea) है। कुछ विद्वानों के मत से इसी जाति के सं० ऑल्बा (S. alba) को वेतस मानना चाहिये। १. वेत्रो वेतो योगिदण्डः सुदण्डो मृदुपर्वकः। वेत्रः पंचविधः शैत्यकषायो भूतपित्तहृत्।। रा. नि.
५३२ भावप्रकाशनिघण्टुः इसी जाति के अन्य उपभेद (जलमाला) सँ० टेट्रास्पर्मा (S. tetrasperma) एवं सँ० ॲक्मोफाइला (S. acmophylla) को जलवेतस माना जाता है। भावप्रकाशकार वंजुल और बानीर पर्याय में लिखते हैं किन्तु चरक¹ में दोनों का साथ-साथ उल्लेख होने से ऐसा मालूम होता है कि ये दो अलग वनस्पतियाँ हैं। च० नि० अ० ४-३६ में वेत्र तथा वेतस भी साथ-साथ आये हैं जिससे ये भी दो अलग द्रव्य हैं ऐसा मालूम होता है। वंजुल नाम से चरक में वेदनास्थापन महाकषाय में एवं आसवयोनिसार वृक्षों (सु० अ० २५) में तथा सुश्रुत में न्यग्रोधादिगण में उल्लेख है 'विदुल' नाम चरक में वमनोपग महाकषाय (सू.अ. ४ में आया है जिसका अर्थ चक्रपाणि हिज्जल करते हैं। सुश्रुत (सू.अ. ३९) में ऊर्ध्वभागहरगण में विदुल आता है वहाँ डल्हण उसका अर्थ वेतस करते हैं। श्रीयुत यादव जी विदुल नाम हिज्जल के पर्याय में मानते हैं। हिज्जल (समुद्रफल) में वामक गुण देखा भी जाता है। चरक में वेतस नाम से उसकी मूलत्वक् का उपयोग रक्तपित्त (चि० अ० ४) में एवं सुश्रुत में जीर्णज्वर (उ० अ० १९) में मूल का उपयोग किया हुआ है। चरक में वेत्र नाम से रक्तपित्त (चि० अ० ४), शोथ (चि० अ० १२) एवं ऊरुस्तम्भ (चि० अ० २७) में उपयोग किया गया है। गुणों की दृष्टि से वेदमुश्क के गुण भावप्रकाशोक्त वेतस से मिलते हैं। यहाँ पर वेदमुदक एवं वेंत का अलग- अलग वर्णन किया गया है। जलवेतस के अन्तर्गत वेदमुश्क की अन्य उपजाति जलमाला का वर्णन किया गया है। ६१. वेतस १ (वेदमुश्क) सं०-वेतस, वानीर, गन्धपुष्प। हिं०, पं०-वेदमुश्क। पश्तो०-ख्वगवल। अ०-खिलाफुल् बलखी। फा०-वेदेमुश्क, गुर्वएबेद्। अं०-Willow विलो; Sallow (सॅलो)। ले०-Salix caprea Linn. (सॅलिक्स कॅप्रिआ लिन.)। Fam. Salicaceae (सॅलिकॅसी)। यह फारस, ईरान, उत्तर पश्चिम सीमान्प्रान्त एवं भारतवर्ष में काश्मीर तथा पंजाब में होता है। इसका वृक्ष-छोटा तथा १५-३० फीट ऊँचा होता है। छाल-पतली, लचीली, कषाय एवं बहुत कड़वी होती है। पत्ते-एकांतर, हरे, बड़े, अंडाकार, दन्तुर एवं नुकीले होते हैं। मध्यशिरा ऊपर के पृष्ठ पर कुछ श्वेत किन्तु अधोपृष्ठ पर रोमश होती है। पुष्प-पीतवर्ण के तथा सुगन्धित होते हैं। इसके पंचांग का व्यवहार किया जाता है। इसके पुष्पों से बनाये अर्क का 'अर्क वेदमुश्क' नाम से यूनानी चिकित्सा में बहुत व्यवहार किया जाता है। इससे स्रवित हुई शर्करा, वेद अंगबीन का भी उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसकी छाल में ४-१०% टैनिक ऐसिड, २-७% एक रवेदार ग्लूकोसाइड, सॅलीसिन (Salicin), मोम, वसा एवं गोंद होता है। इसके पुष्पों में एक सुगन्धित उड़नशील तैल पाया जाता है। गुण और प्रयोग-इसकी छाल ग्राही, शीतल, ज्वरहर, दाहप्रशमन, वेदनास्थापक, मूत्रल, शिरःशूल नाशक, हृदय को बल देने वाली, उत्तेजक एवं वाजीकर है। इसके पुष्प रोचक एवं पत्ते ज्वरहर होते हैं। (१) इसकी छाल का क्वाथ विषम ज्वर, पैत्तिक ज्वर, नूतन आमवात तथा कफक्षय में देते हैं। इससे दाह, शिरःशूल, संधिपीड़ा, संधिशोथ एवं रक्तष्ठीवन कम होता है। अर्श में छाल का लेप किया जाता है। रक्तष्ठीवन में इसके काण्ड की राख खिलाते हैं। (२) इसके फूलों का अर्क उष्ण ज्वर तथा हृदय की धड़कन में पिलाते हैं। नेत्राभिष्यन्द तथा शिरःशूल में इसमें कपड़ा भिंगो कर उसकी पट्टी रखते हैं। मात्रा-छाल १/२-१ तो०; अर्क १-२ तोला।
१. क. अ. १, ९; सि. अ. १०, १९।
गुडूच्यादिवर्गः ५३३ ६२. वेतस २ (बेंत) सं०- वेत्र, वेतस । हिं०- वेंत । बं०- छांचि वेत । म०- वेत । क०- वेतसु । गु०- नेतर । ते०- जतयूर् कुली । पं०- बैत । ता०- बेत्तम् । फा०- बेंत, हजां खिरजा । अ०- खीरजा, खलाफ, हरजां । अं०- Cane (केन) । ले०- Calamus tenuis Roxb. (कॅलॅमस् टेन्युइस् राक्स.) । Fam. Palmeae (पामेइ) । यह जलप्राय भूमि में २ हजार फीट की ऊँचाई तक पाया जाता है । इसकी लता- सघन, आरोही तथा काँटेदार होती है । यह काँटों की सहायता से फैलती है । काण्ड- चिकना, हरा और कोषमय पत्राधारों से ढँका हुआ रहता है । पत्ते- २-४ फीट लम्बे, पक्षाकार और पत्रदण्ड काँटों से युक्त होते हैं । पत्रक- ६-१२ इञ्च लम्बे, १/२-३/४ इञ्च चौड़े, रेखाकार, मालाकार, नुकीले एवं तीन शिराओं से युक्त होते हैं । पत्रक के किनारे तथा शिरा पर भी काँटे होते हैं । पत्रनाल और पत्रकोष पर भी प्रायः १ इञ्च तक लम्बे और सीधे काँटे होते हैं । पत्रकोष से चाबुक के सदृश ८ फीट तक लम्बी एक रचना फ्लॅजेलम् (Flagellum) निकली रहती है जिस पर भी टेढ़े काँटे होते हैं । पुष्प- पत्रकोषों के अन्दर एकलिंगी पुष्पों की विदाण्डिक मंजरियाँ पाई जाती हैं । फल- प्रायः १/२ इञ्च लम्बा एवं काले किनारे के वल्कपत्रों से ढँका हुआ रहता है । शीतऋतु में फल पक जाते हैं । बेंत की कई जातियाँ पाई जाती हैं । गुण और प्रयोग- इसको कुछ विद्वान् वेतस मानते हैं तथा वेतस के स्थान पर इसका प्रयोग करते हैं । इसकी जड़ ज्वरहर, पित्तहर, पौष्टिक एवं विरेचक मानी जाती है । इसके फल का गूदा ग्राही होता है । इसके कोमल अंकुरों का शाक तिक्तपौष्टिक माना जाता है । अथ जलवेतसः । तस्य नामगुणानाह निकुञ्चकः परिव्याधो नादेयो जलवेतसः । जलजो वेतसः शीतः १कुष्ठहृद्वातकोपनः ॥१३७॥ जलवेतस के नाम तथा गुण- निकुञ्चक, परिव्याध, नादेय और जलवेतस ये सब पर्यायवाची शब्द हैं । जलवेतस- शीतल, कुष्ठनाशक तथा वात को कुपित करनेवाला होता है । [१३७] ६३. जलवेतस (जलमाला) सं०- जलवेतस, वंजुल ? हिं०- जलमाला, सुकूलवेत, बंद । म०- वालुञ्ज । बं०- पानिजामा । ता०- अन्नुपलै । ते०- एतिपाल । फा०- वेदसादा, वेदलेला । अ०- खिलाफ्, सफ्साफ । ले०- Salix tetrasperma Roxb. (सॅलिक्स टेट्रास्पर्मा राक्स) । Fam. Salicaceae (सॅलिकॅसी) । इसका वृक्ष प्रायः नदी नालों के किनारे पाया जाता है । हिमालय में ६००० फीट की ऊँचाई तक यह होता है । काश्मीर तथा पश्चिमोत्तर प्रान्त में इसे लगाते हैं । इसका वृक्ष- साधारण ऊँचा तथा सुन्दर होता है । छाल- कृष्णाभ, तन्तुमय, चिमड़, कड़वी, कषाय तथा कुछ सुगन्धित होती है । पत्ते- ३-६ इञ्च लम्बे, रेखाकार-भालाकार, चिकने, पत्रोदार हरा, पत्रपृष्ठ, सफेद एवं पत्रवृन्त लाल रंग का होता है । पुष्प- सफेदी लिये पीले और कुछ सुगन्धित मंजरियों में आते हैं । फल- करीब ५ इञ्च लम्बा होता है तथा प्रत्येक फल में ४-६ बीज होते हैं । इसकी छाल एवं पत्र का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है । इसके लचीले पतले काण्ड से टोकरियाँ बनायी जाती हैं । इसकी अन्य उपजातियों को वेत, लैला, मजनूं तथा भैंसा आदि नामों से पुकारा जाता है । १. संग्राही इति पाठः ।
५३४ भावप्रकाशनिघण्टुः **गुण और प्रयोग—**इसके गुण भी वेदमश्क की तरह ही हैं। इसकी छाल पौष्टिक, ज्वरघ्न तथा नियतकालिकज्वरप्रतिबंधक है। रक्तातिसार, यकृत् एवं प्लीहा तथा कामला में इसके ताजे पत्तों का रस देते हैं। **मात्रा—**छाल ½-१ तो०; रस २-५ तो०; अर्क ५-१० तो०। अथेज्जलः (समुद्रफल इति लोके) तस्य नामगुणानाह इज्जलो हिज्जलश्चापि निचुलश्चाम्बुजस्तथा। जलवेतसवद्वेद्यो हिज्जलोऽयं विषापहः ॥१३८॥ **इज्जल (समुद्रफल) के नाम तथा गुण—**इज्जल, हिज्जल, निचुल और अम्बुज, ये सब पर्यायवाची शब्द हैं। **इज्जल—**गुणों में 'जलवेतस' के ही समान है तथा विशेषतः यह विषनाशक है। [१३८] ६४. इज्जल (समुद्रफल) **हिं०—**इज्जल, इंजर, हिज्जल, समुद्रफल । **बं०—**हिज्जल । **म०—**सत्फल, समुद्रफल । **गु०—**फल । मा०— समंदर फल । **आसा०—**हिंडोल । **सन्ता०—**हिंजल । **कोल०—**सपरुंग । **उरि०—**किजोलो । **ते०—**कणपु, कणिगि । **ता०—**समुद्रपुल्लानि । **क०—**केंपुकणगिन । **मल०—**चरियसंसकरवडि । **ले०—**Barringtonia acutangula (Linn.). Gaertn. (बॅरिंगटोनिआ एक्युटेग्युला, (लिन) गार्ट) । Fam. Lecythidaceae (लेसिथिर्डेसी) । यह प्रायः सब प्रान्तों में पाया जाता है किन्तु बंगाल तथा दक्षिण में अधिक देखने में आता है। इसका वृक्ष— मध्यमाकार का और बारह मास हरा
गुडूच्यादिवर्गः ५३५ (१) बच्चों के प्रतिश्याय, कास, फुफ्फुसपाक आदि कफविकारों में इसे देते हैं। यदि इसके देने के पश्चात् वमन न हो तो नमक डालकर उष्ण जल पिलाना चाहिये। इससे वमन होकर कफ निकल जाता है तथा पखाना भी होता है। यदि इसके प्रयोग से कुछ दुष्परिणाम मालूम पड़े तो चावल की माँड़ घी मिलाकर दें। समुद्रफल को पीसकर छाती तथा पेट पर भी लगाते हैं। (२) तमकश्वास में ६ माशा समुद्रफल व सफेद कोयल की जड़ ६ माशे दूध में घिसकर देते हैं जिससे वमन- विरेचन होकर आराम मिलता है। (३) शिरःशूल में इसके बीजों का नस्य लाभदायक होता है। (४) इसके पत्तों का रस मधु मिलाकर आमातिसार में देने से लाभ होता है। (५) आँखों से पानी जाता हो तो समुद्रफल को जल में घिसकर लगाने से लाभ होता है। (६) उदरशूल, आनाह आदि में नमक, अजवायन के साथ इसका चूर्ण दिया जाता है। (७) पर्यायिक ज्वरों में काली मिर्च एवं तुलसी पत्र के साथ इसे देते हैं। मात्रा-१-२ रत्ती। अथाङ्कोटः (अङ्कोल-ढेरा)। तस्य नामगुणानाह अङ्कोटो दीर्घकीलः स्यादङ्कोलश्च निकोचकः। अङ्कोटकः कटुस्तीक्ष्णः स्निग्धोष्णास्तुवरो लघुः।।१३९।। रेचनः कृमिशूलामशोफग्रहविषापहः। विसर्पकफपित्तास्रमूषकाहिविषापहः ।।१४०।। अंकोल के नाम तथा गुण-अंकोट, दीर्घकील, अङ्कोल और निकोचक ये सब 'अङ्कोल' के नाम हैं। अङ्कोल- कटु तथा कषाय (कसेला) रसयुक्त, तीक्ष्ण तथा उष्णवीर्य, स्निग्ध, लघु (हलका), रेचक (दस्तावर) होता है एवं कृमि, शूल, आम, शोथ (सूजन), ग्रहबाधा, विष, विसर्प, कफ, पित्त, रक्तविकार एवं मूसा तथा सर्प के विष को दूर करने वाला होता है। १३९-१४०] अथाङ्कोटफलस्य गुणानाह तत्फलं शीतलं स्वादु श्लेष्मघ्नं बृंहणं गुरु। बल्यं विरेचनं वातपित्तदाहक्षयास्रजित् ।।१४१।। अङ्कोल के फल का गुण-अङ्कोल का फल-शीतल, स्वादिष्ट, कफनाशक, बृंहण, पाक में गुरु, बलकारक, विरेचक एवं वायु, पित्त, दाह, क्षय तथा रक्तविकार को दूर करने वाला होता है। [१४१] ६५. अङ्कोट हिं०-अङ्कोल, ढेरा, टेरा, ढेला। बं०-आंकोड, बाघ, आंकडा, अकरकंटा। म०-अंकोल। गु०-आंकोल, अंकोल। क०-अंकोले-मर। ते०-कुडुगु; अंकोलमु। ता०-अलंर्गी। सन्ता०-डेला, ढेला। ले०-Alangium lamarckii thwaites (एलैञ्जिअम् लेमार्काई थ्वेट्स)। Fam. Alangiaceae (एलेञ्जियेसी)। यह मध्य और दक्षिण भारत, उत्तर प्रदेश, बंगाल, बिहार, हिमालय की घाटी से गङ्गा तक और राजपुताना आदि कई प्रान्तों में पाया जाता है। यह प्रायः नदी-नालों की ढालों पर अधिक होता है। इसका छोटा वृक्ष, काँटेदार देखने में सुन्दर और सघन होता है। छाल-धूसर रङ्ग की, मोटी एवं खुरदरी होती है। जड़-भारी, पीताभ, तेलिया तथा मजबूत होती है। जड़ की छाल, दालचीनी की अपेक्षा भूरे रङ्ग की रहती है। पत्ते- कनेर के पत्तों के समान तीन से पाँच इञ्च लम्बे, १ से २।। इञ्च चौड़े, आयताकार, आयताकार-प्रासवत् या कोई अंडाकार होते हैं। पुष्पोद्गम के पूर्व पत्ते गिर जाते हैं। फूल-सुगन्धित सफेद रङ्ग के होते हैं। फल-कच्ची अवस्था में नीले और पकने पर जामुनी लाल, .४-.६ इञ्च बड़े तथा मांसल होते हैं। बीज-गुठलीदार और बड़े होते हैं। Aesculus indica CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammpu. Digitized by S3 Foundation USA
५३६ भावप्रकाशनिघण्टुः colebr. (एस्क्युलस् इण्डिका कोले.) को 'कंडार, बंखोर, अंकोल' आदि नामों से क्वचित् वर्णित किया जाता है किन्तु प्रस्तुत अङ्कोट के प्रतिनिधि के रूप में उक्त वनस्पति का व्यवहार नहीं करना चाहिये । इसकी जड़ की छाल, पत्र, बीज एवं बीज तैल का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। इसका स्वाद कड़वा एवं गन्ध अप्रिय होती है । रासायनिक संगठन-इसकी जड़ की छाल में ॲलेज़ाइन (Alangine) नामक एक कड़वा क्षाराभ एवं पोटॅशियम् क्लोराइड (Potassium chloride) पाया जाता है । इस क्षाराभ के रवे नहीं बनते तथा यह जल में भी नहीं घुलता । यह मद्यसार में घुल जाता है । बिल्ली में ॲलेज़ाइन सल्फेट (Alangine sulphae) नामक इसके लवण के शिरान्तर्गत सूचिकाभरण से रक्तनिपीड कम होता है जो १, २ मिनट में ही स्वाभाविक हो जाता है। इससे हृदय अवसादित होता है तथा आन्त्र की पुरःसरण क्रिया बढ़ती है । इससे श्वास अनियमित हो जाता है । गुण और प्रयोग-इसकी छाल उष्ण, कड़वी, वामक, स्वेदजनक, मूत्रल, रेचक, ज्वरहर, कृमिघ्न एवं विषहर है । अल्प मात्रा में (१-३ र०) यह हल्लासकारक, स्वेदजनन एवं मूत्रल है । अधिक मात्रा (३ माशा) में यह वामक एवं विरेचक है । इसके गुण मदार तथा एपिकाक के समान हैं । वामक मात्रा में प्रयोग से आमाशय में दाह तथा हृदय एवं रक्तवाहिनियों पर अवसादक प्रभाव पड़ता है ! (१) कुष्ठ, उपदंश तथा सभी प्रकार के त्वचा के विकारों में इसकी मूलत्वक् १/२-१ रत्ती की मात्रा में दिन में तीन बार देते हैं तथा बीज तैल या जड़ को पीसकर लगाते हैं । (२) प्रतिश्याय, इन्फ्लूएञ्जा एवं संधिपीड़ा युक्त ज्वर (डेंग्यु) में इसकी जड़ घोड़वच या सोंठ के साथ चावल की मांड में उबालकर देते हैं तथा पत्तों को पीसकर जरा गरम कर पीड़ा युक्त स्थान पर बाँधते हैं । (३) यकृतोदर, जलोदर एवं वृक्कजन्य शोफ में इसकी मूलत्वक् ३ रत्ती की मात्रा में देने से विरेचन होता है तथा यकृत् की क्रिया सुधरती है । इसके साथ यवक्षार का प्रयोग करने से मूत्र भी बढ़ता है । (४) चूहे के विष में तथा सर्पविष में यह लाभदायक माना जाता है । सर्प विष में २० रत्ती की मात्रा में मूल का चूर्ण चावल की धोवन के साथ देते हैं । मात्रा-मूलत्वक् १-३ रत्ती; वामक ३ माशा । अथ बलाचतुष्टयम् तस्य नामगुणानाह बलावाट्यालिका वाट्या सैव वाट्यालकाऽपि च । महाबल पीतपुष्पा सहदेवी च सा स्मृता ।।१४२।। ततोऽन्याऽतिबला ऋष्यप्रोक्ता कङ्कतिका च सा । गाङ्गेरुकी नागबला झषा ह्रस्वगवेधुका ।।१४३।। बलाचतुष्टय (चारों प्रकार के बला) के नाम तथा गुण-(१) बला, वाट्यालिका, वाट्या तथा वाट्यालका ये सब नाम बला (खिरैंटी) के हैं । (२) महाबला, पीतपुष्पा और सहदेवी ये सब नाम महाबला के हैं । (३) अतिबला, ऋष्यप्रोक्ता और कङ्कतिका ये सब अतिबला के हैं । [१४२-१४३] बलाचतुष्टयं शीतं मधुरं बलकान्तिकृत् । स्निग्धं ग्राहि समीरास्रपित्तास्रक्षतनाशनम् ।।१४४।। बलाचतुष्टय-शीतवीर्य, मधुररसयुक्त, बलकारक, कान्तिकारक, स्निग्ध एवं ग्राही होता है और वायु रक्तपित्त, रक्तविकार तथा व्रण को दूर करने वाला होता है । [१४४] ❖ बरियारा, सहदेवी, ककहिया, गुलशकरी, इति बलाचतुष्टयम् ।।१४४।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
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यहाँ पर 'बलाचतुष्टय' से (१) बरियारा, (२) सहदेई, (३) ककहिया, (४) गुलशकरी—इन चारों को ही समझना चाहिये । [१४४] बलामूलत्वक्चूर्णं पीतं सक्षीरशर्करम् । मूत्रातिसारं हरति दृष्टमेतन्न संशयः ॥ १४५॥ हरेन्महाबला कृच्छ्रम् भवेद्वातानुलोमिनी। हन्यादतिबला मेहं पयसा सितया समम् ।। १४६ ।। 'बरियारे' के जड़ की छाल का चूर्ण यदि दूध तथा शक्कर के साथ मिलाकर पीया जाय तो मूत्रातिसार को दूर करता है, यह परीक्षा करके देखा गया है, अतएव इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये । 'महाबला' मूत्रकृच्छ्र को दूर करती है तथा इससे वायु का अनुलोमन भी होता है। 'ककहिया' का चूर्ण दूध तथा चीनी के साथ खाने से प्रमेह नष्ट होता है। [१४५-१४६] नोट-भावप्रकाशकार बला के चार भेद लिखते हैं। आधुनिक उद्भिज्जवेत्ताओं ने भी बला प्रजाति (Sida) की कई जातियों का वर्णन किया है। इनमें से अतिबला (कंघी) निस्संदेह ॲब्युटिलॉन् (Abutilon) प्रजाति की बनस्पति है । अधिकांश विद्वानों ने सिडा कॉर्डिफोलिआ (Sida cordifolia) को बला माना है, किन्तु श्री ठाकुर बलवन्त सिंह जी ने (पीत पुष्प) सिडा रॉम्बिफोलिया (Sida rambifolia) को वास्तविक बला लिखा है जिसको अन्य विद्वानों ने महाबला माना है । कुछ विद्वान रॉम्बिफोलिआ का अन्य उपभेद (श्वेत पुष्प) सिडा रॉम्बिफोलिया (Sida rhombifolia) को महाबला मानते हैं । भावप्रकाशकार महाबला के पर्याय में सहदेवी लिखते हैं लेकिन वास्तव में सहदेवी यह भिन्न वर्ग की ह्वर्नोनिआ सिनेरिआ (Vernonia cinerea) है । चरक-सुश्रुत में महाबला नाम नहीं आया है किन्तु सहदेवा नाम है । सम्भव है कि चरक, सुश्रुतोक्त सहदेवा ही महाबला हो तथा गलती से सहदेवा के स्थान पर सहदेवी छप गया हो । नागबला-के सम्बन्ध में अधिक मतभेद हैं। सिडा हेरोनिसीफोलिआ या सिडा ह्यूमिलिस् (Sida veronicaefolia; Syn-Sida humilis) को अधिकांश विद्वान् नागबला मानते हैं। यह भूमि पर सर्प की तरह टेढ़ी-मेढ़ी फैलती है। कुछ विद्वान् गुलसकरी को नागबला मानते हैं क्योंकि नागबला के पर्याय में गांगेरुकी आया है । गुलसकरी के ले० नाम के विषय में भी मतभेद है। सिडा स्पाइनोसा (Sida spinosa) को कुछ लोगों ने गुलसकरी लिखा है किन्तु श्री ठा० बलवन्तसिंह जी ने उसे अशुद्ध बतलाया है तथा वे ग्रेविआ हिर्सुटा (Grewia hirsuta) को गुलसकरी मानते हैं । नागबला का चतुष्फला पर्याय इसके लिये उपयुक्त मालूम होता है । इसे तथा इसके अन्य भेद ग्रे० पोप्यूलिफोलिया (Grewia populifolia) को गांगेरुकी (गंगरेन) कहते हैं जिससे इन्हें नागबला माना जाता है। इनके अतिरिक्त सिडा ॲक्युटा (Sida acuta) एवं अन्य भेद भी पाये जाते हैं। यहाँ पर संक्षेप में उपर्युक्त भेदों का स्वतन्त्र वर्णन किया गया है । वास्तव में गुणों की दृष्टि से इनमें विशेष अन्तर न होने के कारण एक के स्थान में दूसरे का व्यवहार किया जा सकता है । ६६. बला (बरियारा) हिं०-बरियार, बरियारा, बरियाल, खरेठी, खरैटी, खिरैंटी । बीजबन्द-(बीज) । बं०-बेडेला । म०-चिकणा । गु०-बलदाणा (बीज), खरेटी, बल, बला । क०-किसंगी, हेतुट्टि-गिडा । ते०-चिरिबेण्डा, मुत्तवु । ता०-अखिल- मनैपुण्डु । मा०-खरेंटी । पं०-खरैहटी, सिमक । अं०-Country mallow (कण्ट्री मॅलो); Sida (सिडा) । ले०-Sida cordifolia Linn. (सिडा कॉर्डिफोलिआ लिन.)। Fam. Malvaceae (माल्वेसी) । यह सब प्रान्तों में प्रायः बारहों मास पाया जाता है। किन्तु वर्षा ऋतु में इसकी बहुलता खेतों और मेड़ों पर देखने में आती है। इसकी जड़ और डंडी बहुत मजबूत होती है जो आसानी से नहीं टूटती ।
५३८ भावप्रकाशनिघण्टुः इसका क्षुप-छोटा, २-४ फीट ऊँचा, स्वावलम्बी, मृदुरोमश तथा अनेक शाखाओं से युक्त रहता है। स्तम्भ- काष्ठमय एवं रेशेदार होता है। छाल-हल्के पीताभ भूरे रङ्ग की होती है। पत्ते-१-२ इञ्च लम्बे, हृदयाकृति, लट्वाकार- आयताकार, तूलरोमश, गोलदन्तुर, ७-९ शिराओं से युक्त एवं १/२-१ १/२ इञ्च लम्बे पर्णवृन्त से युक्त होते हैं। पुष्प- बरसात के अन्त में छोटे पीले रङ्ग के फूल आते हैं जिनमें ७-१० स्त्रीकेसर होते हैं। फल-छोटे, मूंग जितने बड़े होते हैं। बीज-गहरे भूरे या काले रङ्ग के छोटे बीज रहते हैं जिन्हें बीजबन्द कहा जाता है। ग्रन्थिपर्ण (पृ० २५३) के बीजों को भी बीजबन्द कहा जाता है। जड़-प्रायः २-५ इञ्च लम्बी तथा १/२ इञ्च मोटी होती है। इसकी जड़, पत्र, बीज एवं पञ्चांग का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसके पञ्चांग में एक क्षाराभ, तैल, फाइटोस्टेरॉल् (Phytosterol), म्यूसिन, राल, रालीय अम्ल एवं पोटॉशियम् नाइट्रेट (Potassium nitrate) ये पदार्थ पाये जाते हैं। इसके पत्र, काण्ड एवं मूल में क्षाराभ की मात्रा ०.०८५% रहती है किन्तु बीजों में यह ०.३% होती है। इसके क्षाराभ में प्रधान अंश एफ़ेड्रीन (Ephedrine) का रहता है। गुण और प्रयोग-बला (बरियरा) शीतवीर्य, बल्य, रसायन, वृष्य, प्रजास्थापन, संग्राही वातपित्तहर एवं स्निग्ध है। इसका उपयोग रक्तपित्त, प्रमेह, प्रदर, वातविकार एवं व्रण में किया जाता है। (१) शुक्रमेह में इसके पञ्चांग का स्वरस देने से लाभ होता है। (२) श्वेत प्रदर, बारबार पेशाब होना तथा सोजाक में इसके जड़ की छाल का चूर्ण शर्करा तथा दुग्ध के साथ प्रयोग करते हैं। (३) अर्द्धाङ्ग, अर्दित, मन्यास्तम्भ, अवबाहुक, गृध्रसी तथा शिरःशूल आदि वातविकारों में इसकी केवल जड़ या हींग और सैंधव मिलाकर जड़ का प्रयोग करते हैं तथा दुग्ध के साथ सिद्ध तैल का बाह्य प्रयोग करते हैं। (४) नेत्राभिष्यंद में इसके पत्र पीसकर बाँधते हैं। (५) उपदंश, फिरंग तथा क्षत में इसकी जड़ को पीसकर बाँधने से व्रण जल्दी अच्छे होते हैं। पञ्चांग के क्वाथ से व्रण प्रक्षालन भी किया जाता है। (६) (महा) बला की जड़ एवं सोंठ का क्वाथ कम्पयुक्त विषम ज्वरों में लाभदायक होता है। (७) हृदय को बल देने के लिये मकरध्वज तथा कस्तूरी के साथ इसका प्रयोग करते हैं। (८) राजयक्ष्मा में दूध के साथ इसकी जड़ से सिद्ध घृत का उपयोग मधु मिलाकर करते हैं। (९) श्लीपद में (महा) बला की जड़ एवं हरिताल पीसकर लेप करते हैं। (१०) रसायन के लिये इसकी जड़ (१/२-१ पल) को दूध के साथ पीसकर पिलाते हैं तथा आहार में घृत युक्त दूध भात खिलाते हैं। इससे आयु वृद्धि होती है। मात्रा-मूल ६ माशा-१ तोला, पञ्चांग ६ माशा-१ तोला। ६७. महाबला, सहदेवी ? सं०-सहदेवा, क्षेत्रबला। हिं०-सहदेई, सहदेया, पीतबला। बं०-पीतबडेला। म०-चिकणी, सहदेवी, तुपकड़ी। गु०-खेतराऊबल, खेतराऊबलदाणा। पं०-सहदेवि। ते०-मयिलमाणिक्यम्। ता०-मयिरमाणिक्कम्। ले०-Sida rhombifolia Linn. (सिडा रॉम्बिफोलिया लिन.)। Fam. Malvaceae (माल्वेसी)। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
गुडूच्यादिवर्गः ५३९ यह क्षुप जाति की वनौषधि प्रायः सब प्रान्तों में कहीं-न-कहीं पाई जाती है। यह ऊसर भूमि में अधिक होती है। उसका क्षुप-१-४ फीट ऊँचा, झाड़दार और सीधा होता है। पत्ते-२-३ इञ्च लम्बे, अभिलट्वाकार या तिर्यगायताकार तथा दन्तुर होते हैं। फूल-पीले रंग के बरियारे के फूलों के आकार वाले किन्तु उनसे कुछ बड़े होते हैं। फल-बरियारे के ही समान होते हैं। यह एक परिवर्तनशील जाति बतलाई जाती है जिसके अन्तर्गत कई उपभेद बतलाये गये हैं। इसी के उपभेद सिडा रॉम्बॉइडिआ (Sida rhomboidea) के पुष्प श्वेतवर्ण के होते हैं। यद्यपि भावप्रकाशकार इसे सहदेवी लिखते हैं तथापि यह वास्तविक सहदेवी नहीं है। सहदेवा यह नाम इसके लिये अधिक उपयुक्त है क्योंकि चरक सुश्रुत में बला के भेदों में सहदेवा का उल्लेख है। सहदेवी का आगे स्वतंत्र वर्णन किया गया है जो भिन्न वर्ग की वनस्पति है। रासायनिक संगठन-इसके पत्तों में लुआब बहुत होता है। गुण और प्रयोग-इसके गुण भी बला सदृश ही होते हैं। शीतज्वर तथा आमवात में सोंठ के साथ इसकी जड़ का क्वाथ पिलाते हैं। मूत्रकृच्छ्र में इसकी जड़ के क्वाथ से वेदना कम होती है। क्षत पर मूलस्वरस की पट्टी रखने से व्रण जल्दी अच्छा होता है। हरिताल के साथ इसकी जड़ के लेप से श्लीपद में लाभ होता है। मात्रा-६ मा० से १ तोला। ६८. सहदेवी सं०-सहदेवी। हिं०-सहदेई, सहदैया। बं०-छोट कुकासिमा। म०-सहदेवी, सायिदेवि, सादोडी। गु०- सदोडी, शेदरडी। ता०-नैचिट्टे। ते०-घेरिट्टेकरनिना। मल०-पिरिना। क०-सहदेवी। अं०-Fleabane (फ्लीबेन)। ले०-Vernonia cinerea Less. (व्हर्नोनिआ सिनेरिआ लेस्)। Fam. Compositae (कॉम्पोज़िटी)। यह बरसात के दिनों में परित्यक्त भूमि में सब जगह होती है। इसका क्षुप-स्वावलंबी अथवा प्रसरणशील, रोमश तथा ८ इञ्च से ३ फीट तक ऊँचा होता है। काण्ड-पतला, रेखा युक्त एवं रोमश होता है। शाखायें-प्रायः श्वेताभ रोमश होती हैं। पत्ते-कई तरह के अर्थात् रेखाकार, अंडाकार, लट्वाकार या अभिलट्वाकार, अखंड या दन्तुर, रोमश, अवृन्त अथवा क्रमशः संकुचित होकर सूक्ष्म वृन्त से लगे होते हैं। पुष्प-हलके जामुनी रंग के पुष्प .२५ इञ्च लम्बे और आयताकार मुण्डक में आते हैं। अधःपत्रावलि-घंटिकाकार, .२ इञ्च लम्बी और उसके पत्र प्रायः रेखाकार, लम्बाग्र और उनका अग्र कंटक सदृश तीक्ष्ण होता है। यह सहदेवी बलाभेद नहीं है किन्तु जिस सहदेवी के बारे में यह मान्यता है कि जड़ शिखा में बाँधने से ज्वर कम होता है वह यही है। गुण और प्रयोग-यह शीतवीर्य, स्वेदजनक, कृमिघ्न एवं शोथहर है। ज्वर में पसीना लाने के लिये इसका क्वाथ या स्वरस पिलाते हैं तथा शरीर पर लगाते हैं। अर्श में इसका स्वरस दिया जाता है। यह पेशाब की जलन तथा बस्ति के उद्वेष्टन में लाभदायक है। इसका लेप शोथ में उपयोगी है। इसके बीज कृमिनाशक, विषहर तथा घोड़ों के लिये पौष्टिक माने जाते हैं। नेत्राभिष्यन्द में पुष्पों का व्यवहार किया जाता है। मात्रा-स्वरस ६ मा०-१ तोला; बीज ४ र०-१ मा०। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
५४० भावप्रकाशनिघण्टुः ६९. अतिबला (कंघी) हिं०-कंघी, ककही, ककहिया, कंगही । बं०-पेटारी । म०-मुद्रा, मुद्रिका, करंडी, पेटारी । पं०-पीली बूटी, अतिखिरते । गु०-खपाट, कांसकी, डावली । मा०-डावी । क०-श्रीमद्रिगिडा । ते०-तुतुरुबेंड । सिन्ध०-सिम्बुल । सन्ता०-मिरूबहा । ता०-तुत्ति । फा०-दरख्ते शाहनाह । अ०-मश्तुलगूल । अं०-ndian Mallow (इण्डियन् मॅलो) । ले०-Abutilon indicum (Linn.) Sw. (एब्युटिलोन् इण्डिकम् (लिन.) स्व.) । Fam. Malvaceae (माल्वेसी) । यह वनौषधि प्रायः गरम प्रान्तों में अधिक पाई जाती है । इसका क्षुप-झाड़दार, दो से ढाई हाथ ऊँचा और पुराना होने पर ४-५ हाथ तक ऊँचा देखा जाता है । इस पर मृदु श्वेताभ मखमली रोमावरण होता है । पत्ते-एकांतर, ³/₄- १ इञ्च लम्बे, गिलोय के पत्तों के आकार वाले, दन्तुर, मृदुरोमश तथा लम्बे वृन्त से युक्त होते हैं । फूल-पीले नारङ्गी रङ्ग के प्रायः सन्ध्याकाल में खिलते हैं । फल-चक्राकार गोल कंघी की तरह होते हैं । इनसे प्रायः बालक छापा किया करते हैं । बीज-बरियारे के बीजों से कुछ बड़े होते हैं । इन्हें भी बीजबंद कहा जाता है । इसकी एक दूसरी जाति होती है जिसे हिं०-बड़ी कंघी, ले०-Abutilon hirtum G. Don. (एब्युटिलोन् हिट्म् जी. डॉन्.) कहते हैं । इसमें मृदुरोमावरण के अतिरिक्त चिपचिपे रोम तथा शाखाओं और पुष्पडंडों पर लम्बे मुलायम रोयें भी होते हैं । इसका भी अतिबला के नाम से प्रयोग किया जा सकता है । रासायनिक संगठन- इसके पत्तों में लुआब बहुत होता है जो उष्ण जल में आ जाता है । पत्तों की राख १६% होती है जिसमें क्षारीय सल्फेट, क्लोराइड, मॅग्नेशियम् फास्फेट तथा कॅल्शियम कार्बोनेट आदि लवण होते हैं । गुण और प्रयोग-इसकी जड़ वातहर, रसायन, मूत्रजनन; बीज स्नेहन, मृदुरेचन, वाजीकर, कासहर; छाल मूत्रजनन एवं पत्र स्नेहन, वेदनाहर हैं । (१) सोजाक, मूत्रकृच्छ्र एवं बस्तिविकार आदि में इसके पत्तों का क्वाथ या बीजों का प्रयोग बहुत लाभदायक होता है । मूत्रकृच्छ्र तथा रक्तमूत्र में मूल का क्वाथ लाभदायक है । प्रमेह में पेशाब साफ होने के लिये दूध एवं शर्करा के साथ इसकी छाल देते हैं । (२) मसूढ़े ढीले हों तथा दाँत में दर्द हो तो इसके पत्ते के क्वाथ से कुल्ला कराते हैं । वेदनायुक्त स्थान पर इससे सेंकते हैं । व्रण तथा फोड़े आदि पर इसके पुष्प तथा पत्तों का लेप किया जाता है । (३) ज्वर में दाहशान्ति के लिये इसके पत्ते तथा मूल का क्वाथ दिया जाता है । (४) रक्तप्रदरं में इसकी जड़ का चूर्ण शर्करा एवं मधु के साथ दिया जाता है । (५) इसके बीज नपुंसकता, अर्श, सोजाक तथा बस्तिविकारों में दिये जाते हैं । (६) पित्तातिसार में पत्रस्वरस में घृत मिलाकर खिलाते हैं । (७) गुदा पर इसके बीजों के धूप से सूत्र-कृमि नष्ट होते हैं । मात्रा-मूल ६ माशा-१ तोला; बीज ४-८ माशा । ७०. नागबला-१ सं०-भूमिबला, नागबला, विश्वदेवा । हिं०-फरीदबूटी ? म०-भुईबल, मुईचिकणा । गु०-भोंयबल । बं०- जोंका । ता०-पलुपुन्दु । ते०-गायपूआकु । ले०-Sida vero-nicaefolia Lam. (सिडा ह्वेरोनिसीफोलिआ लॅम्.) Syn-Sida humilis Cav. (सिडा ह्युमिलिस् कॅह.) । Fam. Malvaceae (माल्वेसी) । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
गुडूच्यादिवर्गः ५४१ यह प्रायः सब प्रान्तों में पाई जाती है। इसका क्षुप (प्रसर)—बहुवर्षायु, रोमश, लम्बी शाखाओं से युक्त तथा जमीन पर अथवा झाड़ियों पर फैला हुआ होता है। भूमि पर सर्प की तरह टेढ़े-मेढ़े यह फैला होने के कारण इसे नागबला कहते हैं। पत्ते—१/२-१ इञ्च लम्बे, प्रायः लट्वाकार, हृद्वत्, दन्तुर, रोमश तथा लम्बाग्र होते हैं। पुष्प—पीले रंग के छोटे अनेक पुष्प आते हैं। गुण और प्रयोग—गर्भिणी अतिसार में इसके पत्तों का फाण्ट देते हैं। मूत्र-कृच्छ्र में पुष्प तथा कोमल-फल चीनी के साथ देते हैं। क्षत तथा ठोकर लगने पर पत्तों को पीसकर बाँधते हैं। नागबला की जड़—यह बहुत उत्तम रसायन, पुष्टिदायक, आयुवर्धक मानी गयी है। राजयक्ष्मा तथा क्षतक्षय आदि में यह बहुत लाभदायक मानी जाती है। रसायन के लिये इसकी जड़ की छाल १/२-१ तोले दूध में पीसकर अथवा घृत एवं मधु के साथ इसका चूर्ण-सेवन का विधान है। पथ्या में घृत दुग्धयुक्त रक्तशालि अथवा साठी चावल का भात खाये (च० चि० अ० १)। इसी प्रकार प्रतिदिन १/२ तोले से बढ़ाकर ४ तोले तक की मात्रा में इसका चूर्ण दूध के साथ खाये तथा आहार में दूध ही पीये। क्षतक्षयी के लिये इस प्रकार एक महीने प्रयोग से पुष्टि, आयु, बल तथा आरोग्य की वृद्धि होती है (च० चि० अ० ११)। राजयक्ष्मा में दूध के साथ नागबला का चूर्ण सेवन करने से लाभ होता है (सु० उ० अ० ४१)। शोढल ने घृत एवं मधु के साथ क्षय के लिये इसका प्रयोग लिखा है। हृद्रोग, कास तथा श्वास में भी दूध के साथ इसका चूर्ण दिया जाता है (चक्र)। उपर्युक्त गुण जिसमें मिलें वही शास्त्रीय नागबला हो सकती है। मात्रा—मूल १/२ से १ तो०। ७१. नागबला—२ (गुलसकरी ?) सं०—कण्टकिनीबला। हिं०—गुलशकरी, जङ्गली मेथी। बं०—गोरक्षचाकुले, बोन मेथी। म०—नागबला। मा०—गङ्गेरण। पं०—गङ्गेरण, गङ्गेरन। गु०—कांटालोबल। फा०—शनबलिदेवरी। अ०—शमलोदेदस्ती। ले०— Sida spinosa Linn. (सिडा स्पाइनोसा लिन.)। Fam. Malvaceae (माल्वेसी)। यह इस देश के अधिक उष्ण भागों में पश्चिमोत्तर प्रदेश से दक्षिण तक पाई जाती है। इसका क्षुप—अनेक शाखाओं से युक्त, स्वावलम्बी तथा श्वेताभ वर्ण का होता है। शाखाएँ—पतली, खुरदरी एवं किञ्चित् सूक्ष्म रोवेंदार होती हैं। पत्ते—१-१ १/२ इञ्च लम्बे, अंडाकार, कुछ नुकीले, दन्तुर और मोटे होते हैं। पत्तों के नीचे सन्धि पर प्रायः तीक्ष्ण काँटे होते हैं। फूल—आध इञ्च के घेरे में गोलाकार, ५ पंखड़ियों से युक्त सफेद रङ्ग के आते हैं। फल—पाँच पंखड़ीवाले होते हैं तथा सूखने पर ५ भाग हो जाते हैं। बीज—५-९ बीज होते हैं। कुछ विद्वानों ने इसके दो भेद माने हैं जिसमें श्वेतपुष्प के क्षुप को सि० अॅल्बा (S. alba) तथा पीतपुष्प वाले को सि० ऑल्निफोलिआ (S. alnifolia) लिखा है। इसकी जड़ तथा पत्तों का उपयोग किया जाता है। गुण और प्रयोग—इसके पत्र स्नेहन तथा मूत्रजनन हैं। इसकी जड़ बल्य तथा ज्वरघ्न है। विषम ज्वर में मूलत्वक तथा सोंठ का क्वाथ पिलाते हैं। मूत्रकृच्छ्र, सोजाक तथा मूत्रेन्द्रिय के अन्य विकारों में इसके पत्तों का उपयोग किया जाता है। मात्रा—६ माशा-१ तोला। ७२. नागबला ३ (गुलसकरी, गांगेरुकी) सं०—गुडशर्करा। हिं०—गुलसकरी, कुकुरांड, कुकुरबिचा। संता०—सेतकट, सेताण्डीर। बिहा०—सेतारेपडी, सेतापेटू, सेताजरका। म०—गोवाली। ले०—Grewia hirsuta, Vanb. (ग्रेविआ हिर्सुटा, व्हेन्ब)। Fam. Tiliaceae (टिलिएसी)। यह उत्तर पश्चिम भारत, नेपाल तथा कोंकण में पाया जाता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
५४२ भावप्रकाशनिघण्टुः इसके क्षुप-डेढ़-३ फीट ऊँचे तथा रोमश होते हैं। इसकी जड़ के पास से अनेक शाखायें निकली रहती हैं। पत्ते-विचित्र प्रकार के, रेखाकार, लट्वाकार-भालाकार या गोलाई लिये हुये आयताकार, लम्बाग्र, अल्पवृन्त युक्त तथा तीक्ष्ण दन्तुर होते हैं। पुष्प-पीतवर्ण के होते हैं। फल-प्रायः चार खण्ड वाले तथा मृदुरोमों से ढँके रहते हैं। नागबला का चतुष्फला यह पर्याय इसे उपयुक्त होने के कारण कुछ इसे नागबला मानते हैं। किन्तु श्री ठा० बलवन्त सिंह जी इसे गुलसकरी मानते हैं तथा इसे 'गुडशर्करा' का अपभ्रंश मानते हैं। अन्य विद्वानों ने गुलसकरी पूर्वोक्त नागबला २ को माना है। इसे या इससे मिलती जुलती एक छोटी वृक्ष जाति ग्रेविआ पोप्युलीफोलिया वाह. (Grewia populifolia Vahl.) को गांगेरुकी (गंगरेन) कहते हैं। कुछ विद्वानों का मत है कि यह ग्रे० पोप्युलीफोलिआ ही गांगेरुकी है जिसे नागबला नहीं मानना चाहिये क्योंकि गांगेरुकी यह नागबला का पर्याय मानना उचित नहीं। गांगेरुक (फल) का चरक सू० अ० २७ तथा सू० अ० ४६ में उल्लेख है। गांगेरुक (फल) यह धन्वन के समान गुण वाला मधुर, कुछ कषाय, शीतल तथा पित्त-कफनाशक है। तलवार आदि से घाव होने पर इसके (गांगेरुकी) मूल का स्वरस उसमें भरकर बाँधने से वेदना नष्ट होती है (शा० ध० म० खं० अ० १-२०)। गुण और प्रयोग-शुक्र-दौर्बल्य में इसके मूल का उपयोग किया जाता है। फोड़े पर इसके मूल को पीसकर बाँधने से फोड़ा पककर जल्दी अच्छा होता है। आमातिसार में इसके पत्तों के क्वाथ से बहुत लाभ होता है। अथ लक्ष्मणा । तस्या लक्षणगुणानाह पुत्रकाकाररक्ताल्पबिन्दुभिर्लाञ्छितच्छदा ।।१४७।। लक्ष्मणा पुत्रजननी बस्तगन्धाकृतिर्भवेत् । कथिता पुत्रदाऽवश्या लक्ष्मणा मुनिपुङ्गवैः ।।१४८।। 'लक्ष्मणा' के लक्षण तथा गुण-जिसके पत्तों पर लाल रङ्ग के छोटे-छोटे बिन्दुओं से पुरुष का आकार बना हो तथा जो देखने में बस्तगन्धा (वन अजवायन) के समान मालूम पड़े उसे पुत्र को उत्पन्न करने वाली 'लक्ष्मणा' समझनी चाहिये। श्रेष्ठ मुनियों ने इसे अवश्य पुत्र देनेवाली बतलाया है। [१४७-१४८] ७३. लक्ष्मणा लक्ष्मणा यह एक सन्दिग्ध वनस्पति है। भावप्रकाशकार इसके परिचय में लिखते हैं कि इसके पत्तों पर पुरुषाकृति रक्त-चिह्न होते हैं तथा इसका आकार बस्तगन्धा की तरह होता है। बस्तगन्धा का अर्थ कुछ लोगों ने वन अजवायन किया है। कुछ ने इसका अर्थ बकरे की गन्ध सदृश गंध वाला किया है जो उचित नहीं मालूम पड़ता। तुलसी की तरह के क्षुप को भी बस्तगन्धा कहा गया है। मदनपाल निघण्टु में लक्ष्मणा के परिचय में 'गोक्षीरसद्दृशं पुष्पं र मवल्लिसमन्वितम् । रक्तबिन्दुयुतं पत्रं लक्ष्मणाऽऽकार उच्यते' लिखा है। कोश में लक्ष्मणा का अर्थ हंस जाति का पक्षी दिया हुआ है। ध० नि० एवं रा० नि० में एक विशेष प्रकार की श्वेत कंटकारी का लक्ष्मणा नाम से उल्लेख किया हुआ है किन्तु रा० नि० ने आगे मूलकादि वर्ग में फिर से लक्ष्मणा नामक अन्य वनस्पति का उल्लेख किया है जिसके गुणों में 'स्त्रीवन्ध्यत्वविनाशिनी' दिया हुआ है। इससे ऐसा मालूम होता है कि उस समय भी श्वेत जाति की कंटकारीविशेष को लक्ष्मणा मानते थे जैसा आजकल कुछ विद्वान् मानते हैं। यद्यपि श्वेत कंटकारी में गर्भकारक गुण हैं तथापि लक्ष्मणा उससे भिन्न है क्योंकि एक ही स्थान पर दोनों का उल्लेख मिलता है (अ० ह० शा० अ० १-४०)। अन्य निघंटुओं ने इसे शीत, मधुर, रसायन, बल्य, त्रिदोषघ्न एवं स्त्रीबन्ध्यत्वविनाशक लिखा है। पुत्रप्राप्ति के लिये सुश्रुत (शा० अ० २-३३) में लक्ष्मणा को दूध के साथ कूचकर उसका रस दाहिने नासा पुट में डालने के लिये लिखा है। नवजात शिशु के लिये उत्पन्न होने के दूसरे दिन लक्ष्मणासिद्ध घृत के पान कराने का विधान है (सु० शा० अ० १०)। बन्ध्यत्व नाशन के लिये इसकी जड़ को दूध के साथ सेवन करने का विधान है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmti. Digitized by S3 Foundation USA
गुडूच्यादिवर्गः ५४३ चीन में अरॅलिआ क्विन्क्वीफोलिआ (Aralia quinquefolia; Fam. Araliaceae) नामक एक पौधा पाया जाता है जिसे वहाँ जिन्सेंग (Ginseng) कहते हैं। इसकी जड़ को वहाँ अत्यन्त प्रभावशाली औषध मानते हैं। संभवतः इसका कारण इसका मानवाकृति से सादृश्य हो सकता है। इसको वहाँ के चिकित्सक रोग निवारक एवं जनाव्याधि विनाशक मानते हैं। लक्ष्मणा के वर्णन में 'पुत्रकाकार' का अर्थ यदि मानवाकृति कंद करे तो दोनों में पर्याप्त साम्यता मालूम होती है क्योंकि जितना महत्त्व अपने यहाँ लक्ष्मणा को दिया जाता है वैसा ही जिन्सेंग को चीन में दिया जाता है। इसका पौधा छोटा एवं पत्ते करतलाकार होते हैं। इसकी जड़ का स्वाद कुछ कड़ुआ तथा सुगनयुक्त होता है। निम्नलिखित वनस्पतियों को लक्ष्मणा नाम दिया हुआ मिलता है किन्तु इनके लक्ष्मणा होने में सन्देह है। (क) Ipomoea sepiaria Koen. (आइपोमिआ सेपिएरिआ कोएन्.)। Fam. Convolvulaceae (कन्वोल्व्युलेसी)। गु०-हनुमानवेल। (ख) Atropa mandragora (एट्रोपा मेण्ड्रागोरा)। Fam. Atropaceae (एट्रोपेसी)। संभवतः इस वनस्पति का उचित नाम Mandragora autumnalis Spreng; Fam. Solanaceae (मॅण्ड्रागोरा ऑटम्नॅलिस् स्प्रे.; सोलेनेसी) है। (ग) Smithia geminiflora Roth (स्मिथिया जेमिनिफ्लोरा रॉथ)। Fam. Legumin osae (लेग्युमिनोसी)। (घ) Biophytum sensitivum (Linn.) DC. (बायोफाइटम् सेन्सिटिव्हम् डीसी.)। Fam. Geraniaceae (जिरॅनिएसी)। अथ स्वर्णवल्ली (सोनबेल) । तस्या नामगुणानाह स्वर्णवल्लीरक्तफला काकायुः काकवल्लरी । स्वर्णवल्ली शिरःपीडां त्रिदोषान्हन्ति दुग्धदा ।।१४९।। 'सोनबेल' के नाम तथा गुण—स्वर्णवल्ली, रक्तफला, काकायु और काकवल्लरी ये सब संस्कृत नाम 'सोनबेल' के हैं। सोनबेल—शिर की पीड़ा तथा त्रिदोष को दूर करती है एवं दूध को बढ़ाने वाली होती है। [१४९] ७४. स्वर्णवल्ली 'स्वर्णवल्ली' की लता कैसी होती है, इस सम्बन्ध में कोई वर्णन अन्य ग्रन्थों में नहीं मिलता। रक्तफला विशेषण के उल्लेख के कारण आकाशवल्ली इसका पर्याय नहीं हो सकता। इसके अतिरिक्त आकाशवल्ली का स्वतन्त्र रूप में भी भावप्रकाशकार ने इसी वर्ग में वर्णन किया है। प्राचीन ग्रन्थों में भी स्वर्णवल्ली का स्वतन्त्र रूप में कोई विशिष्ट प्रयोग वर्णित नहीं है। इसीलिये व्यवहार में भी इसका शुद्ध या व्यामिश्रित रूप उपलब्ध नहीं है। अथ कार्पासी (कपास) । तस्या नामगुणानाह कार्पासी तुण्डकेशी च समुद्रान्ता च कथ्यते । कार्पासकी लघु कोष्णा मधुरा वातनाशिनी ।।१५०।। 'कपास' के नाम तथा गुण—कार्पासी, तुण्डकेशी और समुद्रान्ता ये सब नाम 'कपास' के हैं। कपास—लघु, किञ्चित् उष्णवीर्य, मधुर तथा वातनाशक होता है। [१५०] अथ तत्पत्रबीजयोर्गुणानाह तत्पलाशं समीरघ्नं रक्तकृन्मूत्रवर्द्धनम् । तत्कर्णपिडकानादपूयास्रावविनाशनम् ।।१५१।। तद्बीजं स्तन्यदं वृष्यं स्निग्धं कफकरं गुरु ।।१५२।।
५४४ भावप्रकाशनिघण्टुः इसके पत्ते तथा बीजों के गुण-कपास के पत्ते-वायुनाशक, रक्त तथा मूत्रवर्धक होते हैं एवम् कर्णपिडका (कान की फुन्सी), कर्णनाद (कान में शब्द होना) और कर्णपूयास्राव (कान से पीव का आना) इन सबको नाश करने वाले होते हैं। कपास के बीज-दुग्धवर्धक, वृष्य (वीर्यवर्धक), स्निग्ध, कफकारक तथा पाक में गुरु होते हैं। [१५१-१५२] ७५. कपास हिं०-कपास, रूई। म०-कापसी, कापूस। गु०-बोण, कपास। बं०-कार्पास, तुला। ते०-पत्तिचेट्टु, कार्पासमु। क०-हत्ति। ता०-परुक्ति। फा०-पंबः। अ०-नवातुलकुल। अं०-Cotton Plant (कॉटन प्लॅण्ट), Indian Cotton (इण्डियन कॉटन)। ले०-Gossypium herbaceum Linn. (गॉसिपिअम् हर्बेंसिअम् लिन.); Fam. Malvaceae (मालवेसी)। कपास के बीज के नाम-हि०-बिनौला। म०-सरकी। गु०-कपासिया। मा०-कांकड़ा। अ०-हब्बुलकुत्न। फा०-पंबः दाना। कपास या रूई यह सुप्रसिद्ध द्रव्य है। भारतवर्ष के अनेक भागों में बहुलता से इसकी खेती की जाती है। मिस्र, अमेरिका तथा संसार के अन्य उष्ण प्रदेशों में भी इसकी खेती की जाती है। यह गुल्म जाति की वनस्पति ४-५ फीट तक ऊँची होती है। इसके पत्ते-हाथ के पंजे के समान कई भागों में विभक्त रहते हैं। प्रायः ३ से ७ भाग तक देखने में आते हैं। फूल-घंटाकार पीले रंग के होते हैं, उनके बीच का हिस्सा बैंगनी रंग का होता है। फल-डोडी या फल गोलाकार होता है तथा उसके भीतर सफेद रूई से लिपटे हुये ५-७ बीज होते हैं। बीज-किंचित् काले रंग के, चने के समान गोल होते हैं और उनके भीतर सफेद मज्जा होती है। जड़-बाहर से पीले रंग की तथा अन्दर से सफेद होती है। जड़ की छाल गंधयुक्त, पतली, चिमड़, रेशेदार, धारीदार एवं करीब १ फीट तक लम्बी होती है। छाल का स्वाद कुछ तीता एवं कषाय होता है। प्रतिवर्ष प्रायः चौमासे के आरम्भ में खेतों में बीजों का रोपण करते हैं और फाल्गुन-चैत में रूई संग्रह कर पौधे को काट कर खेत साफ कर देते हैं। जाति-इसकी निम्नलिखित अन्य जातियाँ भी पाई जाती हैं। देशभेद से भी यह अनेक प्रकार का होता है। उद्यान कार्पास-सं०-उद्यानकार्पास। हिं०-नर्मा। म०-देवकापसीण। गु०-हिरवणी। पं०-कपास। संता०- बुदिकरकोम। ले०-Gossypium arboreum Linn. (गॉसिपिअम् आर्बोरिअम् लिन.)। यह एक प्रकार की कपास होती है, जिसका बागों में रोपण करते हैं। इसके पौधे-बहुवर्षायु, ८-१० फीट तक ऊँचे होते हैं। पत्ते और फल भी कुछ बड़े होते हैं तथा फूल लाल रंग के होते हैं। अरण्य कार्पासी-सं०-भारद्वाजी (च० सू० अ० ४, रा० नि०)। हिं०-जंगली कपास, वनकपासी। म०- रानकापूस। ले०-Thespesia lampas Dalz & Gibs (थेस्पेसिआ लॅम्पस् डा., गि.)। यह जाति जंगलों में स्वयं उत्पन्न होती है। इसके क्षुप-झाड़ीदार, दृढ़ तथा ४-६ फीट ऊँचे होते हैं। पत्ते- करतलाकार, ३ खण्डयुक्त या अखण्ड एवं व्यास में ४-५ इञ्च होते हैं। फूल-पीले रंग के तथा मध्य में प्रायः लाल रंग के होते हैं। इसकी रूई कुछ पीताभ होती है। रासायनिक संगठन-कपास की जड़ की छाल में एक रंगहीन या पीताभ अम्ल राल ८% तक पाई जाती है जो आक्सीजन के संयोग से चमकीले रक्ताभ भूरे रंग की हो जाती है। इसके अतिरिक्त इसमें डिहाइड्रोक्सि बेञ्जोइक एसिड (Dihydroxy benzoic acid), सॅलिसिलिक् एसिड (Salicylic acid), स्नेहाम्ल, बिटेन (Betaine), सेरिल ॲल्कोहोल् (Ceryl alcohol), फाइटोस्टेरॉल् (Phytosterol), शर्करा एवं फेनॉल के सदृश दो पदार्थ पाये जाते हैं। बीजों में १०-२९% हलके पीले रंग का गन्धहीन तथा स्वादहीन तैल पाया जाता है जिसमें गिलसराइड्स, स्नेहाम्ल, CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
गुडूच्यादिवर्गः ५४५ फॉस्फोलिपिन् (Phospholipin), फाइटोस्टेरॉल् (Phytosterols) तथा रंजक द्रव्य पाये जाते हैं। तैल के फेनॉलयुक्त भाग से एक सुनहले वर्ण का गॉसिपॉल् (Gossypol) नामक विषैला रवेदार पदार्थ पाया जाता है जो जल में नहीं घुलता किन्तु मद्यसार आदि अन्य द्रवों में घुलता है। यह छाल में पाया जाता है। गुण और प्रयोग-कपास के बीज-स्तन्यजनन, स्नेहन, स्रंसन, श्लेष्म निःसारक, बल्य एवं नाडीसंस्थान के लिये पौष्टिक हैं। इसकी रुई उपशोषण तथा रक्षण है। पुष्प-उत्तेजक तथा सौमनस्यजनन हैं। कोमल पत्ते-स्नेहन तथा मूत्रजनन हैं। तैल-स्नेहन, पौष्टिक तथा अधिक मात्रा में स्निग्ध विरेचक है। इसकी जड़ की छाल गर्भाशयसंकोचक एवं आर्तवजनन है। गर्भाशय पर इसकी क्रिया अर्गट (Ergot) की तरह होती है। इससे गर्भाशय का अच्छी तरह संकोच होकर रक्तस्राव रुकता है। इसकी अधिक मात्रा से गर्भपात होता है। (१) प्रसव के बाद इसकी छाल का क्वाथ पिलाने से गर्भाशय का संकोच होता हैज यह आँवल (अपरा) गिरने के बाद पिलाना चाहिए। यदि आधे घण्टे में गर्भाशय संकुचित होकर गेंद की तरह न मालूम पड़े तथा नाड़ी की गति तेज हो तो फिर दुबारा इसे देना चाहिये। पीडितार्तव तथा शीत से उत्पन्न आनार्तव में छाल के क्वाथ से लाभ होता है। श्वेत प्रदर में इसकी जड़ को चावल के धोवन के साथ देते हैं। (२) प्रसूता को दुग्ध वृद्धि के लिये बीजों की पेया बनाकर देते हैं। बीजों की चाय प्रवाहिका में उपयोगी है। शीतज्वर में ज्वर के पूर्व इसका क्वाथ पिलाते हैं। (३) इसके पुष्पों का शरवत उदासीनता-प्रधान मानसिक रोगों (Hypochondriasis) में पिलाते हैं। (४) घाव में रुई जलाकर भरने से रक्तस्राव रुकता है तथा घाव जल्दी अच्छा होता है। रुई का उपयोग शीत से रक्षा, उष्णता पहुँचाने तथा व्रण संरक्षण के लिये करते हैं। (५) इसके कोमल पत्तों का रस आमातिसार में देते हैं। मात्रा-मूलत्वक २-४ माशा; बीजचूर्ण ३-६ माशा। वनकपासी १-इसका उपयोग कपास की तरह ही किया जाता है। इसकी जड़ तथा फल सोजाक में देते हैं। नर्मा-इसमें कपास की अपेक्षा स्निग्धता अधिक रहने के कारण इसके पत्ते तथा जड़ का लेपों में अधिक उपयोग करते हैं। मूत्रकृच्छ्र में पत्तों को दूध में पीसकर पिलाते हैं। अथ वंशः (बांस) । तस्य नामगुणानाह वंशस्त्वक्सारकर्मारत्वचिसारतृणध्वजाः । शतपर्वा यवफलो वेणुमस्करतेजनाः ।। १५३ ।। वंशः सरो हिमः स्वादुः कषायो बस्तिशोधनः । छेदनः कफपित्तघ्नः कुष्ठास्रव्रणशोथजित् ।। १५४ ।। 'बाँस' के नाम तथा गुण-वंश, त्वक्सार, कर्मार, त्वचिसार, तृणध्वज, शतपर्वा, यवफल, वेणु, मस्कर और तेजन ये सब नाम 'बाँस' के हैं। बाँस-सारक, शीतवीर्य, स्वादिष्ट, कषायरसयुक्त, बस्तिशोधक, छेदक, कफपित्तनाशक एवं कुष्ठ, रक्तविकार, व्रण तथा शोथ इन सबको दूर करने वाला होता है। [१५३-१५४] अथ वंशस्य करीरयवयोर्गुणानाह तत्करीरः कटुः पाके रसे रूक्षो गुरुः सरः । कषायः कफकृत्स्वादुर्विदाही वातपित्तलः ।। १५५ ।। तद्यवास्तु सरा रूक्षाः कषायाः कटुपाकिनः । वातपित्तकरा उष्णा बद्धमूत्राः कफापहाः ।। १५६ ।। १. भारद्वाजी हिमा रुच्या व्रणशस्त्रक्षतापहा। (रा. नि.)। ३८ भाव. I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA