भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५५० भावप्रकाशनिघण्टुः ८१. गोंद पटेर (गुन्द्र) हिं०-पटेर, गोंदपटेर । म०-रामबाण । ले०-Typha angustata Bory & Chaub. (टाइफा अँग्स्टेटा, वो., चौ.)। Fam. Typhaceae (टाइफेसी) । नोट-आगे वर्णित एरका और गोंदपटेर एक ही जाति की वनस्पतियाँ हैं। इनका वर्णन आगे एक साथ ही किया गया है। अथैरका (मोथीतृणविशेषः) । तस्या नामगुणानाह एरका गुन्द्रमूला च शिविर्गुन्द्रा शरीति च । एरका शिशिरा वृष्या चक्षुष्या वातकोपिनी । मूत्रकृच्छ्राश्मरीदाहपित्तशोणितनाशिनी ॥१६४॥ 'एरका' के नाम तथा गुण-एरका, गुन्द्रमूला, शिबि, गुन्द्रा और शरी ये सब पर्यायवाची शब्द हैं। एरका- शीतवीर्य, वृष्य, नेत्रों के लिये हितकर, वात को कुपित करने वाली एवं मूत्रकृच्छ्र, अश्मरी, दाह, पित्त तथा रक्तविकार को दूर करने वाली होती है। [१६४] ८२. एरका हिं०-एरका, पटेरा । बं०-होगला । म०-रामबाण । गु०-घाबाजरीयुं । अं०-Elephant grass (एलिफेण्ट ग्रास) । ले०-Typha elephantina Roxb. (टाइफा एलिफेण्टीना रा.) । Fam. Typhaceae (टाइफेसी) । एरका-पश्चिमोत्तर हिन्दुस्तान आसाम एवं दक्षिण तक के दलदलों में एवं सिंधु के डेल्टा में अधिक पाई जाती -है। यह दलदलों में उत्पन्न होने वाली तृणजातीय वनस्पति ६ से १२ फीट तक लम्बी होती है तथा यह समूहबद्ध होकर उगती है। पत्ते-मूलीय, ४-६ फीट लम्बे, पौन से डेढ़ इञ्च तक चौड़े और नतोदर होते हैं। इनकी धार अग्र की ओर लहरदार होती है। पुष्प-नारीपुष्पों की विदण्डिक मंजरियाँ ८-२० इञ्च लम्बी और भूरी नारंगी रंग की होती हैं। इन्हीं पुष्पदण्डों से ८-२२ इञ्च लम्बी नरपुष्पों की मंजरियाँ भी निकली रहती हैं। इसकी एक दूसरी जाति T. angustata (टाइफा अँग्स्टेटा) भी पाई जाती है। इनमें मुख्य भेद दोनों की पत्तियों में होता है। पहली जाति में कोषमय पत्राधार के ऊपर पत्ती का घेरा त्रिभुजाकार और दूसरी जाति में क्वचित् गोलाकार होता है। इनकी पत्तियों की चटाइयाँ बनती हैं। गुण और प्रयोग-यह शीतल, मूत्रल, ग्राही, वीर्यवर्धक, चक्षुष्य तथा अश्मरी, दाह एवं रक्तपित्तनाशक है। इसके पुष्पों को कूचकर व्रण पर बाँधने से व्रण जल्दी भर जाता है। मात्रा-३-६ माशा। अथ कुशः (कुशा) क्षुरपत्रश्च (डाभ) तयोर्नामानि गुणांश्चाह कुशो दर्भस्तथा बर्हिः सूच्यग्रो यज्ञभूषणः । ततोऽन्यो दीर्घपत्रः स्यात्क्षुरपत्रस्तथैव च ॥१६५॥ दर्भद्वयं त्रिदोषघ्नं मधुरं तुवरं हिमम् । मूत्रकृच्छ्राश्मरीतृष्णाबस्तिरुक्प्रदरास्रजित् ॥१६६॥ कुश तथा डाभ के नाम और गुण-कुश, दर्भ, बर्हि, सूच्यग्र और यज्ञभूषण ये सब 'कुशा' के नाम हैं और दीर्घपत्र एवं क्षुरपत्र ये दो नाम 'डाभ' के हैं। दर्भद्वय (उपर्युक्त कुशा तथा डाभ ये दोनों)-त्रिदोषनाशक, मधुर तथा कषायरसयुक्त, शीतल एवं मूत्रकृच्छ्र, अश्मरी (पथरी), तृषा, बस्तिसम्बन्धी रोग तथा रक्त प्रदर को दूर करने वाले होते हैं। [१६५-१६६] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA