भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुडूच्यादिवर्गः ५५१ ८३. कुश, दर्भ हिं०-कुशा, दाभ, कुस घास । म०-दर्स्न । बं-कुश । पं०-दभ, द्रभ । गु०-दाभडो, दरभ । क०-वीलीय, बुद्धशशी । ते०-कुश, दर्बालु । ता०-दर्भ । ले०-Eragrostis cynosuroides Beauv. (इरेग्रॉस्टिस् साइनोसुरोइडीस् बी.); Syn. Desmostachya bipinnata Stapf (डिस्मोस्टेचिआ बाइपिन्नॉटा स्टा.) । Fam. Gramineae (ग्रॉमिनी) । कुश-मूंझ की जाति की मूंझ से छोटी एक प्रकार की घास है । इसके पत्ते, काण्ड, धनहरा आदि मूंझ के ही आकार के परन्तु मूंझ से छोटे होते हैं । यह खुले हुए घास के मैदानों में सर्वत्र पाया जाता है । इसके पौधे मोटे, बहुवर्षायु, दृढ़ तथा १-३ फीट ऊँचे होते हैं । मूलस्तम्भ-सीधा खड़ा परन्तु बहुत गहराई तक होता है । पत्ते-१८ इञ्च तक लम्बे, .२ इञ्च चौड़े, अग्र पर काँटे की तरह तीक्ष्ण और पत्रतट सूक्ष्म रोमों के कारण तेज धार का होता है । पुष्पदण्ड-६-१८ इञ्च लम्बा तथा सीधा होता है । बीज-१/४ इञ्च लम्बे, अंडाकार तथा चपटे होते हैं । वर्षऋतु में पुष्प तथा शीतऋतु में फल लगते हैं । इसकी छोटी जाति को कुश तथा बड़ी जाति को दर्भ कहते हैं । दर्भ के पत्ते लम्बे तथा खर होते हैं । चरक सुश्रुत में कुश, काश तथा दर्भ इनका एक साथ अनेक स्थानों में प्रयोग आया है । डल्हण ने इन तीनों का परिचय इस प्रकार दिया है-कुशः ह्रस्वदर्भः । ह्रस्वो मृदुः सूचीपत्रः ।। कासः चामरपुष्पः चामरपत्रः ।। दर्भः पृथुलः खरपत्रः दीर्घः ।। रा० नि० ने इसका एक श्वेत दर्भ भेद लिखा है जिसे अधिक गुणकारी माना है । इनके मूल का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है । गुण और प्रयोग-कुश एवं दर्भ शीतल, मूत्रविरेचन, स्तन्यजनन एवं पिपासाहर है । प्रदर, आँव, दाह, रक्तार्श, अश्मरी एवं बस्तिविकारों में इसका उपयोग किया जाता है । प्रदर, रक्तप्रदर एवं रक्तार्श में इसकी जड़ एवं बला को चावल के धोवन के साथ पीसकर देने से लाभ होता है । मात्रा-३-६ माशा । अथ कत्तृणम् (रोहिस इति च) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह कत्तृणं रौहिषं देवजग्धं सौगन्धिकं तथा । भूतिकं ध्यामपौरञ्च श्यामकं धूपगन्धिकम् ।। १६७ ।। रौहिषं तुवरं तिक्तं कटुपाकं व्यपोहति । हृत्कण्ठव्याधिपित्तास्रशूलकासकफज्वरान् ।। १६८ ।। 'रोहिस' नाम से प्रसिद्ध कत्तृण के नाम तथा गुण-कत्तृण, रौहिष, देवजग्ध, सौगन्धिक, भूतिक, ध्यामपौर, श्यामक तथा धूमगन्धिक ये सब 'रोहिस' वाचक शब्द हैं । रोहिस-स्वाद में कषाय तथा तिक्तरसयुक्त एवं विपाक में कटुरसयुक्त होता है और हृदय तथा कण्ठसम्बन्धी रोग, पित्तरक्त (रक्त पित्त), शूल, कास (खाँसी) तथा कफज्वर को नष्ट करता है । [१६७-१६८] ८४. रोहिष घास हिं०-रोहिस, रूसा घास, रतहर, मिरचा गन्ध । बं०-अगम घास । म०-रोहिषगवत । क०-डुंल्लु । फा०- खवालमागून, खलालमामून, खबालमामून । गु०-रोंडसो । अं०-Rosha Grass (रोषा ग्रास) । ले०-Cymbopogon schoenanthus Linn. (साइम्बोपोगोन् स्कीनैन्थस् लिन.) । Fam. Gramineae (ग्रेमिनी) । यह मध्य भारत, दक्षिण और पश्चिमोत्तर प्रान्त तथा पञ्जाब में अधिक पाई जाती है । यह वन उपवनों में आप ही आप उत्पन्न होती है और वाटिकाओं में भी रोपण की जाती है । यह ५-६ फीट ऊँची एक सुगन्धित घास है । इसकी जड़ बारहौं मास जीवित रहती है । काण्ड-चिकने, पत्रयुक्त तथा प्रायः रक्ताभ होते हैं । पत्ते-बहुत लम्बे, क्रमश: पतले, चिकने, कोमल, नुकीले, कांडासक्त तथा आधार पर गोल CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA