भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुडूच्यादिवर्गः ५४९ यह तृणजाति की बहुवर्षायु वनस्पति प्रायः नदियों के किनारे गुच्छों में उगती है। यह १२ से १८ फीट तक ऊँचा होता है। पत्ते-बहुत पतले-पतले, ५-७ फीट लम्बे, ।।।-१ इञ्च चौड़े तथा तीक्ष्णाग्र होते हैं। डंठल के अन्त में पीताभ सफेद से रक्ताभ बैंगनी बारीक फूलों का धनहरा लगता है। इसके कांड, पत्र तथा पत्रकोषों से निकाले रेशे काम में लिये जाते हैं। इसकी एक और जाति होती है जिसे मूँज कहा जाता है जो आकार प्रकार में छोटी होती है। शर तथा मूंज की जड़ का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। गुण और प्रयोग-यह शीतल, तृष्णानिग्राहक, मूत्रल एवं वृष्य है। व्रण में तथा प्रसूता के कमरे में इसकी जड़ से धूपन किया जाता है। मात्रा-मूल ३-६ माशा। अथ कासः । तस्य नामगुणानाह कासः कासेक्षुरुद्दिष्टः सस्यादिक्षुरसस्तथा । इक्ष्वालिकेक्षुगन्धा च तथा पोटगलः स्मृतः ।। १६१ ।। कासः स्यान्मधुरस्तिक्तः स्वादुपाको हिमः सरः । मूत्रकृच्छ्राश्मदाहास्रक्षयपित्तजरोगजित् ।। १६२ ।। 'कास' के नाम तथा गुण-कास, कासेक्षु, इक्षुरस, इक्ष्वालिका, इक्षुगन्धा तथा पोटगल ये सब नाम कास के हैं। कास-मधुर तथा तिक्तरसयुक्त, विपाक में मधुर, शीतवीर्य और सारक होता है एवं मूत्रकृच्छ्र, अश्मरी (पथरी), दाह, रक्तविकार, क्षय तथा पित्त सम्बन्धी रोग को दूर करता है। [१६१-१६२] ८०. कास हिं०-कास, कासी, कांस घास। बं०-केशे। म०-कसई। गु०-कांसडो। क०-किरियिकागच्छ, कासलु। ते०-रेलु। ता०-नाणलू। मा०-कास। अं०-Thactch grass (थैंच ग्रास)। अं०-Saccharum spontaneum Linn. (सॅकेरम् स्पॉण्टेनियम् लिन.) । Fam. Gramineae (ग्रैमिनी) । यह सभी प्रान्तों में उत्पन्न होता है। कास तृणजातीय वनस्पति प्रायः नदियों के किनारे तथा दलदलों के आस-पास अधिक देखने में आती है। इसके पौधे ५-७ फीट (कभी-कभी १८ फीट तक) ऊँचे होते हैं। काण्ड ठोस होते हैं। पत्ते-१-२ ।। फीट लम्बे, बहुत कम चौड़े (१/८-१/४ इञ्च) तथा उनके किनारे मुड़े हुये होते हैं। पुष्पदण्ड-।।।-२ फीट लम्बा होता है जिस पर श्वेत वर्ण के पुष्प गुच्छों में आते हैं। शरदऋतु में ये पुष्पित होते हैं तथा शीत ऋतु में फलते हैं। इसका प्रायः छप्पर और टट्टी बनाने में उपयोग किया जाता है। इसके मूल का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। गुण और प्रयोग-इसकी जड़ स्तन्यजनन एवं मूत्रल है। इसका उपयोग मूत्रकृच्छ्र, अश्मरी, रक्तार्श, रक्तप्रदर एवं कपोत, पारावत आदि के मांस के खाने से उत्पन्न अजीर्ण में किया जाता है। मात्रा-मूल ३-६ माशा। अथ गुन्द्रः (पटेर-गोंदपटेर इति च) । तस्य नामगुणानाह गुन्द्रः पटेरको गुल्मः शृङ्गवेराभमूलकः। गुन्द्रः कषायो मधुरः शिशिरः पित्तरक्तजित् । स्तन्यशुक्ररजोमूत्रशोधनो मूत्रकृच्छ्रहृत् ।। १६३ ।। गोंद पटेर के नाम तथा गुण--गुन्द्र, पटेरक, गुल्म और शृङ्गवेराभमूलक ये सब नाम 'गोंदपटेर' के हैं। गोंद पटेर-कषाय तथा मधुर रसयुक्त, शीतवीर्य, रक्तपित्त एवं मूत्रकृच्छ्र को दूर करनेवाला एवं दूध, शुक्र, रज और मूत्र का शोधन करनेवाला होता है। [१६३] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA