भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 598, कुल 1167 में से

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गुडूच्यादिवर्गः ५४७ द्रव्यों में पर्याप्त साम्यता पाई जाती है। लोबेलिआ दक्षिण की तरफ ही प्राप्त होता है। यहाँ पर दोनों द्रव्यों का अलग- अलग वर्णन किया गया है। ७७. नरकट हिं०-नरकट । म०-नल । गु०-नाली, नाइरी । कोल०-जंकई । ले०-Phrag-mites kirka Trin. (फ्रॅग्माइटीज कर्का ट्रिन.) । Fam. Gramineae (ग्रॅमिनी) । यह दलदलों या नदियों के किनारे होता है। इसका पौधा-१०-२० फीट ऊँचा तथा बाँस की तरह दिखलाई देता है। इसके कांड के पर्व पीले तथा छोटे होते हैं। लम्बे भूमिशायी कांडों द्वारा ये शीघ्र अपनी संख्या-वृद्धि करते हैं। पत्ते-कड़े, सीधे, खड़े, १-२ फीट लम्बे एवं १ से १ १/२ इञ्च चौड़े होते हैं। पुष्पव्यूह की छोटी दण्डिकायें धूसर या भूरे रंग की होती हैं। इसका एक अन्य भेद अरुण्डों डोर्नैक्स लिन. (Arundo donax Linn.) भी पाया जाता है जो ६-१२ फीट ऊँचा होता है। इसके मूल का क्वाथ स्नेहन, मूत्रल, आर्तवजनन एवं दुग्ध कम करने वाला है। इसमें ग्रेमाइन (Gramine, C₁₁ H₁₄ N₂) तथा डोनेक्सेराइन (Donaxarine, C₁₅ H₁₆ O₂ N₂) नामक दो क्षाराम पाये जाते हैं जिनमें से प्रथम की अल्पमात्रा से कुत्ते में रक्त दबाव बढ़ता है किन्तु अधिक मात्रा से कम हो जाता है। ७८. नरसल, देवनल हिं०-नरसल, नल । म०-देवनल, बोकेनल, ढवनल, नल । बं०-बड़ानल । क०-काडहोगे सोप्पु । ता०- काट्टुपुगैयिलै । कच्छ०-आँची । गु०-नाली । ते०-अडवियोगाकु । अं०-Wild tobacco (वाइल्ड टोबॅको); Lobelia (लोबेलिआ) । ले०-Lobelia nicotianaefolia Heyne. (लोबेलिआ निकोटिआनिफोलिआ हेन्.) । Fam. Lobeliaceae (लोबेलियेसी) । यह पश्चिमी घाट में बम्बई से त्रावनकोर तक २-७ हजार फीट की ऊँचाई तक, कोंकण, माथेराज, दक्षिण, महाराष्ट्र का दक्षिण प्रदेश, नीलगिरी, मलाबार तथा मैसूर में पाया जाता है। इसका क्षुप-५-१२ फीट ऊँचा, द्विवर्षायु या बहुवर्षायु होता है। काण्ड-ऊपर की तरफ पोला तथा ऊपर की ओर इससे शाखाएँ निकली रहती हैं। पत्ते-तंबाकू की तरह, संख्या में बहुत, हलके हरे रंग के, छोटे पर्णवृन्त से युक्त, नीचे के १२ × २ इञ्च बड़े तथा ऊपर के क्रमशः छोटे, भालाकार, महीन दाँतों से युक्त एवं मृदुरोमश होते हैं। पुष्प- जामुनी आभायुक्त, श्वेत वर्ण के, १ फीट तक लम्बी मंजरियों में आते हैं। फल-८ मि० मि० व्यास के गोल सामान्य स्फोटिफल होते हैं। बीज-बहुत छोटे, अंडाकार, दबे हुये, पीताभ भूरे रंग के तथा स्वाद में अत्यन्त तीते होते हैं। इसके पुष्पदंड पर एक गाढ़ा, पीले रंग का स्राव जमा हुआ पाया जाता है। इसमें एक प्रकार की अप्रिय गंध होती है। इसके वायवीय भाग को अक्तूबर तथा नवम्बर में तोड़कर छाया में सुखाकर उपयोग में लाया जाता है। सूखे हुए पौधे पर राल की तरह एक पदार्थ लगा रहता है तथा इसका स्वाद उष्ण एवं तीता होता है। इसकी धूल से नाक तथा गले में तंबाकू की तरह प्रक्षोभ होता है। इसकी नली से बन्सी बनाई जाती है जिसे कोंकण में पावा कहते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें मुख्यतया लोबेलीन (Lobeline, C₂₂ H₂₇ O₂ N) नामक एक क्षाराम पाया जाता है। गुण और प्रयोग-लोबेलीन की क्रिया बहुत कुछ तंबाकू में पाये जाने वाले निकोटिन (Nicotine) की तरह होती है। इससे हल्लास उत्पन्न होकर कफ निकलता है। पाश्चात्य चिकित्सा में उद्वेष्टनयुक्त श्वसनिकाशोथ (Bronchitis) के लिए इसका बहुत उपयोग किया जाता है। तमकश्वास (Asthma) में आवेग के समय तथा बाद में भी इसके टिंक्चर

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