भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुडूच्यादिवर्गः ५४५ फॉस्फोलिपिन् (Phospholipin), फाइटोस्टेरॉल् (Phytosterols) तथा रंजक द्रव्य पाये जाते हैं। तैल के फेनॉलयुक्त भाग से एक सुनहले वर्ण का गॉसिपॉल् (Gossypol) नामक विषैला रवेदार पदार्थ पाया जाता है जो जल में नहीं घुलता किन्तु मद्यसार आदि अन्य द्रवों में घुलता है। यह छाल में पाया जाता है। गुण और प्रयोग-कपास के बीज-स्तन्यजनन, स्नेहन, स्रंसन, श्लेष्म निःसारक, बल्य एवं नाडीसंस्थान के लिये पौष्टिक हैं। इसकी रुई उपशोषण तथा रक्षण है। पुष्प-उत्तेजक तथा सौमनस्यजनन हैं। कोमल पत्ते-स्नेहन तथा मूत्रजनन हैं। तैल-स्नेहन, पौष्टिक तथा अधिक मात्रा में स्निग्ध विरेचक है। इसकी जड़ की छाल गर्भाशयसंकोचक एवं आर्तवजनन है। गर्भाशय पर इसकी क्रिया अर्गट (Ergot) की तरह होती है। इससे गर्भाशय का अच्छी तरह संकोच होकर रक्तस्राव रुकता है। इसकी अधिक मात्रा से गर्भपात होता है। (१) प्रसव के बाद इसकी छाल का क्वाथ पिलाने से गर्भाशय का संकोच होता हैज यह आँवल (अपरा) गिरने के बाद पिलाना चाहिए। यदि आधे घण्टे में गर्भाशय संकुचित होकर गेंद की तरह न मालूम पड़े तथा नाड़ी की गति तेज हो तो फिर दुबारा इसे देना चाहिये। पीडितार्तव तथा शीत से उत्पन्न आनार्तव में छाल के क्वाथ से लाभ होता है। श्वेत प्रदर में इसकी जड़ को चावल के धोवन के साथ देते हैं। (२) प्रसूता को दुग्ध वृद्धि के लिये बीजों की पेया बनाकर देते हैं। बीजों की चाय प्रवाहिका में उपयोगी है। शीतज्वर में ज्वर के पूर्व इसका क्वाथ पिलाते हैं। (३) इसके पुष्पों का शरवत उदासीनता-प्रधान मानसिक रोगों (Hypochondriasis) में पिलाते हैं। (४) घाव में रुई जलाकर भरने से रक्तस्राव रुकता है तथा घाव जल्दी अच्छा होता है। रुई का उपयोग शीत से रक्षा, उष्णता पहुँचाने तथा व्रण संरक्षण के लिये करते हैं। (५) इसके कोमल पत्तों का रस आमातिसार में देते हैं। मात्रा-मूलत्वक २-४ माशा; बीजचूर्ण ३-६ माशा। वनकपासी १-इसका उपयोग कपास की तरह ही किया जाता है। इसकी जड़ तथा फल सोजाक में देते हैं। नर्मा-इसमें कपास की अपेक्षा स्निग्धता अधिक रहने के कारण इसके पत्ते तथा जड़ का लेपों में अधिक उपयोग करते हैं। मूत्रकृच्छ्र में पत्तों को दूध में पीसकर पिलाते हैं। अथ वंशः (बांस) । तस्य नामगुणानाह वंशस्त्वक्सारकर्मारत्वचिसारतृणध्वजाः । शतपर्वा यवफलो वेणुमस्करतेजनाः ।। १५३ ।। वंशः सरो हिमः स्वादुः कषायो बस्तिशोधनः । छेदनः कफपित्तघ्नः कुष्ठास्रव्रणशोथजित् ।। १५४ ।। 'बाँस' के नाम तथा गुण-वंश, त्वक्सार, कर्मार, त्वचिसार, तृणध्वज, शतपर्वा, यवफल, वेणु, मस्कर और तेजन ये सब नाम 'बाँस' के हैं। बाँस-सारक, शीतवीर्य, स्वादिष्ट, कषायरसयुक्त, बस्तिशोधक, छेदक, कफपित्तनाशक एवं कुष्ठ, रक्तविकार, व्रण तथा शोथ इन सबको दूर करने वाला होता है। [१५३-१५४] अथ वंशस्य करीरयवयोर्गुणानाह तत्करीरः कटुः पाके रसे रूक्षो गुरुः सरः । कषायः कफकृत्स्वादुर्विदाही वातपित्तलः ।। १५५ ।। तद्यवास्तु सरा रूक्षाः कषायाः कटुपाकिनः । वातपित्तकरा उष्णा बद्धमूत्राः कफापहाः ।। १५६ ।। १. भारद्वाजी हिमा रुच्या व्रणशस्त्रक्षतापहा। (रा. नि.)। ३८ भाव. I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA