भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४६ भावप्रकाशनिघण्टुः 'बाँस' के अङ्कुर तथा यव (चावल) के गुण-बाँस का अङ्कुर-पाक में कटु रसयुक्त, रूक्ष, गुरु, सारक, कटु तथा कषायरसयुक्त, कफकारक, स्वादिष्ट, दाहजनक एवं वात-पित्त को उत्पन्न करने वाला होता है। बांस के यव (चावल)-सारक, रूक्ष, कषायरसयुक्त, पाक में कटुरसयुक्त, वातपित्तकारक, उष्णवीर्य, मूत्ररोधक तथा कफनाशक होते हैं। [१५५-१५६] ७६. बाँस हिं०-बाँस। गु०-बाँस। म०-बांबू। बं०-बाँश। ते०-बेदरू, बोंगा। ता०-मुंगिल। कोल०-कटंगा। मा०-बांव। सन्ताल०-माट। अ०-कसब। अं०-Bamboo (बांबू)। ले०-Bambusa arundinacea Willd. (बांबुसा अरुण्डिनेसिया विल्ड)। Fam. Gramineae (ग्रैमिनी)। बाँस इस देश के प्रायः सब प्रान्तों में उत्पन्न किया जाता है और छोटी-छोटी पहाड़ियों के आस-पास आप ही आप जंगली भी उत्पन्न होता है। छोटे, बड़े, मोटे, पतले, ठोस और पोले इन भेदों से बांस कई प्रकार का होता है। इसकी ऊँचाई ३०-४० फीट से १०० फीट तक होती है और मोटाई ३-४ से १२-१६ इञ्च तक होती है। इसके पत्ते-१- १॥ इञ्च चौड़े और ५-६ इञ्च तक लम्बे होते हैं। प्रायः बाँस का वृक्ष पुराना होने पर फूलता-फलता है और कोई-कोई बाँस अवधि के पूर्व ही फूलने-फलने लगता है। इसके फूल-छोटे-छोटे सफेद होते हैं और फल-जइ के आकार के दिखाई पड़ते हैं। इसको वेणुबीज कहते हैं। इसकी कई अन्य जातियाँ होती हैं। बाँस के संबंध में शेष वर्णन वंशलोन के साथ पृष्ठ ? पर किया गया है। अथ नलः (नरसल) तस्य नामगुणानाह नलः पोटगलः शून्यमध्यश्च धमनस्तथा। नलस्तु मधुरस्तिक्तः कषायः कफरक्तजित्। उष्णो हृद्बस्तियोन्यर्त्तिदाहपित्तविसर्पहृत् ।।१५७।। 'नरसल' के नाम तथा गुण-नल, पोटगल, शून्यमध्य और धमन ये सब नाम 'नरसल' के हैं। नरसल- मधुर, तिक्त तथा कषायरसयुक्त और उष्णवीर्य होता है, एवम् कफ, रक्तविकार, हृदय, बस्ति तथा योनि सम्बन्धी पीड़ा, दाह, पित्त और विसर्प को दूर करने वाला होता है। [१५७] नोट-नल के सम्बन्ध में जो वर्णन निघंटुओं में मिलता है उससे कुछ भ्रम उत्पन्न होता है। भावप्रकाशकार नल का एक ही भेद लिखते हैं तथा इन्होंने इसे उष्णवीर्य लिखा है किन्तु इसको पित्तविकार, कफविकार, रक्तदोष एवं विसर्प इत्यादि में लाभदायक माना है। रा० नि० तथा ध० नि० में नल एवं महानल (देवनाल) ये दो भेद मिलते हैं जिनमें से नल को शीतवीर्य एवं रक्तपित्तहर माना है तथा महानल को अधिक वीर्यशाली एवं रसक्रिया में उपयोगी लिखा है। नल के जो प्रयोग सुश्रुत-चरकादि में मिलते हैं उनसे ऐसा मालूम होता है कि यह शीतवीर्य है तथा पित्त विकार, विसर्प, मूत्रविकार आदि में उपयोगी है। उन प्रयोगों में इसके साथ कुश, दूर्वा आदि पित्तशामक एवं मूत्रजनक इसी प्रकार के द्रव्यों का उल्लेख है जिससे ऐसा अनुमान होता है कि नल भी इन्हीं के वर्ग का द्रव्य है। कुछ आधुनिक ग्रन्थकारों ने ग्रेमिनी (Gramineae) वर्ग के फ्रैग्माइटीज कर्का (Phragmites kirka) को नल माना है। इसी वर्ग में कुश, दूर्बा आदि द्रव्य भी आते हैं। कुछ अन्य आधुनिक विद्वानों ने नल को लोबेलिआ निकोटिआनफोलिआ (Lobelia nicotianaefolia) माना है जो कम्पैनुलेसी (Campanulaceae) वर्ग का है तथा जिसका पाश्चात्य चिकित्सा में कफनिःसारक रूप में तमकश्वास के लिये प्रयोग किया जाता है। यह विषैला द्रव्य है। नल के परिचय में कहीं पर 'वंशपत्रो मृदुच्छदः। छिद्रांत्रो नर्तको रन्ध्री मृत्युपुष्पो विभीषणः' यह भी श्लोक मिलता है जो उपर्युक्त लोबेलिया के लिये अधिक उचित मालूम पड़ता है। भावप्रकाशकार भी नल को उष्ण एवं कफहर मानते हैं किन्तु इन्होंने भी इसका वर्णन कुश, कास, दूर्बा आदि के साथ किया है अतः नल के ग्रैमिनी वर्ग के फ्रैग्माइटीज कर्का होने की संभावना भी कम नहीं है। स्वरूप की दृष्टि से दोनों CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA