भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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५५२ भावप्रकाशनिघण्टुः

या तांबुलाकार होते हैं। पत्तों को मसलने से सुगन्ध आती है। पुष्प-लाल, बादामी रंग के पत्रकोश से ढँकी हुई विदण्डिक मञ्जरियां आती हैं। वर्षा एवं शीतकाल में फूल-फल आते हैं। रासायनिक संगठन-इसकी पत्तियों से एक सुगन्धित तेल (Geranium oil- जिरेनियम् ऑयल) निकाला जाता है। कोमल घास से तेल अधिक एवं उत्तम प्रकार का निकलता है। इसका रंग फीका ललाई लिये जामुनी रंग का होता है। इसमें गन्ध गुलाब जैसी तथा स्वाद में यह अदरख की तरह चरपरा एवं रुचिकर होता है। गुण और प्रयोग-इसमें का तेल उष्ण, स्वेदजनन, मूत्रजनन, ज्वरघ्न, उत्तेजक, चेतनाकारक एवं त्वग्भागकारक है। नूतन आमवात में तैल मलने से लाभ होता है। गंजापन (इन्द्रलुप्त) पर इस तैल को मलते हैं। प्रतिश्याय, ज्वर, अजीर्ण तथा कफविकारों में इसके क्वाथ से लाभ होता है। मात्रा-३-६ माशा। अथ भूतृणम् (शरबाण) तस्य नामगुणानाह गुह्यबीजं तु भूतीकं सुगन्ध्यं जम्बुकप्रियम्। भूतृणं तु भवेच्छत्रा मालातृणकमित्यपि ।।१६९।। भूतृणं कटुकं तिक्तं तीक्ष्णोष्णं रेचनं लघु। विदाहि दीपनं रूक्षमनेत्र्यं मुखशोधनम् ।।१७०।। अवृष्यं बहुविट्कञ्च पित्तरक्तप्रदूषणम् ।।१७१।। शरबाण के नाम तथा गुण-गुह्यबीज, भूतीक, सुगन्ध्य, जम्बुकप्रिय, भूतृण, छत्रा और मालातृणक ये सब शरबाण के नाम हैं। शरबाण-कटु तथा तिक्तरसयुक्त, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, रेचक, लघुपाकी, दाहजनक, अग्निदीपक, रूक्ष, नेत्रों के लिये अहितकर, मुख को शुद्ध करनेवाला, अवृष्य (वीर्यवृद्धि नहीं करने वाला), अत्यन्त मल उत्पन्न करने वाला और पित्तरक्त को दूषित करने वाला होता है। [१६९-१७१] नोट-भृतृण के लेटिन नाम के सम्बन्ध में मतभेद हैं। श्री यादवजी ने साइम्बोपोगोन् ज्वरांकुश (Cymbopogon jwarankusa) को भूतृण माना है जिसका वर्णन पहले पृष्ठ २६१ पर 'लामज्जक' के अन्तर्गत किया जा चुका है। कुछ विद्वानों ने हरी चाय, साइम्बोगोन् साइट्रोटस् (Cymbopogon citratus) को भूतृण माना है किन्तु इसे श्री यादवजी 'जम्बीरतृण' मानते हैं जिसका चरक सू० अ० २७ में हरित वर्ग में एवं सुश्रुत सू० अ० ४६ में शाक वर्ग लिखित में वर्णन आया है। यहाँ पर निम्नलिखित वर्णन हरीचाय का किया गया है। ८५. भूतृण (हरीचाय) हिं०-शरबाण, भूतृण, गन्धतृण, अगियाखर, हरीचाय, गन्धबेना। बं०-गन्धतृण। गु०-लीलीचा। म०- हिरवा चहा, ओला चहा। क०-मज्जिगेहुल्लु। पं०-गन्धतृण, शरवाण, रामकर्पूर। ता०-कर्पूर पुल्ल। ते०- चिप्पगंड्डि। अं०-Lemon Grass (लेमन् ग्रास); ले०-Cymbopogon-citratus (DC.) Stapf. (साइम्बोपोगॉन् साइट्रेट्स् डीसी. स्टा.); Andropogon citratus DC. (एण्ड्रोपोगॉन साइट्रेटस डीसी.)। Fam. Gramineae (ग्रैमिनी)। यह भारतवर्ष के अनेक प्रान्तों में विशेषकर पंजाब और संयुक्त प्रान्त की पहाड़ी भूमि तथा वाटिकाओं में भी उत्पन्न होती है। यह ५-७ फीट ऊँची घास है। पत्ते-३-४ फीट लम्बे, पौन इञ्च चौड़े होते हैं। पुष्प-उभयलिङ्गी पुष्प की मञ्जरियाँ वर्षाकाल में आती हैं। इसकी पत्ती को मसलने से उसमें से नींबू की तरह सुगन्ध आती है। इस तृण का फांट बनाकर उसमें दूध और चीनी मिलाकर चाय की तरह पीते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें एक सुगन्धित उड़नशील तैल होता है जिसे Indian Melissa oil (इंडियन् मेलिसा ऑइल), Indian oil of Verbena (इंडियन् ऑइल् ऑफ वर्बेना) कहते हैं। यह गहरे पीत या भूरे से लाल रंग का नींबू की गन्ध जैसा होता है। इस तैल में प्रधान रूप से सिट्राल (Citral, C10 H16 O) नामक पदार्थ होता CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA