भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 599, कुल 1167 में से

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५४८ भावप्रकाशनिघण्टुः का १० बूँद दिन में ३ बार अन्य औषधियों के साथ उपयोग किया जाता है। उद्वेष्टनयुक्त कास में भी इससे लाभ होता है। इसके श्वसनकेन्द्र को उत्तेजित करने के कारण फुफ्फुसपाक तथा कार्बन मॉन् आक्साइड एवं मॉफोन की विषाक्तता में इसका उत्तेजक रूप में प्रयोग करते हैं। इसकी फली या पत्तों को थोड़ी देर चबाने से चक्कर, शिरःशूल, कंप एवं अन्त में हल्लास, प्रस्वेद तथा शिथिलता उत्पन्न होती है। विष प्रभाव—अधिक मात्रा से उपर्युक्त लक्षण अत्यंत तीव्र होते हैं तथा साथ में गले में जलन, ऐच्छिक क्रियाओं का धीरे-धीरे ह्रास, तीव्र तथा कमजोर नाड़ी, शैत्य, निपात एवं मूर्च्छा या संन्यास होता है। कुछ में मृत्यु के पूर्व आक्षेप होते हैं। मृत्यु श्वसन के रुकने से होती है। ५-८ र० पत्रचूर्ण या बीज से तीव्र वमन होता है तथा ४ माशे (१ ड्राम) पत्रचूर्ण से मृत्यु हुई है। इसका विषैला परिणाम इसके प्रयोग के पश्चात् कभी-कभी वमन के द्वारा ओषधि न निकलने के कारण होता है। मात्रा—चूर्ण ½-१ ½ र०; टिंक्चर लोबेलिआ इथेरिआ ५-१५ बूँद। प्रतिनिधि एवं व्यामिश्रण—(१) लोबेलिआ एक्सेलसा (Lobelia excelsa Lesch.) का इसके प्रतिनिधि के रूप में व्यवहार किया जाता है। यह इसी की तरह होता है किन्तु इसमें मुलायम रोमयुक्त मोटे पत्र होते हैं तथा मंजरी बैंगनी आभायुक्त हलके पीताभ रंग के घने पुष्पों से युक्त होती हैं। इसके परागाशय (Anther) पृष्ठ भाग पर चिकने होते हैं। (२) लोबेलिआ इन्फ्लेटा लिन. (Lobelia inflata Linn.) का पाश्चात्य चिकित्सा में प्रयोग किया जाता है जो अमेरिका में उत्पन्न होता है। (३) ह॒र्बस्कम् थॅप्सस लिन. (Verbascum thapus Linn.); Fam. Scro-phularia (स्क्रोप्युलेरिएसी) तथा कम्पोज़िटी वर्ग के पौधों की कभी-कभी इसमें मिलावट रहती है।

अथ भद्रमुञ्जः (रामशर-सरपत इति वा) मुञ्जश्च (मूंज)। तयोर्नामगुणानाह

भद्रमुञ्जः शरो बाणस्तेजनश्चेक्षुवेष्टनः ।।१५८।। मुञ्जो मुञ्जातको बाणः स्थूलदर्भः सुमेखलः। मुञ्जद्वयन्तु मधुरं तुवरं शिशिरं तथा ।।१५९।। दाहतृष्णाविसर्पास्रमूत्रकृच्छ्राक्षिरोगजित् । दोषत्रयहरं वृष्यं मेखलासूपयुज्यते ।।१६०।। 'सरपत' तथा 'मूँज' के नाम और गुण—भद्रमुञ्ज, शर, बाण, तेजन और इक्षुवेष्टन ये सब नाम 'सरपत' के हैं। मुञ्ज, मुञ्जातक, बाण, स्थूलदर्भ और सुमेखल ये सब नाम 'मूंज' के हैं। उक्त दोनों प्रकार के मूञ्ज—मधुर, कषाय रसयुक्त, शीतवीर्य और वृष्य होते हैं एवं दाह, तृषा, विसर्प, रक्तविकार, मूत्रकृच्छ्र, नेत्ररोग तथा त्रिदोष को दूर करनेवाले होते हैं और 'मेखला' बनाने में इनका उपयोग होता है। [१५८-१६०]

७९ भद्रमुञ्ज

हिं०—भद्रमुञ्ज, रामसर, सरपत, कंडा। क०—रामसपु, सरगोलु। सन्ताल०—सर। ते०—वेल्लुपोनिक। सिन्ध०— सर। बं०—शर। म०—शर। पं०—करकाना। गु०—तीरकांस। ले०—Sacharum munja Roxb. (सकेरम् मुंज राक्स.)। Fam. Gramineae (ग्रैमिनी)। भद्रमुञ्ज—यह उत्तर भारत, पंजाब तथा गंगा के ऊपरी मैदान में उत्पन्न होता है।

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